नगर विकास न्यास के पूर्व अध्यक्ष श्रीगोपाल अग्रवाल और आठ अन्य के खिलाफ परसों भ्रष्टाचार निवारण न्यायालय ने भ्रष्टाचार निरोधक ब्यूरो को जांच के आदेश दिये हैं-इन पर आरोप है कि गलत रिपोर्ट के आधार पर न्यास द्वारा विकसित योजना में भूखण्डों का कब्जा कर और करवा कर करोड़ों का नुकसान करवा दिया।
कल जोधपुर हाइकोर्ट ने न्यास द्वारा ही विकसित जोड़बीड़ आवासीय कॉलोनी की जमीन को वन विभाग की बताकर उसके मालिकाना हक पर सवालिया निशान लगा दिया है। इस कॉलोनी की योजना भी तब बनी थी जब पिछली भाजपा सरकार के दौरान श्रीगोपाल अग्रवाल न्यास अध्यक्ष थे। श्रीगोपाल अग्रवाल के कब, कितने और किस प्रकार के राजनीतिक सरोकार रहे हैं-यह शोध का विषय है। यद्यपि न्यास अध्यक्ष होने की पात्रता केवल राजनीतिज्ञ होना नहीं हैं, फिर भी यह नियुक्तियां राजनीतिक कहलाती हैं।
श्रीगोपाल अग्रवाल ने आज तक जो भी हासिल किया-अपने व्यक्तित्व में ठेठ व्यापारिक बुद्धि और दबंगई के घालमेल के चलते किया है और बाद में इस घालमेल में जरूरत से भी कम धन के पुट का योगदान भी माना जा सकता है। कहते हैं श्रीगोपाल अपने स्कूली जीवन से ही दबंग थे। पाठकों की जानकारी के लिए बता दें कि मनोविज्ञान मानता है कि यह दबंगई अपने से कमजोर तक ही प्रभावी होती है, जैसे ही दबंग को पता चलता है कि सामने वाला उससे इक्कीस है और उससे यदि काम निकालना हो तो दबंग दंडवत होते भी देर नहीं लगाता।
भाजपा के राज में पहले भैरोंसिंह के समय और बाद में वसुंधरा के काल में ये श्रीगोपाल बीकानेर की भाजपाई राजनीति में पैराशूट से कब अवतरित हुए, शहर भाजपाईयों के लिए आज भी चकरघिन्नी का सबब है।
पद पर रहते श्रीगोपाल ने क्या-क्या किया इसकी चर्चाएं गाहे-बगाहे होती रहती हैं और बिना पद पर रहते भी जो कुछ वे करते और जोड़ते रहे हैं वह भी किसी से छुपा नहीं है। हो सकता है न्यास अध्यक्ष रहते उनके कुछ और निर्णयों पर अंगुली उठने लगे। यह सब करते उनमें अति आत्मविश्वास या प्रकारान्तर से जिसे दबंगई भी कह सकते हैं-हमेशा देखा जाता है-अभी हाल ही में सीओ सिटी जिनके पास ट्रैफिक का चार्ज भी है, ने उनकी दुकान के आगे सड़क पर अनधिकृत रूप से रखी जाली शायद इसलिए उठवा दी कि वे उनकी हैसियत से परिचित नहीं होंगी-तभी दूसरे दिन से वह जाली बदस्तूर वहीं है।
उनके बारे में यह भी सब जानते हैं कि श्रीगोपाल की आमने-सामने की दोनों दुकानें किराये की होने के बावजूद इन्हीं वर्षों में दोनों ही दुकानों को 10 से 20 वर्गफुट से ज्यादा तक पक्के निर्माण से फुटपाथ पर बढ़ा लिया गया है। मकान मालिकों की बिसात तो श्रीगोपाल के सामने समझ में आती है-पर इन कब्जाए फुटपाथों को लेकर नगर निगम की आंखें क्यों मिची हुई है-समझ से परे है। भाजपा के बोर्ड की आंखें मिच जाना तो समझ में आता है। इस दौरान निगम के बोर्ड कांग्रेस के भी रहे हैं और आज भी हैं। श्रीगोपाल द्वारा अपने भाजपाई रसूखातों से अब तक जो कुछ भी हासिल किया और काबिज हुए हैं उसके एवज में उन्होंने पार्टी के लिए कुछ किया भी है तो देखने में नहीं आया है। विसर्जन के नाम पर कभी कुछ किया भी होगा तो उन्होंने निवेश समझ कर ही किया होगा, खर्च समझ कर नहीं।
—दीपचन्द सांखला
28 अप्रेल, 2012
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