Thursday, July 13, 2023

ये विवेकाधीन कोटे

 एकता कपूर के सिरियल टीवी पर जब परवान पर थे, उस समय एक बात बड़ी अटपटी लगती थी-उनमें जो परिवार दिखाये जाते थे, उन परिवारों के लोग आपसी बातचीत में और षड्यंत्रों में सैकड़ों करोड़ से कम की बात नहीं करते थे-एकता कपूर के उस टीवीय दौर को कोई बहुत लम्बा समय नहीं गुजरा है-अब जब हजारों करोड़ के घपले आम हो रहे हैं तो लगता है कि एकता आने वाले कल को देख रही थी।

यद्यपि आज बात सैकड़ों करोड़ की तो नहीं करेंगे-फिर भी कुल जमा इन करोड़ों का हिसाब सैकड़े में ही बैठेगा। कल विधानसभा के बजट सत्र में मुख्यमंत्री ने घोषणा की है कि अब से प्रत्येक विधायक अपने क्षेत्र में विधायक निधि से एक करोड़ की बजाय दो करोड़ रुपये प्रतिवर्ष खर्च कर सकेगा। अच्छा ही है, जनता का पैसा है जनता की सुविधाओं पर खर्च करने के एक रास्ते को और चौड़ा कर दिया गया है। लेकिन जनता में इसकी कोई उत्साहजनक प्रतिक्रिया नहीं देखी जा रही है। हां, विधायकों की बांछें जरूर खिली देखी जा सकती हैं। जब से यह कोटा शुरू हुआ है, इस धन से शायद ही कोई ऐसा काम हुआ हो जिसे सचमुच सार्वजनिक कहा जा सके।

अब हम इस कोटे पर अपने बीकानेर के सन्दर्भ में ही बात कर लें-जिले से सात विधायक और एक सांसद हैं-अब चौदह करोड़ इन विधायकों के कोटे के और पांच करोड़ सांसद कोटे के मिला कर कुल उन्नीस करोड़ प्रतिवर्ष मिला करेगा। अब तक मिल रहे थे बारह करोड़। यह धन प्रतिवर्ष इसी जिले में लगता रहा है। सांसद कोटे के जिले से बाहर के अनूपगढ़ के हक को छोड़ भी दें तो भी मोटा-मोट ग्यारह करोड़ रुपये तो प्रतिवर्ष यहां खर्च हो ही रहे होंगे।

इस धन को सचमुच विवेकपूर्ण तरीके से खर्च किया जाता तो यहां की घोषित कच्ची बस्तियों के बाशिंदे-उनका जीवन, महिलाओं की दयनीय स्थिति और वहां के बच्चों के छिनते बालपन को सहज जीवन की जरूरतें मुहैया करवाई जा सकती थीं। लेकिन अधिकांश पैसा या तो सामुदायिक भवनों के नाम पर वोट प्रभावी जातिय समूहों के भवनों पर खर्च हुआ या ऐसे ही किन्हीं स्वार्थपूर्ण कार्यं में। वो भी कोई बहुत ढंग से खर्च नहीं हुआ, इस तरह से बने भवन गुणवत्ता के नाम पर कमजोर पाये जायेंगे। और अगर जागरूक समाज नियंताओं के चलते गुणवत्ता कुछ ठीक हो भी गई है तो सब के सब भवन हैं कुरूप ही-काम में कोई फिनीशिंग नहीं देखी जा सकती। धनाढ्य जातीय समूहों के भवनों से इनकी तुलना तो की ही नहीं जा सकती-सब काम राजीव गांधी की बात को ही टेर देते लगते हैं कि जनता तक रुपये का पंद्रह पैसा ही पहुंचता हैं।

इस कोटे की शहर में अजब-गजब चर्चाएं होती रही हैं कि एक सांसद ने अपनी दूकान के आगे नाली भी सांसद कोटे से बनवाली तो एक सांसद को तीस प्रतिशत देकर इस कोटे का पैसा अपने किसी भी काम में लगवा लो-खैर जनता है, प्रतिध्वनि (इको) तो करेगी ही!

बीकानेर जिले के विधायकों और सांसद से अनुरोध है कि वे सचमुच का कुछ करना चाहते है तो इस धन को खर्च करने की मदों को बदलें-शहर और गांवों में बहुत-सी बस्तियां हैं जिनके निवासी—उल्लेख करें तो वहां की महिलाएं और बच्चे नारकीय जीवन जीने को अभिशप्त हैं– उन कॉलोनियों-बस्तियों की सड़कों, नालियों को ठीक करवायें-पीने के स्वच्छ पानी की व्यवस्था करवायें और ऐसी बस्तियों के बच्चों और महिलाओं के लिए बहुद्देशीय केन्द्र विकसित करवायें। जिनकी देखभाल की व्यवस्था सांसद और विधायक खुद निजी स्तर पर करवायें ताकि इन बस्तियों के निवासी अपने जीवन के कुछ पल सुकून से गुजार सकें। और, यह भी कि उनको ऐसे अवसर भी सुलभ करवाएं जिससे कि वे अपने जीवन और भविष्य को सरस बनाने का तरीके सीख सकें।

इस धन को खर्च करने का अब असली और एकमात्र मकसद वोट-बैंक बनाना ही रह गया हो तो वो भी सुझाये तरीके से धन को खर्च करने से ज्यादा कारगर ढंग से पूरा होगा और कुछ सकारात्मक और जरूरी काम भी हो जायेंगे?

दीपचन्द सांखला

21 अप्रेल, 2012

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