Friday, July 14, 2023

पैट्रोल के दाम बढ़ना

 सरकारी तेल कम्पनियों ने कल शाम जब पैट्रोल के दामों में लगभग साढ़े सात रुपये की बढ़ोतरी की तो हमारे मीडिया के सभी रूप सक्रिय हो गये-जिन्होंने टीवी पर समाचार देखे उन्होंने यह भी देखा होगा कि जिन एंकरों ने बड़े-बड़े खबरिया चैनलों के लोगो लगे माइक हाथ में ले रखे थे उन्हें भी पैट्रोल पम्पों पर कतार में खड़े अधिकतर कार चालक भाव नहीं दे रहे थे। यानी 'एसी' गाडिय़ों में बैठे लोग अपनी प्रतिक्रिया देना तो दूर कांच तक नहीं उतार रहे थे। कुछेक जिन्होंने कांच उतार रखे थे या दुपहिया वाहनों पर थे वे अपनी तात्कालिक खीज जरूर उतार रहे थे। इसे तात्कालिक इसलिए कहा कि आज सुबह बीकानेर के एक पैट्रोल पम्प के सेल्समैन से जानना चाहा कि इस खीज का रूप और समयावधि कितनी है तो उसने बताया कि आप खुद खड़े होकर देख लें कितने लोग इसके खिलाफ बोलते हैं-'रात को जिस समय घोषणा हुई तब तो जरूर कई विरोध के हबीड़े में देखे गये, पर देखना तीसरे दिन सभी सामान्य हो जाते हैं।'

अब हो यह गया है कि विरोध भी प्रायोजित होने लगे हैं, मीडिया को कोई न कोई ऐसा मुद्दा चाहिए जिसके माध्यम से पाठक और दर्शक की आंख को वे ज्यादा से ज्यादा समय तक अपनी प्रस्तुति से पकड़े रख सकें। राजनीति में धुर विरोधी पार्टियां जो सरकार को भुंडाने के मुद्दे की जुगत में ही लगी रहती हैं-उनके लिए पैट्रोल-डीजल या ऐसी ही अन्य किसी वस्तु का दाम बढऩा जरूर हार्ट पम्पिंग से कम नहीं होता है-क्योंकि विरोध करते दिखना उनकी अस्तित्वगत मजबूरी है-यह दीगर बात है कि इन विरोधियों के सरकार में होने पर इस तरह की बढ़ोतरी से बहुत अलग वे भी कुछ करते सम्भवत: नहीं दिखते हैं। रही बात सरकार की सहयोगी पार्टियों की तो उसमें भी कल की तृणमूल कांग्रेस की ममता के स्टैण्ड से चौकस नागरिक को तो सबकुछ समझ लेना चाहिए। ममता ने कहा कि हमसे राय नहीं ली गई। हम इस बढ़ोतरी से दु:खी हैं, पर सरकार को समर्थन जारी रखेंगे। वामपंथियों की बात करें तो उनके तरकश में तर्कों के तीर या तो भोंथरे हो गये हैं या प्रत्यंचा खींचने जितना करार अब उनके हाथों में नहीं रहा है।

कुल जमा कहने का भाव यही है कि वैश्वीकरण और उदार आर्थिक नीतियां केवल बाजार को रोशन  करने के लिए ही हैं-जिनमें बाजार का हिस्सा बनने की क्षमता और सामथ्र्य नहीं है उसे जीने का हक भी शायद नहीं रहेगा!

आकण्ठ व्याप्त भ्रष्टाचार, व्यापारियों-उद्योगपतियों के लिए बिछे पलक पांवडे, गरीबों के नाम पर आये दिन आने वाली योजनाएं और नये-नये वेतन आयोगों के वेतनमान आदि सभी का मकसद मात्र बाजार को रोशन करना भर है। सभी राजनीतिक पार्टियां कमोबेश ऐसा चाहने भी लगी हैं-विरोध तो नूरा-कुश्ती का ही एक एपीसोड भर है।

देश की लगभग आधी आबादी को तो पैट्रोल तो क्या डीजल और रसोई गैस से भी कोई लेना-देना नहीं है-हां, पैट्रोलियम पदार्थ में से एक केरोसिन से जरूर उन्होंने वास्ता बना लिया है जो उनके स्याह जीवन में रोशनी का और किसी न किसी परिवार के लिए पेट की आग बुझाने में सहायक होता है। देखना यह है कि सरकार उन गरीबों की केरोसिन तक पहुँच को कितना महफूज रख पाती है।

पैट्रोल में लगातार बढ़ोतरी के बावजूद भी अपने इस छोटे से शहर बीकानेर में प्रतिमाह औसत 2700 दुपहिया और करीब 350 चौपहिया वाहन बिक जाते हैं।

मई, 2009 में यूपीए-2 की सरकार बनने के बाद पैट्रोल के दाम लगातार बढ़ रहे हैं लेकिन बीते वित्तीय वर्ष 2011-12 में ही अपने बीकानेर में दुपहिया वाहनों की बिक्री में पूर्व वर्ष के मुकाबले 28 प्रतिशत बढ़ोतरी दर्ज की गई है। यह सब बताने का मकसद यही है कि समाज के एक छोटे हिस्से के पास इस महंगाई को भुगतने का सामथ्र्य है। रही बात सरकारों के आने-जाने की तो-आजकल वोटों के रुख की दिशा तय करने में मुख्य भूमिका अधिकांशत: मौजूदा सत्ता विरोध यानी ऐन्टी इनकम्बैंसी की हो गयी है। यह फैक्टर सक्रिय हो या कर दिया जाय तो सरकार बदल जाती है अन्यथा लूली-लंगड़ी अवस्था में लौट भी आती है।

दीपचन्द सांखला

24 मई, 2012


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