कल की खबर है कि एक अठारह वर्षीय शादीशुदा युवती ने अपने पर केरोसिन डालकर आग के हवाले कर दिया। कारण, यह बताया जा रहा है कि कोई अन्य युवक उसे बहला-फुसला कर अपने साथ ले गया, कुछ दिन रखा और फिर कह दिया कि तुम अब मेरे साथ नहीं रह सकती। इसी बात से परेशान होकर युवती ने अपने को आग के हवाले किया। इस तरह के प्रकरण अकसर समाचार बनते रहे हैं और समाचार न भी बनें तो चर्चा में रहते हैं। इस तरह की चर्चा जब होती है तो स्त्री को भद्दे विशेषणों के साथ कठघरे में खड़ा किया जाता है। अकसर देखा सुना जाता है कि पुरुषों में होने वाली इस तरह की चर्चाएं चिन्ता के साथ नहीं, रस लेकर की जाती हैं, इन रससिक्त चर्चाओं का अधिकतर अन्तर्निहित भाव यह भी होता है कि उस स्त्री ने 'इसकेÓ लिए हमें क्यों नहीं चुना? हममें क्या कमी है? वहीं जब स्त्रियां इस पर बात करेंगी तो सिवाय भुंडाने के, असल बात का पता होते हुए भी उसकी चर्चा करने से बचती हैं!
इस पुरुष प्रधान समाज में इन घटनाओं को दूसरी तरह से देखने की आदत लगभग नहीं मिलती है। बल्कि स्त्रियां पुरुषों की बात को ही टेर देती दिखाई देती हैं। घटना कोई भी हो, ऊपर उल्लेखित खबर की घटना हो या परिवार में बहू के उत्पीडऩ की बात हो या फिर कन्या भ्रूणहत्या की, कामकाजी स्त्रियों के साथ उनके कार्यस्थलों पर जो कुछ भी होता है उनकी भी, इन सबके अलावा भी स्त्री-व्यवहार से संबंधित सब प्रकार की घटनाओं पर अनायास और सामान्यत: होने वाले विश्लेषणों में स्त्री को ही दोषी ठहराया जाता है कि पुरुष तो ऐसे ही होते हैं या पुरुष तो ऐसा ही करेंगे, स्त्री की ही जिम्मेदारी बनती है कि जीवन के उलझाड़ और समाज के बीहडिय़ झाड़-झंखाड़ों में अपने को पवित्र बनाये रखे। देखा गया है कि स्त्री की पवित्रता को लेकर अन्य स्त्रियां पुरुषों से ज्यादा मुखर होती हैं चाहे वो परिवार में बहू को लेकर होने वाली चिकचिक हो या किसी स्त्री को बहलाए-फुसलाये जाने की घटना हो या फिर स्त्री की कोख के भ्रूण की जांच और जांच के बाद शिशु का लिंग मनचाहा न होने पर जीवहत्या जैसा पाप हो-सभी में स्त्री की वाणी समान रूप से पुरुष की आकांक्षा को अभिव्यक्त करती हुई देखी-सुनी गई है, बिना इस पर विचार किये कि पीडि़त स्त्री की अपनी भी कुछ आकांक्षा हो सकती हैं, या उसकी अपनी दैहिक-मानसिक जरूरतें (हो सकता है वो पूरी न हो रही हों) हो सकती हैं। पुरुष तो घर से बाहर निकलता है तो कइयों से कई प्रकार का संवाद होता है और इस तरह से वह उन्मुक्त और हलका हो लेता है पर स्त्री जो अधिकांश समय घर की चारदीवारी में गुजारती है-कभी सोचते हैं उसकी मन:स्थिति के बारे में? इन सबके अलावा स्त्री का अपना कोई अहम् भी हो सकता है, और क्यों नहीं हो सकता स्त्री का अहम्?
इन सभी बातों और मुद्दों पर खुल कर विचार करने का समय आ गया है, और यह अवसर उसी आधुनिक तकनीक ने दिया, जिसके उपलब्ध होते ही या अवसर मिलते ही उपयोग करने से कोई नहीं चूकता या उपयोग करने को सभी लालायित रहते हैं। यह जरूर हो सकता है कि इस तरह की लालसा और उपयोग की आकांक्षा अपने द्वारा तय मर्यादा में करें— या थोड़े समय बाद इस तर्क के साथ करने लगें कि अब तो सभी कर रहे हैं। लेकिन इस आधुनिकता से शत-प्रतिशत निर्लिप्तता शायद ही किसी में देखी गई हो!
स्त्री ही क्यों? समाज में किसी को भी दोयम हैसियत का समझना और हिकारत से देखना अमानवीय है। उल्लेखनीय यह है कि आधुनिक तकनीक इस दुभांत के लिए प्रेरित करती है और दुभांत करने वाले को नंगा भी। और जब ऐसा हो जाता है तो बगलें झांकने के अलावा दूसरा विकल्प नहीं होता है हमारे पास!
—दीपचन्द सांखला
12 मई,
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