Thursday, July 13, 2023

जिप्सम, पी ओ पी और खेजड़ी

 गुरुवार को विधानसभा में कांग्रेस के विधायक प्रतापसिंह खाचरियावास ने बीकानेर में हो रहे भारी पैमाने पर जिप्सम के अवैध खनन का मामला उठाया। वहीं देवीसिंह भाटी ने इसकी न केवल पुष्टि की बल्कि उन्होंने इससे भी आगे की बात करते हुए यह आरोप भी जड़ दिया कि स्थानीय पुलिस की मिली- भगत भी इस अवैध खनन में है।

लेकिन शहर की बाका डाक तो यह कहती है कि जितने भी अनैतिक और अवैध धंधे हो रहे हैं कमोबेश-उन सभी में राजनीतिक आईने में दीखते चेहरों के ही किसी परिजन-प्रियजन की या तो सीधी भागीदारी होती है या फिर उनके द्वारा संरक्षित होते हैं। कहा यह भी जाता है कि आपस में जुड़ी इनकी कडिय़ों को पुलिस बल्कि खनन, वन, आबकारी, रसद, उद्योग, रीको, कारखाना-बॉयलर आदि विभागों के कारिन्दे जोडऩे का काम करते हैं-इन विभागीय लोगों की भी अपनी लालसाएं होती हैं जिनमें मनचाही पोस्टिंग सबसे अहम मानी गई है, ऊपरी कमाई को तो वह इस तंत्र का बाय-प्रॉडक्ट कहते हैं।

सूरतगढ़ इलाके की सात पीओपी इकाइयां कल ही सीज की गई हैं। अपने बीकानेर में भी सैकड़ों इकाइयां है, अचानक कभी भी निरीक्षण कर लो अधिकतर फैक्ट्रियों में बिना हिसाब का कच्चा माल पकड़ा जायेगा और क्विंटलों में जंगलों से अवैध रूप से काटी गई लकड़ी भी मिल जायेगी। जिन हाइवे पर यह फैक्ट्रियां हैं वहां से गुजरने पर पायेंगे कि हर आठवें-दसवें पेड़ का फुट-दो फुट का ठूंठ ही रह गया है। ये पेड़ पोर्टेबल आरा-मशीनों से काट कर पीओपी फैक्ट्रियों में स्वाहा हो गये हैं। फोर बाई फोर गाड़ी लेकर थोड़ा और अन्दर की रोही में जायें तो ऐसी जमीनों के, जिन के कोई धणी-धोरी नहीं हैं, पेड़ पोर्टेबल आरा-मशीन के शिकार हुए मिलेंगे-जिनमें सर्वाधिक खेजड़ी के पेड़ हैं। क्योंकि यहां यही पेड़ बहुतायत से हैं-यह बताने की जरूरत नहीं कि यह पेड़ न केवल हवा-पानी को संतुलित रखते हैं बल्कि हमें खाने को खोखा-सांगरी भी देते हैं, वहीं इनके पत्ते परम्परागत खेती की खाद का काम करते हैं। छाल की खैर अब बात करना ही बेकार है क्योंकि स्वास्थ्य के मामले में हमारी निर्भरता अंग्रेजी दवाइयों पर जो हो गई है। केवल खेजड़ी ही क्यों बोरटी, कुमट के पेड़ और रोहिड़ा, फोग और कैर भी इस लालच की भेंट चढ़ते जा रहे हैं। इस सब की जानकारी जब यहां के तमाम ग्रामीणों को है तो क्या उनका प्रतिनिधित्व करने वाले पंच-सरपंचों को नहीं है, प्रधान और जिलाप्रमुख को नहीं है, पुलिस को नहीं है या वन विभाग नहीं है? सबको है, कुछ तो लफड़े से बचने को नहीं बोलते तो कुछ इन अवैध कुकर्मों में जब खुद शामिल हों, तब क्यों बोलेंगे, और कुछ को पैसा पहुंच जाता है तो कुछ अपनी मनचाही पोस्टिंग बचाने की लगे रहते हैं। इस तरह यह सभी 'कुछ' मिलकर कोथली में गुड़ फोडऩे में लगे हैं, बिना यह जाने कि कोथली अब घिस कर झीनी-पारदर्शी हो गई है जिसमें हो रहे कुकुर्म अब दीखने लग गये हैं, और यह भी कि, अब इन कुकर्मों की यह थैलियां फटते भी देर नहीं लगाती है। आये दिन बड़े लोगों के फंसने के समाचार इसके गवाह हैं। यह सब इस समस्त चर-अचर जगत के भविष्य से खिलवाड़ की कीमत पर हो रहा है। उस भविष्य की कीमत पर जो हमारी आगामी पीढिय़ों का पोषक होने वाला है। 

गांधी ने कहा है कि यह प्रकृति हमारी सबकी जरूरतें पूरी कर सकती है लेकिन लालच किसी एक का भी पूरा नहीं कर सकती। विडम्बना यही है कि अधिकतर समर्थ  इन राजनेताओं के संरक्षण और नेतृत्व में लालची ही नहीं घोर धूर्त होते जा रहे हैं।

दीपचन्द सांखला

16 अप्रेल, 2012

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