Saturday, April 20, 2013

चुनाव सुधार : मतदान की अनिवार्यता, राइट टू रिकॉल, राइट टू रिजेक्ट


अपने देश में चुनाव प्रणाली के सुधारों के साथ-साथ चुनाव सुधारों की बात भी जब-तब होती रही है। यह जरूरत महसूस किया जाना इस बात का प्रमाण तो है ही कि आबादी का एक तबका अपनेस्वार्थसे इतर भी समझता-सोचता रहा है। चुनाव सुधारों की बातों को पिछले वर्ष तब बल मिला जब अन्ना आन्दोलन परवान पर था। चुनाव सुधारों को लेकर अन्ना की दो मुख्य मांगें हैं-राइट टू रिकॉल यानी जीता हुआ प्रतिनिधि यदि मतदाताओं की उम्मीदों पर खरा उतरे तो उसे वापस बुलाने का हक मतदाताओं को होना चाहिए। दूसरा, राइट टू रिजेक्ट जिसमें मतदाता को लगे कि चुनाव में खड़े सभी उम्मीदवार उसके मत को पाने के योग्य नहीं हैं तो मतदान के समय ईवीएम (इलेक्ट्रानिक वोटिंग मशीन) में विकल्प के रूप में एक बटन उसे ऐसा भी मिलना चाहिए जिसे दबा कर सभी उम्मीदवारों को रिजेक्ट किया जा सके।
चुनाव सुधारों को लेकर एक आवाज भी सुनने को मिलती है। खासकर, भारतीय जनता पार्टी की ओर से, मतदान की अनिवार्यता को लेकर। इसके लिए लालकृष्ण आडवाणी मौके-टोके अपना पक्ष रखते रहे हैं और नरेन्द्र मोदी भी। मोदी तो इस फिराक में भी देखे गये कि यदि राज्य सरकार इसे लागू करने में सक्षम हों तो वे गुजरात में इसे तुरत-फुरत लागू भी कर दें। बिना इस विरोधाभास पर विचारे कि मतदान की अनिवार्यता की बात व्यक्तिगत स्वतंत्रता और लोकतांत्रिक मूल्यों के खिलाफ तानाशाही मानसिकता की उपज है। वैसे भी राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की लोकतान्त्रिक सोच या तो भ्रमित है या फिर इस लोकतान्त्रिक देश में संगठन चलाने की उनकी मजबूरी। मतदान की अनिवार्यता अव्यावहारिक भी है। इस पर मुख्य चुनाव आयुक्त वीएस संपत की राय से सहमत होते हुए उनकी बात को यहां आप से साझा कर रहे हैं-
मतदान करने की वजह सिर्फ मतदाता की बेरुखी ही नहीं होती है। अकसर वह बीमारी, शहर में होने की कारण भी वोट नहीं डाल पाता है। अगर मतदान अनिवार्य करने का कानून बना दिया गया तो उसकी  चुनाव आयोग, दोनों की ही दिक्कतें बढ़ जाएंगी। उसे बिना किसी जुर्म किए अदालत के चक्कर लगाने पड़ेंगे। चुनाव आयोग की सारी ऊर्जा मुकदमे लड़ने में बरबाद होगी पहले से ही मुकदमों का भार झेल रही अदालतों का काम और बढ़ जाएगा।
इस तरहराइट टू रिकॉलबेहद खर्चीला तो होगा ही बल्कि इसे व्यावहारिक भी नहीं माना जाता रहा है। लोकसभा विधानसभा क्षेत्रों में भारी भरकम मतदाताओं की संख्या के चलते पहले तो यह किस तरह तय किया जाएगा किरिकॉलके लिए मतदान करवाया जाय और जैसे-तैसे यह हो भी लिया तो नये प्रतिनिधि के लिए फिर से चुनाव हों और फिर पांच साल के तय समय पर फिर से चुनाव। इस तरह जिस चुनाव क्षेत्र में रिकॉल की जरूरत हो वहां पांच साल में चार चुनाव हो गये, और यदि एक क्षेत्र के सांसद, विधायक और महापौर या परिषद-पालिका अध्यक्ष तीनों ही मतदाताओं की उम्मीदों पर खरे नहीं उतरे तो पांच साल में बारह चुनाव हो जाएंगे! वर्तमान परिस्थितियों में इस प्रकार की संभावनाएं बनती भी हैं। यदि ऐसा सचमुच में हो गया तो यह लोकतंत्र के लिए भद्दा मजाक हो जायेगा। इससे तो ज्यादा अच्छा है कि मतदाता को लोकतान्त्रिक नागरिक के रूप में इस तरह शिक्षित-दीक्षित किया जाय कि वह अपने मत का प्रयोग सोच-समझ कर करे, किसी प्रलोभन, मजबूरी या दबाव में मतदान ना करे। जब तक ऐसा नहीं होता है तब तक चुने प्रतिनिधि को जैसे-तैसे पांच साल भुगतने के अलावा कोई अन्य व्यावहारिक विकल्प नहीं है मतदाता के पास।
राइट टू रिजेक्टजैसे सुधारों की चुनाव प्रणाली में महती जरूरत है, इससे केवल मतदान का प्रतिशत बढ़ेगा, इसके चलते मतदान को अनिवार्य मानने वालों की बात भी एक हद तक पूरी होगी और उम्मीदवारों की छंटनी का अधिकार भी मतदाताओं को मतदान के समय ही मिल जायेगा। क्योंकि तबकम बुरेको भी चुनने की मजबूरी खत्म हो जायेगी। और किसी चुनाव क्षेत्र के मतदान मेंराइट टू रिजेक्टके मत अन्य उम्मीदवारों से ज्यादा होंगे, केवल वहीं नए उम्मीदवारों के साथ दुबारा चुनाव की नौबत आएगी। इसलिएराइट टू रिजेक्टजैसा हक मतदाता को तुरत मिलने की पैरवी की जा सकती है।
20 अप्रैल, 2013

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