Thursday, July 13, 2023

शहर कांग्रेस अध्यक्ष यशपाल हैं या जनार्दन

 आज के अखबारों में छपे फोटुओं के बहाने बात करेंगे। आने वाले कल को शहर में कांग्रेस की संभाग स्तरीय कार्यशाला आयोजित होनी है-संभवत: मेजबानी भी बीकानेर शहर कांग्रेस की है-पार्टी के कई बड़े पदाधिकारी आने हैं। इसी सिलसिले में गये कल एक तैयारी बैठक हुई जिसके फोटोग्राफ आज के अखबारों में साया हुए हैं। इस बैठक में उल्लेखनीय और कहने को प्रदेश कांग्रेस सचिव सलीम भाटी और शहर कांग्रेस अध्यक्ष यशपाल गहलोत उपस्थित थे। 'कहने को' शब्द इसलिए काम में लिया कि जो फोटोग्राफ अखबारों में छपे हैं उनमें इन दोनों को ही उनके पद के हिसाब से न तो केन्द्रीय स्थान हासिल है और न उनके हाव-भाव ऐसा जाहिर करते हैं। उन फोटुओं से लगता है कि इन दोनों पदाधिकारियों को यहां की कांग्रेस में उनकी 'असल' हैसियत के हिसाब से स्थान दिया गया है-या दूसरे तरीके से कहें तो गहलोत और भाटी दोनों ही अपने आपे में रहने वाली शख्सीयत हैं।

सलीम भाटी की बात को एक बार इसलिए छोड़ देते हैं कि वे बाहर से आये हैं और लम्बे समय से यहां अपनी राजनीतिक जमीन तलाशने में लगे हैं-यह बात दीगर है कि वे भले ही यहां सफल ना हो पाये हों लेकिन प्रदेश स्तर पर अपना एक मुकाम बना बैठे ही हैं।

बात यशपाल गहलोत की करते हैं, वे हाल ही में शहर कांग्रेस अध्यक्ष बने हैं-उन्हें अभी न केवल कुछ करके दिखाना है बल्कि पदीय गरिमा के हिसाब से अपनी हैसियत भी बनानी है-यशपाल के मनोनयन के बाद जो उनका पहला परिचय शहर में गया वो यही था कि वे डागा चौक कांग्रेस के खड़ाऊ अध्यक्ष हैं, जो यशपाल की शुरुआती पारी के हिसाब से अच्छे संकेत नहीं थे। यद्यपि गहलोत के मनोनयन को अभी कुल जमा दो महीने भी नहीं हुए हैं फिर भी कम से कम उन्हें अपनी हैसियत को बनाते दीखना ही चाहिए।

कल के जिन फोटुओं के बहाने बात हो रही है उनमें शहर कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष जनार्दन कल्ला ही प्रभावी नजर आ रहे हैं, हाव-भाव से भी और उपस्थिति के हिसाब से भी। पूर्व कांग्रेस अध्यक्ष के बारे में यह कहा जाता रहा है कि वे चाणक्यी राजनीति में माहिर हैं, बिसात को अपने हिसाब से सजा लेते हैं। लेकिन उनकी यह काबीलियत यशपाल के मामले में नजर नहीं आती या फिर वे यह अन्तर्निहित संदेश देने में तो नहीं लगें है कि 'अबार भी आपाईं सब कुछ हां'।

अनुभव, उम्र और हैसियत से पद ऊपर होते हैं, और आज की राजनीति की ऊखाड़-पछाड़ के हिसाब से बात करें तो भी यशपाल यदि कल्ला खेमे से हैं तो उनकी हैसियत बनाने की जिम्मेदारी भी कल्ला खेमे की बनती है। अगर यशपाल अपनी हैसियत बनाने में सफल होते हैं तो कालान्तर से इसका लाभ कल्ला खेमे को ही होगा। लेकिन फिलहाल यही जाहिर होता है कि कल्ला खेमे को यशपाल पर भरोसा पूरा नहीं है, शायद उन्हें लगता हो कि यशपाल किसी हैसियत को हासिल कर जायेंगे तो उनके नहीं रहेंगे-अन्यथा कोई कारण नहीं है कि यशपाल को सार्वजनिक स्थानों और पार्टी कार्यक्रमों में उनके पद के हिसाब से सम्मान न दिया जाय।

जनार्दन कल्ला की उठ-बैठ उन शालीन व्यावसायिक घरानों में मानी जाती रही है, जहां दादा अपने पांच साल के पोते को भी बाबू कहकर इसलिए बुलाने लगता है कि कोई अन्य उसे बाबू से कम ना तो समझे और ना ही पुकारे।

दीपचन्द सांखला

27 अप्रेल, 2012

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