Friday, July 14, 2023

बीकानेर : जनसंघ और भाजपा–6

 पिछले तीन-चार दिनों से राजस्थान भाजपा में चल रही तनातनी बीकानेर में भी पार्टी की अन्दरूनी राजनीति को प्रभावित करेगी। बीकानेर की कुल सात में से चार में भाजपा विधायक हैं और उन चार में से तीन गोपाल जोशी, सिद्धिकुमारी तथा विश्वनाथ वसुंधरा के समर्थन में विधायकी से इस्तीफा देने की रस्म निभा चुके है। रहे देवीसिंह भाटी तो लगभग हमेशा से ही वे न केवल अपने बूते राजनीति करते रहे हैं बल्कि मौका मिले तो अपनी खुद की क्षत्रपाई दिखाने से भी नहीं चूकते। पार्टी में तहसील-जिलों से लेकर राष्ट्रीय स्तर तक संघीय और गैर संघीय पृष्ठभूमि वालों के बीच कब्जे की लड़ाई जारी है-कहा यह भी जा सकता है कि पार्टी अपने सबसे बुरे दौर से गुजर रही है। इसके बावजूद चुनावी बिसात पर देखे तो बीकानेर में पार्टी की स्थिति ठीक-ठाक है। पूरी राजनीतिक चतुराई के साथ सांसदी कर रहे अर्जुन मेघवाल अपनी पार्टी में तो चुनौतीहीन हैं ही विरोधी कांग्रेस के पास भी फिलहाल कोई मजबूत उम्मीदवार नजर नहीं आ रहा है कि जो आगामी चुनाव में मेघवाल को पटकनी दे सके। लगभग ऐसी ही स्थिति बीकानेर पूर्व में सिद्धिकुमारी ने अपनी बना ली है। खाजूवाला से भी विश्वनाथ के पार्टी टिकट पर तो कोई संशय नहीं है लेकिन अगली बार जीत ही जायेंगे, कह नहीं सकते हैं। क्योंकि बहुत कुछ इस पर निर्भर करेगा कि कांग्रेस वहां से किसे उम्मीदवार बनाती है और गोविन्द मेघवाल क्या कर गुजरने की स्थिति में अपने को ले आते हैं। लूनकरणसर और श्रीडूंगरगढ़ दोनों विधानसभा क्षेत्रों को भाजपा ने कभी गंभीरता से लिया ही नहीं है तो वहां के लिए क्या कहें। लूनकरणसर से मानिक सुराणा और श्रीडूंगरगढ़ से किसनाराम नाई चुनाव लड़ेंगे ही, पार्टी चाहे टिकट दे या ना दे! नोखा में कांग्रेसियों को विरोधियों की जरूरत ही नहीं है वे खुद ही आमने-सामने होते रहे हैं, फिर भी बिहारीलाल का दावा अपनी जगह कायम है। हो सकता है कांग्रेस की आपस की लड़ाई उनके लिए अनुकूलता छोड़ दे तो जीत भी जायें। कोलायत की बात करें तो वहां भाजपा के तय करने से नहीं देवीसिंह भाटी जो तय करेंगे वही होगा!

बीकानेर पश्चिम में मानिक सुराणा की तर्ज पर ही नन्दलाल व्यास अपने समर्थकों को कह रहे हैं कि पार्टी टिकट दे या ना दें वे अगला चुनाव लड़ेंगे ही। नन्दलाल व्यास की टिकट की दावेदारी जिस प्रकार सशक्त है उसी तरह उनकी उम्मीदवारी भी सशक्त मानी जाती रही है। सुना है संघीय पृष्ठभूमि के ओम आचार्य फिर से अपनी दावेदारी का मन बनाये हुए हैं-किसी कारण से उनकी दावेदारी कमजोर दिखेगी तो वे अपने युवा भतीजे विजयकुमार को आगे कर सकते हैं। वैसे 1980 के विधानसभा, 1989 के लोकसभा और 1990 में फिर विधानसभा में लगातार गिरता उनके वोटों का ग्राफ उनकी दावेदारी को कमजोर करता है। इस गिरते ग्राफ का कारण पार्टी कार्यकर्ता तो ओम आचार्य के अहम् को मानते हैं लेकिन उनका संघीय पृष्ठभूमि से होना भी एक कारण हो सकता है। क्योंकि पहले बीकानेर और बाद में बीकानेर पश्चिम सीट की तासीर संघीय पृष्ठभूमि वालों के लिए अनुकूल कभी नहीं मानी गई है।

युवा, नये चेहरे और मक्खन जोशी के पोते अविनाश जोशी पिछले चुनावों से ही अपनी पहुंच के चलते बीकानेर पश्चिम से अपनी उम्मीदवारी की आस बनाए हुए हैं। लेकिन उनकी इन उम्मीदों को कल के गोपाल जोशी के वसुंधरा समर्थन में दिये इस्तीफे से धक्का लग सकता है। क्योंकि वसुंधरा के इस संकटकाल में मजबूती से उसके साथ खड़े होकर गोपाल जोशी ने भी वसुंधरा पर अपनी पकड़ और बढ़ा ली है। दूसरा पक्ष यह भी है कि भाजपा यदि इस सीट पर नन्दलाल व्यास के अलावा अन्य किसी को टिकट देती है तो सूत्र यही बताते हैं कि वे भाजपा का खेल बिगाड़े बिना नहीं रहेंगे। तब बी.डी. कल्ला के लिए यह एक अच्छी उम्मीद हो सकती है।

पार्टी नेतृत्व और वसुंधरा की सांप-छछूंदर से भी ज्यादा बदतर स्थिति से लगता है कि एक-दूसरे को छोडऩे पर अगले चुनाव में दोनों को ही भारी नुकसान उठाना पड़ सकता है। भाजपा के पास विधानसभा में सरकार बनाऊ सीटें कबाडऩे की कुव्वत वाला कोई दूसरा नेता नहीं है और आरएसएस राजस्थान में तो क्या देश में कहीं भी इस स्थिति में आज भी नहीं है कि अपने दम पर सत्ता जुगाड़ु बहुमत दिला सके। अकेले दम पर वसुंधरा भी अपने को ऐसी स्थिति में नहीं पाती कि उनके समर्थन में कल इस्तीफा देने वाले 60 में से 15 विधायकों को भी बिना भाजपा के वापस जिता सके। मध्यप्रदेश में उमा भारती की पार्टी का हश्र वसुंधरा ने देखा है।

बीकानेर भाजपा में अपनी ठीक-ठाक हैसियत बना चुके गोपाल गहलोत के लिए लगता है बिछती चुनावी जाजम पर भाजपा में अब कोई ठौर नहीं है। उन्हें यह समझ में शायद काफी पहले ही आ चुका है, उसी के अनुसार अपने अस्तित्व के लिए अपने बूते वे पगपीटे भी कर रहे हैं, चुनावी  राजनीति करनी है तो यह सब करना ही होगा!

लगे हाथ बीकानेर में पार्टी संगठन की ही बात करें तो उसमें ठीक कांग्रेस की तर्ज पर कभी खड़ाऊ अध्यक्ष होता है तो कभी संगठन किसी दबंग या बड़े नेता की जेब में और उक्त दोनों स्थितियां न भी हो तो देखा यही गया है कि पार्टी अध्यक्ष और संगठन की कोई सुनता नहीं है।

समाप्त

दीपचन्द सांखला

7 मई, 2012

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