Thursday, July 13, 2023

आईने को आईना दिखाने की ख्वाहिश

 अखबारों को देश, दुनिया और समाज का आईना मान लें तो लगता है कि ना केवल यहां के बाशिन्दे बल्कि यहां के सभी कार्यालय और संस्थान सक्रिय हैं, यह सक्रियता सकारात्मक भी है-नकारात्मक भी, कर्म भी हो रहे हैं और कुकर्म भी। कोई अपनी खुशियां जाहिर करता दीखता है तो कोई अपनी कुंठा। कुछ गड़बडिय़ां करने में लगे हैं तो कुछ इन गड़बडिय़ों को रोकने और पकडऩे में। कुछ अपनी राजनीति को चमकाने में लगे हैं तो कुछ केवल इसी जुगत में ही लगे रहते हैं कि दूसरे की चमक की दमक कम कैसे की जाय।

वैसे हम अखबार-टीवी वाले या मान लो मीडिया वाले दावा तो यही करते हैं कि हम इस देश, दुनिया और समाज का आईना हैं-होगा ही, हम ही क्यों विरोध करें इसका। लेकिन यह तो है ही कि कुछ थोड़े लोग ही हैं जो हमेशा इस आईने के मुखातिब पाये जाते हैं, आईने की भी अपनी सीमाएं हैं ही कि जो उसके सामने है उन्हीं को ही तो उनका अक्स दिखाएगा। शेष जो भी हैं वो इन मुखातिबों की आड़ में आ जायें तो इस आईने में दिखेंगे कैसे और तब इस आईने का दोष क्या? अब बात इस तरह करें कि समस्या इस आईने की सीमाओं की है या उन कुछ लोगों की, जो हमेशा अपने को आईने के सामने ही बनाये रखते हैं या बने रहने में सफल होते हैं। अब कह सकते हैं कि वे जब लगे ही इस जुगत में रहते हैं कि इस अखबार टीवी रूपी आईने में उनका ही अक्स दीखता रहे तो उन्हें हम निकम्मा तो कैसे कह सकते हैं-आखिर जुगत करना भी तो कर्म में ही आयेगा। अब कृष्ण ने भी गीता में यही तो कहा कि कर्म किये जा फल की चिन्ता ना कर। उन्होंने यह तो नहीं कहा कि फल को देख भी मत और दिखा भी मत।

अब एक और मजेदार बात ध्यान में आई है, वह यह कि जो लोग इस टीवी-अखबारी आईने में बने रहने की जुगत में लगे रहते हैं और शेष कुछ वे लोग जो किसी कोण-बदकोण से इस आईने की झलक देखने को आतुर, उतावले या व्यसनी होते हैं—ऐसे दोनों ही प्रकार के लोग उन सबसे बहुत कम हैं जो इस देश, दुनिया और समाज के शेष और असल बाशिन्दे हैं। उनकी परवाह तो दूर की बात है, ऐसे शेष लोगों की दिनचर्या की जद्दो-जहद में और उनके ऐजेन्डे में ना हमारे इस टीवी-अखबारी आईने की गिनती है और ना ही उसमें अपने चेहरे को किसी कोण-बदकोण से देखने की जुगत और उत्सुकता। उनकी हर सुबह शुरू होने वाली दौड़-धूप का कुल जमा मकसद अपना पेट पालना और तन पर कपड़े और छत का छप्पर है तो उसे बचाये रखना भर है। अपने देश में इस आधी से अधिक जनसंख्या का ये टीवी-अखबार ना तो आईना हैं और ना ही बनने की ख्वाहिश। क्योंकि ऐसे लोग ना तो हमारी प्रसार संख्या बढ़ाने वाले पाठक हैं और ना टीआरपी के नमूना दर्शक, और जब ऐसा नहीं हैं तो हमारा लेना-देना ही क्या है उनसे! पर हम टीवी-अखबार वाले भी किसी वहम में ना रहें—वे लोग भी हमें कुछ नहीं जानते-समझते हैं?

दीपचन्द सांखला

20 अप्रेल, 2012


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