Thursday, July 13, 2023

ये अच्छे-अच्छे कानून

 सर्वोच्च न्यायालय ने निजी स्कूलों में पचीस प्रतिशत सीटें निर्धन परिवारों के बच्चों के लिए तय करने को बने कानून को वैध ठहराया है। शिक्षा का अधिकार कानून समतामूलक समाज की दिशा में बड़ा और अच्छा कदम है।

आजादी बाद के पैंसठ सालों में देश में जितने कानून बने हैं उन्हें शासन और व्यवस्था द्वारा निष्ठापूर्वक लागू किया जाता और जनता द्वारा कर्तव्य मान कर उन्हें स्वीकार किया गया होता तो देश की तसवीर दूसरी होती-शायद सोने की चिडिय़ा जैसी ही कुछ।

दलितों और आदिवासियों के उत्थान के लिए बने आरक्षण कानून के दायरे से क्रीमीलेयर को बाहर न रखने के चलते जहां असल जरूरतमंदों के लिए यह दूर की कौड़ी बनता जा रहा है वहीं गैर आरक्षित वर्ग इसे बोझ मानने लगा है। क्रीमीलेयर को इस सुविधा के चलते ही दलितों-आदिवासियों में भी उच्च और निम्न वर्ग बनते जा रहे हैं। आरक्षण जैसा मानवीय कानून क्रियान्वयन की अपनी कमियों के चलते जितना समाधान मूलक होना चाहिए उतना नहीं हो पा रहा है।

अब यदि शिक्षा का अधिकार कानून के अंतर्गत निजी स्कूल कोई ऐसी व्यवस्था विकसित कर लें कि वे कानूनी प्रावधानों से बच भी जायें और इन निर्धन परिवारों के बच्चों को पढ़ाना भी ना पड़े-इस इंस्पेक्टरी राज में सबकुछ संभव है-और यह तय है कि अधिकतर स्कूल ऐसा कर पाने में सफल होंगे।

मनरेगा (महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी कानून) जैसी स्कीम में सरकार द्वारा घपले की गुंजाइश के छेद लगातार बंद किये जाने के बावजूद निकालने वाले घपले की गुंजाइश निकाल ही लेते हैं- अन्यथा देश भर से मनरेगा और एनआरएचएम (राष्ट्रीय ग्रामीण स्वास्थ्य मिशन) जैसी योजनाओं में बड़े घपलों के समाचार आये दिन देखने-सुनने को नहीं मिलते। छोटे-मोटे घपले, गड़बडिय़ों के समाचार तो अब बनने ही बन्द हो गये हैं।

कुछ तो कानून बनते ही शायद तोडऩे के लिए हैं-जैसे सार्वजनिक स्थानों पर धूम्रपान न करना, प£ास्टिक की थैलियों का उपयोग न करना, मिठाई के साथ डिब्बे को ना तोलना, मिलावट ना करना, नकली माल न बेचना, कम ना तोलना, एमआरपी से ज्यादा दर पर ना बेचना, बिना बिल (केशमीमो) के माल ना बेचना, घरेलू गैस सिलेंडरों का व्यावसायिक उपयोग ना करना, बिना हेलमेट दुपहिया और बिना बेल्ट चौपहिया वाहन न चलाना, वाहनों का अवैध आवागमन ना होना, जुआ-सट्टा ना खेलना, शराब की दुकान समयबद्ध खोलना व बंद करना, घोषित शुष्क दिवस पर शराब का विक्रय नहीं होना, पेड़ ना काटना, अवैध खनन ना करना आदि-आदि।

एक और कानून है बाल विवाह के खिलाफ। अपने प्रदेश में शायद जितने विवाह बालिगों के यानी वैध उम्र में होते हैं, उनसे ज्यादा नाबालिगों के होते हैं-अभी इसी महीने अक्षय तृतीया है। एक महीने पहले से बाल विवाहों के खिलाफ जन जागरण अभियान चल रहे हैं, थोड़े दिनों में टीवी-अखबारों में इनके खिलाफ विज्ञापन आने शुरू हो जायेंगे-करोड़ों रुपया खर्च होगा इन सब पर, बात वहीं की वहीं! हजारों नाबालिग जोड़े या बालिग लड़के के साथ नाबालिंग लड़कियां धड़ल्ले से विवाह बंधन में बंध जायेंगे। यह भी कि कई गांवों से यह सुनने को भी आता है कि पुलिस थानों को थानासिगरी भोजन तक पहुंचाया जाता है ऐसे मौकों पर! क्योंकि इस गैर कानूनी काम में धन की रिश्वत को वाजिब नहीं गिना जाता है।

दीपचन्द सांखला

13 अप्रेल, 2012


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