Thursday, July 13, 2023

वैशाख ऊजली दूज

 आज वैशाख सुदी दूज है, बीकानेर का स्थापना दिवस। आज से 524 वर्ष पहले राव बीका ने तब के इस गांव की स्थापना की जो अब नगर में विकसित हो गया है। लोक में प्रचलित है कि जोधपुर के शासक राव जोधा जब अपने शासकीय कार्य में व्यस्त थे तो वहीं उनके बड़े पुत्र बीका अपने चाचा कांधल के साथ कानाफूसी करने लगे। जोधा को अच्छा नहीं लगा। उन्होंने अपने छोटे भाई और पुत्र दोनों को चुभते लहजे में कह दिया कि काके-भतीजे कोई नया गांव बसाने की तजवीज में हो क्या। बीका पहले ही से इस आशंका से ग्रस्त तो थे ही कि जोधपुर के शासन का उत्तराधिकार सौतेली मां के पुत्र के चलते उन्हें मिलने वाला नहीं है। जोधा के उक्त कटाक्ष को चाचा-भतीजे ने चुनौती के रूप में लिया और निकल पड़े गांव बसाने।

आज जहां बीकानेर नगर बसा है वहां बीका को दो अनुकूलताएं शायद दिखी हों-एक यह कि थार की इस रोही में किसी अन्य शासनाकांक्षी की चुनौतियां न्यूनतम थीं और रहेगीं, दूसरी अनुकूलता यह कि इसी इलाके में बीका का ननिहाल भी था। शायद इसीलिए किसी व्यक्ति के कहीं बिना पूरी सज के पहुंचने पर इस कहावत से टोका जाता है कि ननिहाल समझ कर आ गये हो क्या? खैर यह तो हुई स्थापना की बात। इसी स्थापना दिन की खुशी को जाहिर करने के वास्ते इसी दिन शाम को और दूसरे दिन, खाने में खीचड़ा और पीने को इमल्याणा बनता है और मौज-शौक में पतंगें उड़ाई जाती हैं। इनके बारे में भी कहा जाता है कि बीका अपने कुछ सिपाहियों और प्रजाजनों के साथ घूमते-फिरते जब इस भू-भाग पर पहुंचे तब तक वे सब थक-ऊब चुके थे और राशन भी जवाब देता दीख गया था और उपरोक्त उल्लेखित दोनों अनुकूलताएं थी ही। यही कारण आज के इस नगर के इस भू-भाग पर बसाने के उस समय बन गये होंगे। टोले में जिसके पास जो भी धान था एक जगह इक_ा किया, कूटा गया और एक साथ रांध लिया गया। यह तो बन गया खीचड़ा और आप चाहें तो खीचड़े का लगावण कह लो या मीठा, इमली और गुड़ को पानी में घोल-भिगो कर तैयार कर लिया इमल्याणा। स्थापना का भोज तो इस तरह  हो लिया। रही बात पतंगों की तो धरती पर काबिज होने के बाद अपने आधिपत्य की झलक दूर तक दिखाने को कह लो या अपने उच्छबी मन की उड़ान की अभिव्यक्ति-चन्दा (पतंग का एक रूप) बनाया और उड़ाया गया। कहने को इस स्थापना दिवस को मनाने का यह ढंग पहले दिन से चला आ रहा है-जब तक व्यक्ति के मन में अपने रोजमर्रा के कार्यकलापों और नीरस एकरसता को तोडऩे की उत्कंठा बनेगी तब-तब वह ऐसे ही अवसरों में आनंद के कुछ क्षण निकालता रहेगा। आज और कल के लिए हासिल ऐसे ही समय के लिए बधाई और शुभेच्छाएं।

नुकता : पंचांगों के अनुसार वैशाख सुदी तीज कभी क्षय नहीं होती है इसलिए उसे अक्षय तृतीया या आखातीज कहा जाता है। लेकिन आज की दूज तो अक्षय नहीं होती तो फिर इसे आखाबीज क्यों कहा जाता है? लोक में प्रचलित है तो लोक ही विचारे इस पर!

दीपचन्द सांखला

23 अप्रेल, 2012

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