Wednesday, May 27, 2015

अभाव के बहाने पानी की बात

इन्दिरा गांधी नहर की रखरखाव के लिए कुछ दिन नहरबंदी क्या रही शहर बिन पानी हो गया, बजाय बिन पानी सब सून के, मटके फोड़े जाने लगे, संबंधित विभाग की रोज हत्ता-तत्ता होने लगी। हत्ता-तत्ता करते हम भान ही नहीं रखते कि जलदाय विभाग के कार्मिक-अधिकारी भी हम ही में से हैं, खुद हम अपने-अपने कामों में कितना मुस्तैद रहते हैं? जब से पानी-घर-घर पहुंचने लगा इसकी बेकद्री करने लगे हैं। पानी के साथ चतुराई का बरताव छोड़ दिया है।
हम उस क्षेत्र के बाशिन्दे हैं जहां यह अतिशयोक्ति प्रचलित है कि आप पीने को घी मांग लें, सहर्ष मिलेगा, पानी मांग लिया तो पिलाया तो जायेगा लेकिन हर्ष गायब हो जाएगा यानी पानी यहां का दुर्लभतम द्रव्य रहा है। चतुराई से इसे वापरने के तौर तरीके बताने वाले नब्बे से ऊपर के चश्मदीद आज भी हैंपरात में बैठकर नहाना, नहाए पानी से कपड़े धोना और फिर उस पानी के उपयोग के भी किस्से हैं, वहीं सूखी मिट्टी से बरतन मांजने का यहां प्रचलन पानी अंवेरने का ही अंग रहा है।

अकाल की बात छोड़ दें तो इस क्षेत्र के सभी गांव अपनी-अपनी जरूरत के पानी का प्रबन्ध ऐसा रखते थे कि उन्हें इधर-उधर ताकना नहीं पड़ता था। शहर की बात करें तो बारिश के पानी के टांके और बाहरी ताल-तलाइयां सभी जरूरत पूरी करते थे। कुछ तलाइयों ने शहरी बसावट में आकर आगोर क्या खोए, अपना अस्तित्व ही खो दिया। पसरते शहर ने बाहरी क्षेत्र के तालाब भी लील लिए। तालाब को जीवन देने वाले आगोर होते हैं और बेसुध पसरता शहर ऐसी आगोरों की लिहाज नहीं करता। लिहाज इसलिए भी खत्म हो गया कि उनकी जरूरत समझना बन्द कर दिया। नल से पानी घरों में ही जाता है, जिन नई बसावटों में इसकी व्यवस्था नहीं है वहां शहर की देह को नलकूपों से छेद कर खींचा हुआ पानी टैंकरों के माध्यम से पहुंच जाता है।

कहने को तो बीकानेर रियासती काल के आदर्श शासक महाराजा गंगासिंह को माना जाता है लेकिन इस शहर के मुहल्लों तक पानी पहुंचाने का काम अन्तिम शासक शार्दूलसिंह ने ही किया। मुहल्लेवार तब लगे इन पानी के नलों का मान था, पानी की इज्जत थी। तीस-पैंतीस वर्ष पहले तक सुविधा होने के बावजूद कई घरों में पानी के कनेक्शन नहीं थे, वे अपनी जरूरतें सार्वजनिक नल स्टैण्ड से पूरी करते थे।

शहर की बाहर छवि कुछ ऐसी थी कि लोग पूछते, आप बिना पानी गुजर कैसे करते हैं, लेकिन यहां वैसा अभाव कभी महसूस नहीं हुआ। पिछली सदी के आठवें दशक में जलदाय विभाग ओपरी हवा में लिया था। पम्प लगे परम्परागत कुएं सूखने लगे या पम्प खराब रहने लगे, सार संभाल में लापरवाही होने लगी।

इसी दौरान थोड़े समय के लिए महबूब अली नाम के जनप्रतिनिधि आए। उन्होंने शहर की इस प्राथमिक जरूरत को समझा। मंत्री थे, पानी का महकमा था, सबसे ऊपर इस शहर से उन्हें प्यार था। बन्द पड़े कुओं को चालू करवाया। आजादी बाद की सूबे की बड़ी योजना राजस्थान नहर के माध्यम से शहर की कांकड़ तक पहुंचे हिमालय के पानी को शहर तक पहुंचाने की उनकी मंशा को जलदाय विभाग ने जब महंगी और समय खाऊ बताया तो उन्होंने जुगाड़ु व्यवस्था करवा शहर को कुओं के पानी के साथ न्यूनतम समय और कम लागत में नहरी पानी भी उपलब्ध करवा दिया। ऐसी इच्छाशक्ति वाला जनप्रतिनिधि शहर को उनसे पहले मिला और ही अब तलक।

शहर के विकास के साथ भारी विदेशी ऋणों को खपाने और उसमें से हिस्सा-पांती पाने की नीयत से बने कई जलाशयों के बावजूद किसी किसी मुहल्ले के लोग रोज उद्वेलित होते हैं, सम्बन्धित विभाग और प्रशासन की अकर्मण्यता तो दीखती ही है, इससे यहां के जनप्रतिनिधियों की दृष्टिहीनता भी साफ झलकती है। जनप्रतिनिधि चाहे सत्ता पक्ष से हों या विपक्षी, यहां तो जरूरत पर ही दिखावे की सक्रियता दिखाते हैं। ये सभी व्यवस्थाएं हमेशा चाक चौबन्द रहे इसकी सतत चेष्टा किसी नेता में दिखाई नहीं देती।
--दीपचंद सांखला

27 मई, 2015

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