1977 के विधानसभा चुनावों में जनता पार्टी की लगभग मिल चुकी टिकट को खो देने के बाद मक्खन जोशी 1985 में ही उम्मीदवारी कर पाये। इस चुनाव में 1980 के चुनावों की तरह भाजपा और जनता पार्टी में कोई समझौता नहीं हो पाया तो महबूब अली ने भी भाजपा के उम्मीदवार के रूप में चुनाव लड़ा। 'पार्टी विद ए डिफरेंस' का दावा करने वाली भाजपा तब बीकानेर में लगभग अनावृत देखी गई। 1980 के चुनावों में जो भाजपा कांग्रेस के बी.डी. कल्ला को भारी टक्कर देती है उसी भाजपा को 1985 के चुनावों में जमानत के लाले पड़ गये थे। 1980 में भाजपा को मिले वोटों में यदि आरएसएस का बड़ा योगदान था तो जैसा कि कहा गया कि वह बाद में क्यों नहीं देखा गया-या महबूब अली के भाजपाई उम्मीदवार होने के बावजूद आरएसएस और भाजपाइयों द्वारा क्या केवल इसलिए विरोध किया गया कि वे अल्पसंख्यक समुदाय से थे! यह वही महबूब अली थे जिनका जनता सरकार में मंत्रित्वकाल न केवल बेदाग रहा बल्कि उन्होंने उस छोटे से कार्यकाल में ²ढ़ पहल के साथ जिस तरह और जैसे कार्य किये वैसी पहल बाद में नहीं देखी गई। पिछली सदी के आठवें दशक के मध्य में पेयजल की भारी किल्लत का सामना करने वाले इस शहर को तत्काल और पर्याप्त राहत के 'महबूबी प्रयास' उल्लेखनीय हैं। साफ और काम करने वाले की छवि और भाजपा उम्मीदवार होने के बावजूद महबूब अली को शर्मनाक संख्या में मतों का मिलना 'साफ सुथरी और अनुशासित पार्टी' होने के भाजपा के दावों के परखचे उडऩे की शुरुआत कहा जा सकता है।
अपनी स्थापना के वर्ष 1980 से 1985 के बीच ही पार्टी नियंताओं को यह एहसास भी संभवत: हो गया कि केवल संघीय सोच के आधार पर सत्ता हासिल नहीं की जा सकती है। इसी के चलते पार्टी में तभी से संगठनात्मक राजनीति में संघ और व्यावहारिक राजनीति में गैर संघीय लोगों में जो रस्साकशी शुरू हुई वह आज तलक जारी है। कहते हैं कि 1980 के दशक के शुरुआती दौर में जो नेता-कार्यकर्ता पान मुंह में लिए ओम आचार्य के कार्यालय की सीढिय़ां चढऩे में संकोच करते थे उन्होंने ही बाद में उन्हीं ओम आचार्य को गिनना बंद कर दिया था।
1990 के चुनाव में समझौते के तहत बीकानेर की सीट फिर जनता दल के हिस्से में आ गई थी। जनता सरकार में मुख्यमंत्री रहे और पृष्ठभूमि के अनुसार भाजपाई हो गये भैरोंसिंह शेखावत ने 1990 और 1993 के विधानसभा चुनावों को सरकार बनाने की उत्कट इच्छा के साथ यह तय करके लड़ा था कि सरकार बनानी ही है। दोनों ही बार वे सफल भी हुए। उनकी इस इच्छा की अभिव्यक्ति हम बीकानेर में इस तरह देख सकते हैं कि 1993 के चुनावों में पहले तो उन्होंने तब के कांग्रेस विरोध के बड़े नेता मक्खन जोशी को टिकट देने के प्रस्ताव के साथ पार्टी में लाने की कोशिश की, पार नहीं पड़ी तो पार्टी टिकट किसी संघीय पृष्ठभूमि वाले को न देकर कमजोर तबके में लोकप्रिय और दबंग छवि वाले नन्दलाल व्यास को दिया। नन्दलाल व्यास बुलाकीदास कल्ला और मक्खन जोशी जैसे दो भारी भरकम उम्मीदवारों के सामने भाजपा के लिए यह सीट निकाल ले गये।
इस तरह आजादी बाद पहली बार जनसंघ-भाजपा इस विधानसभा सीट पर काबिज हो पायीं।
क्रमश:
—दीपचन्द सांखला
5 मई, 2012
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