Friday, October 9, 2015

प्रकाशन के शुरुआती जुगाड़ और जरूरत

प्रकाशन का काम भी अन्य व्यवसायों की तरह धंधा ही हो गया है। समाज में कभी जिस तरह लेखकों का अतिरिक्त सम्मान था और कुछेक को अब भी हासिल है, वैसा ही अतिरिक्त सम्मान कभी प्रकाशन व्यवसाय में लगे लोगों का भी था। लेकिन पिछले तीस-चालीस वर्षों में प्रकाशकों के ऐसे सामाजिक सम्मान में लगातार कमी आती जा रही है। अपवादस्वरूप उन समृद्ध प्रकाशकों की बात यदि न करें जिन्हें वैसा सम्मान धनबल से हासिल है तो इस तलपट के कुल जमा असल सम्मान में प्रकाशकों की हिस्सेदारी अब कम ही है। ऐसे सम्मान के हक का दावा प्रकाशक अब इसलिए भी नहीं कर सकते क्योंकि पुस्तक को उन्होंने आपूर्ति की वस्तु मात्र बना दिया और सरकारें भी पुस्तकों की थोक खरीद अन्य वस्तुओं की तरह टेण्डर जैसी सामान्य प्रक्रिया से ही करने लगी है। पुस्तक जब वस्तु के रूप में ही तबदील हो चुकी तो उसका उत्पादन भी वस्तु की तरह होना शुरू हो गया और जिस तरह की लापरवाही और असावधानियां सामान्यत: अन्य वस्तुओं के निर्माण में देखी जाती हैं, वैसी ही इस व्यवसाय की विक्रय वस्तु पुस्तक के निर्माण में भी आम हो गई है।
निजी क्षेत्र के वे प्रकाशक जो अपने को ब्राण्ड रूप में स्थापित रखना चाहते हैं या हो गए हैं वे जरूर अच्छा प्रेस ढूंढ़ लेते हैं, अच्छा डिजायनर और प्रूफरीडर अनुबंधित कर लेंगे ताकि कसौटी पर उनके दावे कुछ तो खरे उतरें। लेकिन तमाम आधुनिक संसाधनों और सुविधाओं के बावजूद पुस्तक प्रकाशन में वैसी निष्ठा नहीं दिखाई देती जो आजादी बाद के तीस-चालीस वर्षों तक देखी गई। भारत में प्रकाशन के सौ-सवा सौ वर्षों का शुरुआती चौथाई काल स्थापित होने के संघर्ष और चुनौतियों से निबटने में गुजर गया, दूसरा एक-चौथाई देशप्रेम के जज्बे से आजादी के आन्दोलन में प्रकाशकीय योगदान कर कुछ कर गुजरने में, इस तरह से आजादी के बाद तीसरे एक चौथाई काल को उद्देश्यपूर्ण प्रकाशन व्यवसाय का नैष्ठिक काल कह सकते हैं। चूंकि मैं हिन्दी प्रकाशन व्यवसाय से हंू इसलिए उचित ही होगा कि इसी भाषा के प्रकाशन व्यवसाय के माध्यम से बात करूं। मुझे लगता है अन्य अधिकांश भारतीय भाषाओं के प्रकाशन व्यवसायों की स्थितियां हिन्दी प्रकाशन व्यवसाय की स्थितियों से बेहतर होंगी, इसलिए बात बदतर हिन्दी प्रकाशन के हवाले से करने पर शेष का कमोबेश अन्दाजा लगाया जा सकेगा।
पिछले लगभग चार दशकों से जब से पुस्तकों की सरकारी खरीद का दौर-दौरा चला तब से ऐसे बहुत से व्यापारी और लोग इस व्यवसाय में आ गये जो किताब को एक वस्तु से ज्यादा न मानते और न ही बरतते हैं। चिन्ताजनक यह भी है कि व्यावसायिक प्रतिस्पर्धा के चलते स्थापित और प्रतिष्ठित प्रकाशकों का चाल-चलन भी कुछ तो पीढिय़ां बदल जाने के चलते और कुछ अति लालच में धंधेबाज प्रकाशकों जैसा ही हो गया।
ऐसे में प्रकाशन के प्रारंभिक चरणों की बात करना बेमानी-सा है। पाण्डुलिपि चयन के लिए निजी क्षेत्र के प्रकाशन प्रतिष्ठानों में अब पहले की तरह न तो चयनकर्ताओं के किसी पैनल की गुंजाइश बची है और न ही प्रकाशन प्रतिष्ठानों के मालिक वैसे रहे हैं जो चयन का प्राथमिक निर्णय भी खुद कर सकें। ऐसे में अधिकांश निजी प्रकाशनों में अब स्थापित लेखक की रचना होना ही चयन का एक आधार हो गया है। लेखक किसी प्रभावशाली पद पर है और कोई बड़ा लाभ दिलाने की हैसियत रखता है तो उसकी पुस्तक प्रकाशित हो जायेगी, इस तरह यह दूसरा आधार हो गया। तीसरा आधार आजकल बड़ा कारगर है, वह यह कि लेखक यदि उत्पादन लागत खुद वहन कर ले और रॉयल्टी प्राप्ति की रसीद पूर्व में ही प्रकाशक को थमा दे। इस तरह प्रकाशन के प्रारम्भिक चरण 'पाण्डुलिपि चयन' के मानकों का आधार ही बदल गया।
दूसरा महत्त्वपूर्ण चरण पाण्डुलिपि के सम्पादन का था जो अब सिरे से गायब है। जिसकी पुस्तक है बहुत कुछ उस लेखक की प्रतिष्ठा के भरोसे ही छोड़ दिया जाता है। इस चरण का महत्त्व तब और भी नहीं बचता जब पता हो कि अधिकांश पुस्तकें थोक में खरीद होकर डम्प होनी हो। तथ्यात्मक व तथ्यहीन, प्रामाणिक या अप्रामाणिक जो कुछ भी लेखक की ओर से लिखकर दे दिया गया, उसे लिया और प्रकाशित कर दिया जाता है, यह मान कर कि लेखक जाने और लेखक की बलाय जाने, पाठकों की चिंता अब है भी किसे। इस तरह सम्पादक जैसी इकाई इस व्यवसाय से लगभग गायब है। जिस किसी प्रकाशन प्रतिष्ठान में सम्पादक जैसा कोई है, वहां नाम मात्र का ही या उनसे चयन और सम्पादन जैसी औपचारिकताएं ही पूरी करवायी जाती हैं।
तीसरा प्रारंभिक चरण प्रि-प्रेस, मुद्रण और बंधाई का आता है जिसमें इन इकाइयों की भूमिका भौतिक उत्पादन की है। हालांकि प्रि-प्रेस में कम्पोजिंग-टाइपिंग के काम में प्रूफरीडर की प्राथमिक भूमिका होती है इसलिए इस भूमिका को निभाने वाले जैसे-तैसे भी हैं वे पीस रेट या पृष्ठदर के आधार पर मिल जाते हैं—रही बात आकल्पक या डिजायनर की तो कम्प्यूटर और उसके सॉफ्टवेयर जैसे नये आए साधनों के बाद यह काम कोई बहुत मुश्किल काम नहीं रहा है। तीसेÓक वर्षों से रिबिल्ट या पुरानी ऑफसेट मशीनों के सुलभ आयात के बाद मुद्रण का काम भी जितना खर्च प्रकाशक करना चाहता है उसके अनुसार विभिन्न दरों और क्वालिटी का अब आसानी से होने लगा अन्यथा लैटरप्रेस जमाने के बुकवर्क को याद करके आज अचम्भा ही किया जा सकता है। यही स्थिति बंधाई के काम की भी है, बंधाई से जुड़ी न केवल रिबिल्ट या पुरानी मशीनें आयात होने लगी बल्कि कई निर्माता देश में भी इन्हें बनाने और उपलब्ध करवाने लगे हैं। फोल्डिंग मिसल और जुज सिलाई से लेकर कवर पेस्टिंग और गत्ता बाइंडिंग का काम जहां आज हाथ से भी होता है वहीं इन सबके लिए मशीनें आ गई हैं और बंधाई के आधुनिकतम प्रतिष्ठान सेवाएं देने लगे हैं।
इन प्रारम्भिक चरणों में पुस्तक बनने तक की बात तो हो ली पर तैयार होने के बाद उसका बिकना अब उतना आसान भी नहीं रहा। हां, सरकारी खरीदों के चलते इतना आसान भी हो गया कि पुस्तक संस्कृति ही खतरे में दीखने लगी है। सरकारी खरीदों के चलते जहां अनाप-शनाप पुस्तकें छपने लगी हैं वहीं रिश्वत और कमीशनखोरी की जरूरत में किताबों की कीमतें इतनी अधिक रखी जाने लगी है कि आम पाठक उसे खोलकर देखने तक की हिम्मत नहीं कर पाता। इसलिए बात होना यह जरूरी है कि पुस्तकों को सामान्य पाठकों के लिए भी सुलभ कैसे बनाया जाय। प्रकाशकों का ध्यान इस ओर लगभग नहीं है। वाजिब मूल्यों पर मनचाही पुस्तक मिले तो ऐसे पाठक भी देखे जाते हैं जो न्यूनतम मजदूरी से भी कम आय वर्ग के लगते हैं लेकिन पुस्तक खरीदने के लिए जेब से तीन-चार सौ रुपये निकाल लेते हैं।
साहित्य अकादमी और नेशनल बुक ट्रस्ट जैसे सार्वजनिक क्षेत्र के प्रकाशन उपक्रम नहीं होते तो पाठकों को वाजिब मूल्य पर न साहित्येतर पुस्तकें मिलती और न ही अच्छे अनुवाद। निजी क्षेत्र के प्रकाशकों ने अच्छे अनुवाद करवा कर प्रकाशित करना बहुत कम कर दिया है। निजी क्षेत्र के प्रकाशक अनुवाद उन्हीं पुस्तकों का करवाते हैं जो अन्य भाषाओं में बेस्टसेलर रही हों। कई प्रकाशक अनुवाद छाप भी रहे हैं तो इस लोभ में कि पुस्तक कॉपीराइट से मुक्त है और उसका अनुवाद आसानी से हासिल हो गया है। अनुवाद कैसा है इसकी पड़ताल सामान्यत: अब जरूरी नहीं मानी जाती। अलावा इसके साहित्येतर पुस्तकों के प्रति निजी क्षेत्र के प्रकाशक गम्भीर नहीं लगते हैं। प्रकाशित करते भी हैं तो नई स्थापनाओं, और प्रामाणिकता पर ध्यान कम ही दिया जाता है। इस तरह की जो पुस्तकें प्रकाशित हो रही हैं उन्हें पिष्ट पेषण कहने में संकोच कैसा। साहित्यिक प्रकाशनों की खरीद के सरकारी बजट को खपाने में प्रकाशित पीएचडी के शोधग्रंथ बड़े काम आ रहे हैं। नौकरियों के लिए ये शोधग्रंथ न केवल पैसा देकर लिखवाएं जाते हैं बल्कि पैसा देकर प्रकाशित भी करवा लिए जाते हैं। ऐसी पुस्तकों का स्तर क्या होता है, बताने की जरूरत नहीं।
बड़ी प्रतिकूलता यह भी है कि लेखक भी ऐसी परिस्थितियों को लेकर सचेष्ट नहीं लगते हैं। लेखक छपने तक की चेष्टाओं से ऊपर उठें और इस पूरे परिदृश्य पर चिंतन-मनन और चर्चा-परिचर्चा शुरू करें, चर्चा होगी तो संभवत: वैकल्पिक रास्ता भी निकलेगा। उनके यह मानने-कहने से अब काम चलने वाला नहीं कि यह जिम्मेदारी समाज की और प्रकाशकों की है। इसे नजरअन्दाज नहीं किया जा सकता कि लेखक समाज का अहम हिस्सा है और प्रकाशकों के हमजाद अग्रज भी। पाठकों के संदर्भ से बात करें तब लगता है कि प्रकाशन व्यवसाय के बुरे दिनों का प्रमाण इससे ज्यादा क्या होगा कि बीते पचास वर्षों में प्रति पुस्तक संस्करण संख्या इक्कीस सौ से घटते-घटते तीन सौ पर आ चुकी है, वह भी यदि किसी थोक खरीद में नहीं आई या लेखक स्वयं लेकर बांटने न लगे तो इतनी कम प्रतियों का यह पहला संस्करण भी प्रकाशक के गोदाम या उसके बाइंडर के यहां पड़ा धूल चाटता रहता है।
—दीपचन्द सांखला
विनायक शिखर, पॉलिटेक्निक कॉलेज के पास
शिवबाड़ी रोड, बीकानेर 334003        deepsankhla@gmail.com

(9 अक्टूबर, 2015 को साहित्य अकादमी, नयी दिल्ली की गंगटोक संगोष्ठी में पढ़ा गया पर्चा।)

5 comments:

Unknown said...

Agreed

Unknown said...

सुव्यवस्थित सुगठित और सूचनात्मक यह लेख मन में कुछ सवाल छोड जाता है।।।
संवाद की बात मन में आती है...

Unknown said...

सुव्यवस्थित सुगठित और सूचनात्मक यह लेख मन में कुछ सवाल छोड जाता है।।।
संवाद की बात मन में आती है...

Unknown said...

Agreed

Unknown said...

बहुत सम्यक और सार्थक लिखा है दीपजी। आपकी-सी चिंता कुछ और प्रकाशकों की होती तो संभवतः परिदृश्य कुछ बदला हुआ या बदलता हुआ होता। ज़ाहिर है कि इसमें लेखकों की भी भूमिका कम नहीं।