Thursday, January 24, 2019

एल्युमनी के बहाने सादुल पब्लिक स्कूल की बात (13 मार्च, 2012)

कहते हैं विद्यार्थी जीवन को लगभग सभी याद करते हैं, जिनमें इस याद की तीव्रता ज्यादा होती है और जो स्कूल या कॉलेज विशेष में बिताए लमहों को भूल नहीं पाते वे उस स्कूल-कॉलेज के जिक्र के बहाने भी ढूंढ़ते रहते हैं,  इन बहानों की अभिव्यक्ति का एक तरीका एल्युमनी एसोसिएशन यानी संस्थान विशेष के पूर्व छात्रों का संगठन भी होता है। बीकानेर के सरदार पटेल मेडिकल कॉलेज के पूर्व छात्रों का संगठन पिछले पच्चीस से भी ज्यादा वर्षों से सक्रिय है, इसी तरह वेटेनरी कॉलेज, बीके स्कूल और स्पोर्ट्स स्कूल के छात्रों के संगठनों की सुर्खियां भी यदा-कदा देखने को मिलती हैं। मेडिकल कॉलेज, वेटेनरी कॉलेज और बीके स्कूल को छोड़ दें तो स्पोर्ट्स स्कूल के पूर्व छात्रों का दीवानापन समझ से बाहर है। इस स्कूल के इतिहास को देखें तो इसने अब तक तीन करवटें ली है। आजादी से पहले यह वाल्टर नोबल्स स्कूल कहलाता था जिसमें सामन्तों और सेठ-साहूकारों के किशोर ही पढ़ पाते थे। बाद में इसको थोड़ा व्यापक रूप देते हुए सादुल पब्लिक स्कूल नाम दिया गया जिसमें छात्रवृत्तियों के माध्यम से आये दलितों के कुछ किशोरों को छोड़ दें तो उच्च, उच्च मध्यम और जमींदार परिवारों के विद्यार्थियों की पहुंच ही इस संस्थान तक हो पाती थी।
पिछली सदी के आठवें दशक के मध्य में जब देश के प्रत्येक राज्य में एक स्पोर्ट्स स्कूल विकसित करने की घोषणा हुई तो राजस्थान सरकार को सादुल पब्लिक स्कूल का परिसर इसके लिए सबसे उपयुक्त लगा। क्योंकि इसमें न केवल एक से अधिक खेल मैदान थे बल्कि इन्डोर स्टेडियम, टेनिस कोर्ट, बास्केट बॉल  कोर्ट, बैडमिन्टन कोर्ट, वॉलीबॉल कोर्ट आदि-आदि सहित व्यवस्थित तीन छात्रावासों के साथ भव्य भवन भी था।
नोबल्स स्कूल और पब्लिक स्कूल के समय की बात करें तो जिन पारिवारिक अनुकूलताओं से विद्यार्थी आते थे उनको हासिल सुविधाओं और संसाधनों के चलते वे जीवन में अपने लिए कुछ ना कुछ उल्लेखनीय उपलब्ध कर ही लेते थे, इसी के चलते कई उल्लेखनीय व्यक्तित्व इस स्कूल की देन मान सकते हैं। लेकिन पिछले पैंतीस से ज्यादा वर्षों से, जबसे इसे स्पोर्ट्स स्कूल में परिवर्तित किया गया, तब से इस स्कूल की उपलब्धि-व्यक्तित्व अंगुलियों पर गिनने जितने भी नहीं कहे जा सकते। अन्य सरकारी संस्थानों की ही तरह यह स्कूल भी लगातार बद से बदतर स्थितियों में गुजर-बसर कर रहा है। इसके मानी यह नहीं है कि इसको फंड नहीं मिल रहे हैं। आज भी वहां लाखों रुपये मासिक के सार्वजनिक धन का दुरुपयोग हो रहा है। दुरुपयोग इसलिए कहा क्योंकि इस धन से कोई बहुत उल्लेखनीय परिणाम नहीं मिल रहे। खेलों में राज्य के दो-चार नाम कभी चमकते भी हैं तो उनमें इस स्कूल का कोई योगदान नहीं देखा गया।
उक्त सब लिखने के मानी केवल आलोचना करनख मात्र नहीं है, एल्युमनी एसोसिएशन को सुझाव देना भर है कि केवल बिल्डिंगों को, मैदानों को ठीक करवाने से या इधर-उधर से फंड उपलब्ध करवाने मात्र से इन संस्थानों की दशा सुधरने वाली नहीं है। जरूरत ठकुरसुहाती छोड़ कर वहां के अध्यापकों की, खेल प्रशिक्षकों की और अन्य कर्मचारियों की मंशा बदलने की है ताकि वह अपनी ड्यूटी को--अपने धर्म को निभायें और यह भी कि किसी भी तरह की फैकल्टी और स्टाफ की यदि कमी है तो प्रदेश से ड्यूटी-फुल लोगों को चुन कर लगवाने के प्रयास कर इस संस्थान को पूर्णता प्रदान करें। नहीं तो इस स्पोर्ट्स स्कूल के सन्दर्भ में माना यही जायेगा कि इस के परिसर रूपी शरीर में स्पोर्ट्स स्कूल रूपी तीसरी आत्मा के रहते दूसरी आत्मा सादुल पब्लिक स्कूल के मोह रखने वाले  बौराये हुए हैं।
दीपचंद सांखला
13 मार्च, 2012

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