Thursday, March 13, 2014

देवीसिंह भाटी : देख दिनन को फेर

मगरे के शेर की दहाड़ अरावली की छितराई पहाडिय़ों में अब गूंज पैदा करने में अक्षम होती लगने लगी है। पारिवारिक झटकों, ढळती उम्र और विधानसभा चुनाव की पिछली और पहली हार ने देवीसिंह भाटी को ठिठककर देखने को मजबूर कर दिया है, तभी कल जब जयपुर में बीकानेर लोकसभा क्षेत्र के पार्टी उम्मीदवार पर चर्चा के बाद अनमने ही सही भाटी को कहते सुना गया कि पार्टी जिसको भी उम्मीदवार बनाएगी उसे जिताकर भेजेंगे। यह वही भाटी हैं जिनके बारे में कहा जाता है कि पिछली सदी के आखिरी दशक में पार्टी में रहते उन्होंने मुख्यमंत्री भैंरोसिंह शेखावत की कुर्सी लपकने का दुस्साहस दिखलाया और 2003 में भाजपा से अलग होकर चुनाव लड़ा तो कमल को उखाड़ फेंकने की बात कहने तक से वह नहीं चूके। अपनी परगा में अब तक अपने तरीके और सलीके से बरताव करने वाले देवीसिंह भाटी लगता है अपने को ढलान पर देखने लगे हैं। पिछले कई महीनों से वर्तमान सांसद अर्जुनराम मेघवाल के विकल्प का अभियान चलाने और अति-आत्मविश्वासी हो चुके अर्जुनराम मेघवाल को कसौटी पर लगाने को मजबूर कर देने वाले देवीसिंह हताश होते दीखने लगे हैं। अकेले भिडऩे और अपने अनुकूल निर्णय करवाने के आदी भाटी के लिए इस तरह की परिस्थितियों का तब आना जब अर्जुनराम मेघवाल ने अपने लखणों से ही पार्टी में अपनी साख पर प्रश्नचिह्न लगवा लिए।
बीकानेर लोकसभा क्षेत्र में विधानसभा के आठ क्षेत्र आते हैं। जिले के सातों और श्रीगंगानगर जिले के अनूपगढ़ विधानसभा क्षेत्र से बने इस लोकसभा क्षेत्र में पांच विधायक भाजपा से हैं जिनमें से गोपाल जोशी और डॉ. विश्वनाथ के स्पष्ट विरोध और सिद्धीकुमारी के अस्पष्ट विरोध या झमेले में पडऩे की चतुराई के चलते तटस्थ दिखने की उनकी कोशिश रही है। सिद्धी इस तरह फ्रेम में आकर अपने को कसौटी की छाया से दूर रखने के जतन में हैं। विधानसभा चुनावों में हारे तीनों भाजपाई उम्मीदवारों में सवा लाख से भिडऩे की कूवत अपने में मानने वाले देवीसिंह भाटी का हौसला कम हुआ है या पैर पीछे करना उनकी रणनीति का हिस्सा है, कह नहीं सकते, पर लूणकरनसर के सुमित गोदारा जहां भाटी से कदमताल करते दिख रहे हैं तो लगता है नोखा के सहीराम बिश्नोई अपने साहस को परोट नहीं पा रहे हैं। शायद इसीलिए अनुपस्थिति से काम चला रहे हैं।
अर्जुनराम ने सांसद बनने के बाद जिस चतुराई और रणनीति से बिना कुछ किए बहुत कम समय में लोकप्रिय छवि बनाई लेकिन कार्यकाल की पूर्णता तक उसे उसी ऊंचाई तक सहेज कर नहीं रख सके। पार्टी के प्रभावियों में से अधिकांश को नाराज करने और केवल हथाई से रसोई बनाने की चतुराई के चौड़े जाने से उनकी बनी-बनाई छवि खिरने लगी और नौबत यहां तक गई कि अच्छी सांसदी के कई पुरस्कार मैनेज करने, जनसम्पर्क कक्ष को मुस्तैद रखने और पूर्व प्रशासनिक अधिकारी होने के बावजूद पार्टी के इस सर्वाधिक अनुकूल समय में उनकी उम्मीदवारी की दावेदारी हिचकोले खाते दिखने लगी।
मेघवाल के लिए सुकून की बात इतनी-सी है कि श्रीडूंगरगढ़ के विधायक किसनाराम नाई और अनूपगढ़ की कृष्णा बावरी का समर्थन तथा शहर भाजपा अध्यक्ष नन्दकिशोर सोलंकी की पार्टी निष्ठा के चलते स्पष्ट सहमति है। पार्टी में प्रदेश प्रतिनिधि सत्यप्रकाश आचार्य और जिले के अधिकांश मंडल और प्रकोष्ठ पदाधिकारी या तो उनके पक्ष की मंशा जता रहे हैं या पार्टी निर्णय का अनुसरण करने की बात कह कर विरोध के झमेले में फंसने से बच रहे हैं, अन्यथा अर्जुनराम मेघवाल की उम्मीदवारी ऐसे अनुकूल समय में सर्राटे से आनी चाहिए थी, क्योंकि राज में भागीदारी हासिल करने की अपनी कूवत का एहसास वह करवा चुके हैं।

13 मार्च, 2014

1 comment:

kumar said...

आपका आंकलन बिलकुल ठीक है 1-2 बातो छोड़ दे तो अपने सांसद मोहदय का 5 वर्ष का निचोड़ पेश किया है तो पूर्व विधायक साहब का असहाय होता नजर आना