पीबीएम अस्पताल के लाइफ सेविंग मेडिकल स्टोर में लगभग बावन लाख रुपये का घपला उजागर हुआ है, संभागीय आयुक्त ने इसकी जांच भ्रष्टाचार निरोधक ब्यूरो को सौंप दी है।
जब से यह घपला उजागर हुआ तब से प्रशासन और आरोपी, दोनों ओर से सक्रियता दिखाई जा रही है। प्रशासन ने दो लिपिकों को निलंबित कर दिया तो दूसरी ओर आरोपियों ने कई टुकड़ों में 'घपले से प्राप्त' सत्ताईस लाख रुपये जमा कराने की शैली में लौटा दिये हैं। यह सब बातें वो हैं जो समाचारों से वास्ता रखने वालों को मालूम हैं। लेकिन यह घपला जब हो रहा था तब क्या सचमुच ऐसा था कि इस घपले से लाभ उठाने वालों के अलावा किसी को भी इस घपले का भान नहीं था! अगर यह कह भी दें तो क्या आप पाठकों में से कोई इसे स्वीकार करेगा? शायद, नहीं!
समाज में हो रहे अधिकतर अनैतिक, अवैध और असामाजिक कुकर्मों की जानकारी बहुत से लोगों को होती और रहती है, लेकिन बहुत कम लोग ऐसे होते हैं जो इसके खिलाफ जबान खोलते हैं और ऐसे और भी कम होते हैं जो गलत होते को टोकते हैं। किसी भी कुकृत्य को यदि टोका नहीं जाता है या सीधे ना भी टोकें तो कम से कम उसे भुंडाया तो जाना ही चाहिए। इस तरह टोकने-भुंडाने से बचने की प्रवृत्ति से संदेश यह जाने लगा है कि इन सब कृत्यों को समाज की मौन स्वीकृति हासिल है, और इस मौन स्वीकृति की धारणा के चलते ही समाज के अधिकतर समर्थ दिन-ब-दिन भ्रष्ट से भ्रष्टतर होते जा रहे हैं।
पीबीएम अस्पताल के बारे में कहते हैं कि इसके बजट में इतना धन आता है कि उसको बरतने वालों को होने वाले ऊपर के कुल वारे-न्यारे का हिसाब लगायें तो वह सालाना करोड़ों रुपयों में बैठता है। ढाई-तीन दशक पहले इसी पीबीएम को लेकर एक बात सुनने को मिली थी कि इसके अधीक्षक पद पर ईमानदार छवि के एक डॉक्टर नियुक्त हुए। उस समय ग्लूकोज कांच की बोतल में आया करता था। सप्लायर द्वारा खुद तय या रीत के अनुसार पीबीएम को आपूर्ति होने वाले ग्लूकोज की प्रति बोतल पर एक रुपया अधीक्षक का बनता था-शुरू में अधीक्षक ने आनाकानी की और नाराज भी हुए-लेकिन सप्लायर कब हार मानने वाले थे, उन्हें लगने लगा कि यह तो 'व्यावसायिक ईमानदारी' नहीं है। तब वो तर्क यह लाये कि भवन निर्माण का सामान बेचने वाले चिनाई, सुथारी और बिजली के चलवों को जो दस्तूरी देते हैं उस दस्तूरी को प्राप्त सामाजिक स्वीकृति का हवाला देकर उन घोषित ईमानदार अधीक्षक महोदय को रिश्वत देनी शुरू कर दी। कहते हैं कि केवल ग्लूकोज बोतलों की उस तथाकथित दस्तूरी की प्रतिमाह की राशि उन अधीक्षक महोदय की तनख्वाह से ज्यादा बैठती थी। यह सब बात तो सप्लायर और अधीक्षक के बीच की रही तो फिर आम कैसे हुई? होती कैसे नहीं उन सप्लायर महोदय ने मीर जो मार लिया था। पूरी जिन्दगी ईमानदार की छवि वाले व्यक्ति को बेईमान बना दिया। इसका ढिंढोरा भी सप्लायर ने खुद ही पीटा।
यह सब बताने के मानी ये है कि जब आप का बोस बेईमान होगा और इसकी जानकारी नीचे वालों को जब होगी तो फिर वे अनुचित लाभ उठाने से क्यों चूकेंगे? आज जिस तरह पीबीएम के पूरे परिसर में बदबू तारी रहती है। ठीक इसके विपरीत कोई तीस-चालीस साल पहले तक इसी पीबीएम अस्पताल की व्यवस्था की तारीफ की खुशबू दूर-दूर तक महसूस की जाती थी और चर्चे सुने जाते थे-अब तो ऊपर से लेकर नीचे तक के सरकारी सेवकों में शायद कम ही होंगे जो बे-हक को गू मानते हों या अपनी ड्यूटी पूरी निष्ठा से करते हों। कितने डॉक्टर अपनी शपथ पर खरे हैं? जब डॉक्टर नहीं होंगे तो नर्सिंग स्टाफ क्यों खरा होगा, क्लीरकल स्टाफ क्यों कर्तव्यनिष्ठ होगा और क्यों चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी अपनी ड्यूटी बजायेगा।
आजकल सुना तो यह जाता है कि आउटडोर में अधिकतर डॉक्टर अन्य इन्स्ट्रूमेंट से जांच तो दूर मरीज के स्टैथेस्कोप लगाने की जहमत तक नहीं उठाते। आये मरीज को आफत ही समझते हैं। क्योंकि वे जिस पोस्ट पर बैठे हैं वहां या तो बेमन से बैठे हैं या यहां बैठे रहने के लिए राजनीतिज्ञों को मोटा धन पहुंचाते हैं। और उन्हीं डॉक्टर के घर दिखाने चले जाओ तो न केवल स्टैथेस्कोप लगाएंगे बल्कि देखने भर को कुछ इन्स्ट्रूमेंट से और देखेंगे, यह भी कि रुक्के में चार-छ: जांच करवाने का भी लिखा होगा-कहते हैं आजकल जांच करने वाली लेबों में से कई जांच लिखने वाले डॉक्टर को चालीस से साठ प्रतिशत तक कमीशन पहुंचाते हैं। समाज में जब सभी समर्थ भ्रष्ट होने की दौड़ में लगे हों तो इन डॉक्टरों से और स्वास्थ्य कर्मचारियों से ईमानदारी की उम्मीद करना बेकार है। समाज को गलत होते कामों को टोकना और उनके खिलाफ मुखर होना होगा-अन्यथा अखबारों और टीवी वालों को भ्रष्ट आचरण की खबरें छापने-दिखाने को और आपको पढऩे-देखने को अकसर मिलती रहेंगी।
—दीपचन्द सांखला
12 अप्रेल, 2012
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