Wednesday, October 31, 2018

बीकानेर की पहली महिला वकील और विधायक कान्ता कथूरिया (16 दिसंबर, 2011)

बीकानेर की राजनीति की एक समय अहम् शख्सीयत रहीं कान्ता कथूरिया का निधन कल जयपुर में हो गया। 78 वर्षीय कान्ता कथूरिया का जन्म बीकानेर में ही 24 अगस्त, 1933 को हुआ था। बीकानेर के तत्कालीन शासक गंगासिंह ने उनके पिता को कराची से बुला कर स्थानीय म्युनिसिपलिटी में चीफ इंजीनियर का पद दिया था। कान्ता कथूरिया ने अपने सार्वजनिक जीवन की शुरुआत एक वकील के रूप में उस समय के जाने माने वकील सूरजकरण आचार्य के सहायक के तौर पर में की और यहां की पहली महिला वकील बनी। आज भी जब महिलाएं राज के साथ 33 प्रतिशत आरक्षण की जद्दोजहद में हैं, कान्ता कथूरिया आजादी के शुरुआती दौर से ही बारास्ता स्थानीय निकाय बीकानेर की चार विधानसभा सीटों में से एक कोलायत से 1967 में विधायक चुनी गयीं और 1972 में इसी सीट से दुबारा भी। यद्यपि उस समय कोलायत विधानसभा के आधे से ज्यादा मतदाता शहरी ही थे। लेकिन भौगोलिक रूप से यह विधानसभा क्षेत्र पाकिस्तान की सीमा तक फैला हुआ था। उस समय के लगभग बीहड़ इस इलाके से एक महिला का चुनाव लड़ना और जीत कर आना उल्लेखनीय तो है ही।
राज्य की राजनीति में भी कान्ता कथूरिया उस समय के मुख्यमंत्री और राज्य कांग्रेस में सर्वाधिक ताकतवर मोहनलाल सुखाड़िया के विरोधी खेमे में रहीं, और न केवल रहीं बल्कि कहा जाता है कि सन् 1969 के राष्ट्रपति चुनाव में राज्य के जिन पांच विधायकों ने कांग्रेस पार्टी के अधिकृत प्रत्याशी नीलम संजीवा रेड्डी के खिलाफ इंदिरा गांधी समर्थित प्रत्याशी वी वी गिरि को वोट दिया, उनमें से एक कान्ता कथूरिया भी थीं। वो भी तब मुख्यमंत्री मोहनलाल सुखाड़िया पार्टी के अधिकृत प्रत्याशी के साथ थे। यदि यह सच है तो इसके दो कारण मान सकते हैं। एक तो यह कि महिला होने के नाते उन्होंने इंदिरा गांधी का साथ दिया या फिर राज्य की कांग्रेस राजनीति में सुखाड़िया विरोधी मथुरादास माथुर खेमे में होने के कारण उन्होंने ऐसा किया। बीकानेर की राजनीति में 1967 का विधानसभा चुनाव काफी परिवर्तनकारी था। इससे पहले यहां समाजवादी पार्टी का असर जोरों पर था। 1957 और 1962 का बीकानेर विधानसभा चुनाव प्रजा समाजवादी पार्टी के मुरलीधर व्यास ने जीता था। विधान सभा के कोलायत क्षेत्र का पहला चुनाव 1962 में हुआ और यहां से भी प्रजा समाजवादी पार्टी के मानिकचंद सुराना विजयी रहे। लेकिन 1967 के विधानसभा चुनाव परिणाम पलट गये। भीलवाड़ा से लौट कर स्थानीय राजनीति में आये गोकुलप्रसाद पुरोहित बीकानेर सीट से और कान्ता कथूरिया कोलायत सीट से विजयी रहे। दोनों ही कांग्रेसी उम्मीदवार थे। सन् 1977 को छोड़ दें तो तब से अब तक बीकानेर की सक्रिय राजनीति में कोई उल्लेखनीय भूमिका समाजवादी नहीं निभा पाये।
सन् 1970 में बीकानेर नगर परिषद के चुनाव हुए। कांग्रेस का बोर्ड बना लेकिन बीकानेर की कांग्रेस दो खेमों में बंट गई। एक गोकुलप्रसाद पुरोहित का खेमा और दूसरा कान्ता कथूरिया का। परिषद अध्यक्ष गोपाल जोशी बने, ये पुरोहित खेमे से थे, मक्खन जोशी और जनार्दन कल्ला भी इन्हीं के साथ थे। साथ तो अशोक आचार्य भी थे लेकिन कान्ता कथूरिया ने आचार्य को अपने साथ कर लिया और इसी के चलते अशोक आचार्य नगर परिषद के उपाध्यक्ष भी चुने गये।
1977 के विधानसभा चुनावों में गोपाल जोशी जैसी ही गलती विधायक रहते हुए कान्ता कथूरिया ने भी की थी, पार्टी टिकट से चुनाव लड़ने की अनिच्छा जाहिर करके। तब साहस दिखाया विजयसिंह एडवोकेट ने, उन्होंने कांग्रेस टिकट से कोलायत से चुनाव लड़ा हालांकि वे रामकृष्णदास गुप्ता से हार गये, जो उस समय दिखता ही था। 1980 के चुनावों में गोपाल जोशी को तो उन्हीं के रिश्ते में साले बुलाकीदास कल्ला ने शहर की राजनीति लगभग बाहर कर दिया, जो अब 2008 में पुनः काबिज हो पाये। चुनौती हीनता की स्थिति में कान्ता कथूरिया ने 1980 और 85 में चुनाव तो कोलायात से लड़ा लेकिन जीत नहीं पायी। इन दो हारों से कान्ताजी कोलायत क्षेत्र से पूरी तरह नाउम्मीद हो गईं और अपना ज्यादातर समय जयपुर में ही गुजारने लगीं। उन्होंने तब तक राज्य की राजनीति में एक हैसियत प्राप्त कर ली थीं। वो ना केवल प्रतिष्ठित राज्य लोकसेवा आयोग और संघ लोकसेवा आयोग की सदस्य रहीं बल्कि समाज कल्याण बोर्ड, राजस्थान सिन्धी अकादमी, राज्य भंडार निगम और राज्य महिला आयोग की समय-समय पर चेयरपर्सन भी रहीं।
आज की राजनीति जिस मुकाम पर है उसके शुरुआती संवाहकों में कान्ता कथूरिया का नाम भी लिया जाता है। यह उनका नकारात्मक पहलू भी है।
--दीपचंद सांखला
16 दिसम्बर, 2011

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