Thursday, December 27, 2018

पाती गांधीवादी अशोक गहलोत के नाम


अशोकजी!
मुख्यमंत्री के तौर पर इस तीसरे और अब तक में मुश्किल रहने वाले कार्यकाल के लिए शुभकामनाएं। आप की छवि गांधीवादी की रही है लेकिन यह कहने में कोई संकोच नहीं कि मुख्यमंत्री के आपके पिछले दोनों कार्यकाल की शासन शैली में गांधीवाद की छाप कहीं दिखाई नहीं दी। गांधी ग्राम आधारित अर्थव्यवस्था के हामी थे और आप शहरी विकास में लगे रहे, वह भी कुछ ही शहरों तक। वर्तमान में कृषि प्रधान कहे जाने वाले इस देश का कृषि क्षेत्र सबसे मुश्किल दौर से गुजर रहा है। तेलंगाना के मुख्यमंत्री के. चन्द्रशेखर राव को छोड़ दें तो कोई भी मुख्यमंत्री कृषि क्षेत्र के लिए गंभीर नजर नहीं आता। किसानों की ऋण माफी दो कारणों से जरूरी थी। पहला : खेतिहर किसान जिस बुरे दौर से गुजर रहे हैं, ऐसे में उन्हें फौरी राहत देने के लिए यह जरूरी हैचाहे इससे कुछ जमींदार किसान ही लाभान्वित क्यों ना हो रहे हों। दूसरा : यह कांग्रेस का चुनावी वायदा था जिसे पूरा करना जरूरी इसलिए भी हो गया कि मई तक संभावित लोकसभा चुनावों में पार्टी को वोट फिर जो लेने हैं। लेकिन क्या कोई भी सरकार ऋणमाफी जैसी राहत प्रतिवर्ष दे सकती है, कतई नहीं। तो फिर क्यों ना इस विकराल होती समस्या के ठोस समाधानों पर काम होकरना चाहें तो अमलीजामा पहनाने को पांच वर्ष कम नहीं होते हैं। किसानों की समस्याओं के स्थाई समाधान के लिए इन बिन्दुओं पर काम हो सकता है।
     न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) को कारगर बना कर इसे किसानों की संजीवनी बनाया जा सकता है। समग्र लागत मूल्य में पचास प्रतिशत जोड़कर बिना सीमा बांधे समस्त फसल की सरकारी खरीद ही किसानों को राहत दे सकती है। एमएसपी में जमीन की कीमत का ब्याज भी शामिल किया जाना जरूरी है।
     एमएसपी में आने वाली समस्याओं से निबटने के लिए प्रशासनिक स्तर पर बहुत कुछ करने की जरूरत है। कृषि मंत्रालय के दफ्तरों, कृषि विज्ञान केन्द्रों और कृषि विश्वविद्यालयों के बीच ऐसी कारगर प्रणाली विकसित की जाए जिसके अन्तर्गत किसानों को क्षेत्रवार ना केवल यह सलाह दी जाय कि कौन सी फसल की बुआई की जा सकती है, वरन् इसका मकसद यह भी होना चाहिए कि किसी भी जिन्स की फसल इतनी ना हो जाए कि कीमतें गिराना मजबूरी हो जाए। इसमें एक समस्या जो आ सकती है वह यह कि किसान ऐसी सलाह ना मान फसल की बुआई कर दे और फसल होने पर नजदीकी क्षेत्र के उस किसान के जिम्मे बेचने का सौदा कर ले जिसे उसी फसल की बुआई का सुझाव मिला हो! इसे रोकने के लिए बीघावर फसल खरीद की अधिकतम मात्रा तय की जा सकती है।
     फसलों का नुकसान कम से कम हो, इसके लिए संबंधित महकमों और अकादमिक संस्थानों को मुस्तैद किया जाना ज्यादा जरूरी है। इन महकमों को किसानों के संपर्क में निरन्तर रहने और हर कदम पर सलाह-निर्देश की प्रवृत्ति बनानी होगी।
     इस तरह की व्यवस्थाओं से फसलों के नुकसान की गुंजाइश जहां न्यूनतम रह जायेगी वहीं कृषि बीमा जैसी मद का भारी-भरकम बजट सरकार का बचेगा। फिर भी किसी की फसल को नुकसान पहुंचा हो तो उसके वाजिब मुआवजे की भरपाई सरकार करे। इस मुआवजे की अनुशंसा संबंधित ग्राम सभा करे तथा समुचित निरीक्षण के बाद वह मुआवजा सरकार को मान्य हो।
     ग्रामीण अर्थव्यवस्था कारगर बन सके इसके लिए ग्रामीण क्षेत्रों में जिन सुविधाओं को विकसित और प्रतिष्ठित करना जरूरी है उसमें शिक्षा, चिकित्सा मुख्य है। यदि इन पर गंभीर नहीं होंगे तो शेष सब किया-धरा बेकार जा सकता है। ये सुविधाएं ग्रामीणजन के लिए तो जरूरी हैं ही गांवों में सेवाएं देने वाले सरकारी कारकुन गांव में सपरिवार टिके रहें, इस हेतु भी जरूरी है। इन सुविधाओं के लिए किसी को भी 50 किमी से अधिक दूर नहीं जाना पड़े।
शिक्षा : सूबे के प्राथमिक, सेकण्डरी और सीनियर सेकण्डरी सरकारी स्कूलों को दिल्ली के शिक्षा मंत्री मनीष सिसोदिया की कार्यप्रणाली की तर्ज पर पुनप्र्रतिष्ठ करना जरूरी है। अलावा इसके उच्च शिक्षा के लिए ग्रामीण क्षेत्र के किसी भी विद्यार्थी को 50 से 70 किमी से ज्यादा दूर नहीं जाना पड़े, इस हेतु पर्याप्त दूरी पर ना केवल सरकारी कॉलेजों की व्यवस्था हो बल्कि उन्हें व्यवस्थित बनाए रखने के लिए लगातार प्रयास किए जाने होंगे।
चिकित्सा : गांवों के प्राथमिक चिकित्सा केन्द्र में सुविधाओं हेतु स्टाफ को लगाना जहां जरूरी है वहीं यह भी जरूरी है कि ग्रामीणों और गांवों में सेवाएं देने वाले लोगों को जरूरत पडऩे पर सेटेलाइट अस्पताल जैसी सुविधा तक पहुंचने के लिए 50 से 70 किमी से ज्यादा दूर नहीं जाना पड़े।
 ग्रामीणों की खेती व पशुपालन की सभी जरूरतें गांवों में पूरी हों और शिक्षा और चिकित्सा की ऐसी चाक-चौबंद व्यवस्था यदि गांवों में विकसित कर दी जाए तो गांवों के लोग शहरों की ओर पलायन करने को ना मजबूर होंगे और ना ही गांवों में सेवाएं देने वाले सभी तरह के सरकारी कारकुन शहरों में रहने को लालायित रहेंगे। शिक्षा-चिकित्सा की जरूरी सुविधाएं यदि गांवों में ही मिलने लगें तो सरकारी अधिकारी-कर्मचारी ना तो फरलो करेंगे और ना अपडाउन ही होगा।
पर्यावरण के मद्देनजर जो एक काम बहुत जरूरी है वह यह है कि भूमिगत पानी की कमी को देखते हुए बारानी खेती और कम पानी की खेती पर काम होना बहुत जरूरी है। अलावा इसके ब्लैक जोन वाले क्षेत्रों के कुओं के उपयोग पर किसी तरह संयम या नियन्त्रण लागू करना भी जरूरी है।
     ग्रामीण आधारित ऐसी अर्थव्यवस्था विकसित होने पर शहरों पर दबाव कम होगा। सरकार भी चाहे तो सीमित अवधि तक शहरी विकास पर खर्च होने वाले धन को गांवों में लगा सकती है। सीमित अर्से तक शहरों में उतना ही खर्च करें जितना कि जरूरी है।
     एमएसपी खरीदी की जिन्सें राज्यविशेष पर बोझ नहीं बने, इसके लिए केन्द्रीय स्तर पर समन्वयक आयोग विकसित किया जानी जरूरी है। यह ना केवल क्षेत्रवार फसल बुआई की सलाह देगा बल्कि जरूरत होने पर फसलों को एक राज्य से दूसरे राज्य में भेजने में सहयोग भी करेगा। अलावा इसके यह आयोग जरूरत होने पर फसलों के निर्यात की सलाह भी केन्द्र सरकार को दे सकेगा।
     यह सभी योजनाएं बिना धन के पूरी नहीं होनी है इसलिए धन का कारगर नियोजन भी जरूरी होगा। राज्य सरकार को अपने स्तर पर इसकी जहां व्यवस्था करनी होगी वहीं शिक्षा, चिकित्सा एवं कृषि क्षेत्र में सरकारी बेड़े को बढ़ाने का जो अतिरिक्त भार राज्य पर पड़ेगा उससे निबटने के लिए कोई रास्ता भी निकालना होगा। इसके लिए एक उपाय यह हो सकता है कि ऐसी तजवीज भी निकाली जाए जिसमें वेतन आयोग की आगामी सिफारिशों को मानने के लिए राज्य को बाध्य ना होना पड़े। वेतन आयोगों की ऐसी सिफारिशों से केवल और केवल बाजार को ही लाभ होता रहा है। इसके एवज में समाज को जो बड़ा नुकसान हो रहा है, वह यह कि सरकारें नये सरकारी रोजगार देने से कतराने और सहमने लगी हैं। सुझाई गई ग्रामीण आधारित अर्थव्यवस्था में रोजगार की विकराल होती समस्या से भी कुछ राहत मिलेगी क्योंकि जहां उक्त सभी सुझाव बिना सरकारी बेड़े को बढ़ाए पूरे नहीं हो सकेंगे वहीं गांवों में नये रोजगार स्वत: ही विकसित होने लगेंगे।
अशोकजी! गांधीवादी छवि पर गांधीवादी छाप गांव आधारित अर्थव्यवस्था विकसित किए बिना संभव नहीं है। यदि आप ऐसा कुछ नहीं कर पाते हैं तो इतिहास में गैर गांधीवादी छाप वाले शासकों में और आप में कुछ ही डिग्री का अन्तर दर्ज होगा। जाहिर है वह विशेष उल्लेखनीय तो नहीं होगा।
दीपचन्द सांखला
27 दिसम्बर, 2018

2 comments:

Unknown said...

बेहतरीन पत्र। आपने समाज के चहुंमुखी विकास के लिए आवश्यक तात्कालिक एवं दीर्घकालिक उपाय सुझाए हैं, जिन्हें लागु कर सरकारें यह साबित कर सकती हैं कि इच्छा शक्ति हो तो जनहित के कार्यों को अंजाम दिया जाना असंभव नहीं है।

Deep Chand Sankhla said...

धन्यवाद