Thursday, February 27, 2020

यूं बने हैं हम 'भारत के लोग'

रक्त शुद्धता और मूल निवासी होने के दावों के बीच आज का आलेख भारतीय लेखक और पत्रकार टोनी जोसेफ के 'द हिन्दू' में प्रकाशित साक्षात्कार पर आधारित है। यह साक्षात्कार भारतीय सभ्यता को समझने के लिए किये शोध के आधार पर लिखी जोसेफ की अंग्रेजी पुस्तक 'अरली इण्डियन्स' के सन्दर्भ से लिया गया है। इस साक्षात्कार की जानकारी मित्र अविनाश व्यास ने दी और अग्रज वीरेन्द्र शर्मा ने उसके अनुवाद में सहयोग किया। कुल जमा यही कि प्रस्तुति के अलावा इसमें मेरा खास कुछ नहीं। ―सं.

#
नस्लीय विचार करते यह माना जाता रहा कि जो जहां बसा है उनके पूर्वज मूल रूप से वहीं रहते आए हैं। मानव कंकालों की अस्थियों से हासिल यूनिक आनुवंशिक कोड जिसे डीएनए भी कहा जाता है, इसकी वैज्ञानिक खोज से जीव-जगत पर आनुवंशिकता आधारित अनुसंधान और विश्लेषण से न केवल कई धारणाएं मिथक साबित हुईं बल्कि उसने मानव सभ्यता के इतिहास को भी हिला दिया है। विभिन्न कालों में विश्व के अनेक भागों में भिन्न-भिन्न जन समूहों के लगातार पलायन और विस्थापन होते रहे हैं। डीएनए की खोज बताती है कि ऐसे पलायन और विस्थापनों के दौरान अलग-अलग समूहों के मेल मिलाप से नस्लें मिश्रित होती गईं। इसके चलते नस्ली और आनुवंशिक श्रेष्ठता और शुद्धता की बात अर्थहीन साबित हुई है। ये पलायन और विस्थापन मध्य एशिया में ही नहींयूरोप, अमेरिका और अफ्रीका आदि सभी महाद्वीपों-व उप महाद्वीपों में होते रहे हैं।
इस तरह की स्थापनाएं टोनी जोसेफ की हाल ही में आई पुस्तक 'अरली इण्डियन्स' में मिलती हैं। इस पुस्तक में जोसेफ ने बताया कि आबादी के ऐसे पलायनों के फलस्वरूप, अनेक प्राचीन सभ्यताओं के समय में इस भारतीय भू-भाग में विस्थापन हुए और समय के साथ उनमें संबंध भी बने। ऐसे में अपनी नस्ल को ही श्रेष्ठ मानना और आनुवंशिक तौर पर रक्त शुद्धता के दावे भ्रम ही हैं।
भारत के संदर्भ में जोसेफ इस प्रक्रिया को समझते हुए बताते हैं कि वर्तमान भारतीय सभ्यता मुख्यत: चार ऐतिहासिक पलायनों से आए लोगों से बनी है।
वैज्ञानिक शोधों के आधार पर मनुष्य का विकास दक्षिण अफ्रीका में हुआ और पूरी दुनिया वहीं के विस्थापितों से बनी है। हमारे इस उप-महाद्वीप के दक्षिण में मनुष्य का पहला पदार्पण पैंसठ हजार वर्ष पूर्व अफ्रीका से सीधे हुआ वहीं दूसरा विस्थापन बारह हजार पूर्व ईरान से होना सिद्ध हुआ है। पहले-पहल कृषक समूह वहीं से यहां आए और पश्मिोत्तर भू-भाग में बस गये। भारत में खेती-किसानी की शुरुआत तभी से शुरू मानी गई। धीरे-धीरे ये लोग अपने से तिरपन हजार वर्ष पूर्व आये और दक्षिण में बसे आदि-भारतीय से घुल-मिल गये। परिणाम स्वरूप इस उप-महाद्वीप पर कृषि क्रान्ति का सूत्रपात हुआ। इस मिलन से 'हड़प्पा सभ्यता' का उदय और विस्तार हुआ।
तीसरे बड़े विस्थापन के तौर पर चार हजार वर्ष पहले पूर्वी-एशिया से भी लोग-बाग इस उप-महाद्वीप पर आए। पूर्व-दक्षिण के इस विस्थापन में 'खासी' और 'मण्डारिन' भाषी पनपे।
इस तीसरे विस्थापन के कुछ समय बाद ही पैंतीस सौ से चार हजार वर्ष पूर्व मध्य-एशिया के कजाकिस्तान से जो लोग आए वे अपने को आर्य कहने लगे, इस अन्तिम बड़े विस्थापन के साथ ही इण्डो-यूरोपियन भाषाओं का विकास और विस्तार हुआ।
इस प्रकार हम जो आज भारतीय हैं, वे उक्त चार विस्थापनों के विभिन्न अनुपातों का मिश्रण हैं। शोध से यह निष्कर्ष भी निकलता है कि हड़प्पा सभ्यता ही हमारी मूल और मुख्य सभ्यता है। उत्तर और दक्षिण की आबादी उसी सभ्यता की वाहक है। उसी हड़प्पा सभ्यता ने हमें एक सूत्र में पिरो कर रखा। भौगोलिक दूरियों की वजह से दक्षिण में द्रविड़ संस्कृति का विकास हुआ और उत्तर में इण्डो-यूरोपियन संस्कृति।
उक्त चारों विस्थापनों से वर्तमान भारत का एक ही हिस्सा-अण्डमान द्वीप समूह ही पूरी तरह अछूता रहा। वे जैसे भी थे, अपनी नस्ल और आनुवंशिकता के हिसाब से शुद्ध थे। अपने ही समूहों के भीतर जोड़े बनाकर रहने जैसी मर्यादा का पालन दो हजार वर्ष पूर्व से मिलता है, जो यह दर्शाता है कि प्रकारान्तर से विकसित हुई यह जातिप्रथा आर्यों के आगमन की वजह से नहीं बल्कि उससे भी पहले के राजनीतिक विकास, स्थानीय जरूरतों और अन्य कारणों से पनपी।
अब तक का अन्तिम निष्कर्ष यही है कि भारत की वर्तमान समग्र आबादी में 50% से 65% हिस्सा उस भारतीय वंश परम्परा से है जो 65 हजार वर्ष पूर्व अफ्रीका से विस्थापित होकर आये थे।
किसका क्या धर्म और भाषा है और उसके पूर्वज कौन थे, किस क्षेत्रविशेष के हैं। इस तरह के भाव उक्त स्थापनाओं से निरर्थक साबित होते हैं।
दीपचन्द सांखला
27 फरवरी, 2020

No comments: