बीकानेर लोकसभा क्षेत्र का जिक्र कल करते समय इशारा किया था कि 1971 के चुनावों से इस क्षेत्र में जातीय फैक्टर को हवा मिलनी शुरू हो गई थी, जिसका असर बाद के सभी चुनावों में दिखाई दिया। इसी के चलते सन् 1971 से 2004 तक हुए सभी 9 आम चुनावों में (1996 के चुनाव के अलावा) जाट समुदाय के प्रत्याशी ही विजयी हुए। 1977 में चौधरी हरिराम (जनता पार्टी), 1980 और 1984 में मनफूलसिंह भादू (कांग्रेस), 1989 में चौधरी हरिराम के बेटे और मार्क्सवादी नेता शोपतसिंह (सीपीएम), 1991 में फिर मनफूलसिंह भादू (कांग्रेस), 1996 में अपवाद के रूप में राजपूत महेन्द्रसिंह भाटी (भाजपा), 1998 में बलराम जाखड़ (कांग्रेस), 1999 में रामेश्वर डूडी (कांग्रेस) और 2004 में सिने अभिनेता धर्मेन्द्र (भाजपा)। धर्मेन्द्र भी शायद इसीलिए जीत पाये कि वे जाट समुदाय से हैं, और इस क्षेत्र के अधिकांश मतदाता जाट बहुल या जाट प्रभावी गांवों के हैं। शहर और कस्बों में जरूर धर्मेन्द्र को सिनेमाई छवि का लाभ मिला होगा। 1989 में कांग्रेस विरोध की हवा के चलते माक्र्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी के उम्मीदवार शोपतसिंह इसलिए जीत पाये कि वे जाट समुदाय के थे। 1996 के चुनावों में देवीसिंह भाटी के पुत्र महेन्द्रसिंह का जीतना करिश्मे से कम नहीं था। देवीसिंह भाटी इसे कैसे सम्भव कर पाये, यह वे ही बता सकते हैं!
सन् 2009 के चुनाव-परिसीमन (क्षेत्रों का पुनर्सीमांकन और श्रेणी परिवर्तन) बाद के पहले चुनाव थे। लोकसभा चुनाव के लिए बीकानेर का यह क्षेत्र अनुसूचित जाति के लिए सुरक्षित हो गया। भाजपा ने बीकानेर के ही अर्जुनराम मेघवाल को भारतीय प्रशासनिक सेवा से इस्तीफा दिलवा कर मैदान में उतारा, जबकि टिकट के लिए बीकानेर के ही ओम सोनगरा की भी दावेदारी थी। वह न केवल राष्ट्रीय कार्यकारिणी के सदस्य रह चुके हैं बल्कि श्रीगंगानगर लोकसभा क्षेत्र से भाजपा उम्मीदवार के रूप में पहले चुनाव भी लड़ चुके हैं। भारतीय समाज में अधिकांशत: जब जातीय आधार पर ही तय होता है तो भाजपा और कांग्रेस ने भी शायद अनुसूचित जाति में भी यह देखा कि उनमें किस जाति के वोट ज्यादा हैं-कहा जाता है कि बीकानेर लोकसभा क्षेत्र में अनुसूचित जाति में मेघवालों के वोट ज्यादा हैं और यह जाति आजादी बाद से राजनीतिक रूप से प्रभावी भी है। इसके अलावा 2009 के चुनावों में भाजपा यह स्थापित करने में भी सफल रही कि अर्जुनराम मेघवाल साफ-सुथरी और बेदाग छवि के उम्मीदवार हैं, जबकि ऐसा था नहीं-अर्जुनराम मेघवाल 2008 के विधानसभा चुनावों में चूरू के जिला कलक्टर थे और उन्हें बीच चुनाव में चुनाव आयोग ने पदमुक्त किया था। कहा जाता है कि अर्जुनराम ने पद पर रहते पार्टी विशेष के पक्ष में कुछ किया था। किया ही होगा अन्यथा चुनाव आयोग इतना बड़ा कदम नहीं उठाता! और सचमुच ऐसा है तो उन्हें बेदाग तो नहीं कहा जा सकता, क्योंकि उन्होंने पद पर रहते जो किया वो उनके ड्यूटी धर्म के खिलाफ था। खैर, कांग्रेस ने अपने उम्मीदवार के रूप में रेंवतराम पंवार को उम्मीदवार बनाया जो मेघवाल जाति से ही आते हैं और दो बार नोखा विधानसभा क्षेत्र की नुमाइंदगी कर चुके हैं, एक बार भाजपा से और एक बार कांग्रेस से। यद्यपि अर्जुनराम और रेंवतराम में वोटों का ज्यादा अंतर नहीं था। मात्र 19,575 वोटों की हार-जीत रही जो लोकसभा चुनावों की वोटिंग के हिसाब से ना कुछ मानी जाती है (हार-जीत तो एक वोट से भी हो सकती है, पिछला विधानसभा चुनाव एक वोट से हारे सीपी जोशी इस एक वोट के फर्क को निकालने में कोर्ट की शरण में हैं?)
बीकानेर का 2009 का यह आम चुनाव जातिय फैक्टर के प्रभाव को दर्शाने वाला भी है– 2004 में सामान्य श्रेणी की सीट रहते इस क्षेत्र में मतदान का कुल प्रतिशत 56.75 रहा था। जैसे ही यह क्षेत्र सुरक्षित घोषित हुआ 2009 के चुनावों में मतदान का प्रतिशत 15.5 प्रतिशत गिरकर 41.25 प्रतिशत पर आ गया! हो सकता है अनुसूचित जाति के उम्मीदवार को वोट देने के प्रति उदासीनता के चलते, अन्य पिछड़ों (जाट भी शामिल हो लिए हों) और उच्च जातियों ने मतदान करने में ज्यादा रुचि न दिखाई हो!
—दीपचन्द सांखला
17 मई, 2012
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