शहर राजनीति की बात करें तो भारतीय जनसंघ और उसके संकर प्रतिरूप भारतीय जनता पार्टी की बात करना जरूरी है। भाजपा को जनसंघ का संकर प्रतिरूप इसलिए कहा कि जनसंघ को राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ प्रसूत शुद्ध पार्टी कहा जाता था-लेकिन पिछली सदी के आठवें दशक में जब देश में कांग्रेस विरोध की आकांक्षाएं पुरजोर थी, जिसे मूर्त करने को गठित जनता पार्टी जब अक्षम साबित हुई तो वे बहुत से लोग जो सचमुच उस कांग्रेस विरोध बल को बनाये रखना चाहते थे-उन्हें जनता पार्टी के पूर्व जनसंघी घटक में उम्मीदें दिखाई दीं और इन्हीं उम्मीदों को बनाये रखने को भारतीय जनता पार्टी का गठन हुआ जिसमें मुख्य घटक जनसंघ और शेष वे लोग थे-जो कांग्रेस विरोध की उम्मीदें हरी रखना चाहते थे। जनसंघ के इस संकर प्रतिरूप भाजपा की स्थिति चाल और चरित्र दोनों में कांग्रेस से भिन्न नहीं देखी जाती है बल्कि इस चाल और चरित्र की कोढ़ में साम्प्रदायिकता की खुजली असाध्य रोग की तरह जरूर देखी जाती है।
खैर, हमें बीकानेर के संदर्भ में लौटना होगा-आजादी बाद से संघ के विचार में आस्था और उसे सही मानने वाले लोग यहां रहे हैं। जनसंघ की मातृ संस्था आरएसएस जिस अति विनम्रता से राष्ट्रभक्ति और हिन्दूधर्म की बात करता रहा है उससे कुछ धर्मपरायण और कुछ राष्ट्रभक्त उनकी ओर आकर्षित होते रहे हैं। इसी के चलते कई निर्मलमन शख्सीयतें तो कुछ राजधर्म निभाने के इच्छाधारी भी आरएसएस और जनसंघ से जुड़े।
लोकतंत्र और चुनावों के सम्बन्ध में मतदाता कुछ जानते, समझने लगते उससे पहले ही 1952 का पहला विधानसभा चुनाव आ लिया। कहते हैं उसी का परिणाम था कि 1952 के विधानसभा चुनाव में बीकानेर से धनपति मोतीचन्द खजांची निर्दलीय के रूप में जीत गये थे, उनके निकटतम प्रतिद्वंद्वी रामराज्य परिषद के दीनानाथ भारद्वाज थे। मोतीचन्द खजांची ने 5095 वोट लिए तो दीनानाथ ने 4546, इस तरह हार-जीत 549 वोट की ही रही। रामराज्य परिषद भी हिन्दूधर्म की बात करने वाली पार्टी थी-जिसके चलते ही सम्भवत: आरएसएस और जनसंघ का आत्मविश्वास इस चुनाव के बाद बनने लगा। इस आत्मविश्वास को बनाने में शुरुआती योगदान प्रेमनाथ डोगरा, टीकमचन्द खत्री, चांदरतन आचार्य, जगदीशनारायण शर्मा और कृपाचन्द सुराणा का माना जाता है। जनसंघ ने 1957 में सेवानिवृत्त जज जेठमल आचार्य को, 1962 में चांदरतन आचार्य उर्फ शेरे चांदजी को, 1967 में मक्खनलाल शास्त्री और 1972 में भंवरलाल कोठारी को अपना उम्मीदवार बनाया। लेकिन लगता है तब शहर की तासीर कांग्रेस विरोध की तो जरूर थी लेकिन साम्प्रदायिक नहीं थी। इन्हीं अनुकूलताओं को समाजवादियों ने समझा और सक्रिय हुए जिनमें वैचारिक स्तर पर सत्यनारायण पारीक और मानिकचन्द सुराणा प्रमुख थे। लेकिन व्यावहारिक राजनीति में जैसलमेर से अपने ससुराल बीकानेर आकर सक्रिय हुए मुरलीधर व्यास ने यहां सफल पारी खेली। इसीलिए शायद उक्त शुरुआती चुनावों में जनसंघ अपनी कोई उल्लेखनीय उपस्थिति दर्ज नहीं करा पायी। इसके सम्भावित कारणों पर कल चर्चा करेंगे।
क्रमश:
—दीपचन्द सांखला
1 मई, 2012
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