Friday, March 7, 2014

केजरीवाल के बहाने

केन्द्र में कांग्रेस नेतृत्व की सरकार से ऊबे आम-आवाम की गोलबन्दी एक समय नरेन्द्र मोदी और भाजपा के पक्ष में होती दिख रही थी, उसमें, अरविन्द केजरीवाल ने सेंध तो लगा ली पर उस सेंध से हासिल जनसमर्थन को वह सहेज कर रख नहीं पा रहे हैं। उनके गुजरात दौरे के दौरान ही हुई लोकसभा चुनाव तारीखों की घोषणा के साथ आचार संहिता पूरे देश में लागू हो गई। आचार संहिता की पालना में लगे गुजरात सरकार के अधिकारियों द्वारा अरविन्द केजरीवाल को रोका जाना और आचार संहिता की पालना करने का कहना, अरविन्द केजरीवाल को रुचा नहीं और इसके लिए वह गुजरात की मोदी सरकार को भुंडाने लगे। उक्त घटनाक्रम का असर केजरीवाल के समर्थकों में उलटा गया और वे भाजपा के दिल्ली और लखनऊ कार्यालयों पर विरोध प्रदर्शन में जुट गए और दूसरी तरफ से भाजपाई भी। इसे आमने-सामने की मुठभेड़ में बदलते देर नहीं लगी। फिर वह सब-कुछ हुआ जैसा ऐसी परिस्थितियों में हमेशा होता रहा है। कुछ घायल अस्पताल पहुंचे। आरोप-प्रत्यारोप शुरू हुए। हिंसक प्रतिक्रिया की शुरुआत करने का आरोप दोनों ही एक दूसरे पर लगा रहे हैं।
अरविन्द केजरीवाल जब गुजरात गये तो उन्हें मालूम था कि इसी दौरान आचार संहिता लग जानी है। ऐसे में एक पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष होने के नाते आचार संहिता के प्रावधानों की जानकारी उन्हें नहीं थी तो इसकी जानकारी उन्हें जुटानी चाहिए थी और उन प्रावधानों पर बजाय बहस करने और आरोप-प्रत्यारोप लगाने के, उन पर अमलकर उदाहरण पेश करना चाहिए था। मानते हैं, गुजरात सरकार दूध की धुली है और उनके सभी अधिकारी स्याणै! हो सकता है राज्य में सत्तारूढ़ दल की ऐसी ही गतिविधियों को वे नजरअन्दाज करते हों? लेकिन केवल इस बिना पर छूट 'आप' पार्टी को भी मिले ऐसी उम्मीदें ठीक नहीं है।
'आप' पार्टी ऐसे सक्रिय लोगों का जमावड़ा है जिनमें आक्रोश है, निराशा है, बदलाव चाहते हैं और ऊब भी चुके हैं। इनमें वे अवसरवादी भी होंगे जो अपने निहित स्वार्थों को पूरा करने की फिराक में जुड़ गए हैं। ऐसे सतभेळ समूह को बिना किसी वैचारिक आधार और बिना खरे साधनों के परोटना नामुमकिन सा होता है। ऐसी भीड़ में बहुतों की अपनी कुण्ठाएं भी होती हैं जो अवसर मिलते ही फूट पड़ती हैं। लखनऊ और दिल्ली की घटनाएं ऐसी ही मानसिकता का प्रदर्शन था। हो सकता है हिंसक वारदात की शुरुआत दूसरी तरफ से हुई हो, पर हिंसा का जवाब हिंसा से देना लोकतांत्रिक है, न्यायिक और ही मानवीय। भाजपाई और कांग्रेसी या ऐसी ही अन्य पार्टियों की भीड़-सा ही आचरण 'आप' पार्टी वालों को करना था तो नई पार्टी बनाने की जरूरत ही क्या थी। केजरीवाल इन घटनाओं के लिए अब दु: प्रकट कर रहे हैं, माफी मांग रहे हैं। लेकिन इस तरह की औपचारिकताएं इस बात की गारन्टी नहीं देती कि ऐसी प्रतिक्रियाओं की पुनरावृति भविष्य में नहीं होगी।
केजरीवाल और कभी उनके नेता रहे अन्ना हजारे की सीमाओं का खुलासा 'विनायक' ने कई बार किया। साथ-साथ यह भी माना कि 'अनाड़ी' मैदान में कूद ही गए हैं तो इन्हें परखने का समय दिया जाना चाहिए अन्यथा आमूल बदलाव चाहने वाले मतदाताओं के पास इन सभी पार्टियों को नकारने के अलावा अन्य कोई विकल्प नहीं है। कम बुरे को चुनने की बात गले इसलिए नहीं उतरती क्योंकि बुराई की बढ़त रोकने की कोई युक्ति अभी तक विकसित नहीं कर पाएं हैं। अन्ना इसी तर्क के आधार पर 'ब्रांड एम्बेसेडर' बनकर ममता बनर्जी का तो समर्थन कर रहे हैं, लेकिन केजरीवाल को सहयोग करने के उनके तर्क को कुतर्क ही कहें या और कुछ !!

7 मार्च, 2014

3 comments:

मोहन थानवी said...

Taza ghatnakram ke parinam swrup Sab kuchh Apni marjee or Anukulta se karne wale ki Haandi kaath ki bani dikhane lagi hai...

maitreyee said...

बहुत सही!!

maitreyee said...
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