ए आर रहमान के कम्पोज और मोहित चौहान के गाये इस गाने को इन दिनों अकसर सुना जा सकता है-'साडा हक-ऐथे रक्ख'। इस गाने में इस लाइन को कई बार बोला जाता है। फिल्म में हीरो का हक उसकी मित्र है जिसकी शादी किसी दूसरे के साथ हो चुकी है।
कोई बीसेक साल पहले तक-'दुनियां भर के मेहनतकशों एक हों', 'हर जोर जुलम की टक्कर में हड़ताल हमारा नारा है', अपना हक लेके रहेंगे जैसे नारे बीकानेर में अकसर सुनने को मिलते थे, फिर इस में पड़ोसी पंजाब के रंग भी दीखने लगे-राजस्थानी-हिन्दी भाषी इस शहर के मजदूरों-कर्मचारियों के जलसों में अपने हक लेके रहेंगे का भाषान्तरण हो गया 'साडा हक-ऐथे रक्ख'। बाजार किसी को किस तरह भुनाता है उसका एक उदाहरण फिल्म रॉक स्टार का उक्त गाना है।
कल जब एक मई मजदूर दिवस है तो हक के उस नारे की फिर याद आ गई लेकिन फिल्मी कोटिंग के साथ। एक मई मजदूरों के हकों की याद का दिन है जो अब केवल दिन ही रह गया है। कल कुछ मजदूर और कर्मचारी संगठन छोटी मोटी सभा करेंगे-हो सकता है शाम को एक मशाल जुलूस भी निकाला जाए। जुलूस अगर निकाला भी गया तो उसमें इतने भर लोग ही होंगे कि रस्म अदायगी हो सके।
कर्मचारी और मजदूर एक दूसरे को सहोदर कहते आये हैं लेकिन पांचवे और पांचवे के बाद छठे आयोग के वेतन के बाद लगता है कर्मचारियों के हक तो मोटा-मोट हासिल हो गये हैं बावजूद इसके कुछ कर्मचारी संगठन अभी भी बचे और बने हैं तो उनका मकसद कुलजमा अब स्वार्थ पूर्ति ही ज्यादा है! कर्मचारी नेता के हक-अपनी हाजरी और काम की छूट और ट्रांसफर से बचाव भर रह गये हैं तो कुछ अन्य कर्मचारी अपने द्वारा की जाने वाली अनियमितता की ढाल के रूप में इन्हें काम लेते रहे हैं। इस तरह की सुविधाओं के चक्कर में यह कर्मचारी और उनके संगठन लगता है अपने सहोदर मजदूर को वो भूलते जा रहे हैं। होना यह चाहिए था कि कर्मचारी यदि अपने हकों को पाने की जद्दो-जहद से कुछ मुक्त हुवे हैं तो मजदूरों के हकों को तरतीब देने-व्यवस्थित करने की जिम्मेदारी ओढ़ते। लेकिन ऐसी कोई मंशा कर्मचारी संगठनों में देखी नहीं जा रही है।
असंगठित क्षेत्रों में इन दिनों जो मजदूरी बढ़ी है उसमें सीधा-साधा योगदान मनरेगा का है-जिसके चलते असंगठित के ये मजदूर अपने नियोजकों से मौल भाव की स्थिति में आ गये हैं। अन्यथा तीन-चार साल पहले तक सौ रुपये धियाड़ी भी उन्हें नहीं मिलती थी और महीने में अठारह से बीस धियाड़ी करना ही संभव हो पाता था यानी महीने भर में मजदूरों की कुल आय दो हजार से ज्यादा नहीं बैठती थी।
असंगठित क्षेत्रों के मजदरों के हकों को तरतीब देने का काम बीकानेर में कुछ लोग करते जरूर हैं- एक संगठन उनको पंजीकृत और शिक्षित करने के प्रयास में लगा है। लेकिन वह भवन निर्माण से सम्बन्धित मजदूरों तक ही सक्रिय है-लेकिन ऐसे और भी कई सारे क्षेत्र है-जहां मजदूरों की स्थितियां अच्छी नहीं है। उम्मीद यह की जानी चाहिए कि दुनिया भर के मेहनतकशों की बात करने वाले कर्मचारी संगठन अपनी जिम्मेदारी समझ कर इन असंगठित मजदूरों के लिए एक समयबद्ध कार्य योजना बनायें और उनके हकों की बात करें। मनरेगा के चलते अभी अनुकूलता भी है मजदूरी और अन्य सुविधाओं को लेकर मजदूर मोल भाव की स्थिति में है। यह मनरेगा भी लोककल्याण की नियत से कम और बाजार को रोशन करने के लिए बाजार में पैसा लाने के मकसद से ज्यादा चल रही है-हो सकता है बाजार को रोशन करने वालों का मन बदल जाये और दूसरी कोई दूर की कोड़ी और ले आयें।
कर्मचारी संगठन यदि भारतीय अवधारणा से भी विचार करें तो संगठित क्षेत्र के कर्मचारियों को हासिल सुविधाएं समाज का कर्जदार बनाती है। वे उस कर्जे से अपने सहोदर समुदाय-असंगठित मजदूरों के लिए कुछ करके मुक्त हो सकते हैं।
किसी भी बहाने सक्रिय हों-असंगठित क्षेत्र के मजदूरों के लिए उन्हें सक्रिय होना चाहिए-तय करने का अवसर कल मजदूर दिवस है ही।
—दीपचन्द सांखला
30 अप्रेल, 2012
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