Thursday, July 13, 2023

चुप क्यों है जिला कलेक्टर और संभागीय आयुक्त

 एक विचित्र विवाद इन दिनों शहर में चर्चा में है, वेटेनरी विश्वविद्यालय के पास स्थित राजस्व विभाग के विश्रामगृह का। दो सरकारी महकमें पिछले कुछ दिनों से जोर आजमाइश में लगे हैं– नूरा कुश्ती तो नहीं कह सकते इसे, लेकिन तमाशा जरूर कह सकते हैं। तमाशा इसलिए कि दो सरकारी विभाग अपनी मिल्कीयत को साबित करने को आन्दोलन पर उतारू हैं, इस तरह के मामलों को प्राथमिक स्तर पर सुलझा लिया जाना चाहिए था। इसकी पहली जिम्मेदारी जिला कलक्टर की बनती है। कलेक्टर से पार नहीं पड़े तो संभागीय आयुक्त बैठे हैं। लेकिन लगता है कि न तो जिला कलेक्टर और ना ही संभागीय आयुक्त अपनी इस प्रशासनिक जिम्मेदारी से वाकिफ हैं।

बिना वजह खड़े किये इस विवाद से प्रशासन की ही भद्द हो रही है। मीडिया खबरें छाप-दिखा रहा है और पढ़ने-देखने वाले चटखारे ले रहे हैं।

कहते हैं कि कोई बीसेक साल पहले यूआइटी ने राजस्व विभाग को जमीन दी-इस पर राजस्व विश्रामगृह बना दिया गया। नया था तब तक आबाद रहा। जैसे-जैसे पुराना होता गया, टूट-फूट भी आती गई-जो सरकारी कार्य में कुछ जल्दी ही आती है। राजस्व विभाग ने उसकी समयोचित सार-सम्हाल नहीं की। आज आन्दोलन पर उतारू इन राजस्व विभाग के कर्मचारियों ने तब इस विश्रामगृह के प्रति अपनी कोई जिम्मेदारी नहीं समझी, लेकिन चौधर हाथ से जाती देख अब खड़े हो गये हैं। शुक्र है अभी तक राजस्व विभाग कोर्ट-कचहरी नहीं पहुंचा है। शायद उनको भरोसा नहीं है कि फैसला उनके पक्ष में आयेगा! न आने का कोई कारण नहीं दिखता है, जमीन उनके नाम है तो हक-सफा भी उनके नाम ही होना संभव है, मरम्मत, सार-संभाल और निर्माण के नाम पर मिल्कीयत मिलती होती तो शहर के आधे मकानों की मिल्कीयत बदली होती-खैर! कोर्ट तो तब कुछ करेगा जब कोई पक्षकार उसके पास पहुंचेगा। कोर्ट खबरों का संज्ञान भी ले सकता है, लेकिन यह उसके विवेक पर निर्भर करता है।

यूआइटी ने पिछले दिनों इसी परिसर में पीछे पड़ी खाली जमीन पर एक और विश्रामगृह का निर्माण किसी जिम्मेदारी के भाव से करवाया हो, ऐसा संभव नहीं लगता है। सरकार में कई बार धन को खर्च करना भी बड़ी समस्या होती है। कलक्टर यूआइटी के चेयरमैन थे तब उनको लगा होगा कि यूआइटी का पैसा खर्चना है तो इस राजस्व विभाग के परिसर में ही एक और विश्रामगृह क्यों ना बनवा दिया जाय।

अब जब इसे लेकर दोनों विभाग झोड़ कर रहे हैं तो कुछ प्रश्न खड़े होते हैं—

-निर्माण के लिए यूआईटी को यह परिसर राजस्व विभाग ने क्या बिना किसी कागजी  औपचारिकता के ही सुपुर्द कर दिया था? अगर औपचारिकता निभाई गई तो उनमें सुपुर्दगी की शर्तें क्या थीं और यदि ऐसा कुछ हुआ ही नहीं और यूआइटी ने काम शुरू कर दिया तो क्या तब राजस्व विभाग सो रहा था?

-यूआइटी ने वहां पैसा लगाया और इसी आधार पर वह अपनी मिल्कीयत जता रहा है तो पैसा लगाने से पहले उसने राजस्व विभाग से कोई अनुबन्ध करने की जरूरत क्यों नहीं समझी, जबकि जमीन यूआइटी के  नाम थी ही नहीं।

अब जब दोनों सरकारी विभाग स्थानीय प्रशासन की भद्द को और बिगाडऩे में लगे हैं तो जिला कलेक्टर और संभागीय आयुक्त अपनी प्रशासनिक जिम्मेदारी क्यों नहीं पूरी कर रहे हैं!

दीपचन्द सांखला

17 अप्रेल, 2012

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