चालीसेक साल पहले की एक घटना का जिक्र यहां करना चाहेंगे। जोधपुर विश्वविद्यालय के कुलपति वी वी जॉन थे– उन्होंने कुलपति का पद किसी लॉबिंग से हासिल नहीं किया था-तब के दबंग मुख्यमंत्री मोहनलाल सुखाडिय़ा के निवेदन पर यह पद उन्होंने अपनी कुछ शर्तों के साथ स्वीकारा। मथुरादास माथुर की राजनैतिक हैसियत भी मोहनलाल सुखाडिय़ा से कम नहीं थी, वो जोधपुर से थे। उन्होंने वी वी जॉन से जोधपुर विश्वविद्यालय में एक नियुक्ति की सिफारिश की, जॉन ने अनसुना कर दिया। माथुर को यह नागवार गुजरा। कहते हैं इसकी शिकायत उन्होंने सुखाडिय़ा से की और उस नियुक्ति के लिए जॉन को कहने को कहा। सुखाडिय़ा ने उन्हें समझाया कि जॉन की शर्तों में यह भी शामिल है कि वो विश्वविद्यालय के किसी काम में मुख्यमंत्री का हस्तक्षेप पसंद नहीं करेंगे। सुखाडिय़ा के यह समझाने पर माथुर मान गये कि जोधपुर विश्वविद्यालय की प्रतिष्ठा के लिए वी वी जॉन जैसे कुलपति की जरूरत है। सभी जानते हैं कि वी वी जॉन का कुलपति कार्यकाल जोधपुर विश्वविद्यालय का स्वर्णकाल माना जाता है।
आजकल के अधिकतर कुलपति पता नहीं कितनी सिफारिशों और नाक रगड़ कर बनते हैं। उनमें आत्मविश्वास हीनता इतनी देखी गई है कि वे मुख्यमंत्री तो क्या सांसद-विधायकों की हाजिरी भरने से भी संकोच नहीं करते हैं। यही नहीं आईएएस, आईपीएस अधिकारियों तक की अगवानी करते देखा जा सकता है उन्हें! अपनी गरिमा का भान तो चाहे ना हो, कम से कम कुलपति के पद की गरिमा का खयाल तो रखना ही चाहिए पदासीन को। ऐसी स्थितियों के लिए केवल वे ही दोषी हों ऐसा नहीं है, राजनेताओं को भी ऐसे ही कुलपति चाहिए जो बिना रीढ़ के हों और उनके कहे को आज्ञाकारी होकर अंजाम दे। शिक्षा- या कहें तो देश के भविष्य (छात्र-छात्राएं) की परवाह किसे है? वे जानते हैं कि देश का भविष्य सचमुच शिक्षित हो जायेगा तो उनके हांके हंकेगा नहीं!
इस तरह की परिस्थितियों के लिए आमजन भी दोषी है। कुछेक साल पहले की बात है बीकानेर में ही किसी निजी महाविद्यालय का उद्घाटन समारोह था जिसमें एक कुलपति मंच पर आमंत्रित थे। वे कुलपति बनने से पहले किसी महाविद्यालय में विज्ञान विषय पढ़ाते थे, ज्यादा से ज्यादा होंगे तो आचार्य रहे होंगे। उद्घाटन समारोह में मंचस्थ थे तो उन्हें संबोधन के लिए बुलाया ही जाना था। जो व्यक्ति संयोजन कर रहे थे, उन्होंने अतिशयोक्ति की सारी हदें पार कर दीं। उन्होंने कुलपति को आमन्त्रित करते हुए पोडियम से कह डाला कि कुलपति विश्व के महान वैज्ञानिक हैं। संयोजन करने वाले को तो लगा होगा कि अतिशयोक्ति के बखान से उसकी पूछ रहेगी और आगे भी संयोजन के और मौके मिलेंगे। और यह जरूरी भी नहीं है कि संयोजन करने वाले को पता हो कि विज्ञान का व्याख्याता या आचार्य भर होने और वैज्ञानिक होने में क्या अन्तर होता है और महान होने में भी। लेकिन कॉलेज के उस उद्घाटन समारोह में मंच पर और मंच के सामने भी बौद्धिक कहे जाने वाले कई लोग थे। उनमें से किसी को भी संयोजक के उक्त संबोधन पर असहज होते नहीं देखा गया। कहते हैं शब्दों को बरतने में यदि लापरवाही होगी तो धीरे-धीरे वे अपना अर्थ खो देंगे, जबकि संवाद के इस युग में शब्दों की जरूरत बढ़ेगी ही!
—दीपचन्द सांखला
9 मई, 2012
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