नए गजनेर रोड के पुल के एक तरफ कल लोगों ने जाम लगा दिया। मसला वहीं की प्रताप बस्ती में बिजली का ट्रांसफार्मर बदलने का था। आक्रोश तो इसलिए बना कि ट्रांसफार्मर के जल जाने के कारण बस्ती के एक हिस्से को रात भर अंधेरे में रहना पड़ा और आक्रोश को जाम में इसलिए बदला गया कि जब बिजली निगम वाले ट्रांसफार्मर बदलने पहुंचे तो कुछ लोगों ने ट्रांसफार्मर के स्थान को बदलने का आग्रह कर डाला। हो सकता है उस जगह ट्रांसफार्मर होने से कुछ को परेशानी होती हो। स्थान बदलने की मांग करने वालों ने अपनी मांग के पक्ष में जो बात कही वह यह थी कि वहीं पास में स्कूल है, इसलिए कुछ आशंकाएं बनी रहती हैं। हो सकता है यह बात सही हो और यह भी हो सकता है कि कुछ निहित स्वार्थी जो कण्ठ बली भी हों, इसमें अपना कोई हित देख रहे हों। ट्रांसफार्मर वहां वर्षों से लगा है, कोई नया तो लग नहीं रहा था और स्थान बदलवाना ही था तो यह अवसर नहीं था। जब बस्ती का एक बड़ा हिस्सा रात में अंधेरे में रहा हो और दिन की इस गर्मी में बिना पंखे के! ऐसा लिख इसलिए रहे हैं कि इस तरह की मांगें अधिकांशत: कुछेक के स्वार्थों से प्रेरित होती हैं।
जो समस्या उठाई गई उसका समाधान ट्रांसफार्मर के चारों ओर दीवार बनाना या तारबन्दी करना भी हो सकता है। दूसरी बात यह कि पूरी बसावट के मोहल्ले में पहले तो ट्रांसफार्मर के लिए दूसरा स्थान मिलना मुश्किल होता है और यदि मिल भी जाये तो इस बात की क्या गारंटी है कि वहां विरोध नहीं होगा। खैर, समाज जब तक व्यापक सोच के साथ विचारने की आदत नहीं बनायेगा-ऐसी घटनाएं होती रहेंगी।
फिर हमें इस पर भी विचार करना चाहिए कि आजकल आम रास्ता जाम करने का जो विरोध का तरीका आम हो गया है वह कितना जायज है-या तो सड़क जाम कर देेंगे या रेल रोक देंगे। तर्क उनका यह कि इसके बिना सुनवाई ही नहीं होती-दम तो उनकी बात में भी है। क्योंकि प्रशासन भी आजकल ठठेरे की बिल्ली बना हुआ है-उसे छोटी-मोटी ठक-ठक से कोई फर्क नहीं पड़ता। लेकिन प्रशासन का भी यह कहना है कि बिन सिर पैर की मांग लिए आये दिन लोग सड़कों पर उतर आते हैं तब वह क्या करे? कल के संदर्भ में बात करें तो प्रशासन की बात में तंत लगता है।
आप सड़क और रेल को रोक कर शहर और देश की धमनियों को रोकते हैं। अधिकतर लोग घर- शहर से तभी निकलते हैं जब बहुत जरूरी होता है-या कोई परेशानी होती है। बिना इस पर विचार किये रेल और सड़क को रोक देने से किसी का जीवन या परिवार आजीवन प्रभावित हो सकता है या हमारे इस रोकने-बंद करने के कृत्य से किसी को जीवन भर की पीड़ा मिल सकती है, ऐसा सोचा है कभी? प्रशासन को भी संवेदनशील होना होगा, लोगों की जायज बातों को तुरन्त स्वीकारने और समाधान देने से आमजन का भरोसा प्रशासन में बनेगा और आये दिन होने वाली ऐसी बदमजगी में कमी आयेगी।
—दीपचन्द सांखला
26 अप्रेल, 2012
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