सन् 1980 में भाजपा का गठन हुआ, जनसंघ के अलावा भी बहुत से लोग इस पार्टी से जुड़े, बहुत उम्मीदें भी बनीं। अपने बीकानेर से ही राज्य की जनता सरकार में मंत्री रहे (समाजवादी) महबूब अली भाजपा में शामिल हुए तो लगा था कि पार्टी साम्प्रदायिक विचारों को तिलाञ्जलि दे देगी!
जनसंघ और भाजपा के संदर्भ में बीकानेर लोकसभा और तब की अन्य तीन विधानसभा सीटों (कोलायत, लूनकरणसर और नोखा) पर इसलिए बात नहीं कर रहे हैं वहां आठवें दशक तक जनसंघ या भाजपा का अस्तित्व था ही नहीं।
जनता पार्टी सरकार का प्रयोग असफल होने के बाद 1980 के विधानसभा चुनावों में कांग्रेस (आई) और नवगठित भारतीय जनता पार्टी दोनों ने ही शहर सीट से एकदम नये उम्मीदवारों को मौका दिया। कांग्रेस ने युवा कॉलेज व्याख्याता बुलाकीदास कल्ला को और भाजपा ने युवा वकील ओम आचार्य को उम्मीदवार बनाया। कांग्रेस विरोधियों में समाजवादियों की रही यह परम्परागत सीट चुनावी समझौते में जनता पार्टी द्वारा भाजपा को दे दी गई थी। कल्ला के परिवार में अग्रज जनार्दन कल्ला गोकुलप्रसाद पुरोहित और बाद में अपने बहनोई गोपाल जोशी के सहयोग की राजनीति करते थे। बी.डी. कल्ला राजनीति को शायद तभी से आदर्श करिअर के रूप में देखने लगे। ओम आचार्य के पिता दाऊदयाल आचार्य की आजादी के आन्दोलन में सक्रिय भूमिका थी, तब वे कांग्रेसी थे। निर्मल मन के दाऊदयाल आचार्य बाद में आजन्म आरएसएस के प्रति निष्ठावान रहे, इसीलिए आरएसएस और जनसंघ में और बाद में भाजपा के एक वर्ग में उनके प्रति सम्मान हमेशा रहा।
1980 के चुनावों में आजादी बाद से पहली बार बीकानेर शहर में दो प्रतिद्वंद्वी उम्मीदवार एकदम युवा और 'फ्रेश' थे। टक्कर कांटे की रही। 1900 से भी कम मतों से बी.डी. कल्ला विजयी हुए। एक बार तो लगा ओम आचार्य के रूप में भाजपा को बीकानेर में एक नेता मिल गया। पता नहीं क्यों बाद के वर्षों में ओम आचार्य चुनावी राजनीति में उस तरह सक्रिय नहीं देखे गये। इस चुनाव में जनता पार्टी के तब के नेताओं की भूमिका को आज भी संदेह से देखा जाता है। ओम आचार्य ने बाद में लोकसभा का एक चुनाव पार्टी टिकट से जरूर लड़ा था लेकिन उस चुनाव में उनका प्रदर्शन उल्लेखनीय नहीं रहा था।
1980 के विधानसभा चुनाव में ओम आचार्य को मिले भारी मतों पर यह कहा गया था कि उसमें आरएसएस का बड़ा योगदान रहा है। लेकिन ऐसा ना तो उससे पहले के चुनावों से प्रमाणित होता है न ही बाद के चुनाव परिणामों से। ओम आचार्य के हारने के बावजूद उनके द्वारा सम्मानजनक मत हासिल करने का एक बड़ा कारण तो बीकानेर के मतदाताओं में जनता सरकार के प्रयोग के असफल होने से उत्पन्न खिन्नता को माना जा सकता है और यह भी कि कांग्रेस विरोध की मानसिकता वाले मतदाताओं ने ओम आचार्य को मत देकर अपनी उस खिन्नता की पीड़ा को अभिव्यक्ति दी हो। और दूसरा ओम आचार्य को लाभ अपने पिता की छवि का भी मिला होगा जिनका सम्मान शहर में आरएसएस और गैर आरएसएस दोनों ही तबकों में समान था। आरएसएस को भी अपना उम्मीदवार होने और उनके मजबूत भी होने का भान शायद हो गया था तभी 1980 के चुनावों में देखी गई आरएसएस की सक्रियता बाद में किसी भी भाजपाई उम्मीदवार के लिए नहीं देखी गई। 1998 के चुनावों में आरएसएस से ही जुड़े भाजपाई उम्मीदवार सत्यप्रकाश आचार्य के लिए भी नहीं।
क्रमश:
—दीपचन्द सांखला
4 मई, 2012
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