Friday, July 14, 2023

बीकानेर : जनसंघ और भाजपा–2

 भारतीय सनातनी मन आस्था के लिए सगुण भक्ति में जहां तैतीस करोड़ देवी-देवताओं में रमता है और उनमें भी उन तैतीस करोड़ की साधना करने वालों ने अपने-अपने ढंग से साधना की अलग-अलग विधियां बना रखी हैं। अलावा इनके निर्गुण भक्ति की अनगिनत धाराएं यहां प्रवहमान हैं। उक्त दोनों आस्तिक परम्पराओं के साथ हमारे देश में नास्तिकों की अपनी जमात भी रही है। पारम्परिक भारतीय मन की अभिव्यक्ति जैन और बौद्ध धर्म के रूप में भी हुई। सम्भव है जैन और बौद्धों से पहले भी साधना की कई परम्पराएं बनी होंगी जो उदार और आत्मसाती भारतीय सनातन परम्परा में विलीन होकर उसका हिस्सा बन गई होंगी।

यह बताने का तात्पर्य इतना ही है कि भारतीय सनातन मन में संकीर्णता के लिए स्थान बनाना मुश्किल है। बीकानेरियों का मन भी उसी व्यापक भारतीय मन का हिस्सा है।

भारतीय जनसंघ के बारे कहा और माना जाता है कि वो उत्तरी भारत की शहरी पार्टी थी, तब के चुनाव परिणाम इसकी पुष्टि भी करते हैं।

बीकानेर के सन्दर्भ में बात करें तो शहरी क्षेत्र होने के बावजूद भारतीय जनसंघ को यहां उल्लेखनीय सफलता न मिलना इन दो कारणों से समझा जा सकता है। जैसा कहा गया कि 1952 के चुनाव का मतदान तो चुनाव के बारे में जनता के कुछ समझ में आने से पहले ही सम्पन्न हो गया था। 1957 के दूसरे चुनाव तक समाजवादियों ने मुरलीधर व्यास के जुझारू नेतृत्व में शहर में अपनी जाजम बिछा ली थी-कांग्रेस विरोधियों को एक लड़तिये की जरूरत थी जिसे मुरलीधर व्यास ने न केवल पूरा किया बल्कि लगातार दो चुनाव जीत कर अपने अजेय होने की छवि भी बना ली थी। इसी के चलते, जहां जनसंघ के हिन्दू कार्ड तक को स्वीकार नहीं किया गया वहीं कांग्रेस को भी 1967 के चुनावों तक अपने उम्मीदवार बार-बार बदलने पड़े। हिन्दू कार्ड के अलावा जनसंघ के कांग्रेस विरोध के एजेन्डे को भी समाजवादी मुरलीधर व्यास ने अभिव्यक्ति देकर उसे यहां बेअसर बनाये रखा।

जनसंघ को बीकानेर में पांव टिकाने को जगह न मिलने का दूसरा कारण कांग्रेस के पास कांता कथूरिया जैसी नेता का होना भी रहा है। आजादी के बाद भारत-पाकिस्तान के बंटवारे के साथ बड़ी संख्या में हुए लोगों के देशान्तरण की पीड़ा को दोनों तरफ के कट्टरपंथियों ने धर्म से जोडऩे का प्रयास किया जिसमें वे एक हद तक सफल भी हुए। पाकिस्तान से आये अधिकतर हिन्दू उत्तरी भारत के शहरों में बसे थे। कुछ सकारात्मक प्रयासों और कुछ नकारात्मक बातों के चलते राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और जनसंघ ने देशान्तरण की पीड़ा भोग रहे लोगों की सहानुभूति हासिल कर ली थी। इसी का परिणाम था कि उत्तर भारत के शहरी क्षेत्रों में देशान्तरण करके आये लोगों में से अधिकतर को अपना समर्थक बना लिया था। लेकिन जनसंघ के लिए बीकानेर की स्थिति भिन्न इसलिए हो गई थी कि यहां आजादी से काफी पहले सिंध से आकर बसे कथूरिया परिवार की कान्ता कथूरिया कांग्रेस की राजनीति करने लगीं थी। देशान्तरण करके आये लोगों ने कान्ता कथूरिया में अपना स्वाभाविक भरोसेमंद पाया। इस तरह देशान्तरण के बाद उत्तरी भारत के शहरी क्षेत्रों में बसा जनसंघ का यह स्वाभाविक समर्थक वर्ग बीकानेर में अधिकांशत: कांग्रेस समर्थक हो गया था।

क्रमश:

दीपचन्द सांखला

2 मई, 2012

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