साहित्य और भाषा की सामान्य समझ के आधार पर आज का यह सम्पादकीय है, पाठकों से निवेदन है कि इसे इसी रूप में लें न कि किसी भाषाविज्ञ और साहित्यानुरागी के आलेख के रूप में।
इसी सत्ताईस और अट्ठाइस तारीख को बीकानेर में एक समारोह हो रहा है, आयोजकों ने इसे ज्ञानगोष्ठी का नाम दिया है, देश की नामी साहित्य अकादमी, दिल्ली के इस आयोजन का स्थानीय सहभागी मुक्ति संस्थान है। अवसर है राजस्थान के दो गुणीजनों कन्हैयालाल 'सहल' और अगरचन्द नाहटा के जन्म शताब्दी वर्ष का। यह आयोजन सम्भवत: साहित्य अकादमी के राजस्थानी से सम्बन्धित आयोजनों के पेटे हो रहा है, क्योंकि निमन्त्रण पत्र कथित राजस्थानी भाषा में है।
राजस्थानी भाषा को संवैधानिक मान्यता के लिए लगभग आधे राजस्थान में बहुत-सी संस्थाएं और लोग सक्रिय हैं, इस मुद्दे पर पूरी सहानुभूति के साथ ही आज की बात है।
इस प्रदेश को राजस्थान नाम मोटा-मोट आजादी के बाद ही दिया गया है, भौगोलिक ²ष्टि से देखें तो इस में बहुत से क्षेत्र ऐसे भी हैं वहां आज भी 'राजस्थानी' 'बोली-लिखी नहीं जाती है और जहां जहां की बोली को राजस्थानी कहा जा रहा है उन सभी बोलियों में बड़ा अन्तर देखा और सुना जाता है। बीकानेर के तो हर मोहल्ले की अपनी अलग बोली है। राजस्थानी के एक बड़े दिग्गज ने निजी बातचीत में यह स्वीकार भी किया है कि राजस्थानी की बड़ी समस्या यही है कि यह विभिन्न बोलियों का समूह है और भाषा बनने की प्रक्रिया में है। उन्होंने यह भी स्वीकार किया कि राजस्थानी अभी भाषा नहीं बन पायी है।
विभिन्न भौगोलिक क्षेत्रों के भाषा से सम्बन्धित गुणीजन जिन्होंने अपनी बोली या भाषारूप को राजस्थानी कहना स्वीकार कर लिया है, उन सभी के अपने-अपने आग्रह इस बात को लेकर हैं कि वह जिस तरह लिख रहे हैं उसे ही राजस्थानी के रूप में स्वीकार किया जाना चाहिए। अब तक देखने-समझने में यही आया है कि न राजस्थानी भाषा, साहित्य संस्कृति अकादमी ने और न ही साहित्य अकादमी, दिल्ली के राजस्थानी सलाहकार मण्डल ने बोली और भाषा के इस बारीक लेकिन विकराल अन्तर पर कोई महती प्रयास किये हों। इसके मानी यह कतई न लें कि यह बात एकरूपता के आग्रह के साथ कही जा रही है। यदि अपनी बोलियों को एक भाषा के रूप में विकसित करना चाहते हैं तो व्याकरण सम्बन्धी कुछ मानक तो तय होने ही चाहिए। अन्यथा जिस निमन्त्रण पत्र का ऊपर जिक्र किया है उसमें भाषा के परिष्करण के नाम पर शब्दाग्रही विसंगतियां नहीं रहतीं। उदाहरण के लिए निमन्त्रण पत्र के शुरुआती वाक्य में ही यह बताने के लिए कि यह साझा आयोजन है, भेळप और सिरौळे जैसे दो समानार्थक शब्दों का प्रयोग एक साथ किया गया है। फिर इस आयोजन का जो नाम दिया है 'सईका हंदी चितारणी' इसके दोनों शब्द और विभक्ति का उल्लेख सीताराम लालस के शब्दकोश में मिलता तो है, लेकिन क्या इन शब्दों के उपयोग से बचा नहीं जा सकता था। वो भी तब जब अभी तलक भाषा का आधार बोलियां ही हैं। तो क्या ऐसे शब्दों का प्रयोग किया जाना उचित नहीं होता जो सहज ग्राह्य हों-वैसे भी जिन्हें आमजन कहा जाता है उनकी इन साहित्यिक आयोजनों में भागीदारी न के बराबर रहने लगी है, और इस तरह के अधिकतर आयोजन 'मैं थनै चाटूं तू म्हनै चाट' की स्थिति को लगभग प्राप्त हो गये हों तब क्या आप इस तरह के प्रयोग करके सामान्य साहित्यिक रुचि रखने वालों को भी दूर रहने का संदेश तो नहीं दे रहे हैं?
इसी निमन्त्रण पत्र में आगे पूर्वाह्न 10.30 बजे को परभाते लिखा है जिसकी पुष्टि न तो लालस करते हैं और न ही वृहत हिन्दी कोश करता है और न ही आप्टे का संस्कृत हिन्दी कोश। दो शब्द और है 'घड़ावन' और 'आऊकार'। आयोजक जरा बतायें तो सही इन शब्दों के माध्यम से वे क्या सम्प्रेषित करना चाहते हैं। शब्दकोश तो इन दोनों ही शब्दों की साख नहीं भर रहे हैं। हां, हो सकता है कहीं यह बोले जाते हों! अब, कह सकते हैं कि अभी शब्दकोश ही पूरे नहीं बने हैं तो इसके लिए कितने दशकों की योजना है राजस्थानी के कर्णधारों की! राजस्थानी वाले यह दावा तो करते हैं कि गुजराती और हिन्दी 'राजस्थानी' से निकली हैं तो यह दोनों भाषाएं तो अपना एक मुकाम बना चुकी हैं, पर राजस्थानी वाले अभी तक किस चून में है।
निमन्त्रण पत्र में अपराह्न 12.30 बजे को भी तीजै पौरा (तीसरा प्रहर) तो 4 बजे को भी तीजै पौरा बताया गया है, क्या राजस्थानी प्रहर तीन घन्टे से ज्यादा का होता है? और लगे हाथ यह जानने की भी उत्सुकता है कि प्रहर को राजस्थानी में किस समयमान में बांटा गया है।
हो सकता है कि भाषा के बाजीगर अपने किये को सही बताने को कुछ तर्क और सबूत ले आयें लेकिन क्या उससे उठे इन प्रश्नों का अस्तित्व समाप्त हो जायेगा?
राजस्थानी को मान्यता के झण्डाबरदारों से इतना तो पूछ ही सकते हैं कि सार्वजनिक धन से चलने वाली राजस्थानी भाषा, साहित्य और संस्कृति अकादमी और साहित्य अकादमी, दिल्ली के राजस्थानी के सलाहकार मण्डल के खेवनहार पहले एक-दूसरे को तो मान्यता दें। सूचनाएं तो यही कहती हैं कि इन दोनों को सम्हालने वाले हमेशा ही शीतयुद्ध से ग्रसित रहते हैं।
—दीपचन्द सांखला
22 मई, 2012
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