Monday, August 12, 2013

शहर में बारिश

बीकानेर शहर के लिए बारिश प्रकृति की वह देन है जिसकी उडीक भी रहती है तो जाने पर बस कर, बस कर की आवाजें भी आने लग जाती हैं। सवा पांच सौ साल पहले जब इस शहर ने बसना शुरू किया तब उसे अपने आप के विस्तार का भान ही नहीं होगा। शहर की बसावट के लिए थार-रेगिस्तान के इस भू-भाग का ठीक-ठाक लम्बाई-चौड़ाई का ऐसा स्थान देखा गया जो ढिगे (ऊंचाई) पर था।
पसरते इस शहर को यह सुध ही नहीं रही कि कहां की बसावट अबाध रहेगी। कल की बारिश के आज जो समाचार लगे हैं, उनमें बताया गया कि पानी ने कहां-कहां पर कैसा-कैसा रंग दिखाया है। कुछ डूब क्षेत्र तो स्थाई ही हैं। पुराना शहर इस मामले में लगभग सुरक्षित है। परेशानी उन क्षेत्रों में ज्यादा है जिनकी बसावट पिछले सौ-सवा सौ साल में हुई। इस बसावट के समय भी इतना ध्यान तो रखा ही गया था कि थोड़ी-बहुत बारिश में गुजारा कैसे करेंगे। लेकिन पिछले पचास वर्षों में बसावट के अतिरिक्त दबाव में जिस तरह शहरी विकास हुआ है, परेशानियां वहीं ज्यादा भुगतनी पड़ रही हैं। कहने को इस बसावट का नियोजन स्थानीय निकायों यथा नगर परिषद, निगम और नगर विकास न्यास को करना था, ऑन रिकार्ड किया भी है। लेकिन देखा गया कि जिन मानकों का कड़ाई से पालन किया जाना था, वह नहीं हुआ। इनमें सर्वाधिक लापरवाही पानी निकासी के साधनों में रही, फिर वह चाहे रोजमर्रा घरों से निकलने वाला पानी हो या फिर बरसाती। कुछ काम हुए भी हैं तो भ्रष्टाचार और कई प्रकार के स्वार्थी दवाबों के चलते उनकी योजनाएं बिना पूरी तरह आगा-पीछा सोचे बनी और उनका क्रियान्वयन भी दक्षतापूर्ण नहीं हुआ। पिछले चालीस साल में रही-सही परेशानी प्लास्टिक थैलियों ने बढ़ा दी। स्थानीय निकायों में दूरदृष्टि वाला कोई जन प्रतिनिधी नहीं आया, किसी ने कुछ करना भी चाहा तो तब संसाधन नहीं थे और कभी संसाधन जुटा लिए गये तो इन निकायों के कार्यालयी ढर्रे ने पूर्ण दक्षता से कुछ होने नहीं दिया।
धन की कमी की बात को अब व्यर्थ का रोना धोना ही कह सकते हैं। काम करने वाला उसे जैसे-तैसे जुटा ही लेता है। हर बारिश के बाद शहर की सड़कों की मरम्मत पेटे ही करोड़ों खर्च होते हैं।
सड़कों के पेचवर्क के वर्कआर्डर अब आनन-फानन में जारी होते हैं। कुछ जगह तो काम बारिश के इस मौसम के समाप्त होने से पहले ही शुरू हो जाएंगे और जिस लापरवाह तरीके से सड़क मरम्मत का काम होता है, वह बताना जरूरी है। शहर की सड़कों में ऐसी सैकड़ों जगह निश्चित है जहां बारिश आते ही पानी जमा होता है, पानी के रहते जैसे ही वहां से यातायात गुजरता है, सड़कें उखड़नी शुरू हो जाती है, कई-कई स्थानों पर वर्ष में दो-वार पेचवर्क होता है। इस पर गौर ही नहीं किया जाता कि ऐसा बार-बार क्यों होता है। क्यों नहीं उन स्थानों में पानी भरने की समस्या का कोई स्थाई समाधान निकाला जाता है। पेचवर्क भी आज कल इस तरह से होने लगे हैं कि पहले डेढ़-डेढ़, दो-दो इंच की गिट्टी बिना डामर के डाल दी जाती है फिर उस पर डामर लगी कुछ कम मोटी गिट्टी को डाल कर रस्म अदायगी भर को रोड रोलर चला दिया जाता है, कुछ छोटी कारियों को तो दाब के लिए यातायात पर ही छोड़ दिया जाता है। काम करवाने वालों का लालच इतने में ही पूरा नहीं होता। यह पेचवर्क पैमाईश में जरूरत से चार गुने तक कर दिये जाते हैं। ऐसा नहीं है कि इस तरह से होने वाले कामों की जानकारी आस-पास में रहने वालों या इन मार्गों से बार-बार गुजरने वालों को नहीं होती। हर कोई लफड़े में पड़ना ही नहीं चाहता है। यही कारण है कि सार्वजनिक कामों में बेइमानी और लापरवाही दिन--दिन बेशरमी से बढ़ती जा रही है।
बारिश अधिकांश को सकारात्मक अनुकूलताएं देती है तो भ्रष्टाचार के चलते कुछ को नकारात्मक। कुछेक जो हर बारिश में ही डूब में जाते हैं उनके लिए तो इस बारिश का तब तक ना होना ही अच्छा है जब तक सम्बन्धित महकमे पानी भराव का स्थाई समाधान ना कर दें।

12 अगस्त, 2013

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