Wednesday, August 31, 2022

बीकानेर : स्थापना से आजादी तक-17

 इस आदेश के पहले तक बीकानेर रियासत में गृहमंत्री के कहने पर डाक तार सेंसर करने और आपत्तिजनक पाये जाने पर रोक के आदेश अमल में लाये जा रहे थे। इस आदेश से मूलचन्द पारीक, दाऊदयाल आचार्य को बाहर समाचार भेजने में काफी दिक्कत होती थी लेकिन जैसे-तैसे कहीं-ना-कहीं से वे समाचार पहुंचा ही देते। अंग्रेज हुकूमत के डाक तार रोकने के आदेश के बाद इनकी पौ-बारह हो गयी। छद्म नामों से इधर-उधर से नेहरू के नाम से रोज तार जाने लगे। बीकानेर के गृहमंत्री ने पोस्ट मास्टर को बुलाकर सख्त आदेश भी दिया, लेकिन अंग्रेज हुकूमत के आदेश के आगे उन्होंने मानने से इन्कार कर दिया। वाइसराय की मौजूदगी में बीकानेर से आने वाले तार अपनी अहमियत दिखाने लगे। बीकानेर रियासत में हड़कंप मच गया।

इसी दौरान दाऊदयाल आचार्य को हिरासत में ले एक दिन गिराई (पुलिस लाइन) में रखा। मूलचन्द पारीक चूंकि गुरिल्ला कार्रवाही में लगे थे इसलिए उनके खिलाफ वारंट जारी किया गया, लेकिन वे बच निकले और रियासत से बाहर आसाम, कलकत्ता चले गये और वहां प्रवासी बीकानेरियों को संगठित करने में लग गये। वहां उन्होंने तुलसीराम सरावगी तथा तारानगर निवासी और बीएचयू के विद्यार्थी रहे सीताराम अग्रवाल से मुलाकात की। सीताराम अग्रवाल ने सभी समाचार जानकर बीकानेर के प्रधानमंत्री को लम्बा तार भेजकर हनुमानसिंह और मघाराम के साथ हो रही ज्यादतियां और अन्य कार्यकर्ताओं की गिरफ्तारी पर चिंता जताई, लेकिन प्रधानमंत्री ने इसका कोई उत्तर नहीं दिया। बीकानेर में गिरफ्तारियां जारी रहीं। मघाराम की 90 वर्षीय माता और छोटा भाई शेराराम, खादी मन्दिर के व्यवस्थापक मेघराज पारीक, नोखा में राज के कर्मचारी कुंजबिहारी आदि को भी गिरफ्तार कर लिया। महाराजा ने दूधवाखारा के किसानों को राहत दिखाने के नाम पर जांच कमीशन बिठाया, इस कमीशन ने भेदभाव करते हुए राजा के खासम-खास सूरजमालसिंह को तो वकील करने की इजाजत दे दी, लेकिन पीड़ित किसानों को वकील करने की इजाजत नहीं दी। हनुमानसिंह चौधरी को भी गोईल की तरह ही लालच दिखाकर तोड़ने की कोशिश की, लेकिन वे भी गोईल की तरह अलग ही मिट्टी के बने थे। 

इसी बीच अनूपगढ़ में नजरबंदी के दौरान गंगादास की हालत चिन्ताजनक हो गयी। खुद अस्वस्थ होते हुए भी पत्नी ने भागदौड़ की, और अनूपगढ़ गयीं। पति की हालत देखकर प्रधानमंत्री को पत्र लिखा कि या तो पति गंगादास को छोड़ दिया जाए या मुझे भी बच्चों सहित वहां नजरबन्द कर दें। इसी दौरान गंगादास कौशिक की नजरबंदी को एक वर्ष हो गया। गंगादास को बिना अवधि बताये पैरोल दे दी गयी। हिदायत दी गयी कि अवांछित गतिविधियां में संलग्नता पायी गयी तो पुन: नजरबन्द कर दिये जावोगे। लेकिन गंगादास दूसरी मिट्टी के बने ही नहीं थे। फिर लग गये और दूधवाखारा आन्दोलन की रिपोर्टिंग करने लगे। उधर गोईल ने लगभग एक माह दिल्ली में बिताकर जयपुर, अजमेर में साथियों से मिलते हुए बीकानेर रियासत के किनारे नागौर की एक धर्मशाला में डेरा डाल लिया। इन सभी यात्राओं की जानकारी सीआईडी के माध्यम से गृहमंत्री के पास लगातार पहुंच रही थी। बीकानेर में गोईल के परिवार को लगातार तंग किया जा रहा था। मूलचन्द पारीक को गोईल के नागौर प्रवास की जानकारी मिलने पर मिलने पहुंच गए और सभी तरह की स्थितियों से अवगत करवाया। गोईल ने आइजीपी को लम्बा पत्र लिखा जिसमें उन्होंने अवगत करवाया कि देश जो करवट ले रहा है, उसे अंग्रेज शासक भी समझने लगे हैं। ऐसे में उम्मीद है कि आपकी रियासत भी इसे समझे। दूसरी ओर जेल की काल कोठरी में यातनाओं से परेशान होकर वैद्य मघाराम ने 22 जुलाई 1945 . को भूख हड़ताल शुरू कर दी।

6 से 8 अगस्त 1945 . को कश्मीर में मिर्जा अफजल बेग के निवास पर अखिल भारतीय देशी राज्य लोक परिषद् की स्टैंडिंग कमेटी की बैठक पं. नेहरू की अध्यक्षता में हुई, जिसमें रियासत के गंगानगर के निर्वासित राव माधोसिंह अहीर ने बीकानेर की स्थितियों से विस्तार से अवगत करवाया। उधर निर्वासित विद्यार्थी नेता दामोदर सिंघल जयपुर, जोधपुर, अजमेर, पिलानी आदि-आदि स्थानों पर घूम कर वहां के विद्यार्थियों को बीकानेर की स्थितियों से अवगत करवा रहे थे।

18 नवम्बर, 1945 . से शुरू मघाराम की भूख हड़ताल पर राज ने आंखें मूंदे ही रखी तो 22 नवम्बर को रामनारायण और 23 नवम्बर को किशनगोपाल गुटड़ ने भी काल कोठरियों में भूख हड़ताल शुरू कर दी। 01 दिसम्बर को भूख हड़ताल के तेरहवें दिन तक वैद्य मघाराम की हालत खराब हो गई। इस हाल में भी उनकी पिटाई कर जबरदस्ती माफीनामा लिखवाने की कोशिश की गयी। लेकिन तीनों की भूख हड़ताल जारी रही। 11 दिसम्बर तक वैद्य मघाराम दिन में बार-बार बेहोश होने लगे। अपने सहयोगी धनराज माली के साथ सक्रिय गंगादास सेवक जोधपुर की प्रेस से छपा पेम्पलेट शहर में बांटने और पढ़ाने लगेजिसमें उक्त तीनों सेनानियों की जेल में भूख हड़ताल और उनको दी जा रही यातनाओं की जानकारी थी।

इधर जब शहर के व्यापारियों को पता चला कि इन्कम टैक्स सादुलसिंह पुन: लगाने जा रहे हैं तो वे भी उद्वेलित हो लिये। बीकानेर से लेकर कराची-कलकत्ता तक के व्यापारी विरोध में लिये। क्रमश...

दीपचंद सांखला

1 सितम्बर, 2022

Wednesday, August 24, 2022

बीकानेर : स्थापना से आजादी तक-16

 1942 के भारत छोड़ो आन्दोलन में गिरफ्तार नेता देशभर की जेलों में बंद थे। अंग्रेजों को लग गया कि कांग्रेस अपने इस आन्दोलन को वापस लेने वाली नहीं है। जून 1943 . में सभी नेताओं को बिना शर्त छोड़ दिया गया, जिसका दबाव रियासतों पर पड़ा तो सहीलेकिन वे ऐंठी रही।

रियासत के चूरू में दूधवाखारा का किसान आन्दोलन प्रजा परिषद् के मेल से आजादी का आंदोलन बनने की अंगड़ाई लेने लगा। दूधवाखारा की जिस प्रशासनिक क्रूरता की ओर महाराजा आंखें मूंदे थे, वह बहुत निर्दयतापूर्ण था। दरअसल दूधवाखारा के जागीरदार की मौत के बाद उनके तीनों बेटे वारिस बन बैठे। इतना ही नहीं, किसानों से लगान वसूली समांतर तीनों करने लगे। इस तरह लगान देने पर किसानों के पास कुछ बचता ही नहीं। लगान नहीं देने पर खेती की जमीनें जप्त कर हाथों-हाथ नीलाम की जाने लगी। वणिक समुदाय के कुछ धनाढ्यों ने इसका लाभ उठाना शुरू किया और निलामी में खरीद कर हाथों हाथ चारदीवारी करवा ली, ऐसी चार दीवारियां, क्षेत्र में आज भी मिल जायेंगी। सादुलसिंह द्वारा दूधवाखारा के इस असंतोष से आंखें मूंदने की वजह तीन वारिस में से एक सूरजमालसिंह का खासमखास होना दिख तो रहा थालेकिन महाराजा सादुलसिंह क्रूर और कामी सूरजमालसिंह से इतना दबते क्यों थे, यह किसी को समझ नहीं आया। इस अनुकूलता का लाभ लेने से गृहमंत्री प्रतापसिंह कहां चूकने वाले थे। उन्होंने दूधवाखारा के किसानों को दबाने की सभी करतूतें कीं, उनके नेता हनुमानसिंह को अज्ञात स्थान पर नजरबन्द कर, यातनाएँ वैसी ही दीं जैसी आचार्य और कौशिक को दी गई आखिर हनुमानसिंह से भी माफीनामा लिखा लिया।

इन क्रूरताओं की सभी खबरें अखबारों के माध्यम से देशभर में पहुंच रही थी। जिसके मुख्य सूत्रधार थे मूलचंद पारीक, जो भोले बनकर बड़ी सावधानी से खबरें इकट्ठी करते और गंतव्य तक पहुंचाते। दूधवाखारा में हो रहे अन्याय की खबरें भी देश भर में पहुंची। अखबारों में छपने वाली इन खबरों से गृहमंत्री प्रतापसिंह का पारा और चढ़ता जाता। उधर महाराजा सादुलसिंह केवल व्यवहार में बल्कि बात भी दो-मुंही करने वाले साबित हुवे। अपनी जबान की कीमत खुद ही खोते जा रहे थे। असहाय हुवे रियासत के प्रधानमंत्री पणिकर अपने को गृहमंत्री प्रतापसिंह के आगे बेबस पा रहे थे।

गोईल और उनके साथियों की अनुपस्थिति में वैद्य मघाराम अपने पुत्र रामनारायण के साथ पिछले निर्वासन को भूलकर केवल सक्रिय थे बल्कि रियासत के माधोसिंह जैसे अन्यों को भी सक्रिय किये हुवे थे। वे दूधवाखारा के किसानों की हिम्मत बंधवाने तक पहुंच जाते। जोधपुर रियासत के सहयोगी जयनारायण व्यास के माध्यम से दूधवाखारा के किसानों पर जुल्म की खबर 'हिन्दुस्तान टाइम्स' तक पहुंचाई। जिसे उसने विस्तार से छापा भी। इन सेनानियों की एक-एक खबर चाक-चौबन्द सीआईडी के माध्यम से गृहमंत्री तक पहुंचती। इनमें से रियासत से कोई बाहर भी गया है तो उसकी मिनट-मिनट की खबर से प्रतापसिंह वाकिफ रहते। दूधवाखारा के किसानों पर जुल्म इतने संगीन थे कि सैकड़ों की संख्या में उन्हें दो बार माउण्ट आबू और एक से अधिक बार बीकानेर आकर महाराजा से रहम चाहा, लेकिन महाराजा सादुलसिंह उन्हें उदारता से आश्वस्त तो करते, लेकिन करते कुछ भी नहीं।

किसी प्रलोभन और यातना से टूटने और कोर्ट में उनकी अपील के मद्देनजर इस बार पब्लिक सेफ्टी (अंग्रेजी कानून) के अन्तर्गत 11 जून, 1945 . को रघुवर दयाल गोईल को रियासत से पुन: निष्कासित कर पुलिस द्वारा बठिंडा तक खदेड़ दिया गया, पर गोईल कहां शान्त बैठने वाले थे। दूसरे ही दिन वे दिल्ली पहुंच हिंदी और अंग्रेसी अखबारों के संपादकों से मिले। उनकी बातों के आधार पर अखबारों ने खबरें लगाई।

22 जुलाई, 1942 . को प्रजा परिषद् की स्थापना हुई। 6 जुलाई, 1945 . बीकानेर के लिए 'किसान दिवस' के तौर पर दूसरा महत्त्वपूर्ण दिवस हो गया। दूधवाखारा और रियासत के अन्य छिटपुट आंदोलन और प्रजा परिषद् का आंदोलन एक-मेक हो गये। 6 जुलाई को वैद्य मघाराम और उनके पुत्र रामनारायण के नेतृत्व में जस्सूसर गेट क्षेत्र में जुलूस निकला। धोखे से नजरबन्द किये गये किसान नेता हनुमानसिंह चौधरी जिन्दाबाद के नारे जुलूस में लगाए जा रहे थे। पुलिस ने लाठीचार्ज कियाविशेषकर मघाराम, रामनारायण को सड़क पर ही बुरी तरह पीटा। आन्दोलनकारियों के फूट डालने के मकसद से उन सभी को गिरफ्तार कर सिर्फ 41 को गिरफ्तार किया। गिरफ्तार नेताओं में मघाराम को गिराई (पुलिस लाइन) और चंपालाल उपाध्याय, श्रीराम आचार्य, मुल्तानचन्द दर्जी, किशनगोपाल गुट्टड़ और चिरंजीलाल सुनार को शहर कोतवाली की हवालात में बन्द कर दिया। जज ने भी इन सेनानियों की सुनवाई करते हुए सभी को 16 दिन के रिमाण्ड पर अलग-अलग थानों में भेज दिया और इन पर, विशेष कर मघाराम पर जुल्म ढाये जाने लगे। बाद में इन सभी को सदर जेल भेजकर काल कोठरियों में बन्द कर दिया गया।

30 जून, 1945 . को शिमला में वाइसराय लार्ड वेवल और भारतीय नेताओं में भारतीय राजनीतिक गुत्थी सुलझाने के लिए सम्मेलन आहूत था। इसलिए अंग्रेज हुकूमत की ओर से सभी रियासतों के पोस्ट मास्टरों को आदेश दिया गया था कि सम्मेलन के दौरान शिमला की डाक और तार रोके जाए। क्रमशः...

दीपचंद सांखला

25 अगस्त, 2022

Thursday, August 18, 2022

बीकानेर : स्थापना से आजादी तक-15

सन् 1942 के बाद विद्यार्थी वर्ग अपने अभिभावकों के काबू में नहीं रहे हैं और बीकानेर के ही अनेक उच्चपदस्थ अधिकारियों के बच्चों ने उस समय काशी हिन्दू विश्वविद्यालय में सरकारी वजीफे पर शिक्षा पाते हुए भी आंदोलन में भाग लिया, य सर्वविदित है। इसीलिए मेरा कोई कुसूर हो तो सरकार मुझे बताए, मैं अपने आप को ठीक कर सकता हूं। कानून अपना काम करे तो मुझे कोई आपत्ति नहीं होगी।'

नागौर सम्मेलन के बाद दामोदर सिंघल ने बीकानेर आने की कोशिश की, लेकिन नोखा पुलिस को मौखिक आदेश देकर चौकस कर दिया गया था। नागौर सम्मेलन की जो बात विशेष उल्लेखनीय है, वह यह है कि आजादी के आंदोलन के सेनानी जोधपुर के जयनारायण व्यास का अपनी सूचनाओं के आधार पर बीकानेर के संभागियों को अच्छे से इस तरह हड़काना

'आपके यहां मजबूत संगठन जैसी कोई चीज नहीं है तो आप सरकार से संघर्ष करने की तो कल्पना ही नहीं कर सकते। मजबूत संगठन का निर्माण तब तक नहीं हो सकता जब तक उसे आम जनता का सहयोग प्राप्त हो और जनता का सहयोग तब तक नहीं मिलता जब तक आप उसकी सेवा करो, उसके दुख-दर्द में हिस्सेदार बनो, रचनात्मक कार्य करो और उनके अभाव-अभियोगों को मिटाने में जी-जान से लग जाओ। गोईल और उनके साथी गत अगस्त से नजरबंद कर दिये गये, आप लोग बताएं कि इन 8-10 महीनों में आपने क्या किया?' व्यास द्वारा इस तरह हड़काने पर बीकानेर के प्रतिनिधि निरुत्तर थे। (आज के राजनीतिक कार्यकर्ता जयनारायण व्यास की इन बातों को अमल में ला सकते हैं)

बीकानेर के कार्यकर्ताओं की नागौर सम्मेलन की एक और उपलब्धि थी, गंगानगर क्षेत्र के रिवाड़ी मूल के अहीर राव माधोसिंह जैसे कार्यकर्ता का जुड़ना, वापसी में गंगानगर जाते हुए वे कई दिन बीकानेर स्थित वैद्य मघाराम के घर रहे और बाद में अपने क्षेत्र में लगातार सक्रिय होने की ऊर्जा से भरपूर होकर गये। 13 मई को वैद्य मघाराम भी गंगानगर पहुंच गये। गंगानगर में माधोसिंह के साथ जो लोग जुड़े और सक्रिय हुए उनमें हरिशचन्द्र दर्जी, वैद्य जीवनदत्त, हंसराज लोहिया, चौधरी ज्ञानीराम वकील, चौधरी हरिशचन्द वकील, माधोसिंह और जीवनदत्त वैद्य ने मिलकर प्रजा परिषद् की गंगानगर शाखा स्थापित की। बाद में 4 डब्ल्यू के सरदार तारासिंह और चक 10 डब्ल्यू के कालासिंह, इन्दरसिंह छविसिंह इनसे जुड़ गये।

चूरू जिले के दूधवाखारा में किसानों पर जागीरदार के अत्याचार लगातार बढ़ रहे थे जिसके चलते वहां के किसान उद्वेलित होने लगे। किसानों का एक बड़ा समूह अपने बीवी-बच्चों को लेकर बीकानेर भी आया ताकि अपनी व्यथा से महाराजा को वाकिफ करवा सके। गर्मियों में महाराजा माउंट आबू चले जाते थे। यहां के अधिकारियों ने किसानों के उस समूह को कह दिया कि आपको अपनी बात महाराजा तक पहुंचानी है तो आबू जाना होगा। किसानों का वह समूह माउंट आबू तक भी गया। लेकिन जाने से पूर्व किसानों ने प्रजा परिषद् से सहयोग करने का अनुरोध कर दिया।

वैद्य मघाराम अपने पुत्र रामनारायण बधुड़ा सहित दूधवाखारा पहुंच गये, मघाराम के बुलावे पर गंगानगर से माधोसिंह भी दूधवाखारा पहुंचे और वहां के आन्दोलन को हर तरह के सहयोग देने का आश्वासन दिया। 

माधोसिंह की गंगानगर में सक्रियता से रियासत का गृह मंत्रालय परेशान हो गया। खुद गृहमंत्री प्रतापसिंह गंगानगर पहुंचे और परिषद् को तोड़ने की कोशिशें कीं। डराया-धमकाया, प्रलोभन दिये, पर माधोसिंह दृढ़ रहे। 27 जुलाई, 1945 को माधोसिंह को रियासत छोड़ने का आदेश दिया, जिसे मानने से माधोसिंह ने इनकार कर दिया। पत्नी के बीमार होते हुए भी माधोसिंह को जबरदस्ती बठिंडा पहुंचा दिया गया। राज के डर के कारण पत्नी को कोई परिचित संभालने नहीं जाते। लूनकरणसर की नजरबंदी में रघुवरदयाल गोईल बीमार, पत्नी-बच्चे बीमार लेकिन इलाज की व्यवस्था ही आजीविका की। ऐसे में मौका पाकर शासन ने गोईल को खरीदने का दुस्साहस किया। सरदारशहर के नेमीचन्द आंचलिया और बीकानेर के वकील ईश्वरदयाल गर्ग के माध्यम से प्रस्ताव भेजा कि आपको खादी के काम के लिए 5 लाख रु. दिये जायेंगे जिन्हें लौटाने नहीं होगे। शर्त यही है कि वे नागरिक अधिकारों की मांग छोड़ दें। इस पर गोईल ने बिचौलियों पर नाराज होते हुए गृहमंत्री को जो कहलवाया, वह इस प्रकार है

'प्रज्ञा परिषद् का अध्यक्ष तो क्या कोई छोटे-से-छोटा कार्यकर्ता सिपाही भी चांदी के टुकड़ों में अपने आपको और राष्ट्र-कार्य को बेचने को कभी तैयार नहीं होगा। आइन्दा फिर कभी सच्चे देशभक्तों को खरीदने से बाज आवें। देशभक्तों की बलि राष्ट्र की बलिवेदी पर गृहमंत्री महोदय चढ़ा देना चाहे तो चढ़ावे, पर आइन्दा फिर कभी चांदी के टुकड़ों में खरीदने की कल्पना ही करें।'

महाराजा और प्रधानमंत्री को भेजे अनेक पत्रों में से किसी का भी उत्तर मिलने पर गोईल ने न्यायालय की शरण में जाना तय किया और बंदी प्रत्यक्षीकरण की दरख्वास्त 15 मई, 1945 को प्रधानमंत्री की मार्फत भिजवा दी जिसमें अब तक उनके और उनके परिवार के साथ किये जाने वाले गैर कानूनी और दमनकारी व्यवहार की पूरी विगत दी।

अनूपगढ़ में नजरबन्द गंगादास कौशिक को उसी तरह की यातनाएं दी जाने लगी जैसी दाऊदयाल आचार्य को दी गई। माफीनामे का वैसा ही मजमून लिखकर हस्ताक्षर करवाने को दिया गया जैसा आचार्य को दिया गया। जर्जर हुई काया लिए कौशिक टस-से-मस नहीं हुए। रामपुरिया विद्यालय में नवीं कक्षा में अध्ययनरत गंगादास कौशिक के पुत्र द्वारका ने कक्षा की हाजिरी में 'हाजिर' के स्थान पर जोर से जयहिन्द बोल दिया। भयभीत हेड मास्टर ने स्कूल छोड़ तत्काल जाकर राज में शिकायत की। शाम तक द्वारका को स्कूल से निष्कासित कर दिया गया। 'जयहिन्द' का यह अभिवादन रियासत के विद्यार्थियों में आम होने लगा था। क्रमश...

दीपचंद सांखला

18 अगस्त, 2022

Thursday, August 11, 2022

बीकानेर : स्थापना से आजादी तक-14

 दाऊदयाल आचार्य अपनी जीवनी में लिखते हैं कि अपने त्रिभुज के दो भुज बाबू रघुवरदयाल गोईल और गंगादास कौशिक के नजरबंदी और कालेपानी में डटे रहने के मूलचन्द पारीक से समाचार सुन-सुन कर मेरी आत्मग्लानि कम होती गयी।

मूलचन्द पारीक, शिवदयाल दवे द्वारा भेजी खबरें जोधपुर के 'प्रजा सेवक' में छपतीं, जिन्हें पढ़कर दिल्ली के 'दैनिक विश्वामित्र' के संपादक सत्यदेव विद्यालंकार ने अपनी प्रतिक्रिया अग्रलेख में इस तरह दी।

'जब तक बीकानेर के अधिकारी खुली अदालत में मुकदमा चलाकर यह बतावें कि बीकानेर के इन कार्यकर्ताओं ने ऐसा क्या किया था जिसके कारण उन्हें अचानक गिरफ्तार करके नजरबंद कर दिया गया, तब तक बीकानेर की जनता को ही नहीं, अन्य देशवासियों की दृष्टि में भी बीकानेर के ये कार्यकर्ता रियासत की अंधेरगर्दी के शिकार समझे जावेंगे। हमें दुख है कि बीकानेर के महाराजा ने कुछ ऐसे व्यक्तियों को उत्तरदायित्व के स्थान पर रख छोड़ा है जो अपने पद के सर्वथा अयोग्य हैं और जो अपने कार्य से बीकानेर के शासन को कलंकित कर रहे हैं और जिनके स्वेच्छाचार से नागरिक स्वतंत्रता त्राहि-त्राहि कर रही है।'

दिल्ली के अखबार में ऐसी फटकार के बाद बीकानेर रियासत के प्रशासन में बेचैनी होनी ही थी, जिसके चलते हड़बड़ाहट में वे केवल खंडन की लीपापोती ही कर पाए।

दैनिक विश्वामित्र (26 नवम्बर, 1944) में एक ऐसी ही खबर तभी और छपी। बीकानेर के सेठ शिवदास डागा के वक्तव्य के हवाले से छपी ये खबर बीकानेर के जनसेवी डॉक्टर धनपतराय के संबंध में थी, डॉ. धनपतराय को बीकानेर के पुराने लोग आज भी इसलिए याद करते हैं कि वह बिना लोभ के अमीर-गरीब सभी का इलाज करते थे। डॉ. धनपतराय म्युनिसिपलिटी के सदस्य भी थे, इसी के नाते एक सरकारी प्रस्ताव का विरोध करते हुए बैठक से वाकआउट कर गये। राज ने नाराज होकर उनकी प्रेक्टिस को ही प्रतिबन्धित कर दिया। जनता त्राहि-त्राहि करने लगीमगर उनकी सुनता कौन था। 

इन्हीं सब परिस्थितियों में मूलचन्द पारीक के सतत प्रयत्न रंग लाए और वैद्य मघाराम ने परिषद् का नेतृत्व संभाल लिया। 26 जनवरी, 1945 को जस्सूसर गेट के बाहर स्थित गोबोलाई तलाई के पास वैद्य मघाराम की अगुवाई में प्रजा परिषद् के सदस्यों ने बैठक की और तिरंगा फहरा कर स्वतंत्रता दिवस की रस्म अदा की। इस के बाद परिषद् के सदस्यों में उत्साह का संचार पुन: हुआ।

1945 . में बीकानेर में एक ऊर्जावान युवा नेता दामोदर सिंघल प्रकाश में आया। डूंगर कॉलेज (तब वर्तमान फोर्ट स्कूल के भवन में चलता था) छात्र संघ के अध्यक्ष रह चुके दामोदर सिंघल को राज के आदेश पर कॉलेज प्रशासन ने निष्कासित कर दिया। चतुर्थ वर्ष के इस विद्यार्थी को विश्वविद्यालयी परीक्षा से ठीक पहले निष्कासित किये जाने पर प्रिंसिपल खुद दुखी थे। इस कार्रवाई पर 18 मार्च 1945 . को बी डी शर्मा ने 'बिना किसी आरोप के विद्यार्थी दंडित' नाम से एक पुस्तिका भी प्रकाशित की जिसमें बताया गया कि दामोदर सिंघल के निष्कासन पर कॉलेज में हड़ताल भी हुई। दामादेर सिंघल के निष्कासन की जो वजह राज द्वारा बताई गयी, उनमें रघुवर दयाल आदि की नजरबंदी आदेश के विरोध में छात्र संघ अध्यक्ष पद से इस्तीफा देना, 26 जनवरी, 1945 . में हॉस्टल में स्वतंत्रता दिवस मनाना और दिल्ली हिन्दुस्तान टाइम्स के सम्पादक देवदास गांधी से मुलाकात करना आदि थी। जबकि दामोदर ने देवदास गांधी से मुलाकात तो कॉलेज के निष्कासन के बाद दिल्ली प्रवास के समय की थी। इससे यह जाहिर होता है कि बीकानेर शासन हर स्वतंत्रता सेनानी की रियासत के बाहर भी पुख्ता जासूसी करवाता था। इसके बाद दामोदर सिंघल को रियासत से निर्वासित भी कर दिया। दामोदर ने अपने निर्वासन के समय को देश को सौंप दिया और जयपुर-जोधपुर में केवल लगातार सक्रिय रहे, बल्कि इस कोशिश में भी लगा रहे कि बीकानेर वापस कैसे जाऊं।

इसी काल में रावतमल पारीक के भाई मेघराज पारीक भी आजादी के आन्दोलन में सक्रिय हुए। राजकीय न्यायालय में अपनी पेशकारी की नौकरी छोड़कर आये मेघराज का यह निर्णय साहसी था। मेघराज ने खादी मन्दिर में व्यवस्थापक के तौर पर काम शुरू किया। तभी 6 अप्रेल से 13 अप्रेल 1945 . को 45वां राष्ट्रीय सप्ताह खादी मन्दिर को आयोजित करना था। शासन का गृह विभाग उक्त दोनों (मेघराज को राज की नौकरी छोड़ना और खादी मन्दिर का काम संभालना) कारणों से ज्यादा चौकस हुआ और आयोजन पर अंकुश लगाने शुरू कर दिये। आयोजन की रूपरेखा पर गोईल से दिशानिर्देश लेने मेघराज लूनकरणसर भी गये लेकिन उन्हें मिलने नहीं दिया गया। और रेलवे स्टेशन पर रोक कर बाद की गाड़ी से जबरदस्ती बीकानेर लाया गया और हनुमानगढ़ का डबल किराया वसूल कर छोड़ दिया। पुलिस की इस ज्यादती के विरोध में मेघराज पारीक ने 25 मार्च से तीन दिन का अनशन किया।

राष्ट्रीय सप्ताह के अन्तर्गत 8, 9 10 अप्रे को नागौर में बड़ा राजनीतिक सम्मेलन रखा गया जिसमें सभी रियासतों के प्रतिनिधि बड़े उत्साह से शामिल हुए। नागौर जाने वाले बीकानेर प्रजा परिषद् के लोगों में भैंरोलाल सुराणा, गोपीकिशन सुथार, श्रीराम आचार्य, कमलादेवी आचार्य, घेवरचंद तंबोली, चंपालाल उपाध्याय, काशीराम स्वामी, भीक्षालाल शर्मा, जीवनराम डागा, किशनगोपाल गुट्टड़, मुल्तानचन्द दर्जी, शेराराम शर्मा, रामनारायण शर्मा आदि थे। सम्मेलन के बाद वैद्य मघाराम 29 मार्च को जोधपुर चले गये, वहां उनकी विद्यार्थी नेता दामोदर सिंघल से मुलाकात तय थी। वैद्य मघाराम के साथ ही दामोदर सिंघल के कॉलेज के साथी कैलाशनारायण, बुद्धदेव शंकरलाल भी साथ हो लिए। बुद्धदेव बीकानेर की न्याय पालिका में सेशन जज थे। जासूसों द्वारा इसकी सूचना मिलने पर गृहमंत्री प्रतापसिंह ने जज साहब को इस बाबत संदेश भेजा तो जज साहब ने जवाब दिया वह विशेष उल्लेखनीय है।

क्रमश...

दीपचंद सांखला

10 अगस्त, 2022