Friday, July 14, 2023

ईसीबी की साख

 इंजीनियरिंग कॉलेज, बीकानेर के लड़कों के हॉस्टल में कल देर रात फिर मारपीट हुई। इससे पहले भी कई बार ऐसा हो चुका है अलावा इसके कॉलेज के जो लड़के बाहर रहते हैं वहां भी आये दिन बदमजगी करते पाये जाते हैं। लेकिन अधिकांशत: खबर उन्हीं घटनाओं की बनती है जिनकी रिपोर्ट दर्ज होती है या थाने को लिखित सूचना दी जाती है। इसके यह मानी नहीं है कि कॉलेज के सभी बच्चे उडंद्द हैं, अधिकतर ऐसे होंगे जो शायद सचमुच पढऩा चाहते हों लेकिन वो असहाय होते हैं। लगता है कॉलेज प्रशासन का भय लगभग समाप्त हो गया है, तभी इस तरह की घटनाएं आए दिन रिपोर्ट होती हैं। सामान्य शरारतों पर तो वैसे भी कोई रिपोर्ट नहीं करता लेकिन नशे की स्थिति में कुछ करते पाये जायें या समूह बना कर मारपीट की जाय तो यह माना जा सकता है कि कॉलेज के प्रशासन की पकड़ कमजोर होती जा रही है। ऐसी स्थितियों में केवल माहौल ही खराब नहीं होता है बल्कि शैक्षिक वातावरण भी खराब होता है। सभी जानते हैं कि पिछले कुछ वर्षों से कॉलेज की साख वह नहीं रही जो आठ-दस साल पहले थी-इस कॉलेज के बारे में पूरे राजस्थान में यह माना जाने लगा था कि सरकारी इंजीनियरिंग कॉलेजों में यह कॉलेज जोधपुर इंजीनियरिंग कॉलेज के बाद नम्बर दो होने को है। और, बाद में तो यह तक कहा जाने लगा था कि अगर यह यूं ही तरक्की करता रहा तो इसको राजस्थान का नम्बर एक इंजीनियरिंग कॉलेज होते देर नहीं लगेगी। पाठकों से यहां यह स्पष्ट कर दें कि जयपुर के एमएनआईटी की गिनती कॉलेजों में नहीं इंस्टीट्यूट में होती है।

यह सब यहां लिखने का मकसद किसी व्यक्तिविशेष को रेखांकित करने का नहीं है, फिर भी प्रशासनिक या अन्य किन्हीं कारणों से किसी को हटाया भी जाता है तो हटाने वाले की प्रशासनिक जिम्मेदारी बनती है कि उसकी जगह किसी ऐसे व्यक्ति को लगाये जो कॉलेज की साख को बनाये रख सके। पिछले एक अरसे से कॉलेज के प्राचार्य बदले जाते रहे हैं, स्थानीय नेताओं, जन प्रतिनिधियों और दबंगों का हस्तक्षेप यहां बढ़ गया है। यहां तक कि यहां होने वाली नियुक्तियों में इन सब की छाया देखी जा सकती है। नियुक्त हुओं में अधिकतर तो इन नेताओं, जनप्रतिनिधियों के दूर-नजदीक के रिश्तेदार हैं या फिर उनके लिए काम करने वाले या काम करने वालों के रिश्तेदार। इंजीनियरिंग कॉलेज समूह और यहां के विश्वविद्यालय नियुक्तियों के मामले में अनुसंधान का रोचक विषय हो सकते हैं।

यह भी नहीं देखा जाता कि जिस पद पर नियुक्ति दी जा रही है वो उस पद के योग्य है या नहीं या निष्ठा से अपने धर्म को निभाएगा या नहीं। वैसे इस तरह की बातों के अब कोई मानी नहीं रहे हैं। धीरे-धीरे कॉलेज का शैक्षिक वातावरण खराब हो गया। इसी का परिणाम है कि कल रात हुई जैसी घटनाएं अकसर होती रहती हैं। उक्त सबके दुष्परिणामस्वरूप कैम्पस प्लेसमेंट के लिए बड़ी कम्पनियां तो अब कम आने लगी हैं।

क्या यहां के जनप्रतिनिधि, राजनेता इन बातों पर सकारात्मक सोच के लिए अवकाश निकालेंगे? शायद नहीं क्योंकि उनकी प्राथमिकताओं में वे खुद के अलावा किसी को देखते नहीं हैं। किसी के लिए कुछ करने से पहले यही देखते हैं कि उसके एवज में उन्हें क्या हासिल होने वाला है या होगा! शहर, शहर की संस्थाएं और शहर की साख अब पुराने जमाने की बात है उनके लिए। सचमुच ऐसा हो गया है या उनकी समझ स्वार्थ के चलते भोथरी हो गई है!

दीपचन्द सांखला

8 मई, 2012



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