Sunday, October 2, 2016

'उगे मौन के जंगलों में सहमा हुआ खो गया है'

साहित्य, संगीत और कला जैसी विधाओं के किसी सृजनकार की स्मृतियों को सार्वजनिक कर किसी शहर के बाशिन्दे अपने सुसंस्कृत होने की भले ही पुष्टि करते हों लेकिन सच यह है कि हरीश भादानी के बाद उनकी कही उक्त शीर्षक पंक्तियों को पुष्ट करते हुए यह शहर मौन का जंगल हो गया है।
पिछली सदी के सातवें, आठवें और नवें दशक में अपने स्थानीय लोक में सक्रिय साहित्यकार हरीश भादानी के समग्र सृजन के प्रकाशन के अवसर पर आयोजित कार्यक्रम उनकी स्मृतियों को साझा करने का अवसर दे रहा है। देश के साहित्यिक लोक में विचरण करने वालों को बीकानेर के संदर्भ से यहां के जो व्यक्तित्व गौरवी-भान करवाते रहे हैं उनमें हरीश भादानी, यादवेन्द्र शर्मा 'चन्द्र' और नन्दकिशोर आचार्य विशेष उल्लेखनीय हैं। इनके साहित्यिक अवदान पर लिखना मेरे बूते से बाहर है। चूंकि पिछले लगभग पांच दशकों से स्थानीय लोक का मैं सक्रिय हिस्सा रहा हूं तो इस आलेख में भादानी की लोकवी भूमिका का जिक्र करने का साहस जरूर कर सकता हूं।
सातवें और आठवें दशक में जिला प्रशासन की ओर से जिला जन सम्पर्क कार्यालय के माध्यम से स्वतंत्रता और गणतंत्र दिवस की पूर्व संध्याओं पर कवि सम्मेलन और मुशायरों का आयोजन हुआ करता था। इस तरह के आयोजनों में तब श्रोताओं की ठीक-ठाक उपस्थिति हुआ करती थी। युवा होते रसिक प्रशिक्षुओं के लिए ऐसे अवसर विशेष प्रशिक्षण के होते थे। तब जिन कवियों-गीतकारों को सुनना अच्छा लगता था उनमें हरीश भादानी भी एक थे।
भादानी अवाम में सीधे हस्तक्षेप करने और उसे जगाए रखने की खैचल में लगे रहने वाले साहित्यकार थे। होली के दिनों में अश्लील गीतों को बनाने और उन्हें लोकप्रिय धुनों पर सार्वजनिक तौर पर सुनने का रिवाज यहां लम्बे समय से रहा है। सुसंस्कृत लोग इसे अनुचित भी मानते रहे हैं। ऐसी प्रवृत्तियों को काउण्टर करने के लिए 1970 के इर्द-गिर्द बीकानेर के कवियों, गीतकारों ने भादानी की अगुवाई में टोली बनाई। चार पहियों के हाथगाड़े पर लाउडस्पीकर की व्यवस्था कर शहर की गली-गवाड़ और चौकों में वे स्वयं के रचे गीतों और कविताओं को गाकर सुनाते थे। तब यह प्रयोग न केवल लोकप्रिय हुआ बल्कि शहर से बाहर भी चर्चा में रहा।
भादानी के कई गीत और कविताएं व्यवस्था विरोधी और अवाम की खैरख्वाही वाले रहे हैं। सभी जानते हैं तब केन्द्र और राज्य—दोनों जगह शासन कांग्रेस का हुआ करता था। वामपंथी हो लिए भादानी चुनावों में अपनी विचारधारा वाले उम्मीदवारों की सभाओं में गीत और कविताएं पहले भी सुनाते रहे लेकिन आपातकाल के बाद 1977 के लोकसभा और विधानसभा चुनावों में जनता पार्टी की सभाओं में भादानी अपने गीतों से श्रोताओं को मचलने को मजबूर कर देते थे। उस दौर में भादानी के 'मरजी राज जासी, लोकराज आसी' और 'रोटी नाम सत है कि खाए से मुकत है' जैसे गीत लोकतंत्र के प्रति अवाम की हुलस को पुष्ट करते देखे गये। साहित्य, कला और संस्कृति-कर्मियों का सीधा जनजुड़ाव तब के बाद यहां नहीं देखा गया। पिछले लगभग बीस-पचीस वर्षों से तो यह सून खलने भी लगी है।
उस दौर में वैचारिक सहिष्णुता थी, विरोध में बात करने वाले साहित्यकारों और संस्कृतिकर्मियों को भी सत्ता और राजनीतिक दलों द्वारा मान दिया जाता था। यही वजह है कि 'लोकराज कत्तई नहीं वह, देह धंसे कुर्सी में जाकर, राज नहीं है कागज ऊपर एक हाथ से चिड़ी बिठाना' जैसी पंक्तियां लिखने वाले भादानी को तब के शासक वर्ग के लोग पूरा मान देते थे।
पिछली सदी के सातवें-आठवें दशक में देश के साहित्यिक लोक में चर्चित 'वातायन' पत्रिका का सम्पादन हरीश भादानी ही करते थे। वातायन के उस दौर में यहां महात्मा गांधी रोड स्थित 5, डागा बिल्डिंग, वैचारिक उद्वेलन का केन्द्र था। तब साम्यवाद, समाजवाद और एमएन राय के नवमानववाद पर मनीषी डॉ. छगन मोहता के सान्निध्य में गंभीर चर्चाएं होती। ऐसी चर्चाओं में तब मानिकचन्द सुराना जैसे लोगों की पूरी सक्रियता रहती थी। राजनीतिक-सामाजिक और साहित्यिक चर्चाओं के उस माहौल से यह शहर पिछले तीन दशकों से ज्यादा समय से वंचित है। कहने को सांस्कृतिक आयोजन बढ़े हैं लेकिन आयोजनों में विमर्श नदारद है। डॉ. छगन मोहता होते तो कहते—केवल पानी बिलोया जा रहा है, जिससे हासिल कुछ नहीं होना।
'वातायन' के मुद्रण में आ रही समस्याओं से निपटने के वास्ते भादानी ने राजश्री प्रिंटर्स नाम से प्रिंटिंग प्रेस भी चलाया, शहर में जिसकी अपनी साख थी। तब भादानी को अपने प्रेस परिसर में प्रिंटिंग ब्लॉक के बराबर मोटाई वाले लकड़ी के फट्टे पर सुथारी औजारों से आकृतियां उकेरते देख सकते थे। इन्हीं आकृतियों को वे ब्लॉक की जगह काम लेकर पत्र-पत्रिकाओं के आवरण पर विभिन्न रंगों में छपवाते थे।
भादानी का ऐसा ही एक पक्ष ओर था। वामपंथी लेखकों और संस्कृतिकर्मियों की सामान्य छवियों से उलट साफ-सुथरे रहने वाले भादानी का 'ड्रेस सेंस' गजब का था, उनके कुर्ते, जैकेट, पजामे विशिष्ट प्रकार के होते। यानी वे केवल शब्दों को ही नहीं संवारते बल्कि रोजमर्रा की अपनी जरूरतों में काम आने वाली वस्तुओं के साथ भी नये-नये प्रयोग करते। बहुधा तो शॉल, चद्दरों आदि से कुर्ते-जैकेट बनवाने के लिए अपना डिजायन वे खुद बताते और कपड़े सिलने वाले कारीगर से सिलवा लेते। भादानी रसोई में भी हाथ आजमाते, सब्जियों को नये-नये तरीकों से बनाते और बेहद स्वादिष्ट बनाते। यही नहीं, कई बार उनकी पहनी चप्पल और चश्मे का फ्रेम भी ध्यान खींचे बिना नहीं रहते।
हरीश भादनी समग्र के प्रकाशन के इस अवसर पर प्रकाशक से संबंधित एक प्रकरण साझा करना जरूरी है। पिछली सदी के आठवें दशक की बात है, राजस्थान विश्वविद्यालय के प्रथम वर्ष, सामान्य हिन्दी की एक पाठ्यपुस्तक 'समवेत' में भादानी की दो कविताएं शामिल की गईं। पुस्तक के सम्पादक भादानी की उदारता से परिचित थे इसलिए स्वीकृति की तो दूर की बात कविताओं को उन्होंने संग्रह में बिना पूछे ही शामिल कर लिया। इसकी जानकारी भादानी से पहले नन्दकिशोर आचार्य को हो गई, पूछने पर भादानी ने अनभिज्ञता जताई। फिर क्या, आचार्य ने प्रकाशक पर कार्यवाही करने के अधिकार भादानी से मौखिक ही ले लिए और देश के उस नामी प्रकाशन की मालकिन के खिलाफ न्यायालय में इस्तगासा लगवा दिया। वकील थे विजयसिंह एडवोकेट, जिन्होंने कांग्रेसी उम्मीदवार के तौर पर 1977 का विधानसभा चुनाव आरके दास गुप्ता के खिलाफ कोलायत से लड़ा।
जज साहब जब दूसरी-तीसरी तारीख देने को हुए तो विजयसिंह ने जज से निवेदन करते हुए कह दिया कि ये लोग मेरे मित्र हैं, हर तारीख को पांच-सात लोग कोर्ट आ धमकते हैं, फीस की बात तो छोडि़ए, कागज-पतर तो घर से लगाता ही हूं, इनके चाय, कॉफी, नाश्ते की व्यवस्था भी मुझे ही करनी पड़ती है। जज ने निवेदन का संज्ञान लिया और प्रकाशक को नोटिस भेज दिया। सम्पादक तुरंत बीकानेर पहुंच गये। भादानी को संपादक से बात न करने को पाबन्द कर आचार्य ने खुद अपने को ही बात करने के लिए नियुक्त मान लिया। उस दौर में जब संपादक ने मानदेय के तौर पर दो कविताओं के पांच सौ रुपये भी किसी को नहीं दिए, आचार्य ने तब मानदेय के पांच हजार रुपये तय कर दिये। सम्पादक भादानी से चिरौरी करते रहे पर भादानी उनकी कोई सहायता न करने को लाचार। आखिर उन्हें भादानी को पांच हजार देने पड़े, रसीद पर हस्ताक्षर तो भादानी ने किए पर रुपए आचार्य ने यह कहते हुए ले लिए कि ये तो भाभी (भादानीजी की पत्नी) को दिए जाएंगे। भादानी असहाय होकर इतना ही कह पाए कि मेरी कविताएं हैं, इनमें से कुछ तो मुझे मिलने चाहिए। लेकिन उनकी सुनी नहीं गई।
अब अपनी बात करूं तो पत्रकार के रूप में शुरुआत में मेरी पहली और विस्तृत रिपोर्ट 1979 के जिस कार्यक्रम की 'मरुदीप' साप्ताहिक में छपी वह भादानी की काव्य पुस्तक 'नष्टो मोह' के लोकार्पण समारोह की ही थी। तब मरुदीप नन्दकिशोर आचार्य के सम्पादन में निकलता था। उस समय भादानी के साथ जो आत्मीय रिश्ता बना, अन्त तक कायम रहा।
---दीपचन्द सांखला 1 अक्टूबर, 2016

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