यह सभ्यता ऐसी है कि अगर हम धीरज धर कर बैठे रहेंगे, तो सभ्यता की चपेट में आये हुए लोग खुद की जलायी हुई आग में जल मरेंगे। पैगम्बर मुहम्मद साहब की सीख के मुताबिक यह 'शैतानी सभ्यता' है। हिन्दू धर्म इसे निरा 'कलयुग' कहता है।—महात्मा गांधी
अरसा पहले एक फिल्म आयी थी 'रोबोट'। रजनीकांत की इस फिल्म में ऐश्वर्या राय नायिका है, रजनीकांत नायक हैं। रजनीकांत वैज्ञानिक हैं, रोबोट बनाते हैं। मकसद यही होता है कि यह रोबोट देश की रक्षा में सेना के काम आये, नायक का बॉस फिल्म में खलनायक (डेनी) की भूमिका में होता है, वह नायक के बनाये रोबोट से श्रेष्ठ रोबोट बनाने में असफल रहता है। नायक के प्रोजेक्ट में खलनायक रोड़े अटकाता है और खामियां निकालता रहता है, रोबोट में बनावटी बुद्धि तो होती है लेकिन बोस का तर्क होता है कि सेना के लिए बनने वाले रोबोट में केवल बनावटी बुद्धि से काम नहीं चलेगा-संवेदना भी होनी चाहिए। नायक संवेदना को भी संभव कर देता है। नतीजा यह होता है कि वह रोबोट जो नायक का प्रतिरूप होता है नायिका के सामने रोबोटीय लहजे में प्रणय निवेदन कर बैठता है, यही नहीं, वह अपने को नायक से बेहतर साबित करने की कोशिश भी करने लगता है। गांधी के उपरोक्त कथन की एक पंक्ति को यहां पुन: उद्धृत करना प्रासंगिक होगा, इस 'सभ्यता की चपेट में आये हुए लोग खुद की जलायी हुई आग में जल मरेंगे।'
गांधी का कहे का और रजनीकांत की फिल्म के उल्लेख का मकसद आये दिन हो रही सड़क दुर्घटनाओं के सन्दर्भ में करें तो बीकानेर से निकलने वाले दो राष्ट्रीय राजमार्गों (बीकानेर-आगरा वाया जयपुर और बीकानेर से इन्दौर वाया-नागौर) और गुजरने वाले एक राष्ट्रीय राजमार्ग (कांडला-पठानकोट वाया जैसलमेर-बीकानेर-श्रीगंगानगर) पर आये दिन जानलेवा और दर्दनाक दुर्घटनाएं होती रहती हैं। एक-एक दुर्घटना कई-कई घरों को इतने प्रकार के दु:ख-दर्द दे जाती है जिसकी कल्पना भर करना कम दर्दनाक नहीं है।
फिल्म में तो नायक खलनायक के हमलों से किसी न किसी प्रकार से बचना संभव कर लेते हैं लेकिन सड़कों पर दौड़ते इन खलनायकों से बचना नायकों के बस में नहीं होता है। इनमें गलती करने वाला (खलनायक) और गलती न करने वाले (नायक) दोनों ही शिकार हो जाते हैं क्योंकि इन दुर्घटनाओं की स्क्रिप्ट फिल्मों की तरह नहीं लिखी जाती है।
हमारी यह सभ्यता जिसे गांधी शैतानी सभ्यता कहते हैं, लालच की सभ्यता है। यह आधुनिक तकनीक जिसने अपने संसाधनों (वाहन, उपकरण आदि) से अपनी जद में आये प्रत्येक को इस मानसिकता से संक्रमित कर दिया है कि उससे संक्रमित अधिकतर लोग अपनी क्षमता से ज्यादा और समय से पहले हासिल करने के लालच के शिकार हो गये हैं। सभी तकनीकी साधन इसी लालची मानसिकता के उत्प्रेरक के रूप में काम करते देखे गये हैं। अब कहने को तो कह सकते हैं कि सड़कों पर डिवाइडर हों तो दुर्घटनाएं कम होंगी-लेकिन ऐसा नहीं है। जिन सड़कों पर डिवाइडर हैं या जो सड़कें फोरलेन, सिक्सलेन हैं, दुर्घटनाएं तो वहां भी होती हैं, आमने-सामने की न होकर ओवरटेक करते और तेज गति या लापरवाही से हो जाती है।
इस तरह की दुर्घटनाओं के शिकार परिवारों के लोग भी थोड़े दिन बाद ही क्षमता से ज्यादा और समय से पहले हासिल करने की उसी लालची दौड़ में शामिल होते देखे जा सकते हैं। तो क्या इन सारी गड़बडिय़ों की जड़ यह तकनीक है या तकनीक को बरतने का हमारा तरीका। इस पर फिर इस तरह से भी विचार करना होगा कि इस तकनीक के अंधे विकास का मकसद क्या है? हम हासिल से और ज्यादा हासिल करने की कोशिश में क्यों लगे हैं। अगर सुख की तलाश ही विकास की इस अंधी दौड़ का मकसद है तो इसे इस तरह भी देखना चाहिए कि सुख के यह सब साधन अंतत: दु:ख का कारण तो नहीं हैं।
वैज्ञानिक तो अब इस कोशिश में लगे हैं कि कम्प्यूटर मनुष्य के दिमाग की गति से भी तेज गति से काम करे और रोबोट मनुष्य से श्रेष्ठ साबित हो। यदि ऐसा सम्भव भी कर लेंगे तो सभी सुख हासिल कर लेंगे और सन्तोष धार लेंगे?
—दीपचन्द सांखला
11 मई, 2012
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