राजेन्द्र राठौड़ की गिरफ्तारी को लेकर भाजपा ने कल जब विधानसभा में गतिरोध बनाया तो देवीसिंह भाटी का अपना अलग अन्दाज था। गुरुवार को जब राठौड़ को गिरफ्तार किया गया तब भी भाटी ने मीडिया के सामने पार्टी लाइन से अलग बात कही। भाटी के इस व्यवहार को अप्रत्याशित नहीं कहा जा सकता। भाटी बीसेक साल से भाजपा में हैं। भैरोंसिंह शेखावत के समय में और बाद में वसुन्धराराजे के समय में भी उन्होंने हमेशा पार्टी में अपनी स्वतंत्र हैसियत का अहसास करवाया। भाजपा भाटी को लेकर हमेशा सहमी देखी गयी मानो भाटी उनकी मजबूरी हो। बीच में पार्टी ने जब प्रदेश की क्षत्रपाई वसुन्धरा को सौंपी तो भाटी ने लगभग बगावती तेवर दिखाते हुए न केवल पार्टी अलग बनाई बल्कि कोलायत विधानसभा का चुनाव जीत कर पार्टी को आईना भी दिखा दिया। 2003 में हुए इन चुनावों में भाजपा ने कोलायत से गोपाल गहलोत को लड़वाया जो उस समय दबंगई की अपनी छवि बनाने को प्रयासरत थे। चुनाव से पहले भाटी समर्थकों को ललकार कर गहलोत ने टिकट तो पक्का करवा लिया लेकिन चुनावी नतीजों में वे तीसरे नम्बर पर रहे।
राजस्थान की राजनीति में देवीसिंह भाटी अपने पहले ही विधायकी काल से चर्चा में तब आये जब बीकानेर में एक दलित महिला के साथ पहले बलात्कार और फिर हत्या की घटना हो गई थी। तब भाटी गले में एक तख्ती लगाकर विधानसभा में पहुंचे थे, तख्ती पर लिखे मजमून में पीड़िता को मुख्यमंत्री की बेटी बताया गया था-तब कांग्रेस की सरकार थी।
बाद में जब भाजपा की सरकार बनी तो मुख्यमंत्री भैरोसिंह शेखावत थे-भाटी मंत्री। तब एक बार फिर उन्होंने सत्ता के गलियारों में तब सनसनी पैदा की जब यह बात आम हुई कि उन्होंने एक आईएएस अधिकारी को चांटा जड़ दिया है।
यह सब बताने के मानी यही है कि भाटी ने राजनीति अपने बल पड़ते हिसाब से ही की है। अभी जब वसुंधरा की रणनीति के खास क्रियान्वयक राजेन्द्र राठौड़ दारासिंह एनकाउन्टर के संकट में घिरे हैं तो भाटी ने यह तर्क दे कर इस गिरफ्तारी को पार्टी मुद्दा बनाने पर एतराज किया कि इस एनकाउन्टर की जांच सीबीआई सुप्रीम कोर्ट के निर्देश और निगरानी में कर रही है। अत: इसे राजनीतिक रंग नहीं दिया जाना चाहिए। यद्यपि उनके इस तर्क से पार्टी में शायद ही कोई मुखर सहमति हो-लेकिन उनकी बात में दम जरूर है, इसे कई लोग स्वीकारते भी हैं।
अब यह अलग विषय है कि सीबीआई ने राठौड़ के खिलाफ कितने पुख्ता तथ्य जुटाये होंगे। लेकिन यह तो तय है कि बिना पुख्ता सबूतों के सीबीआई मदेरणा और राठौड़ जैसों को सीखचों के पीछे करवाने का दुस्साहस सत्तापक्ष के दबाव में तो नहीं कर सकती। समर्थकों का उद्वेलन आजकल लाभ की उम्मीदों के हरा रहने तक ही होता है। जब उन्हें यह लगने लग जाएगा कि उनके आका अब उन्हें लाभ पहुंचाने की स्थिति में आयेंगे ही नहीं तो धीरे-धीरे उनका उफान ठंडा होने लगेगा। मदेरणा की गिरफ्तारी के समय भी लगभग वैसा ही विरोध हुआ था जैसा अभी राजेन्द्र राठौड़ की गिरफ्तारी के समय देखा जा रहा है। राजनीति और समर्थन सभी अब आर्थिक जमा-खर्च और गुणा-भाग से तय होते हैं। इसलिए किये को खुद ही भुगतना होता है। दारासिंह की पत्नी सक्रिय ना होतीं तो दूसरे सैकड़ों ऐसे मामलों की तरह ही यह भी ठण्डे बस्ते में चला जाता।
—दीपचन्द सांखला
10 अप्रेल, 2012
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