Friday, July 14, 2023

बीकानेर लोकसभा क्षेत्र और अर्जुनराम मेघवाल

 लोकसभा के 2009 के चुनाव के प्रचार अभियान के दौरान अर्जुनराम मेघवाल द्वारा सिर पर पाग धारण करने की बात पर डॉ. बी.डी. कल्ला ने कटाक्ष किया कि यह सब नाटक है और चुनावों के बाद भी पाग को सिर पर रखने की चुनौती दे डाली। कहते हैं कि कल्ला की इस बात को अर्जुनराम ने दिल पर नहीं सिर पर लिया और बाद उसके सिर पर पाग रखे बिना वे आज तक सार्वजनीन नहीं हुए। ठीक सदी के महानायक कहलाए जाने वाले अमिताभ बच्चन की तरह, जो लगभग सत्तरह साल से सिर पर बिना विग लगाये सार्वजनीन नहीं होते!

यह बताने का मकसद इतना भर है कि अपने सांसद अर्जुनराम मेघवाल शो-बाजी में विश्वास करते हैं और उसे व्यवस्थित रूप से प्रचारित भी करते हैं। लोकसभा का सत्र जब भी चलता है अर्जुनराम ऐसा कोई भी मौका नहीं छोड़ते जो उनकी चर्चा का विषय बनें और कुछ नहीं तो शून्यकाल में ही सही कोई न कोई स्थानीय या राष्ट्रीय मुद्दा उठाये बिना वे नहीं रहते-न केवल मुद्दा उठाते हैं बल्कि अपने जनसम्पर्क कर्मियों के माध्यम से उसकी खबर मीडिया तक पहुंचाते भी हैं, यह जानते हुए भी कि शून्यकाल में कहे की कोई खास वकत नहीं होती। बीकानेर के सांसदों में जनसम्पर्क की इस तरह की सावचेती इससे पहले डॉ. करणीसिंह में ही देखी गई। वे न केवल संसद में खुद के द्वारा किये हस्तक्षेप की सूचना समय-समय पर पैंफलेट के माध्यम से अपने मतदाताओं को देने का प्रयास करते थे बल्कि इसके लिए उन्होंने 'सत्य विचार' नाम से अखबार भी शुरू कर रखा था। हालांकि इस अखबार में दूसरे तरह के समाचार ही ज्यादा होते थे। यह अखबार 'भोंपू' का रूप नहीं ले सका तो शायद इसलिए कि इसके संपादक अधिकांश समय शुभू पटवा जैसे पत्रकार रहे। 1971 के चुनावों के बाद तो डॉ. करणीसिंह ने महात्मा गांधी रोड पर कुछ दिनों के लिए एक व्यवस्थित जनसम्पर्क कार्यालय भी खोला था। उसी तर्ज पर कहते हैं अर्जुनराम का भी एक कार्यालय है-कान्ता कथूरिया कॉलोनी में। डॉ. करणीसिंह की तरह ही अपने अर्जुनराम भी खुद के द्वारा उठाये मुद्दों की सूचना भर देते हैं-उन मुद्दों का बाद में क्या हश्र हुआ या किस मुद्दे के पीछे पड़ के उन्होंने उसे सिरे तक पहुंचाया ऐसी कोई जानकारी वे अपने मतदाताओं से साझा करना जरूरी नहीं समझते। या फिर ऐसा भी हो सकता है कि मुद्दे उठाने भर को और उन्हें प्रचारित करने भर तक ही इतिश्री अपनी वे मानते हों-क्योंकि किसी मुद्दे को उठाना तो आसान होता है उसके पीछे पड़ कर अंजाम तक पहुंचाना काफी मुश्किल होता है। अपने सांसद द्वारा अब तक उठाये मुद्दों में से कितने मुद्दे अंजाम तक पहुंचे और उनको अंजाम तक पहुंचाने में अर्जुनरामजी की भूमिका क्या रही-ऐसी सूचना का साझा भी उन्हें अपने मतदाताओं से करना चाहिए।

अभी हाल ही में दक्षिण भारत की किसी संस्था ने अर्जुनराम को 'सांसद रत्नÓ सम्मान से नवाजा था-सभी जानते हैं कि देश में ऐसी हजारों संस्थाएं हैं जो इस तरह के सम्मानों के काम में ही लगी है-पता नहीं क्यों इस सम्मान को उन्होंने यहां इतना प्रचारित किया।

पिछले रेल बजट में बीकानेर से कोयम्बटूर रेलगाड़ी की घोषणा हुई थी-इस गाड़ी को जिस मार्ग से चलाने की घोषणा है उस मार्ग पर पहले ही एक गाड़ी बीकानेर को मिली हुई है। इस गाड़ी के मार्ग में यदि महाराष्ट्र के बाद परिवर्तन करवा दिया जाय तो बीकानेर वालों को उससे दोहरा लाभ होगा-एक तो पूणे-बेंगलूरू के लिए एक गाड़ी मिल जायेगी दूसरा उन्हें कोयम्बटूर जाने के लिए सित्ततर किलोमीटर का सफर कम भी करना होगा। सांसद को इसकी जानकारी है लेकिन सूचना देने में हमेशा मुस्तैद रहने वाले अर्जुनराम इस मुद्दे पर पता नहीं क्यों चुप्पी साधे हुए हैं। ऐसे और भी कई मुद्दे हो सकते हैं, सांसद चाहें तो उन्हें 'सिरे तक पहुंचा करÓ बीकानेरवासियों के लिए सचमुच कुछ कर सकते हैं। उन की बेदाग छवि पर शहर में इन दिनों दबे मुंह बातें यह भी होने लगी हैं कि सांसद भी जमीनों के काम में लग गये हैं और सांसद विवेक कोष के दुरूपयोग के आरोप तो उनकी पार्टी के लोग ही खुलेआम लगाने लगे हैं-इन आरोपों में सचाई कितनी है वो तो अन्वेषण से ही पता लगेगा लेकिन सांसद की तरफ से कोई सफाई इन आरोपों पर नहीं दी जा रही है।

लगे हाथ पिछले चुनावों में अर्जुनराम के प्रतिद्वंद्वी रहे रेंवतराम की बात कर लें-वे शायद पिछली सदी के आठवें दशक के आस-पास गोपाल जोशी के कहे अनुसार राजनीति करने वाले हैं जिसमें जोशी यह मानते थे कि 'पार्टी के खिलाफ माहौल हो तो नेता जनता के लिए कुछ भी कर लें, जीतेंगे नहीं और हवा पार्टी के पक्ष में है तो जनता के लिए कुछ न करने वाले नेता भी चुनाव जीत जाते हैं। लगता है रेंवतराम भी इसी तरह की राजनीति करने में विश्वास करने वालों में से हैं-पिछले लोकसभा चुनाव के बाद इस क्षेत्र में रेंवतराम की कोई खास सक्रियता नहीं देखी गई है-जबकि उनकी हार भी सम्मानजनक थी। स्थानीय चुनाव विश्लेषकों का मानना है कि वे थोड़ी और मेहनत करते और बीकानेर शहर के कांग्रेसी दिग्गज अपनी पार्टी के लिए मन लगा कर काम करते तो रेंवतराम जीत सकते थे। क्योंकि लोकसभा के चुनावों में 19,575 वोटों की हार कोई बड़ी हार नहीं होती है और रेंवतराम कुल जमा इतने ही वोटों से हारे थे। लगता यही है कि रेंवतराम में अब राजनीति करने की इच्छाशक्ति शायद नहीं रही-इस तरह की मानसिकता से नेता खुद का नुकसान तो करते ही हैं-पार्टी को भी बड़ा नुकसान पहुंचाते हैं। रेंवतराम शायद अर्जुनराम की शो-बाज सक्रियता से सहम गये हैं।

दीपचन्द सांखला

18 मई, 2012

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