Friday, July 14, 2023

पद टूटने पर हायतौबा क्यों

 बीकानेर के अखबारों में एक खबर को आज सुर्खियों के साथ लगाया गया है। राज्य सरकार के वित्त विभाग की बजट निर्णायक समिति ने इन्दिरा गांधी नहर परियोजना विभाग के लगभग 150 पदों को समाप्त करने की अनुशंसा की है। इस परियोजना का काम पूरा हो गया तो व्यावहारिकता यही कहती है कि इस विभाग को समाप्त कर इसके अधिकारियों-कर्मचारियों को अन्य विभागों में समायोजित कर दिया जाय। मोटा-मोट उपनिवेशन विभाग भी इसी मुकाम पर है। लेकिन देखा गया है कि जब भी ऐसा होने की सुगबुगाहट शुरू होती है या निर्णय किया जाना होता है तो उन विभागों से जुड़े कर्मचारी-अधिकारी संघ विरोध में खड़े हो जाते हैं। इस तरह की अव्यावहारिक मांगों के समर्थन में हमारा मीडिया भी राग अलापने लगता है या मुद्दे को हवा देने लगता है। जबकि मीडिया की जिम्मेदारी यह बनती है कि वे अपने पाठकों को असलियत से रू-बरू करवाये।

आईजीएनपी विभाग की साख तो पहले से अच्छी नहीं है। 30-40 साल पहले तब भी नहीं थी जब सार्वजनिक धन का दुरुपयोग, टैक्स चोरी या मिलावट आदि लोग-बाग डरते-डरते करते थे। उस समय इस आईजीएनपी को राजस्थान नहर परियोजना (आरसीपी) कहा जाता था। तब इस महकमे को बीकानेर में सबसे बदनाम महकमा माना जाता था-वित्तीय अनियमितताएं, गुणवत्ता विहीन निर्माण और सीमेंट चोरी के समाचारों की शहर में आए दिन दबी जबान चर्चा होती थी। इसीलिए इस योजना के पूरा होने में तय समय और तय धन से कितना गुना अधिक खर्च हुआ, इस पर बात करना भी बेमानी हो गया है। उस समय के चौकस नागरिक आज भी बता सकते हैं कि किस तरह आरसीपी (आईजीएनपी) के अधिकारी-कर्मचारी इस तरह की बातों पर खिसिया कर रह जाते थे-इस तरह के भ्रष्ट आचरण की बात करने में तब और अब में फर्क इतना ही आया है कि अब लोग खिसियाते नहीं है बल्कि शर्मविहीन देह भाषा के साथ बेशर्मी से बात करते देखे जा सकते हैं-क्योंकि इस तरह की बातें करने वाले अधिकतर अब इसी तरह के आचरण में लिप्त होते हैं, व्यापारी और उद्योगपति भी।

बात कुल जमा यह है कि यह सभी सरकारी कार्यालय और उपक्रम उस सार्वजनिक धन से चलते हैं जिस पर देश के प्रत्येक नागरिक का बराबर का हक है। तब आप बिना जरूरत के किसी विभाग को खत्म करने या बिना जरूरत के पदों को समाप्त करने पर किन्हीं अधिकारियों-कर्मचारियों को होने वाली असुविधा के नाम पर उनके साथ कैसे खड़े हो सकते हैं। जबकि उनके हकों में किसी प्रकार की कटौती नहीं हो रही हो।

इसे फिर से दोहराने में कोई हर्ज नहीं है कि कर्मचारी-अधिकारियों की यूनियनें और व्यापारिक और उद्योग संघ भी अपने अधिकारों के साथ-साथ कर्तव्यों की बात करना कब शुरू करेंगे?

दीपचन्द सांखला

23 मई, 2012

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