Friday, July 14, 2023

आमिर, रामदेव और रतन टाटा

 योग प्रशिक्षक रामदेव ने आमिर खान के शो 'सत्यमेव जयतेÓ की यह कहकर आलोचना की है कि आमिर का मकसद कन्याभ्रूण को बचाना नहीं है, पैसा कमाना है। समाचार है कि आमिर एक एपिसोड को होस्ट करने का पारिश्रमिक तीन करोड़ रुपये ले रहे हैं। पर्दे पर अपनी उपस्थिति से पैसा कमाना आमिर का प्रोफेशन है, जाहिर है पैसा लेकर ही वह ऐसा करते होंगे। क्या केवल इसलिए इस मुद्दे का महत्त्व कम या खत्म हो जाता है। एपिसोड की कमियों पर बात करें तो वह अलग मुद्दा हो जाएगा। जैसे एपिसोड में कसावट नहीं है, संवादों के बीच की फांक जाहिर करती है कि इन संवादों और बातचीत पर पूर्व में चर्चा आपस में हो चुकी है, खैर, यह मसला कला समीक्षा का है। लेकिन रामदेव जिस बिना पर आमिर की आलोचना कर रहे हैं तो फिर वह स्वयं क्या कर रहे हैं? उनके प्रत्येक योग शिविर की राशि तय है, स्थानीय आयोजक उतनी राशि जुटा लेते हैं तभी रामदेव आते हैं। मुद्दे की बात करें तो रामदेव इन दिनों जिस कालेधन की बात कर रहे हैं वह भारतीय अर्थव्यवस्था के सन्दर्भ में बहुत गम्भीर मुद्दा है। इस मुद्दे पर रामदेव की आलोचना भी होती रही है कि वह जो आंकड़े दे रहे हैं उनकी आखिर प्रामाणिकता क्या है या ऐसा केवल वह चर्चा में बने रहने के लिए कर रहे हैं, या इसके माध्यम से लोकप्रियता या कोई सत्तारूप हासिल करके अपना व्यापार बढ़ाना चाहते हैं। रामदेव के लिए होने वाली इन बातों को सिरे से खारिज भी नहीं किया जा सकता, क्योंकि उन पर आर्थिक अनियमितताओं, फार्मेसी नियमों का उल्लंघन और जमीनों के हस्तांतरण में जबरदस्ती के आरोप लगे हैं और जांचें भी हो रही हैं तथा कुछ आरोप पुष्ट भी हुए हैं। तब केवल इसलिए रामदेव का उठाया कालेधन का मुद्दा मुद्दा नहीं रहेगा? आमिर तो फिर भी इसे प्रोफेशन के रूप में ही कर रहे हैं; रामदेव तो संन्यास की आड़ में यह सब कर रहे हैं। इस पर कभी आत्मावलोकन करने की फुरसत है रामदेव को!

रामदेव और उनके सहयोगी बालकृष्ण व्यापार करने के तमाम वो हथकंडे अपना रहे हैं, जो अन्य उद्योगपति अपनाते रहे हैं। रामदेव के समर्थन में एक तर्क यह भी दिया जाता है कि वे तो संन्यासी हैं, वे अपने लिए तो नहीं कर रहे हैं, तब सवाल यह बनता है कि फिर वह यह सब कर क्यों रहे हैं, अब वे ऐसी सब वस्तुएँ बनाने और बेचने लगे हैं जिनका संन्यास, योग तो दूर आयुर्वेद से भी कोई सम्बन्ध नहीं है। रही इस तर्क की बात कि वे किसके लिए कर रहे हैं तो उनके कई निकट संबंधी और रिश्तेदार उनके धंधों से क्यों जुड़े हुए हैं? उनके समानांतर रतन टाटा की बात कर सकते हैं वे संन्यासी तो नहीं बने लेकिन न उन्होंने शादी की और न ही उन्होंने किसी को गोद लिया, हालांकि पूरा कारोबार उन्होंने जिन्हें सौंपा वह उनके दूर का ही कोई खानदानी है। कहा यही जा रहा है कि इस उत्तराधिकारी को चुनने के कड़े मानक थे और जिन्हें चुना गया वे सायरस मिस्त्री तय मानकों पर ही खरे उतरे हैं। जिस तरह की व्यवस्था बन चुकी है उसमें टाटा का कारोबारी घराना न्यूनतम गड़बडिय़ां करता भी पाया गया है। तब आप एक उद्योगपति के रूप में रामदेव को रतन टाटा से किस तरह अलग करके देखते हैं।

दूसरी बात यह कि रामदेव इस बड़ी गलतफहमी में हैं कि आम-आवाम उनके साथ है। ऐसी स्थिति में वह इस जमीनी सचाई को भी नजरअन्दाज कर रहे हैं कि हिन्दी भाषी क्षेत्रों का जो वर्ग उनसे अब तक जुड़ा है वह उच्च मध्यम और मध्यम वर्ग ही है या फिर निम्न मध्यम वर्ग का बहुत छोटा-सा हिस्सा। निम्न वर्ग सहित शेष को तो बाबा के इस योग स्वांग की न तो जरूरत है और न इसके लिए उनके पास समय है।

दीपचन्द सांखला

21 मई, 2012


No comments: