Wednesday, January 15, 2014

जुनून में तबदील होते शौक

यूं तो दुर्घटनाओं के समाचार सुनने-पढ़ने और देखने को मिलते रहते हैं। आए दिन की ऐसी खबरों से हमारी संवेदनाएं भोथरी होती जा रही हैं। ऐसी अधिकांश खबरों को हम सरसरी तौर पर पढ़-सुन कर उसी तर्ज पर अपनी भावभूमि से परे छिटका देते हैं। लेकिन कुछ घटनाएं ऐसी होती हैं जो कुछ देर ठिठककर बेचैन कर देती हैं। जयपुर में घटित कल की एक घटना अटक गई है। कल मकर संक्रान्ति का पर्व था। देश के जिन हिस्सों में पतंगबाजी इस दिन होती है उनमें जयपुर भी है। मोटरसाइकिल पर अपने पिता के साथ जा रही छह वर्ष की बालिका चंचल का गला पतंग के मांझे से कट गया, अस्पताल पहुंची तब तक उसकी जान जा चुकी थी। पिता ने बताया कि चंचल जिद करके आगे इसलिए बैठी ताकि पतंगों को देखने का आनन्द बिना बाधा ले सके। जयपुर में कल ऐसे ही दो मौतें और भी हुईं हैं। सड़क पर पतंग लूटने को बेसुध भागता एक किशोर वाहन की चपेट में आकर खत्म हो गया। एक अन्य दुर्घटना में मोटरसाइकिल सवार मांझे की चपेट में आने से अपनी जान गंवा बैठा।
ऐसी घटनाओं की बिना पर यदि यह तय करने की ठान लें कि पतंगबाजी बंद कर दी जानी चाहिए तो वे लोग जो पतंगबाजी को जीवन का बड़ा सुख मानते हैं, विरोध में खड़े हो जाएंगे और दबे मुंह यह कहते भी संकोच नहीं करेंगे कि उनके इस शौक से कोई मर गया तो हम अपना सुख क्यों छोड़ें। ऐसे जो लोग मनुष्य की जान जाने पर भी नहीं पसीजते  उनसे पतंगबाजी के ऐसे अवसरों पर उन सैकड़ों-हजारों पक्षियों के मरने और घायल होकर और कई-कई दिन पीड़ा भोग कर मरने से भी उनके पसीजने की उम्मीद करना बेकार है। हालांकि सरकार ने इस बार ऐसी अपील जरूर जारी की कि पक्षियों के आकाश में विचरण के सुबह-शाम के समय पतंगें उड़ाई जाएं लेकिन जिनकी संवेदनाओं में आइठाण पड़ चुके हैं, उन पर इस अपील का असर होगा, उम्मीद करना बेकार है। हालांकि पंजाब सरकार ने मांझे की चपेट में आने से मोटरसाइकिल सवार की मौत हो जाने पर हाल ही में अपने यहां पतंगबाजी पर रोक लगा दी है।
इस तरह की दुर्घटनाओं के लगातार बढ़ते जाने का बड़ा कारण यह है किबाजारअपने फायदे के लिए किसी शौक को जुनून में बदल देने हेतु लगातार प्रयासरत रहता है। उपभोक्ता में अपने शौक के प्रति जितना पागलपन, उनका बाजार उतना ही रोशन। अन्यथा ईस्वी की पांचवीं-शती में चीन से शुरू यह शौक पूरी दुनिया के आकाश पर यूं ही काबिज नहीं हो पाता।
बाजार पिछले दो-तीन दशकों से इस प्रयास में भी है कि पतंगबाजी की त्योहारी शामें आतिशबाजी के साथ रात में तबदील हों और वे सफल भी हो रहे हैं। यह आतिशबाजी ना केवल पशु-पक्षियों को बेचैन करती हैं बल्कि दमा और दमे के संभावित मरीजों की तकलीफें भी इस से बढ़ती हैं, जीव-जन्तु की सुध तो क्या लेंगे जब हमारी संवेदनाएं मनुष्य की तकलीफों से ही विचलित नहीं होती। रही बात मीडिया के इस तरह के शौकों को जुनून में तबदील करने में सहायक होने की तो मीडिया भी तो इसी संवेदनहीन बाजार का हिस्सा जो हो गया है।

15 जनवरी, 2014

4 comments:

maitreyee said...

बिल्कुल सही!!!

Unknown said...

Sir!! Completely Agree....,

Unknown said...

Sir!!! Very True... this is actually the fact and the way it's been describe in the article one must understand about the reality..

kumar said...

true sir