आजादी बाद की भारतीय राजनीति में इमरजेंसी को बदलाव बिन्दु के रूप में देख सकते हैं या यूं कहें कि भारतीय सन्दर्भ में व्यावहारिक राजनीति को मोटा-मोट दो कालों में बांट सकते हैं। जनवरी 1977-से पहले का और उसके बाद का। इमरजेंसी के दौरान 1977 की जनवरी के मध्य में इन्दिरा गांधी ने आमचुनाव करवाने की चकित कर देने वाली घोषणा की थी। इमरजेन्सी के सन्दर्भ में बीकानेर का उल्लेख विनायक बाद के अंकों में करेगा। फिलहाल जनसंघ और भाजपा की ही बात बीकानेर के सन्दर्भ में करेंगे।
आजादी बाद से ही जनसंघ ने बीकानेर में कोई उल्लेखनीय उपस्थिति नहीं दिखाई। सन् 1957, 1962, 1967 और 1972 में बीकानेर से जनसंघ के जो भी उम्मीदवार रहे उनमें से किसी ने दुबारा चुनाव नहीं लड़ा-1957 में उम्मीदवार चांदरतन आचार्य उर्फ शेरे चांदजी और 1962 में उम्मीदवार जेठमल आचार्य थे। 1967 के उम्मीदवार मक्खनलाल शास्त्री अपने चुनावों के बाद कभी व्यावहारिक राजनीति में देखे नहीं गये। 1972 का चुनाव लड़े भंवरलाल कोठारी अपने बाद के जीवन में यह तय ही नहीं कर पाये कि उन्हें संस्थागत राजनीति करनी है या चुुनावी! कोठारी सार्वजनिक जीवन में सक्रिय हमेशा रहे, कभी गो-सेवी संस्थाओं के माध्यम से तो कभी आरएसएस के प्रांत पदाधिकारी के नाते, बाद में जब भाजपाई सरकारें बनी तो वे आयोग, यूआइटी अध्यक्ष बनने में सफल जरूर रहे।
देश-प्रदेश और स्थानीय स्तर पर कांग्रेस विरोध की राजनीति करने वालों के लिए इमरजेंसी संकटकाल बनकर आयी थी लेकिन अपने इस शहर के जनसंघ और आरएसएस के कर्णधारों में से सोमदत्त श्रीमाली के अलावा दाऊदयाल आचार्य और ओम आचार्य थोड़े समय के लिए जेल में रहे। श्रीमाली की गिरफ्तारी भी काफी समय बाद ही संभव हो पायी थी। कहा यह जाता है कि जनसंघी नेता गिरफ्तारी से या तो बचते रहे या फिर उन्होंने गिरफ्तार न होने को मैनेज कर लिया था। जबकि इमरजेंसी के दौरान बीकानेर से दस के लगभग समाजवादी पूरे समय जेल में रहे-इससे एक बार फिर जाहिर होता है कि बीकानेर में जनसंघ की जमीनी और नेतृत्व की स्थिति क्या थी।
1977 में बनी जनता पार्टी में जनसंघ भी एक घटक दल था, लेकिन इसके बावजूद बीकानेर के तब के लोकसभा और विधानसभा चुनाव में किसी जनसंघी नेता में अपनी उम्मीदवारी जताने का आत्मविश्वास नहीं देखा गया। विधानसभा चुनाव में सोमदत्त श्रीमाली ने जेल में बिताए समय के आधार पर और रिखबदास बोड़ा ने भूमिगत काम करने के नाम पर जरूर उम्मीदवारी जताई थी, लेकिन दोनों ही अपनी दावेदारी को वजनी नहीं बना पाये। इसमें एक कारण इमरजेंसी और इमरजेंसी पूर्व स्थानीय जनसंघ का कमजोर प्रदर्शन भी हो सकता है। भंवरलाल कोठारी बहुत चतुराई से संस्थाओं और सक्रिय राजनीति में समयानुकूल आवा-जाही करते और कुछ न कुछ हासिल करते रहे। जनसंघी राजनीति की जमीन तैयार करने की कोशिश इनमें से किसी की भी कभी नहीं देखी गई। रिखबदास बोड़ा, जो इमरजेंसी के दौरान शहर से लगभग बाहर रहे, लेकिन इमरजेंसी के बाद वे अपनी उपस्थिति दिखाने की कोशिश जरूर करते रहे। हालांकि थोड़े समय बाद उन्होंने भी शायद उम्मीद छोड़ दी या थक गये।
जनता पार्टी का प्रयोग असफल हुआ। दिग्गजों के भार से कह लो या उनके अहम् के टकराव से पार्टी टूटी और कांग्रेस विरोध का सपना बिखर गया। कांग्रेस और उसके भ्रष्टाचार विरोध की अलख जगाने वाले लोकनायक जयप्रकाश नारायण ने अपने इस सपने के टूटने की यन्त्रणा भोगी और चल बसे। केन्द्र में जनता पार्टी की सरकार गिरी तो कांग्रेस वापस आ गई और कांग्रेस ने 1977 के जनादेश के तर्क और तर्ज पर राज्यों की जनता सरकारों को हटा दिया। इसी संक्रांति काल के अप्रेल 1980 में जनसंघ के संकर प्रतिरूप भारतीय जनता पार्टी की स्थापना हुई। भाजपा इन 32 सालों से अच्छे-बुरे हर मामले में अपने को कांग्रेस से इक्कीस साबित करने की कोशिश में लगी है। भाजपा पर बीकानेर सन्दर्भ से कल बात करेंगे।
क्रमश:
—दीपचन्द सांखला
3 मई, 2012
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