संविधान विशेषज्ञ सुभाष कश्यप ने एक टीवी कार्यक्रम में कहा है कि जिसे हम केन्द्र सरकार कहते हैं, वह संवैधानिक तौर पर दरअसल संघीय सरकार है, जिसमें राज्य का अपना पृथक् महत्त्व बना रहता है। लेकिन पता नहीं कब और किस तरह संघीय सरकार को केन्द्र की सरकार कहा जाने लगा शब्द बदलने से किस तरह छवि और छवि बदल जाने से कार्य व्यवहार किस तरह बदल जाता है, इसका उदाहरण अब तक रही हमारी सभी संघीय सरकारें हैं। वे चाहे किसी भी पार्टी की रही हों।
यह तो रही संघीय सरकार की बात लेकिन कश्यप के कथन का स्मरण कल तब हो आया जब पता लगा कि गुजरात के मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी पार्टी हाईकमान की सांस केवल इसलिए रोके हुए थे कि पार्टी में उनके व्यक्तिगत विरोधी संजय जोशी को मोदी के विरोध के बावजूद राष्ट्रीय कार्यकारिणी में क्यों ले लिया गया। जबकि संजय जोशी की हैसियत पार्टी में नरेन्द्र मोदी से कम नहीं आंकी जाती रही है। एक समय जब संजय जोशी पार्टी के संगठन महामंत्री थे, तब बेचारे लालकृष्ण आडवाणी-जो पार्टी द्वारा घोषित पीएम इन वेटिंग भी थे, को पार्टी अध्यक्ष का पद इसलिए छोड़ देना पड़ा कि उन्होंने मुहम्मद अली जिन्ना को सैक्युलर बता दिया था। वैसे पाठकों की सूचनार्थ बता दें कि जिन्ना सैकुलर नहीं नास्तिक थे। खैर, हमारे यहां कहा जाता है कि 'गई बात तक घोड़े भी नहीं पहुंच पाते हैं।
बात कुल जमा यह है कि अपना देश एक लोकतान्त्रिक देश है, सरकार को जनता चुनती है वो चाहे कुल मतदाताओं के पचीस प्रतिशत वोटों से ही क्यों न चुनी जाये। देश लोकतान्त्रिक है तो यहां की राजनीतिक पार्टियों को लोकतान्त्रिक कहलाने से कैसे रोका जा सकता है। यह बात दीगर है कि सभी पार्टियों में ऊपर से आये नाम पर सर्वसम्मति से समर्थन की घोषणा कर दी जाती है। आखिर सर्वसम्मति भी तो एक लोकतान्त्रिक प्रक्रिया ही है।
लेकिन यह जो भाजपा है, यह पार्टी तंत्र में भी लोकतान्त्रिक स्वरूप का अतिक्रमण करने जा रही लगती है। शायद पार्टी इसे संघीय पार्टी का स्वरूप देकर विकेन्द्रीकरण को अमलीजामा पहनाना चाहती है। अब देख लें, नरेन्द्र मोदी गुजरात में केशुभाई पटेल तो क्या किसी को भी कुछ नहीं गिनते हैं बल्कि वे तो पार्टी अध्यक्ष नितिन गडगरी को भी आईना दिखाने से नहीं चूकते हैं, परसों रात को ही मोदी ने गडकरी को आदमकद आईना दिखाया ही है। वसुन्धरा राजे भी इस मामले में मोदी के जोड़ की हैं। पहले राजनाथ सिंह को और अब कटारिया यात्रा पर गडकरी को उन्होंने आईना ही तो दिखाया है। उमा भारती की पार्टी में वापसी पर मध्यप्रदेश के शिवराजसिंह चौहान की यह शर्त कि उमा मध्य प्रदेश में कोई पंचायती नहीं करेंगी और कर्नाटक में येदियुरप्पा जो कुछ इन दिनों कर रहे हैं वो भी। ऐसे सभी उदाहरण यही संकेत करते हैं कि पार्टी संघीय ढांचे की ओर बढ़ रही है, जैसे वसुन्धरा की राजस्थान भाजपा, नरेन्द्र मोदी की गुजरात भाजपा, शिवराजसिंह की मध्यप्रदेश भाजपा, येदियुरप्पा की कर्नाटक भाजपा, रमनसिंह की छत्तीसगढ़ भाजपा। और रही बात, दिल्ली, झारखंड, हिमाचल प्रदेश और उत्तराखण्ड भाजपा की तो वहां अभी तक यह तय होना बाकी है कि वहां भाजपा किसकी होगी? शेष राज्यों की भाजपा की बात तब होगी जब पार्टी वहां अपनी सम्मानजनक कदकाठी बना लेगी। ऐसा होगा तभी तो उस पर कोई अपनी बपौती दिखाएगा ना!!
उक्त सभी प्रकार की भाजपाओं की दिल्ली में एक संघीय भाजपा होगी-लेकिन वहां भी तो गडकरी की भाजपा में भी एक सुषमा की भाजपा है तो एक जेटली की है! ऐसी परिस्थितियों में देखना यह कि आज गडकरी से नाराज हुए आडवाणी के लिए कौन-सी भाजपा बचेगी? 2014 में चुनाव होने हैं। कांग्रेस के खिलाफ सत्ता विरोध जिसे एण्टी इनकम्बैंसी कहा जाता है, जोर मार ही रही है। इस जोर को सपोर्ट की जरूरत है तब यह मुख्य विपक्षी दल भाजपा पता नहीं अपने को जोडऩे में लगी है या बिखेरने में।
—दीपचन्द सांखला
25 मई, 2012
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