Wednesday, October 31, 2018

जरूरी-गैरजरूरी--रंग-बेरंग खबरें (17 दिसंबर, 2011)

अकसर देखा गया है कि जो खबरें बननी चाहिए वो नहीं बनती, वहीं यह भी कि कुछ खबरें जबरिया बन जाती हैं। ठीक इसी तरह कुछ जो असल मुद्दे होते हैं, वे गौण रह जाते हैं, कुछ मुद्दे ऐसे भी होते हैं जिन्हें उठाना किसी और समूह को चाहिए, उठा कोई और समूह लेता है। ऐसा ज्यादातर होता इसलिए है कि कोई मुद्दा किसी का लिहाज में नहीं उठाया जाता तो कोई किसी समूह का उपयोग आंदोलन द्वारा अपने हित साधने में कर लेता है।
जब-जब भी कोई विशिष्ट व्यक्ति या राजनेता आता है तो आनन-फानन में लाखों-करोड़ों रुपये खर्च कर दिये जाते हैं। बिना टेण्डर शाया किये या बिना कागजी खानापूर्ति किये ही। यह सब औपचारिकताएं बाद में पूरी होती है। ऐसे कामों में व्यवस्था और प्रशासन दबाव में होता है। हिसाब और औपचारिकताएं जब बाद में होती है तो ज्यादा वसूलने वाले का लिहाज भी करना पड़ता है। क्योंकि वो ऐसे मौकों पर काम जो आया था। इस तरह के औचक आयोजनों के खर्चों के बारे में आवाज न तो कभी मीडिया उठाता है और ना ही कोई नागरिक इस तरह के खर्चों की सूचना ‘सूचना के अधिकार’ कानून के तहत मांगता है।
अभी पिछले दिनों राष्ट्रपति बीकानेर आईं। ताबड़तोड़ इतना काम हुआ कि उस खर्चे को जोड़ा जाय तो करोड़ों में बैठेगा। अभी हाल ही में मुख्यमंत्री की 6 घंटे की संक्षिप्त यात्रा अचानक बन गई। इसमें भी लाखों से कम का खर्च नहीं हुआ होगा। हो सकता है इस तरह की यात्राओं के खर्चों को अलग-अलग कई मदों में बांट दिया जाता हो। उन्हें इस तरह भी दिखा दिया जाता है जैसे उस खर्चे का उस यात्रा से कोई लेना-देना ही नहीं था, जिस यात्रा पर असल में वो खर्च होता है।
आज ही खबर है कि शहर की ट्रैफिक पुलिस मुस्तैद होगी। देखेंगे कि समय के साथ यही ट्रैफिक पुलिस शिथिल हो जायेगी और खुद पुलिस वाले ही कायदे तोड़ने लगेंगे। इसकी खबर हम किस मुस्तैदी से बनाते हैं? नहीं बनाते।
पशु-विज्ञान और पशुचिकित्सा विश्वविद्यालय के छात्र पिछले कुछ दिनों से आन्दोलन पर हैं। उनकी मांग है कि निजी क्षेत्र के वेटेनरी कॉलेजों को मान्यता ना दी जाय। देखा जाय तो उनकी पढ़ाई से इसका कोई संबंध नहीं है। हां, उनके भविष्य से हो सकता है। लेकिन किन्हीं दूसरों के भविष्य को दावं पर लगा कर अपने भविष्य को सुरक्षित करना कितना जायज है? अगर निजी कॉलेजों की मान्यता में कुछ गलत भी है तो समाज के कई अन्य समूह भी इसे उठा सकते हैं। वैसे भी यह मुद्दा राज्य सरकार के स्तर का है। इसका विश्वविद्यालय प्रशासन से कोई लेना-देना नहीं है।
संभाग का सबसे बड़ा डूंगर कॉलेज तो अब खबरों में इसलिए नहीं होता कि वहां कक्षाएं लगना लगभग बंद है। कहा तो यहां तक जाता है कि वहां प्राध्यापक ही इस जुगत में लगे रहते हैं कि शैक्षिक माहौल बने ही नहीं। इसी कॉलेज के प्राचार्य का घेराव गैर-शैक्षणिक मुद्दों को लेकर हर दूसरे दिन होता है। इसकी सचित्र खबरें हम रोज देख सकते हैं।
--दीपचंद सांखला
17 दिसम्बर, 2011

बीकानेर की पहली महिला वकील और विधायक कान्ता कथूरिया (16 दिसंबर, 2011)

बीकानेर की राजनीति की एक समय अहम् शख्सीयत रहीं कान्ता कथूरिया का निधन कल जयपुर में हो गया। 78 वर्षीय कान्ता कथूरिया का जन्म बीकानेर में ही 24 अगस्त, 1933 को हुआ था। बीकानेर के तत्कालीन शासक गंगासिंह ने उनके पिता को कराची से बुला कर स्थानीय म्युनिसिपलिटी में चीफ इंजीनियर का पद दिया था। कान्ता कथूरिया ने अपने सार्वजनिक जीवन की शुरुआत एक वकील के रूप में उस समय के जाने माने वकील सूरजकरण आचार्य के सहायक के तौर पर में की और यहां की पहली महिला वकील बनी। आज भी जब महिलाएं राज के साथ 33 प्रतिशत आरक्षण की जद्दोजहद में हैं, कान्ता कथूरिया आजादी के शुरुआती दौर से ही बारास्ता स्थानीय निकाय बीकानेर की चार विधानसभा सीटों में से एक कोलायत से 1967 में विधायक चुनी गयीं और 1972 में इसी सीट से दुबारा भी। यद्यपि उस समय कोलायत विधानसभा के आधे से ज्यादा मतदाता शहरी ही थे। लेकिन भौगोलिक रूप से यह विधानसभा क्षेत्र पाकिस्तान की सीमा तक फैला हुआ था। उस समय के लगभग बीहड़ इस इलाके से एक महिला का चुनाव लड़ना और जीत कर आना उल्लेखनीय तो है ही।
राज्य की राजनीति में भी कान्ता कथूरिया उस समय के मुख्यमंत्री और राज्य कांग्रेस में सर्वाधिक ताकतवर मोहनलाल सुखाड़िया के विरोधी खेमे में रहीं, और न केवल रहीं बल्कि कहा जाता है कि सन् 1969 के राष्ट्रपति चुनाव में राज्य के जिन पांच विधायकों ने कांग्रेस पार्टी के अधिकृत प्रत्याशी नीलम संजीवा रेड्डी के खिलाफ इंदिरा गांधी समर्थित प्रत्याशी वी वी गिरि को वोट दिया, उनमें से एक कान्ता कथूरिया भी थीं। वो भी तब मुख्यमंत्री मोहनलाल सुखाड़िया पार्टी के अधिकृत प्रत्याशी के साथ थे। यदि यह सच है तो इसके दो कारण मान सकते हैं। एक तो यह कि महिला होने के नाते उन्होंने इंदिरा गांधी का साथ दिया या फिर राज्य की कांग्रेस राजनीति में सुखाड़िया विरोधी मथुरादास माथुर खेमे में होने के कारण उन्होंने ऐसा किया। बीकानेर की राजनीति में 1967 का विधानसभा चुनाव काफी परिवर्तनकारी था। इससे पहले यहां समाजवादी पार्टी का असर जोरों पर था। 1957 और 1962 का बीकानेर विधानसभा चुनाव प्रजा समाजवादी पार्टी के मुरलीधर व्यास ने जीता था। विधान सभा के कोलायत क्षेत्र का पहला चुनाव 1962 में हुआ और यहां से भी प्रजा समाजवादी पार्टी के मानिकचंद सुराना विजयी रहे। लेकिन 1967 के विधानसभा चुनाव परिणाम पलट गये। भीलवाड़ा से लौट कर स्थानीय राजनीति में आये गोकुलप्रसाद पुरोहित बीकानेर सीट से और कान्ता कथूरिया कोलायत सीट से विजयी रहे। दोनों ही कांग्रेसी उम्मीदवार थे। सन् 1977 को छोड़ दें तो तब से अब तक बीकानेर की सक्रिय राजनीति में कोई उल्लेखनीय भूमिका समाजवादी नहीं निभा पाये।
सन् 1970 में बीकानेर नगर परिषद के चुनाव हुए। कांग्रेस का बोर्ड बना लेकिन बीकानेर की कांग्रेस दो खेमों में बंट गई। एक गोकुलप्रसाद पुरोहित का खेमा और दूसरा कान्ता कथूरिया का। परिषद अध्यक्ष गोपाल जोशी बने, ये पुरोहित खेमे से थे, मक्खन जोशी और जनार्दन कल्ला भी इन्हीं के साथ थे। साथ तो अशोक आचार्य भी थे लेकिन कान्ता कथूरिया ने आचार्य को अपने साथ कर लिया और इसी के चलते अशोक आचार्य नगर परिषद के उपाध्यक्ष भी चुने गये।
1977 के विधानसभा चुनावों में गोपाल जोशी जैसी ही गलती विधायक रहते हुए कान्ता कथूरिया ने भी की थी, पार्टी टिकट से चुनाव लड़ने की अनिच्छा जाहिर करके। तब साहस दिखाया विजयसिंह एडवोकेट ने, उन्होंने कांग्रेस टिकट से कोलायत से चुनाव लड़ा हालांकि वे रामकृष्णदास गुप्ता से हार गये, जो उस समय दिखता ही था। 1980 के चुनावों में गोपाल जोशी को तो उन्हीं के रिश्ते में साले बुलाकीदास कल्ला ने शहर की राजनीति लगभग बाहर कर दिया, जो अब 2008 में पुनः काबिज हो पाये। चुनौती हीनता की स्थिति में कान्ता कथूरिया ने 1980 और 85 में चुनाव तो कोलायात से लड़ा लेकिन जीत नहीं पायी। इन दो हारों से कान्ताजी कोलायत क्षेत्र से पूरी तरह नाउम्मीद हो गईं और अपना ज्यादातर समय जयपुर में ही गुजारने लगीं। उन्होंने तब तक राज्य की राजनीति में एक हैसियत प्राप्त कर ली थीं। वो ना केवल प्रतिष्ठित राज्य लोकसेवा आयोग और संघ लोकसेवा आयोग की सदस्य रहीं बल्कि समाज कल्याण बोर्ड, राजस्थान सिन्धी अकादमी, राज्य भंडार निगम और राज्य महिला आयोग की समय-समय पर चेयरपर्सन भी रहीं।
आज की राजनीति जिस मुकाम पर है उसके शुरुआती संवाहकों में कान्ता कथूरिया का नाम भी लिया जाता है। यह उनका नकारात्मक पहलू भी है।
--दीपचंद सांखला
16 दिसम्बर, 2011

"चतुर" गहलोत (15 दिसंबर, 2011)

राज्य के मुखिया आज अचानक फिर बीकानेर में होंगे। मुख्यमंत्री ने अभी दो दिन पहले ही जयपुर के पिंकसिटी प्रेस क्लब में पत्रकारों के मुखातिब हो यह ‘स्वीकारा’ था कि उनका पिछला कार्यकाल इस कार्यकाल से बेहतर नहीं था। उन्होंने तर्क दिया कि यदि वो कार्यकाल बेहतर होता तो उनकी पार्टी को उस बुरी हार का सामना नहीं करना पड़ता।
उक्त बयान को सच की स्वीकारोक्ति कहें या एक राजनीतिक बयान, इसे समझना थोड़ा मुश्किल जरूर है लेकिन असम्भव नहीं। गहलोत के दोनों कार्यकाल में जो एक बड़ा अन्तर नजर आता है वह यह कि पिछले कार्यकाल के उनके कई निर्णय ज्यादा सच्चे, मानवीय और आमजन के लिए दीर्घकालिक हित के थे। लेकिन वे थे अलोकप्रिय इसलिए ही उन्हें भारी रोष का सामना करना पड़ा।
हां, यह जरूर कह सकते हैं कि उस हार को गहलोत ने एक सबक के रूप में लिया और अपने पिछले कार्यकाल के कई अच्छे और दीर्घकालिक आम-हित के निर्णयों से बचते हुए गहलोत अब फूंक-फूंक कर कदम रखते हुए दिखाई देते हैं। बीच-बीच में वे अपने ‘मूल रूप’ में भी नजर आने लगते हैं, जब डॉक्टरों को और अन्य सेवाओं को वो हड़काते हैं या मंत्रिमंडल के पिछले पुनर्गठन और शपथ ग्रहण समारोह के बीच के समय में जब पत्रकारों को तल्खी में इस बात पर उलाहना देते हैं कि ‘मेरे दिल्ली के कार्यक्रम अब आप ही तय करते हैं।’ तब थोड़ा और तल्ख होते हुए वे यह भी कह जाते हैं कि ‘चालीस साल के अपने राजनीतिक जीवन के इस मुकाम पर उन्हें हर बात के लिए हाइकमान से पूछने की जरूरत नहीं है।’ देखा गया है कि इस तरह की बयानबाजी से गहलोत का कभी वास्ता नहीं रहा है। उनकी इस तल्खी को मीडिया खास कर खबरिया चैनलों पर एक टिप्पणी के रूप में भी देखा जाना चाहिए।
गहलोत के दोनों कार्यकालों को देखें तो यह भी देखा जा सकता है कि उनके पिछले कार्यकाल में अपनाये कुछ निषेधों और वर्जनाओं को इस कार्यकाल में उन्होंने छोड़ दिया है। जैसे पिछले कार्यकाल में वे मितव्ययिता के नाम पर हवाई और हैलिकॉप्टर यात्राओं से बचते थे। पूर्व मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे के लगातार हवाई दौरों की कांग्रेस ने कई बार आलोचना भी की थी लेकिन खुद गहलोत ही इस बार शायद वसुंधरा राजे की हवाई यात्राओं के उस रिकार्ड को तोड़ दें।  यह गलत भी नहीं है। राजस्थान भौगोलिक दृष्टि से देश का सबसे बड़ा राज्य है। यदि वे इस बार भी उसी आदर्श पर डटे रहते तो शायद वे सभी क्षेत्रों के रू-बरू संपर्क से वंचित रहते या फिर उनमें इतना समय लगता कि वे अन्य शासनिक कार्यों को अपना पूरा समय नहीं दे पाते। और भी बहुत-सी बातें हैं जिनके उदाहरणों से हम कह सकते हैं कि अशोक गहलोत अपने अनुभवों से लगातार सीखने वाले और राजस्थान के अब तक के राजनीतिज्ञों में बेहद सधी चाल से चलने वाले सबसे ‘चतुर’ राजनीतिज्ञ हैं।
--दीपचंद सांखला
15 दिसम्बर, 2011

जिला कलेक्टर डॉ. पृथ्वीराज (14 दिसंबर, 2011)

आठ दिसंबर को यूआईटी अध्यक्ष पद पर मकसूद अहमद के मनोनयन की खबर आई। उसी दिन से जिला कलक्टर और पदेन यूआईटी अध्यक्ष डॉ. पृथ्वीराज को यह पता था कि एक-दो दिन में ही उन्हें यूआईटी अध्यक्ष का कार्यभार छोड़ना होगा। बावजूद इसके उन्होंने यूआईटी के उन बड़े कार्यों का निरीक्षण किया, जिन्हें उन्होंने शुरू करवाया था। ऐसा करके वे अपनी जिम्मेदारी का ही निर्वहन कर रहे थे। लेकिन यह उल्लेखनीय इसलिए हो गया कि सामान्यतः देखा गया है कि पदभार या कार्यभार छोड़ने की संभावना बनने के बाद अधिकारी शिथिल हो जाते हैं। लेकिन डॉ. पृथ्वीराज ने यह अहसास करवाया कि वे अपने जिम्मे के कार्यों को मात्र खानापूर्ति नहीं मानते हैं, उनके प्रति एक जुड़ाव का अनुभव भी करते हैं।
आठ दिसंबर के उनके उक्त अंतिम निरीक्षण के बाद शहर में यह चर्चा भी हुई कि वे अब क्या करेंगे? इस चर्चा का जवाब कल उन्होंने पीबीएम अस्पताल का औचक निरीक्षण करके दे दिया है। डॉ. पृथ्वीराज एमबीबीएस डॉक्टर हैं इसलिए अस्पताल की व्यवस्था में उनका हस्तक्षेप केवल ब्यूरोक्रेटिक नहीं कहा जा सकता। वे यदि संभाग के इस सबसे बड़े अस्पताल की व्यवस्था को सुधारने में रुचि लेते हैं तो हो सकता है वह कारगर साबित हो। इसके लिए उन्हें स्वास्थ्य विभाग से ज्यादा खुद मुख्यमंत्री को युक्तियुक्त रूप से समझाना होगा कि न केवल ऐसे अस्पतालों के बल्कि सभी मेडिकल कॉलेजों के सभी प्रकार के खाली पदों को भरा जाना कितना जरूरी है। मुख्यमंत्रीजी को समझना जरूरी है कि आमजन से सीधे संबंध रखने वाले कम से कम दो विभाग स्वास्थ्य और गृह (कानून-व्यवस्था) के खाली पदों को भरना और इन दोनों विभागों की संपूर्ण कार्यप्रणाली को दुरुस्त करना कितना जरूरी है।
--दीपचंद सांखला
14 दिसम्बर, 2011

नगर विकास न्यास (13 दिसंबर, 2011)

मकसूद अहमद ने नगर विकास न्यास के अध्यक्ष के रूप में अपनी पारी शुरू कर दी है। न्यास अध्यक्ष के साथ कई वर्षों से दुर्योग यह है कि वो अपना कार्यकाल पूरा नहीं कर पाते। पिछले एक अरसे से हर चुनाव में राज्य की सरकार बदल जाती है और पदासीन न्यास अध्यक्ष को हटा दिया जाता है। आने वाली सरकार मनोनयन में दो से तीन साल लगा देती है। इस बीच यह पदभार पदेन रूप से जिला कलक्टर के पास रहता है। देखा गया है कि इसी दौरान ये कलक्टर भी दो-तीन बार बदल जाते हैं। इनमें से कुछ की रुचि न्यास के काम-काज में होती है, कुछ की नहीं। इस सब के चलते न्यास की योजनाएं और रोजमर्रा का काम-काज बुरी तरह प्रभावित होता है। इससे होता यह है कि न्यास के जिम्मे के शहरी विकास के काम और रोजमर्रा की व्यवस्थाएं जिनका सम्बन्ध सीधे आम शहरी से होता है, उनमें न केवल अनावश्यक समय लगता है बल्कि गुणवत्ता में भी कमी आती है। सबसे बड़ा तो आर्थिक नुकसान खुद न्यास का होता है। धणी-धोरी न होने की इस स्थिति में आय का एक बड़ा साधन उसकी करोड़ों रुपये की जमीनें कब्जा हो चुकी होेती हैं और समय गुजरने के साथ ही रिकार्ड में खुर्द-बुर्द भी होनी शुरू हो जाती है।
मकसूद अहमद को पहला काम तो यह करना चाहिए कि खुद पूरी रुचि व समय देकर न्यास की ऐसी जमीनों की पूरी पैमाइश और आसे-पासे सहित स्थान के साथ सूचीबद्ध करवायें। दो भागों में विभक्त इस सूची के एक भाग में वो भूखंड हो सकते हैं जो खाली पड़े हैं तथा दूसरी सूची में ऐसे भूखंड जिनके वाद न्यायालय के विचाराधीन हों। इस सूची को न्यास में ही एक फ्लेक्स बोर्ड के जरिये प्रदर्शित किया जाय जो पारदर्शिता का एक उदाहरण भी बनेगा और जिन भूखंडों का वाद न्यायालय के अधीन नहीं है, उन सब भूखंडों की चारदीवारी करवा कर न्यास सम्पत्ति का बोर्ड लगवाया जाना चाहिए। ऐसे सभी भूखंडों की नीलामी का कार्यक्रम भी तत्काल ही तय करके न्यास के लिए धन जुटाया जा सकता है ताकि नवनियुक्त न्यास अध्यक्ष शहर के विकास की अपनी योजनाओं को मूर्त रूप दे सकें।
इसके अतिरिक्त राज्य सरकार को भी चाहिए कि वो ऐसा कोई कानून लाये जिसमें न्यास अध्यक्षों की कार्य अवधि निश्चित की जा सके। ऐसे में न्यास अध्यक्षों से यह उम्मीद भी की जानी चाहिए कि उनकी कार्यप्रणाली राजनीति से ऊपर उठी हुई केवल आमजन के हित में हो। ताकि सरकार बदलने पर भी उनका कार्यकाल निर्बाध चलता रहे।
--दीपचंद सांखला
13 दिसम्बर, 2011

गहलोत राज के तीन वर्ष (12 दिसंबर, 2011)

अशोक गहलोत के नेतृत्व में प्रदेश में कांग्रेस शासन के आज तीन वर्ष पूर्ण हो गये हैं। विशेष उल्लेखनीय यह है कि टीवी में और अखबारों में सरकार की ओर से इस अवसर पर सामान्यतः जारी होने वाले सुराज के दावों के विज्ञापन नहीं देखे गये। यह विज्ञापन सार्वजनिक धन की बर्बादी और मीडिया को उपकृत करने का ही जरिया बनते हैं। प्रदेश कांग्रेस कमेटी जरूर एक फोल्डर जारी कर रही है। दरअसल इस तरह के काम पार्टी को ही करने चाहिए।
दूसरी ओर मीडिया भी अपनी जिम्मेदारी की रस्म अदायगी कर रहा है। इस अवसर पर राज-काज का थोड़ा बहुत विश्लेषण, कुछ पक्ष और कुछ विपक्ष के नेताओं के वक्तव्य प्रकाशित और प्रसारित कर अपने कर्तव्य की इति मान रहा है। राज्य में भाजपा के पिछले शासन के समय ऐसे ही अवसरों पर पक्ष-विपक्ष के आए ऐसे ही वक्तव्यों को आज आये वक्तव्यों के साथ देखें तो भाषा और भाव वही है, केवल तथ्य और पक्ष बदला है।
दोनों शासनों में प्रशासनिक और क्रियान्वयन के स्तर पर तो कोई मोटा फर्क दिखलायी नहीं देता। उस फर्क को लाने के लिए व्यवस्था में बड़े बदलाव की जरूरत होती है, ऐसे बदलाव की मंशा सरकारें बना सकने वाली इन पार्टियों में मोटा-मोट दिखाई नहीं देती है, वसुंधरा राजे और अशोक गहलोत के काम करने के तरीके और सत्ता के गलियारों से आने वाली बातों से लगता है कि पिछली भाजपा सरकार और इस कांग्रेस सरकार के नेतृत्व के मिजाज में एक बड़ा अंतर यह है कि वसुंधरा राजे के काम के तरीकों में सामंती और अशोक गहलोत के तरीकों में लोकतान्त्रिक छाया देखी जा सकती है। जबकि एक लोकतान्त्रिक शासन व्यवस्था में शासन करने वालों का ना केवल मिजाज बल्कि काम करने का तरीका भी शत-प्रतिशत लोकतान्त्रिक होना चाहिए।
अशोक गहलोत राज्य के लिए सचमुच में कुछ करना चाहते हैं तो एक अक्टूबर के अपने आलेख में जो मुद्दे उठाए थे, उन पर ध्यान देना चाहिए। इस आलेख में शिक्षा और स्वास्थ्य (मानवीय और पशु दोनों ही) की अच्छी सुविधाओं और इन तीनों ही विभागों में अतिरिक्त वेतन के साथ अलग से ग्रामीण सेवा का गठन करने का सुझाव दिया था। इसमें गांवों में स्कूली शिक्षा और सामान्य स्वास्थ्य सेवाओं को पुख्ता करना और तहसील स्तर पर महाविद्यालयी शिक्षा और स्वास्थ्य की विशेषज्ञ सेवाओं को विकसित करने की जरूरत बताई थी। इससे ग्रामीणों का शहरों की ओर न केवल पलायन रुकेगा बल्कि शहरों पर बढ़ रहे असंतुलित दबाव से राहत भी मिलेगी।
अभी गहलोत के पास दो वर्ष का समय है और राज की पेचीदगियों से भी अब वे कुछ राहत महसूस कर रहे होंगे। इस पर विचार करने का समय उन्हें निकालना चाहिए।
-- दीपचंद सांखला
12 दिसम्बर, 2011

Tuesday, October 30, 2018

पी बी एम अस्पताल (10 दिसंबर, 2011)

पी बी एम अस्पताल में रात फिर हंगामा हुआ। पिछले एक अरसे को देखें तो महीने में दो-एक बार तो ऐसा होता ही है। ऐसी घटनाओं के कारणों का विश्लेषण करें तो वो तात्कालिक ही पाये गये हैं, जैसे मरीज के परिजनों को लगा कि डॉक्टरी सेवाएं समय पर और व्यवस्थित मिल जातीं तो वो अपने प्रिय को नहीं खोते। अकसर ऐसा न पूरा सच होता है न पूरा झूठ। अधिकतर तो व्यवस्था ही जिम्मेदार होती है। व्यवस्था की कमी से उपजे असन्तोष पर जब बात करते हैं तो उसके कारण हमेशा तात्कालिक नहीं होते।
पी बी एम अस्पताल की बड़ी प्रतिष्ठा थी कभी। साफ-सफाई के मामले में तो ऐसी कि निस्संकोच फर्श पर कहीं भी बैठ सकते थे। डॉक्टर, नर्सिंग कर्मचारी और वार्डबॉय अपनी ड्यूटी पर हमेशा मुस्तैद दिखाई देते थे। शहर की आबादी बढ़ती गई, धीरे-धीरे व्यवस्था बिगड़ती गई। डॉक्टर और अन्य स्टाफ बढ़ने की बजाय घटने शुरू हो गये। जो डॉक्टर व अन्य कर्मचारी हैं उनमें से अधिकतर वे हैं जो अन्य छोटे-मोटे आर्थिक स्वार्थों से जन्मी बुराइयों के शिकार हो गये। इसी अस्पताल के बारे में जो आम चर्चायें है, उसकी बानगी देखिये।
  • अधिकतर बड़े डॉक्टर हद से ज्यादा प्रैक्टिस मानसिकता के हो गये, यानी अच्छी तनख्वाह के बावजूद उनकी नीयत फीस पर अटकी रहती है, केवल इतने से ही नहीं, वे बिना जरूरत की जांच लिखते हैं और उसी लेब से जांच करवाने का कहते हैं जहां से उन्हें ज्यादा कमीशन मिलता है, चाहे उस लेब की जांच विश्वसनीय है या नहीं, यह भी कि कमीशन के चक्कर में दवाइयां भी या तो बिना जरूरत की लिखेंगे या जेनरिक न लिख कर ऐसे ब्रांड या उन कम्पनियों की लिखेंगे जो कम्पनियां बड़े गिफ्ट या मोटा कमीशन, यहां तक कि डॉक्टर परिवार के लिए महंगी पर्यटन यात्रा का इंतजाम करती हैं। यह भी कि शहर से बाहर से आये मरीजों को लपकने के लिए डॉक्टरों के दलाल भी घूमते रहते हैं।
  • बड़े डॉक्टर अस्पताल की सप्ताह में एक-दो बार आने वाली दिन और रात की ड्यूटी से नदारद पाये जाते हैं। यहां तक कि आउटडोर वाले दिन भी पूरा समय वो नहीं देते। जब वरिष्ठ डॉक्टरों को इस तरह देखते हैं तो वैसा ही कुछ रेजिडेंट डॉक्टर भी करते हैं। हालांकि वरिष्ठों की इज्जत तो रेजीडेंट डॉक्टर इसलिए करते हैं कि लिखित और प्रायोगिक परीक्षाओं में उन्हें नम्बर चाहिए होते हैं। रही बात नर्सिंग और अन्य कर्मचारियों की तो वे भी जब अपने इन वरिष्ठों को देखते हैं तब उन्हीं के तौर-तरीके ही ग्रहण करते हैं। यहां तक कि वरिष्ठ डॉक्टरों को इस तरह करते देखने से नर्सिंग और अन्य कर्मचारियों में उनके प्रति सम्मान कम हो गया--कई बार तो इन कर्मचारियों के सामने वरिष्ठ डॉक्टरों को ड्यूटी करवाने के लिए निवेदन और गिड़गिड़ाने की अवस्था में भी देखा जाता है!
  • छन कर जो गंभीर बातें अस्पताल से बाहर आ रही हैं उनमें डिस्पोजेबल सुइयों का दुबारा उपयोग, वार्डों में डॉक्टरी औजारों को तरीके से स्टरलाइज न करना, यहां तक कि ऑपरेशन थिएटर के औजारों को भी तरीके से स्टरलाइज न करने की बातें बाहर आती रही हैं। हो सकता है उपरोक्त बातें पूरी सच ना हों लेकिन आम लोगों में इस तरह की चर्चा होना इस बात का संकेत करती है कि कुछ ना कुछ तो गड़बड़ है और इस तरह की बातों को सुन-सुन कर ही आम आदमी का असन्तोष मौके-बे-मौके फूट पड़ता है। सरकार को भी चाहिए कि कम से कम आम सार्वजनिक सेवाओं जैसे स्वास्थ्य और पुलिस व्यवस्था में विशेषज्ञों, अधिकारियों और कर्मचारियों के खाली पदों को प्राथमिकता से भरे?
--दीपचंद सांखला
10 दिसंबर, 2011

मकसूद अहमद के मनोनयन के मानी कई हैं (8 दिसंबर, 2011)

यूआइटी अध्यक्ष के रूप में मकसूद अहमद का मनोनयन हुआ है। मकसूद अहमद कल्ला बंधुओं के विश्वस्त हैं। शहर की राजनीति में इस मनोनयन के कई मानी हैं। हालांकि मकसूद अहमद की मुख्यमंत्री निवास तक खुद अपनी पहुंच है फिर भी कल्ला बंधुओं ने यह मनोनयन करवा कर आभास करवाया है कि वे कुछ ही नहीं बल्कि बहुत कुछ रखते हैं और यह भी कि उन्हें शहर की राजनीतिक बिसात पर लम्बी बाजी खेलनी है। कल्ला विरोधी इसे इस तरह भी ले सकते हैं कि भानीभाई के भरोसे शहर कांग्रेस को डागा चौक की छाया से मुक्त करवाना संभव नहीं है। ऐसा देखा गया है कल्ला बंधु जो धार लेते हैं वो अकसर कर गुजरते भी हैं। कल्ला विरोधियों द्वारा मकसूद अहमद के खिलाफ दर्ज किसी शिकायत की प्रति ऊपर तक पहुंचाने के बावजूद शहर कांग्रेस अध्यक्ष न सही वे उन्हें यूआईटी अध्यक्ष तो बनवा ही लाये। कल्ला बंधुओं के सचेत और सतत प्रयासों से ही ऐसा संभव हो पाया है।
पार्टी में कल्ला विरोध की राजनीति करने वाले इसे इस तरह भी ले सकते हैं कि उनका सरदार डंके की चोट करने वाला होगा तभी वे सफल होंगे। चालीसे’क साल पहले गोकुलप्रसाद पुरोहित के साथ भानीभाई के बारे में बातचीत करते हुए मनीषी डॉ. छगन मोहता ने कहा था कि भानीभाई डिस्टिल्ड वॉटर हैं, रिएक्शन नहीं करते। जिस इंजेक्शन के साथ मिक्स होते हैं, वह भले ही रिएक्शन करे। भानीभाई के बारे में यह टिप्पणी आज भी सटीक है। वे कल्ला बंधुओं की तरह टारगेट तय नहीं करते। एक साथ कइयों को राजी रखते हैं, किसी एक के लिए भी सतत प्रयास नहीं करते, शायद अपने लिए भी नहीं। अब तो यह भी लगने लगा है कि भानीभाई मान चुके हैं कि उन्होंने राजनीति की पारी खेल ली है।
तनवीर मालावत भी इस मनोनयन से सचेत हो सकते हैं कि बीकानेर पूर्व से कांग्रेस की टिकट के लिए मकसूद अहमद उनके लिए चुनौती बनेंगे। शहर कांग्रेस अध्यक्ष जनार्दन कल्ला जिस तरह की बिसात बिछाते हैं उसमें ऐसा सम्भव है। कल्ला विरोधियों को यह लग सकता है कि यदि वे अब भी नहीं चेतते हैं तो शहर कांग्रेस अध्यक्ष पद पर भी कल्ला के कोई  परिवारी या दरबारी का मनोनयन हो सकता है, यदि ऐसा होता है तो व्यावहारिक राजनीति में सबसे ज्यादा परेशानी तनवीर मालावत को होगी क्योंकि बीकानेर पश्चिम से तो बीडी कल्ला की उम्मीदवारी हाल-फिलहाल चुनौतीविहीन है।
मकसूद अहमद का महापौर का कार्यकाल तुलनात्मक रूप से ठीक-ठाक माना जाता रहा है। उम्मीद की जानी चाहिए कि वे अपने यूआइटी अध्यक्ष के कार्यकाल को महापौरी से बेहतर संभव कर पाएंगे।
ज्योति कांडा
श्रीगंगानगर यूआइटी के मनोनीत अध्यक्ष ज्योति कांडा का बीकानेर से भी रिश्ता है। वे यहां के कर सलाहकार विनोदकुमार जैन के दामाद हैं। संभव है कि वो आगामी विधानसभा चुनावों में श्रीगंगानगर सीट से कांग्रेसी उम्मीदवारी की दावेदारी करे।
--दीपचंद सांखला
8 दिसंबर, 2011

गोपाल गहलोत (7 दिसंबर, 2011)

विभिन्न राजनैतिक पार्टियों से नाउम्मीद हुए नेताओं में से कुछ खुलेआम और कुछ ने ठिठकते हुए दलित, पिछड़ा और अल्पसंख्यक महासभा के गठन के साथ ही अपनी खुदमुख्त्यारी की घोषणा कर दी है। इनमें प्रमुख हैं गोविन्द मेघवाल और गोपाल गहलोत। गोविन्द मेघवाल तो पहले से भाजपा से बाहर हैं, इसलिए उन्होंने खुलकर अपना एजेन्डा जाहिर कर दिया। गोपाल गहलोत अभी भाजपा की प्रदेश कार्यसमिति के सदस्य हैं। पार्टी ने पहले भी एक से अधिक बार न केवल उनमें भरोसा जताया बल्कि मौके भी दिये हैं। वे शहर भाजपा के अध्यक्ष रहे हैं, विधानसभा का टिकट भी उन्हें दिया गया और महापौर का भी। शायद इसीलिए आयोजन में वे ठिठके-सहमे रहे। यह भी हो सकता है गोपाल गहलोत इस तरह से दबाव बना कर पार्टी से कोई पुख्ता आश्वासन चाहते हों। लेकिन इसकी संभावना कम इसलिए लग रही है कि गहलोत कोलायत से चुनाव लड़ना नहीं चाहेंगे, बीकानेर पूर्व से सिद्धिकुमारी की दावेदारी पुख्ता है। बीकानेर पश्चिम में कांग्रेस हो या भाजपा किसी गैर पुष्करणा को टिकट देने का साहस जुटा नहीं पायेगी। शायद यही सब सोच कर और पार्टी ने पूर्व में जताये भरोसे के दबाव में गोपाल गहलोत ऊहापोह में हैं। गोविन्द मेघवाल ने गोपाल गहलोत की इसी ऊहापोह को भांप लिया होगा तभी उन्हें नवगठित महासभा का न केवल अध्यक्ष मनोनीत कर दिया बल्कि कार्यालय भी गहलोत के हीरालाल मॉल में खोलने की घोषणा कर दी!
हो सकता है खम्मा धणी संस्कृति और सिद्धिकुमारी की थोड़ी बहुत सक्रियता के चलते कम से कम अगला एक चुनाव वो और जीत सकती हैं। गोपाल गहलोत यदि ऐसा ही सोचते हैं तो बीकानेर पश्चिम विधानसभा क्षेत्र में बिना ऊहापोह के और एक निश्चित रणनीति के और योजनाबद्ध तरीके से अल्पसंख्यकों, दलितों और पिछड़ों का भरोसा हासिल कर सकते हैं। नन्दू महाराज इसके उदाह़रण हैं, उन्होंने भाजपा में अन्दर और बाहर रहते हुए अल्पसंख्यकों के एक हिस्से का और पिछड़ों का भरोसा हासिल किया है और यही उनकी हेकड़ी की ताकत है।
राजनीति में लोग कई कारणों से आते हैं, कुछ तो केवल सहती-सहती राजनीति करने के लिए कि कभी कोई पद, प्रतिष्ठा मिल जाये तो ठीक नहीं तो इसी से खुश हो लेते हैं कि कुछ बड़े नेताओं का हाथ उन पर है। कुछ अपने व्यापार-उद्योग में लाभ और सुविधाएं हासिल करने के मकसद से आते हैं। कुछ ही साहसी होते हैं जो चुनाव का सामना करने के हौसले के साथ राजनीति करते हैं। गोपाल गहलोत और गोविन्द मेघवाल इसी तरह के हिम्मती हैं। विधानसभा चुनावों में अभी दो साल हैं, बहुत समझदारी और साहस के साथ रणनीति बनायें तो दोनों कुछ हासिल भी कर सकते हैं।
--दीपचंद सांखला
7 दिसंबर, 2011

बीकानेर शहर कांग्रेस (6 दिसंबर, 2011)

बीकानेर शहर कांग्रेस अध्यक्ष के मनोनयन की गुत्थी सुलझ नहीं रही है। दूध के जले कल्ला बन्धु किसी भी तरह की रिस्क नहीं लेना चाहते। एक बार पार्टी से निष्कासन की पीड़ा भोग चुके बीडी कल्ला और उनके अग्रज शहर कांग्रेस अध्यक्ष जनार्दन कल्ला इस जुगत में हैं कि पार्टी का चरित्र डागा चौक कांग्रेस का ही बना रहे। इसीलिए वे इस ताबड़तोड़ कोशिश में भी हैं कि उनका कोई पारिवारिक या दरबारी यूआईटी का चेयरमैन भले ही ना बने पर शहर कांग्रेस अध्यक्ष पद पर उनके परिवार के या किसी विश्वस्त दरबारी का ही मनोनयन हो। इसके लिए जितने मुस्तैद कल्ला बन्धु हैं, उतने सक्रिय दूसरे गुट के नेता शायद अब नहीं हैं। यही कारण है कि दूसरे गुट द्वारा अध्यक्ष पद के लिए अपने व्यक्तियों का नाम एक से अधिक बार लगभग तय करवा चुकने के बाद भी घोषणा नहीं करवा सके।
कल्ला बन्धु अगले विधानसभा चुनावों में बीकानेर शहर की दोनों सीटों के उम्मीदवारों के पैनल बनाने का काम किसी भी स्थिति में किसी और के हाथों में नहीं आने देना चाहते। 1998 के चुनावों से पहले बीडी कल्ला का पार्टी से निष्कासन और 1998 के उम्मीदवारों की सूची में नाम तक न होने की पीड़ा वो कभी भूल नहीं सकते!
2008 का चुनाव तो परिसीमन के बाद का पहला चुनाव था और उस चुनाव की सभी रीति-नीति वही थी जो उससे पहले के चुनावों में रही है। लेकिन 2013 के चुनावों से जातिय परिदृश्य बदलने के संकेत दिखने लगे हैं। जरूरत उसे भुनाने वालों की है। इन बदलती दिखती परिस्थितियों को कांग्रेस को समझना होगा और कल्ला बंधुओं को भी। आगामी दो वर्षों में यदि कोई नये समीकरण बनते हैं और कल्ला बन्धुओं को यह पूर्वाभास हो जाये कि वो चुनाव हरगिज नहीं जीत सकते तो यह तय है कि बीडी कल्ला हारने के लिए अगला चुनाव नहीं लड़ेंगे। ठीक अपने बहनोई गोपाल जोशी की तरह। आपातकाल के बाद हुए विधानसभा चुनावों में विधायक होते हुए भी दिखती हार के चलते गोपाल जोशी ने चुनाव नहीं लड़ा। उस समय के अपने गलत निर्णय को जोशी आज तक भुगत रहे हैं। लेकिन 1977 और 2013 की स्थितियों में बहुत अंतर है। उम्मीद है कल्ला बन्धु इसे बखूबी समझते होंगे।
--दीपचंद सांखला
6 दिसंबर, 2011

देवानंद (5 दिसंबर, 2011)

सिनेमाई दर्शकों के एक बड़े समूह के चहेते देवानंद अब नहीं रहे। कल उनके देहांत के बाद लगभग सभी चैनलों ने पिछले कुछ वर्षों में प्रसारित देवानंद के साक्षात्कारों का पुनर्प्रसारण दिन भर किया। उससे लगा कि देवानंद एक कलाकार के साथ-साथ बेहद नपे-तुले और समझदार प्रतिक्रिया देने वाले इंसान भी थे। सुरैया के साथ अपने प्रेम संबंधों का जहां उन्होंने बेबाकी से जिक्र किया वहीं जीनत अमान से संबंधित प्रश्नों पर उनके जवाब संयमित थे। कारण शायद यह हो कि सुरैया से उनका प्रेम जीनत अमान के साथ के उनके इकतरफा प्रेम की तरह नहीं था। दूसरा, आज के जमाने के शाहरुख, सलमान और आमिर की तरह देवानंद के जमाने में भी दिलीप कुमार, राजकपूर और देवानंद की त्रिमूर्ति थी। देवानंद ने अपने इन दोनों समकालीनों से संबंधित सवालों के जवाब बेहद शालीनता से दिये और जिन प्रश्नों से विवाद हो सकता था उन्हें टाल दिया।
वहीं आज की शाहरुख, सलमान और आमिर की यह फिल्मी तिकड़ी अकारण ही एक-दूसरे के बारे में अनर्गल बोलती रहती है। हां, ऐश्वर्या की शादी के बाद सलमान की ऐश से सम्बन्धित मुद्दों पर शालीनता तारीफे-काबिल जरूर है।
--दीपचंद सांखला
5 दिसंबर, 2011

हित सर्वजन के सध रहे हैं या प्रभावशालियों के (5 दिसंबर, 2011)

ऐसे मुद्दों पर प्रशासन से और आपत्ति करने वालों से भी सकारात्मक सोच के साथ आगे बढ़ने की उम्मीद की जाती है। यदि सार्वजनिक हित में यह योजनाएं आम शहरी और शहर में आने वालों के लिए ज्यादा सुविधाजनक विकल्प है तो प्रशासन को चाहिए कि उसे जितनी गोचर भूमि अवाप्त करनी है उतनी ही राजस्व भूमि पहले गोचर के लिए वो छोड़े और जिस शिक्षण संस्था और कब्रिस्तान की जमीन लिंक रोड के लिए चाहिए उतनी ही भूमि उन्हें संभव हो तो उस जमीन से लगती और ना हो तो प्रभावित समूहों की सहमति से अन्यत्र उपलब्ध करवा कर कार्य को अंजाम तक पहुंचाना चाहिए। वैसे आमजन को तो शायद पता नहीं लेकिन सार्वजनिक जीवन में सक्रिय लगभग सभी को गंगानगर रोड से पूगल रोड तक की रिंग रोड की योजना में दो समूहों में चले शह और मात की जानकारी होगी। वे दोनों समूह राजनीति करने वाले प्रभावशाली नेताओं के थे, और दोनों ही समूहों की उन दोनों प्रस्तावित मार्गों पर अपनी-अपनी जमीनें थी। मजे की बात तो यह कि दोनों ही समूहों की अगुवाई कांग्रेसी और भाजपाई संयुक्त रूप से कर रहे थे। जाहिर है जिन प्रभावशालियों के स्वार्थ सिद्ध होने थे वो पार्टी को दर किनार कर व्यक्तिगत हैसियत से एक हो गये और दोनों ही समूहों ने अपनी पहुंच और सत्ता का लाभ उठाने की पूरी कोशिश की। उस बाजी में जो समूह ज्यादा शातिर था उसने अपने हित में निर्णय करवा लिया। हां, यह सब हुआ आम-आदमी के हित के नाम पर ही। इसलिए ऐसे विरोधों में मीडिया की जिम्मेदारी यह सूंघने की हो जाती है कि कुछ प्रभावशाली सर्वजन हित के नाम पर कहीं अपने स्वार्थों को साधने में तो नहीं लगे हैं।
--दीपचंद सांखला
5 दिसंबर, 2011

मुश्ताक, मेघवाल और गहलोत (3 दिसंबर, 2011)

गोविन्द मेघवाल और गोपाल गहलोत कल अपने कुछ हित चिन्तकों के साथ बैठे और यह तय किया कि बाबा साहेब अंबेडकर के निर्वाण दिवस 6 दिसंबर से दलितों, पिछड़ों और मुसलमानों के लिए मिल कर काम करेंगे। मुश्ताक भाटी की अध्यक्षता ने इस कॉम्बो को पूरा भी किया।
दो साल बाद होने वाले विधानसभा चुनावों के मद्देनजर बात करें तो यह कॉम्बो बहुत महत्त्वपूर्ण हो सकता है। जिले की सात में से तीन लूनकरणसर, श्रीडूंगरगढ़ और नोखा के विधानसभा क्षेत्रों को छोड़ दें तो बाकी की चार विधानसभा सीटों बीकानेर पूर्व, बीकानेर पश्चिम, कोलायत और खाजूवाला के समीकरणों को गड़बड़ाने का माद्दा यह कॉम्बो रखता है। केवल गड़बड़ाने का ही नहीं--समीकरणों को बदलने का काम भी यह तीनों कर सकते हैं। बशर्ते यह तीनों ही अपनी-अपनी छवियों को एक समयबद्ध योजना के तहत ठीक-ठाक करने-करवाने की ठान लें।
इन तीनों ने कुछ तो अपनी करतूतों से और कुछ इन तीनों के विरोधियों ने बहुत ही सफाई से इनकी छवियों को लगातार धूमिल किया है। वो भी तब जब आज की राजनीति में सर्फ ऐक्सेल और टाइड से धुली कमीज पहने कम ही नेता मिलते हैं। लगभग सभी की कमीज पर कोई न कोई दाग है, जिन्हें धोना मुश्किल ही नहीं नामुमकिन होता है। फर्क सिर्फ इतना ही है कि किसी के यह दाग अनैतिक या आर्थिक है और किसी के दबंगई के। क्योंकि हमारे यहां अनैतिक और आर्थिक दागों को नजरअंदाज करने का चलन है लेकिन दबंगई के दागों को नजरअंदाज करने का चलन फिलहाल नहीं है। यहां यह स्पष्ट करना जरूरी है कि इस तरह की दागी राजनीति का कतई समर्थन नहीं है। लेकिन जिस परिदृश्य और क्षेत्र की बात करेंगे तो जो कुछ भी और जैसा भी वहां है, उन्हीं सन्दर्भों में ही बातचीत हो सकती है।
जातीय जनगणना के परिणामों के हवाले से जिक्र पहले भी किया है। उसी के संभावित आंकड़ों की रोशनी में बात करें और कोई बड़ा राजनैतिक दल इस कॉम्बो को मान्यता दे दे तो कोलायत, खाजूवाला, बीकानेर, पूर्व और पश्चिम इन चारों ही विधानसभा क्षेत्रों में कइयों के जमे जमाए ठाठे बिखर सकते हैं।
यह बात हवा में इसलिए नहीं है कि उत्तर प्रदेश के पिछले विधानसभा चुनावों में इसी तरह की सोशल इंजीनियरिंग के चलते मायावती ने लगभग चामत्कारिक पूर्ण बहुमत के साथ सरकार बना ली थी।
--दीपचंद सांखला
3 दिसंबर, 2011

बंद से असल प्रभावित कौन? (2 दिसंबर, 2011)

खबर है कि कल के व्यापारिक बंद से कोई 22 से 30 हजार करोड़ का कारोबार प्रभावित हुआ। यह बंद केन्द्र सरकार के उस फैसले के विरोध में था, जिसमें खुदरा बाजार में प्रत्यक्ष पूंजी निवेश में 51 प्रतिशत तक की विदेशी भागीदारी की छूट दी गई है।
आजकल के बंद प्रतीकात्मक और राजनैतिक ही ज्यादा होते हैं। ऐसे बंदों से व्यापारियों को कोई बड़ा आर्थिक नुकसान इसलिए नहीं होता क्योंकि आजकल खरीददारी के दो मकसद रह गये हैं जरूरत और विलासिता। जरूरत है तो बाजार जब शाम को खुले तब या दूसरे दिन खरीददार बाजार पहुंचेगा ही। खरीददारी का दूसरा मकसद है विलासिता। विलासिता का एक प्रेरक होता है लालच और यह लालच जब तक पूरा नहीं होता है तब तक उसकी तीव्रता बढ़ती ही जायेगी, वो बाजार पहुंचेगा ही। मोटा-मोट देखें तो बाजार को नुकसान होता ही नहीं है।
ऐसे बंद नुकसान उस निम्न वर्ग का करते हैं जो इस बाजार में दैनकी पर या अन्य तरीकों से काम करके अपना और अपने परिवार का पेट पालता है। वो न तो रिलायंस का उपभोक्ता है और ना ही वालमार्ट का होगा। उसे तो अपने मोहल्ले की उसी दुकान से सामान लेना है जहां से रोजाना लेता है। चाहे वो दुकानदार अशुद्ध देता हो या अस्वच्छ। पिछले 64 सालों से आबादी के इस तीन चौथाई निम्न और निर्धन वर्ग को ऊपर उठाने के नाम पर सब योजनाएं बनी, लेकिन इनके आंकड़े में अब तक कोई चामत्कारिक कमी नहीं आयी है।
मीडिया को देखें-पढ़े तो इस मुद्दे पर पक्ष-विपक्ष के निपुणों-विशेषज्ञों के दो अखाड़े बन गये हैं। दोनों के ही अपने-अपने तर्क हैं और अपने-अपने आंकड़े। पिछले से पिछले लोकसभा चुनाव में सरकार चलाते हुए जिस भाजपा ने अपने चुनावी घोषणा-पत्र में खुदरा बाजार में 26 प्रतिशत प्रत्यक्ष विदेशी निवेश का वादा किया था, वही अब इसके विरोध में ताल ठोंके हुए है। अन्य विपक्षी दलों में भी वामपंथी को छोड़ दें तो उनके विरोध के कारण नीतिगत कम दूसरे ज्यादा हैं। प्रधानमंत्री को लगता है और वो जानते भी हैं कि 25 साल पहले खुले बाजार की आर्थिक नीतियों को लागू करके जिस गंतव्य के लिए वो देश को ले चले थे उसमें ऐसे पड़ावों को टाला नहीं जा सकता। ऐसा नहीं है कि ऐसा जानने और मानने वाले अर्थ विशेषज्ञ विपक्ष के पास नहीं हैं। हो यह रहा है कि संसद में भी और राज्यों की विधानसभाओं में भी--विपक्ष चाहे कोई हो, वह बहस से बचता है और विरोध केवलमात्र विरोध के लिए करता है। संसद और विधानसभाओं के सत्रों पर रोज करोड़ों रुपये खर्च होते हैं। पर इसकी परवाह किसे है। क्योंकि इन सभाओं के अधिकतर सदस्य करोड़ों में जो खेलते हैं। ऐसे में आम आदमी की हैसियत तमाशबीन से ज्यादा की पाते हैं क्या आप.....?
--दीपचंद सांखला
2 दिसंबर, 2011

राजस्थानी भाषा, साहित्य एवं संस्कृति अकादमी (1 दिसंबर, 2011)

राज्य सरकार द्वारा राजनीतिक मनोनयन और नियुक्तियां हो रही हैं। साहित्य एवं कला से संबंधित चार अकादमियों के अध्यक्षों का मनोनयन भी हो गया है। अकादमियों के इन मनोनयनों को मीडिया ने राजनीतिक नियुक्तियां ही कहा है। पता नहीं इन्हें सरकारें ही राजनीतिक नियुक्तियां मानती रही है या मीडिया ने चलत में ही ऐसा मान लिया। वैसे एक अरसे से जिस तरह से मनोनयन होता रहा है, वह राजनैतिक ही कहा जाएगा।
राजस्थानी भाषा, साहित्य एवं संस्कृति अकादमी का कार्यालय बीकानेर में है। इसके अध्यक्ष पद पर पहली बार जिले के ही श्याम महर्षि का मनोनयन हुआ है। वैसे यह आग्रह भी कि बीकानेर से ही अध्यक्ष हो उचित नहीं जान पड़ता। ऐसे मनोनयन तो केवल इस बिना पर तय होने चाहिएं कि कौन उस अकादमी के उद्देश्यों की पूर्ति करने में सक्षम होगा।
श्याम महर्षि को भाषा, साहित्य एवं संस्कृति से संबंधित सफल आयोजनों का लंबा अनुभव है। विचारों को लेकर और अपनी पसंद-नापसंद को लेकर भी बहुत आग्रही वे लगते नहीं हैं। थोड़े-बहुत हैं तो भी अकादमी हित में उन आग्रहों से मुक्त होने की क्षमता उनमें है।
अकादमी के नाम से जाहिर है कि यह केवल साहित्य अकादमी नहीं है। साहित्य के साथ भाषा एवं संस्कृति भी जुड़े हैं। बीच-बीच में यह आरोप भी लगते रहे हैं कि यह मात्र साहित्य अकादमी होकर रह गई है। महर्षि को देखना होगा कि ऐसे आरोपों की पुष्टि उनके कार्यकाल में ना हो।
महर्षि के लिए बड़ी चुनौती अकादमी कार्यालय को दुरुस्त करने की है। बरसों से सचिव का पद खाली है। पहले तो इस पद के काबिल को ढूंढ़ना ही मुश्किल होगा। मिल भी गया तो यह भी देखना होगा कि वर्तमान व्यवस्था में उसके लिए काम करने की संभावनाएं कितनी होंगी। सचिव के अलावा लगभग आधे पद खाली हैं। नियमित लेखाकार तो आज तलक लगा ही नहीं। कार्यालयी अनियमितताओं के आरोप तो खुले या दबे मुंह बारह महीनों ही लगते रहे हैं। पुस्तकालय और स्टोर का भौतिक सत्यापन लम्बे समय से नहीं हुआ है। बीच में कभी हुआ भी है तो रस्म अदायगी से ज्यादा नहीं। यह भी देखना होगा कि कर्मचारी और अधिकारी पूरे कार्यालय समय में रहते हैं या नहीं। श्याम महर्षि इस सब को व्यवस्थित कर पायेंगे या पिछले सब अध्यक्षों की तरह जैसे-तैसे अपना कार्यकाल पूरा करने की जुगत में लगे रहेंगे। यह सब लिखने के मानी महर्षि से नाउम्मीदगी जाहिर करना नहीं, आगाह भर करना है।
--दीपचंद सांखला
1 दिसंबर, 2011

Monday, October 29, 2018

बीकानेर पश्चिम और भारतीय जनता पार्टी (30 नवंबर, 2011)

राजस्थान विधानसभा के मध्यावधि चुनाव की संभावना न्यूनतम है और समय पर होने में अभी दो साल बाकी हैं। नन्दलाल व्यास जिस तरह से सक्रिय हुए हैं उससे बीकानेर पश्चिम से भाजपा के कई संभावित उम्मीदवार ठिठकने लगे हैं। चालीस साल पहले का शहर का राजनीतिक परिदृश्य होता तो यह सामान्य बात थी। तब मुरलीधर व्यास किसी न किसी बहाने उद्वेलन बनाए रखते थे। इन चालीस वर्षों में व्यावहारिक राजनीति में बहुत परिवर्तन हुए हैं। इसलिए ही नन्दू महाराज की इस सक्रियता के दूसरे मतलब हैं। पहले तो सीधा-सीधा सन्देश वर्तमान विधायक गोपाल जोशी के लिए है। महाराज अपनी इस सक्रियता के माध्यम से उन्हें बताना चाहते हैं कि वे या उनका कोई पारिवारिक बीकानेर पश्चिम से भाजपा के टिकट की दावेदारी करता है तो उन्हें नन्दू महाराज की भारी चुनौती का सामना करना पड़ेगा। यह वही नन्दलाल व्यास हैं जिन्हें बगावत के चलते 1998 के चुनाव में पार्टी से निकाला गया था। और हेकड़ स्वभाव के बावजूद 2003 के चुनावों से पहले मैनेज करके न केवल वे पार्टी में लौट आये बल्कि शहर सीट से टिकट भी ले आये थे। इसलिए बीकानेर पश्चिम से भाजपा टिकट के अन्य दावेदारों को इन्हें हलके में लेना भूल होगी।
यदि वर्तमान विधायक गोपाल जोशी आगामी चुनाव में टिकट की फिर से दावेदारी नहीं करते हैं तो वे चाह सकते हैं कि यह टिकट उनके पुत्र गोकुल जोशी को मिले। दूसरे दावेदारों में एक हैं मक्खन जोशी के पौत्र अविनाश जोशी, जो वसुंधरा राजे के निजी सचिवालय में अपनी पहुंच के चलते न केवल उम्मीद बांधे बैठे हैं बल्कि कुछ ऐसे कदम भी उठाए जिनसे उनकी अपरिपक्वता ही जाहिर हुई है। तीसरे हैं ओम आचार्य के भतीजे विजय आचार्य। विजय आचार्य बहुत धैर्य से और सधे हुए कदमों से अपने मुकाम को हासिल करने में गंभीर दिखाई देते हैं।
गोपाल जोशी जिस तरह से 50 से ज्यादा वर्षों से अपनी निजी टीम को बनाए रख कर और धन बल से राजनीति में सक्रिय बने हुए हैं, इन्हीं सब के बूते उन्होंने डागा चौक कांग्रेस के उन मंसूबों पर पानी फेर दिया जहां से दबी जबान यह कहा जाता था कि शहर सीट से विधायक होने के लिए गोपाल जोशी को दूसरा जन्म लेना होगा। बात गोकुल जोशी की करें तो उन में अपने पिता के जैसे संबंधों के निभाव और सूझ-बूझ की कमी दिखाई देती है।
मक्खन जोशी एक समय में न केवल बहुत लोकप्रिय थे बल्कि आठवें दशक में कांग्रेस विपक्ष की व्यावहारिक राजनीति में अपना विकल्प न होने की पैठ भी उन्होंने बनाई थी। उनके पौत्र अविनाश जोशी में लगता है धैर्य की बहुत कमी है और उनको यह भी समझना होगा कि व्यावहारिक राजनीति में केवल बाहरी विनम्रता काम नहीं आती। उन्हें अन्दर से भी विनम्र होना होगा।
ओम आचार्य की न केवल पार्टी में अपनी पुरानी पैठ है बल्कि पार्टी के माई-बाप संघ में भी उनकी पहुंच रही है। इसका अभाव गोकुल जोशी और अविनाश जोशी दोनों को ही विजय आचार्य से पिछड़ा सकता है। दूसरी विजय आचार्य की समझदारी इसी से जाहिर होती है कि वे नन्दू महाराज के जन चेतना अभियान में और पार्टी के अन्य कार्यक्रमों में लगातार सक्रिय दिखाई देते हैं।
नन्दू महाराज सहित जिन चार संभावितों का ऊपर जिक्र है वे सब एक ही जातिय समुदाय से आते हैं। आगामी चुनाव से पहले आने वाले जातीय जनगणना के आंकड़े क्या गुल खिलाएंगे, देखना होगा। क्योंकि फिलहाल बीकानेर पश्चिम से पुष्करणा समाज के व्यक्ति की दावेदारी को दोनों ही पार्टियों में चुनौती नहीं है।
--दीपचंद सांखला
30 नवंबर, 2011

सड़क दुर्घटनाएं और हम (29 नवंबर, 2011)

मनीषी डॉ. छगन मोहता के पुत्र श्रीलाल मोहता ने तीसेक साल पहले मोपेड खरीदी। उस समय वे कॉलेज व्याख्याता थे। डॉ. छगन मोहता ने उन्हें हिदायत देते हुए कहा कि मोपेड को चलाते वक्त पूरा ध्यान रखना। श्रीलाल मोहता का जवाब था--मैं ध्यान से ही चलाता हूं। इस पर डॉ. छगन मोहता ने कहा कि दुर्घटना से बचने के लिए केवल स्वयं का सावधानीपूर्वक चलना पर्याप्त नहीं है, सड़क पर चलने वाले दूसरे भी सावधानी से चलें, यह भी उतना ही जरूरी है अन्यथा वे अन्दर आ गिरेंगे।
कल गजनेर में बस और ट्रक की टक्कर हुई, सात जने अपनी जान गंवा बैठे। पच्चीस से ज्यादा घायल हुए हैं। इन घायलों में से कितने अपने सामान्य जीवन में लौट सकेंगे, अभी कहा नहीं जा सकता। बहुत कम सड़क दुर्घटनाएं प्राकृतिक आपदाओं के चलते होती है जैसे भूकंप से, तेज बारिश से या तेज आंधी से अचानक सड़कों का क्षतिग्रस्त हो जाना। अधिकांश सड़क दुर्घटनाएं मानवीय लापरवाही या भूल का परिणाम होती है। इस तरह की लापरवाही या भूल करने वाले हमेशा खुद भी दुर्घटना के शिकार हों जरूरी नहीं है।
राजमार्गों पर देखते हैं कि सड़कों पर ईंट, पत्थर गिराते हुए ट्रक निकल जाते हैं, गाडियों में कोई खराबी आयी तो उसे ठहराने के लिए सड़कों पर पत्थर रखते हैं, रवाना होते वक्त उस पत्थर को हटाना जरूरी नहीं समझते, आवारा या पालतू पशु जब तब सड़कों पर आ जाते हैं। रात्रि में ऊंट गाड़े और बैलगाड़ियों के आगे-पीछे रिफ्लेक्टर नहीं लगे होते, चौपहिया वाहनों के आगे-पीछे की लाइटें भी कई बार खराब होती हैं। सामने से गाड़ी आ रही हो या किसी गाड़ी के पीछे चल रहे हों तो डीपर लाइट में न चलना जैसी लापरवाहियां तो आम हैं। अपने देश में इस तरह की कोई समयबद्ध वाहन चैकिंग की भी व्यवस्था नहीं है जिसमें यह जांचा जा सके कि निश्चित किलोमीटर चलने के बाद किसी गाड़ी की पूरी सुरक्षा जांच हो चुकी है या नहीं। इसके अभाव में भी कई बार स्टीयरिंग और ब्रेक फेल होते हैं, या ज्यादा घिसे होने से टायर फट जाते हैं।
परिवहन और पुलिस विभाग अपनी ड्यूटी की बजाय चालकों की जिजीविषा पर ज्यादा भरोसा करते हैं, वे मान कर चलते हैं चालक अपनी मौत से डरते हुए गाड़ी सावधानी से ही चलायेंगे। दुर्घटना के जिम्मेदार चालक अकसर दुस्साहसी और मौत से न डरने वाले साबित होते हैं। उनके दुस्साहस को भुगतने वाले मृतक के परिवार और घायल व उनके परिवार इसे नियति मान कर संतोष कर लेते हैं। जिम्मेदार विभागों का काम इस मनुष्य-प्रकृति से चल जाता है। चालक लापरवाही करते हुए पकड़ा जाए या गाड़ी में कोई तकनीकी खराबी पकड़ी जाए तो उसके लिए टेबल के ऊपर जुर्माना और टेबल के नीचे का हर्जाना तय है।
--दीपचंद सांखला
29 नवंबर, 2011

गांधीवादी अन्ना??? (28 नवंबर, 2011)

अन्ना अपने को कहते गांधीवादी हैं लेकिन लगता है उन्होंने गांधी को पूरी तरह जाना-समझा नहीं है। नहीं तो स्वयं अन्ना और उनकी टीम के अहम सदस्य अपने बयानों और अपने भूतकाल की भूलों से बार-बार विवादों में नहीं आते और भ्रष्टाचार के विरुद्ध अपने आन्दोलन की भद्द नहीं पिटवाते। गांधी तो भाषा तक में हिंसा की इजाजत नहीं देते थे? लेकिन अन्ना की जबान बार-बार हिंसा को पुष्ट और समर्थन करती देखी जा सकती है। कृषिमंत्री पंवार को पड़े थप्पड़ पर उनकी पहली प्रतिक्रिया स्थानीय कहावत में ‘कोठे वाली होंठे’ का एक उदाहरण है। रालेगण सिद्धी के शराबियों पर उनका बयान भी हिंसा का ही समर्थन करता है। सार्वजनिक जीवन में काम करने वालों के जीवन का पूर्ण पारदर्शी होना गांधी जरूरी मानते हैं लेकिन अरविन्द केजरीवाल और किरण बेदी का आये दिन कसौटी पर चढ़ना विश्वसनीयता को भंग करता है।
--दीपचंद सांखला
28 नवंबर, 2011

बाजार और ओबामा (28 नवंबर, 2011)

अमरीकी राष्ट्रपति बराक ओबामा का एक बयान है जिसमें उन्होंने अपने देश के संदर्भ में कहा है कि हमें स्थानीय दुकानों से खरीददारी करनी चाहिए और समाज के छोटे उद्योगों को समर्थन देना चाहिए। ओबामा का यह बयान ऐसे समय में आया है जब भारत की केन्द्रीय सरकार ने खुदरा बाजार में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश को मंजूरी दी है। ओबामा के इस बयान को उनका महात्मा गांधी से प्रभावित होना मानें या उनके अपने देश की डांवांडोल हो रही अर्थव्यवस्था को सम्हालने का एक प्रयास। भारत के सन्दर्भ में देखें तो हमें उक्त दोनों ही विकल्पों पर गौर करना चाहिए। देश ने आजादी के बाद गांधी के आर्थिक मॉडल को नहीं अपनाया। अर्थव्यवस्था को एक बार से भी अधिक बदल-बदल कर देखा है देश की आर्थिक विषमताएं घटने की बजाय लगातार बढ़ती ही जा रही है। भारत और अमेरिका की आर्थिक समस्याओं का रूप अलग-अलग हो सकता है। लेकिन, ओबामा के बयान से लगता है कि समाधान एक ही है स्थानीय और छोटे उद्योगों व दुकानों को पनपाना, यही गांधी चाहते थे।
लगता है अमेरिका भारी आर्थिक दबाव में है अन्यथा पिछले कुछ वर्षों को छोड़ दें तो उसकी ओर से कभी भी इस तरह के बयान नहीं आये हैं जिसमें वहां के राष्ट्रपति को इस तरह की अपील करनी पड़ी हो। अब तक अमेरिका दूसरों देशों को न केवल अपने हित में उपयोग करता रहा है बल्कि उसे न्यायिक भी ठहराता रहा है।
ओबामा के उक्त बयान से उनकी दोहरी नीति जाहिर हो रही है। अमेरिका और जो अमेरिकी उद्योग और व्यापार समूह अब तक दूसरे देशों में बाजार ढूंढ़ते फिरते थे, उसी अमेरिका के राष्ट्रपति ओबामा चीन के बाजारू दबाव में ऐसा बयान देने को मजबूर हुए हैं। हमारे देश के आर्थिक नियन्ता इस परिप्रेक्ष्य में खुदरा बाजार में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश पर क्या पुनर्विचार करेंगे?
                                                    --दीपचंद सांखला
28 नवंबर, 2011

वॉलमार्ट से दुबला कौन (26 नवंबर, 2011)

खुदरा बाजार में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश को केंद्र सरकार ने मंजूरी दे दी है। इस पर टीवी-अखबारों में घमासान है। सरकार का निर्णय है इसलिए विपक्ष इसका विरोध कर रहा है। संसद को एक-दो दिन और न चलने देने का बहाना जो मिल गया। यही विपक्ष अगर सरकार में होता तो वो भी यही निर्णय लेता। तब शायद कांग्रेसी इसका रस्मी विरोध करते। बाजार को लेकर पिछले तीस वर्षों से यही नूरा-कुश्ती चल रही है। इस मंजूरी से जो बड़े व्यावसायिक घराने सीधे तौर पर प्रभावित होंगे, मीडिया को वो अपने तरीके से फीडबैक देंगे और जिनको विदेशी कंपनियों के साथ देश में व्यापार करना है वो अपने तरीके से। टीवी, अखबारों को इन दोनों ही तरीकों की प्रतिक्रियाओं को समुचित स्थान देना होगा। मीडिया यह तो बताता  है कि इनसे करोड़ों को रोजगार मिलेगा, वो यह क्यों छुपा जाता है कि इन करोड़-दो करोड़ के रोजगार के लिए कितने करोड़ की रोटी-रोजी छिन जायेगी। यही व्यापारिक घराने विज्ञापनदाता के रूप में टीवी अखबारों के माई-बाप बने हैं। इन मीडिया समूहों का विश्लेषण करेंगे तो पायेंगे कि यह उच्च वर्ग के लिए उच्च वर्ग द्वारा संचालित है अन्यथा देश की लगभग आधी आबादी को मीडिया में स्थान पाने के लिए अपराध, दुर्घटनाओं और प्राकृतिक विपदाओं का ही सहारा लेना पड़ता है।
बड़े विदेशी समूह जब भारतीय बाजार में आयेंगे तो उन भारतीय समूहों से ही प्रतिस्पर्धा करेंगे जो इस व्यापार में लगे हैं अन्यथा निम्न वर्ग की आधी आबादी के लिए जो बाजार है उसकी खबर कब बनी? यह बाजार तो पहले से कम शुद्ध और कम मात्रा बेचने को और उसका उपभोक्ता खरीदने को अभिशप्त है। इस आबादी का उच्च वर्ग से संबंध होगा भी तो इन बड़े बाजारों के सामान की पल्लेदारी करने से ज्यादा का नहीं हो सकता।
गांधीजी शुमाकर से बहुत प्रभावित थे। इसीलिए वे चाहते थे कि शहरों की बजाय गांवों का विकास हो, बड़े-बड़े कल-कारखानों की जगह छोटे कारखाने हों। छोटे-छोटे लोगों की जरूरतें पूरी हो, छोटे-छोटे लोगों का सम्मान हो।
अपने देश के प्रथम प्रधानमंत्री नेहरू इससे शायद सहमत न थे, वे पश्चिम से प्रभावित थे। बड़े-बड़े कारखाने, बड़े-बड़े बांध उनके सपने थे। देश उसी रास्ते पर चल पड़ा। बची-खुची  कसर नब्बे के दशक की विश्व बाजार की नई आर्थिक नीतियों ने पूरी कर दी। ऐसे रास्तों पर छोटे लोगों को कुचलना ही होगा। क्योंकि सबकी नजर अपने से ऊपर पर है, ऊंचे को हासिल करने पर जो नीचे है वो कुचला ही जायेगा।
इसलिए निम्न वर्ग को इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि रिटेल स्टोर रिलायंस चलाता है या वालमार्ट। क्योंकि वो इस प्रतिस्पर्धा में है ही नहीं। इस दौड़ में मध्यम, उच्च मध्यम, उच्च और उच्च से उच्च वर्ग है। कुल आबादी का यह एक-चौथाई हिस्सा ही बाजार को प्रभावित करता है और रोशन भी।
--दीपचंद सांखला
26 नवंबर, 2011

Saturday, October 27, 2018

प्रशासनिक बैठकों की रस्म अदायगी (25 नवंबर, 2011)

परिवहन विभाग की ओर से कल संभाग स्तरीय बैठक की रस्म-अदायगी हुई। अभी हाल ही में संभाग के वीरेन्द्र बेनीवाल स्वतंत्र प्रभार के साथ परिवहन मंत्री बने हैं। इसलिए इस बैठक से उम्मीद भी कुछ ज्यादा बंधी थी। लेकिन जैसा कि ऐसी लगभग सभी सरकारी बैठकों का हश्र होता है, इसका भी वही हुआ। संभाग के तीन लोकसभा सदस्य और 24 विधायकों सहित नगरपालिकाओं, नगर परिषदों, नगर निगमों के अध्यक्ष, सभापति, महापौर--इन सभी में से मात्र एक पालिका अध्यक्ष ने आना जरूरी समझा। परिवहन मंत्री सहित अधिकांश ने तो बैठक की सूचना न होने की बात कहकर अपनी जिम्मेदारी पूरी कर ली। यदि यह सही है तो प्रशासनिक स्तर पर यह और भी गम्भीर है। क्या आयोजकों  ने इन जनप्रतिनिधियों को बाकायदा और व्यवस्थित सूचना देना भी जरूरी नहीं समझा?
इस तरह की बैठकें साल में एक बार भी संभव हो जाए तो गनीमत है। होना तो यह चाहिए था कि बीकानेर और संभाग के अन्य जिला मुख्यालयों की यातायात से संबंधित समस्याओं को व्यावहारिक अंजाम तक पहुंचाने के फैसले होते। बीकानेर शहर में ही लोकल ट्रांसपोर्ट एक बड़ी समस्या है। सिटी बसों का संचालन बार-बार बंद हो जाता है। यद्यपि ऑटोरिक्शा अभी भी अन्य शहरों से यहां सस्ता है लेकिन सिटी बसों से सस्ते नहीं हो सकते। अलावा इसके ऑटो रिक्शा चलाने वालों पर भी कई प्रकार से ध्यान दिया जाना जरूरी है, जैसे उनकी यूनियन के सहयोग से उनके स्वास्थ्य की नियमित जांच होनी चाहिए। उनके पास ड्राइविंग लाइसेंस है या नहीं, देखा जाना चाहिए। समय-समय पर ऐसे रिफ्रेशर कोर्सेस भी चलाए जाने चाहिएं जिसमें उन्हें ट्रैफिक के नियमों की व्यवस्थित जानकारी और उनका पालन करने की जरूरत बताई जा सके। इन्हीं रिफ्रेशर कोर्स के माध्यम से उन्हें लोक व्यवहार का प्रशिक्षण दिया जा सकता है।
ऐसी बैठकों में यह भी तय किया जाना जरूरी था कि शहर की सभी दो लाइन सड़कों के तिराहे और चौराहों पर कम से कम 100-100 मीटर के डिवाइडर तो बनने ही चाहिए। क्योंकि सभी सड़कों के डिवाइडर बनाना बेहद खर्चीला होगा। यदि 100-100 मीटर के डिवाइडर बना दिये जायें तो भी शहर का ट्रैफिक बहुत कुछ ठीक हो सकता है। इससे दो फायदे होंगे, एक तो इन तिराहों और चौराहों पर आए दिन होने वाली छोटी-मोटी दुर्घटनाओं में कमी आयेगी, दूसरा सड़क पर चलने वालों को अपनी लाइन में चलने का अभ्यास भी बनेगा।
राज्य परिवहन और निजी बसों के संचालन की समयसारिणी भी इस तरह से तय होनी चाहिए ताकि परिवहन निगम और निजी बस संचालकों दोनों को नुकसान न हो और यात्रियों को समयबद्ध सेवा का लाभ मिल सके।
--दीपचंद सांखला
25 नवंबर, 2011

सुख के लालच के दु:ख (24 नवंबर, 2011)

कहावत है ‘लालच बुरी बलाय’। जिन घटनाओं की पुनरावृत्ति होती है उनको संकेतों से समझाने के लिए यह कहावतें बनती हैं। यह घटनाएं अच्छी और बुरी दोनों हो सकती है? उक्त कहावत में साफ कहा गया है कि लालच कष्टों को निमंत्रण है। यह लालच की प्रवृत्ति कभी-कभार पशुओं में भी देखने को मिल जाती है, लेकिन इसका निर्णय करने के लिए उनके पास विवेक नहीं होता। मनुष्य को प्रकृति ने विवेक दिया है ताकि वो अच्छे-बुरे का निर्णय कर सके। मनुष्य में यह लालच की प्रकृति उसके उद्भव से मानी जाती है। ईसाइयत में तो इस दुनिया की उत्पत्ति ही लालसा से मानी जाती है। कहते हैं प्रथम पुरुष आदम और प्रथम स्त्री हव्वा को एक सेव उपलब्ध करवा कर आगाह कर दिया गया था कि तुम्हें यह नहीं खाना है। अगर खाने का लालच किया तो हमेशा भुगतना होगा।
इस रूपक का उल्लेख इसलिए किया गया कि वित्तीय विशेषज्ञों द्वारा बार-बार यह बताए जाते रहने के बावजूद कि कोई भी वित्तीय संस्था पांच वर्ष से कम समय में धन को दुगुना करके नहीं दे सकती, हम बार-बार ऐसे ठगोरों के चक्कर में पड़ते हैं और गाढ़े पसीने की अपनी कमाई खो बैठते हैं। इन दिनों जो खबर गरम है वो गोल्ड-सुख की है। कम्पनी पर आरोप है कि इसने ढाई साल में धन दुगना करने का लालच देकर हजारों लोगों से कोई 300 करोड़ रुपये इकट्ठे किये। इसके नियंता गायब होने की फिराक में थे। कुछ पकड़े भी गये हैं। इसी तरह कोई पंद्रह से बीस साल पहले भी एक कंपनी आई थी गोल्डन फोरेस्ट। उसने भी ढाई वर्ष में धन दुगुना करने का लालच देकर कई सौ करोड़ रुपये का चूना लगाया था। बीकानेर के कई अच्छे-भले लोग आज भी उस टीस को नहीं भुला पाए हैं।
आधे मूल्य में ब्रांडेड घरेलू सामान, सोने को चमकाने, सोने को दुगुना करने, आधे भाव में सोना बेचने और रुपयों को दुगुना करने जैसी घटनाएं देश में आये दिन होती हैं। इन घटनाओं की पुनरावृत्ति इसलिए भी होती है कि जिनको यह पता चल जाता है कि यह गड़बड़ हो रही है, उसके बावजूद वे यह सोच कर चुप रह जाते हैं कि हमें सचेत रहना है। दूसरा ठगा जाए तो उनका क्या जा रहा है! वे यह भूल जाते हैं कि ऐसे ठगोरों के हौसले बढ़ेंगे तो अपने को समझदार मानने वालों का विवेक भी कभी खूंटी पर टंगा रह जाएगा। वे अपना काम कर जायेंगे।
--दीपचंद सांखला
24 नवंबर, 2011

डेरे के सफाई अभियान के बहाने स्वच्छता की बात (23 नवंबर, 2011)

दिल्ली में दो दिन और जयपुर में एक दिन के सफाई अभियान के बाद डेरा सच्चा सौदा के अनुयायी आज बीकानेर में हैं! राजस्थान और पड़ोसी राज्यों से अनुयायी लगातार पहुंच रहे हैं। मकसद है एक तो नापासर रोड स्थित इन्हीं के डेरे का निर्माण कार्य और दूसरा है शहर की सफाई का। डेरे वालों का कहना है कि वे दान में पैसा आदि नहीं लेते। श्रम लेते हैं और इसी श्रम से वे सब कुछ संभव कर लेते हैं। यानी डेरे की हजारों बीघा कृषि भूमि में खेती का सारा काम ये अनुयायी अपनी समयानुकूलता से पहुंच कर करते हैं। उपज से जो पैसा आता है उसी से डेरों पर होने वाले खर्चे चलते हैं। निर्माण के लिए ईंट, कंक्रीट, सीमेंट, बजरी और लकड़ी आदि वस्तुएं खरीदी जाती हैं। इन सबको जोड़ने का काम यह अनुयायी लोग श्रमदान से कर लेते हैं।
इस तरह से सामूहिक काम करने की परम्परा हमारे समाज में नई नहीं है। रेगिस्तान के हमारे इस भू-भाग में खेती के लिए यह परम्परा सदियों पुरानी है। स्थानीय बोली में इस पद्धति को ‘लास’ या ‘ल्हास’ कहा जाता रहा है। बदलते दौर में तकनीक और आपसी रिश्तों में आए बदलाव के चलते यह परम्परा बीते काल की बात होती जा रही है। इस तरह की परम्परा अलग-अलग नामों से कमोबेश देश में सभी जगह मिलती है। पंजाब में यह परम्परा कारसेवा के नाम से जानी जाती है।
आज हो रही सफाई को हमें इस प्रकार से भी देखना चाहिए--डेरे के अनुयायी एक अभियान के तहत सफाई कर जायेंगे। शहर के कितने हिस्से को साफ किया और सफाई से इकट्ठा हुए कचरे की ढेरियों को उठाया गया या नहीं? यह कहां-कहां से उठाया गया और कहां-कहां पड़ी रह गई, इसकी खबर भी कल के समाचार पत्रों से पता चल जायेगी।
सवाल है कि अपना शहर आज के बाद क्या हमेशा साफ रहेगा? जिस शहर को सात लाख लोग गंदा करने पर उतारू हों, उस शहर को नगर निगम के सात सौ की जगह सात हजार कर्मचारी भी लगा दिए जाएं तो क्या साफ रख पायेंगे? प्रतिबंध के बावजूद प्लास्टिक केरीबैग, थैलियां, धड़ल्ले से काम ली जा रही हैं। प्लास्टिक डिस्पोजेबल का भी बिना किसी संकोच के धड़ल्ले से उपयोग हो रहा है। जिनसे सीवर और नालियां रुकती हैं। हम अपने घर आंगन की सफाई करके कचरा नियत स्थान पर ना डालकर आलस्य में जहां कहीं भी डाल देते हैं। घर और घर का आंगन तो साफ हो गया, मोहल्ले का आंगन जहां-तहां कचरा डालने से गंदा हो तो किसे परवाह है? खुद लापरवाह हैं तो सफाई-कर्मी द्वारा इकट्ठा किए गए कचरे को नालियों में जाने से कौन रोकेगा! इन सबके चलते ऐसे सफाई अभियान केवल प्रतीकात्मक ही होकर रह जाएंगे। सार्थक तो तब माना जाये जब आम शहरी इसे संकल्प के रूप में भी अपनाए?
                                                     --दीपचंद सांखला
23 नवंबर, 2011

राजनीति : दागियों को संरक्षण नहीं मिलना चाहिए (22 नवंबर, 2011)

प्रदेश के राजनेताओं के चरित्र पर लगातार लग रहे लांछन से पूरा प्रदेश शर्मसार हो रहा है। बड़े घोटालों और चारित्रिक कमजोरियों के नित नए कारनामों की चर्चाओं से अपेक्षाकृत कम चर्चित रहने वाला राजस्थान कुछ महीनों से इन्हीं मामलों को लेकर लगातार सुर्खियों में बना हुआ है। भूमि और खनन घोटालों के बाद मदेरणा-भंवरी प्रकरण और फिर एक अन्य मंत्री रामलाल जाट के सैक्स स्कैण्डल व आर्थिक घपलों की स्याही अभी सूखी भी नहीं थी कि राजनेताओं से संबंधित एक और सीडी प्रकरण सामने आ गया है। उसने प्रदेश के  राजनीतिक गलियारों में फिर हलचल मचा दी। वहीं प्रदेशवासी यह सोचने को विवश हो गए हैं कि जिन राजनेताओं का वे प्रतिदिन जय-जयकार करते नहीं थकते, जिन्हें मालाओं से लादने की होड़ लगी रहती है, वे इतने नीचे तक गिर सकते हैं।
भाजपा शासन में मंत्री रहे जोगेश्वर गर्ग और इसी दल के पूर्व सांसद निहालचंद मेघवाल समेत राजनीति व राजनीतिज्ञों से जुड़े लगभग डेढ़ दर्जन लोगों पर लगे देहशोषण के मामले ने प्रदेशवासियों को झकझोर कर रख दिया है। राजनेता भी समाज का ही हिस्सा हैं और उनके भी आम लोगों की तरह ही सामाजिक-पारिवारिक रिश्ते होते हैं। राजनेताओं की राजनीतिक अपेक्षाओं के चलते व आमजन की सत्ता के निकट रहने की आकांक्षा के लालच में ये रिश्ते और भी प्रगाढ़ व व्यापक होते जाते हैं। पर ताजा घटनाओं से अब लोगों को यह सोचने को विवश होना पड़ेगा कि इन रिश्तों बीच लक्ष्मण रेखा कहां खींची जाए कि नई सीडियां बनने की नौबत नहीं आए।
ऐसा नहीं माना जा सकता कि प्रदेश के राजनेताओं का चारित्रिक पतन कोई अचानक हुआ हो या हाल के वर्षों में इसमें तेजी आई हो। बढ़ती चेतना और एक सीमा तक मीडिया का दायरा बढ़ने से भी कुछ घटनाएं जो पहले आम व्यक्ति तक नहीं पहुंच पाती थी, अब पहुंचने लगी हैं। इन पर अंकुश लगाने में पहली भूमिका संबंधित राजनीतिक दलों की ही है। मामला पुलिस या कानून की चौखट तक जाने से पहले धुआं देखकर आग का अंदाजा इन दलों को लगा लेना चाहिए और संदिग्ध चरित्र वाले अपने सदस्यों को किनारे कर देना चाहिए। इसका थोड़ा-बहुत राजनीतिक नुकसान भी उन्हें उठाना पड़ सकता है लेकिन पानी के सिर तक चढ़ने के बाद होने वाले नुकसान से तो ये दल बचेंगे, सत्ता-मद में रास्ता भटकने वालों को नसीहत भी मिलेगी। यह भी जरूरी है कि एक प्रकरण सामने आने पर, इसे मात्र राजनीतिक षड्यंत्र करार देकर वोटों के नुकसान को सर्वोपरि समझते हुए दागी सदस्यों को बचाना एकमात्र लक्ष्य नहीं बनाएं। शीर्ष नेतृत्व के लिए जरूरी है कि राजनीतिक शुचिता को भी महत्त्व दें। दीर्घकाल में यह ज्यादा फायदेमंद साबित होगा। यह भी होना चाहिए कि ऐसे मामलों में कानून और व्यवस्था के तंत्र को बगैर किसी दबाव के स्वतंत्रता से काम करने दिया जाए ताकि दोषी राजनेता को दंडित करने में कोई व्यवधान नहीं आए। दंड से बचने की उम्मीद भी राजनेता की निरंकुशता को बढ़ावा देती है।
--दीपचंद सांखला
22 नवंबर, 2011

नंदलाल व्यास (21 नवंबर, 2011)

1998 के विधानसभा चुनाव में भाजपा ने जब बीकानेर शहर के अपने विधायक नन्दलाल व्यास को अपना उम्मीदवार नहीं बनाया तो विरोधस्वरूप निर्दलीय चुनाव लड़ा और पार्टी से निष्कासित हुए। 2003 में होने वाले चुनावों से पहले व्यास चाहते थे कि उन्हें पार्टी में ले लिया जाय। पार्टी के एक धड़े को भी लगने लगा कि नन्दलाल व्यास पार्टी की जरूरत हैं। नन्दलाल व्यास ने भी पार्टी पर दबाव बनाने के लिए अलग तरीका निकाला। उन्होंने अपनी निजी क्षमता से जय जन यात्रा की घोषणा की। कई दिनों तक चली उस यात्रा में वे विधानसभा क्षेत्र के लगभग हर हिस्से में गए। तब वे यात्रा के पड़ाव में आए मुहल्ले में ही रात्रि विश्राम करते थे। माहौल भी बना और पार्टी पर दबाव भी। व्यास को न केवल पार्टी में लिया गया बल्कि 2003 के चुनावों में टिकट भी दे दिया गया। लेकिन वे हार गए। 2008 के चुनावों में दावेदारी के बावजूद पार्टी ने उम्मीदवार नहीं बनाया। उन्होंने एक बार तो 1998 को दुहराने की घोषणा कर दी। लेकिन लगता है कि 1998 से 2003 के बीच का सबक उन्हें याद आ गया। अब पार्टी में ही हैं, चुनाव दो साल बाद होने हैं। लगभग ताल ठोंकने के अंदाज में वे जनचेतना यात्रा पर निकल पड़े हैं।
--दीपचंद सांखला
21 नवंबर, 2011

सूरसागर में म्यूजिकल फाउंटेन (21 नवंबर, 2011)

पचास लाख रुपये की लागत से सूरसागर में म्यूजिकल फव्वारा लगाया जाएगा। कुछ वर्ष पहले पब्लिक पार्क में डूंगरसिंह मूर्ति के निकट भी एक म्यूजिकल फव्वारा लगाया गया था। उसमें भी लाखों रुपये खर्च हुए थे। कुछ महीने ही चल पाया। अब उस पूरे फव्वारे का सिस्टम धूल फांक रहा है। सूरसागर में सीवर का पानी लगातार रिस रहा है। ऐसी किसी सूचना की घोषणा नहीं हुई है कि उस रिसते गंदे पानी का कोई पुख्ता इंतजाम किया जा रहा है। यह बात तो दूर की है कि उस सीवर के निर्माण में लगे इंजीनियर और ठेकेदार की कोई जिम्मेदारी तय की गई हो। सूरसागर को आनन्ददायक स्थल बनाने के प्रयास पिछले चार वर्ष से किये जा रहे हैं। लेकिन प्रशासन इसमें लगातार असफल रहा है। रिसते सीवर के पानी की बदबू में नौकायन करते म्यूजिकल फव्वारे का आनन्द ले सकेंगे स्थानीय लोग?
लाखों-करोड़ों रुपये की योजनाएं बनती हैं। कई प्रकार के स्वार्थों के चलते उनका निर्माण भी हो जाता है। लेकिन उनको चालू रखने में शायद कोई स्वार्थ सिद्ध नहीं होते होंगे जो बंद हो जाती हैं। टॉय ट्रेन भी इसका उदाहरण है। प्रशासन ने इसका दो बार उद्घाटन करवाया फिर भी बंद पड़ी है। थोड़े दिनों में खबर आयेगी कि पटरिया गायब हो रही हैं, डिब्बों का सामान चोरी हो गया। इंजन का जेनरेटर किसी के घर को रोशन कर रहा है। जूनागढ़ के सामने स्थित क्रॉफ्ट बाजार का हाल भी ऐसा ही होता लगता है। प्रशासन ने क्रॉफ्ट बाजार का भी उद्घाटन दो बार करवाया है।
--दीपचंद सांखला
21 नवंबर, 2011

Friday, October 26, 2018

राष्ट्रपति की बीकानेर यात्रा (19 नवंबर, 2011)

राष्ट्रपति प्रतिभा देवीसिंह पाटिल अपने दो दिवसीय दौरे पर बीकानेर आईं। दौरा समाप्त कर कल रात लौट भी गईं। राष्ट्रपति के बीकानेर आने का एक प्रयोजन उनके ससुराल पक्ष की ओर से बीकानेर में मायरा भरा जाना था। दीक्षांत समारोह में उनका मुख्य आतिथ्य संयोगवश विश्वविद्यालय को मिल गया। दीक्षांत समारोह भी ऐसा कि न तो गोल्ड मेडल लेने वाले खुश और ना डिग्रियां लेने वाले। खुश तो केवल कुलपति और उनका सचिवालय ही हो सकता है क्योंकि दीक्षांत समारोह उनके कार्यकाल की भविष्य में उपलब्धि माना जायेगा।
दीक्षांत समारोह का मुख्य आकर्षण विद्यार्थियों के लिए यह होता है कि किसी बड़े व्यक्ति के हाथ से उन्हें गोल्ड मेडल पहनाया जाएगा या डिग्रीयां दी जाएंगी। समय और सुरक्षा कारणों के चलते ऐसा संभव नहीं हो पाया। सुरक्षा कारणों के ही चलते विद्यार्थियों, उनके अभिभावकों तथा अन्य अतिथियों को कई असुविधाओं का सामना करना पड़ा। देश में हो रही आतंकवादी घटनाओं और मरजीवड़ों के हमलों के चलते देश की मुखिया की सुरक्षा व्यवस्था का पुख्ता होना जरूरी भी है। तो फिर करोड़ों रुपये खर्च से होने वाली इस तरह की रस्म अदायगी वाले दीक्षांत समारोह का औचित्य भी क्या है?
दौरे की व्यवस्थाएं
कल रात को जब राष्ट्रपति शादी समारोह में आई-गईं तब गजनेर पैलेस होटल से लेकर करणी भवन पैलेस होटल तक के लगभग 32 किलोमीटर के लम्बे रास्ते को सुरक्षा- सावधानियों के चलते चाक चौबंद किया गया। इस बत्तीस किलोमीटर के रास्ते में कई तिराहे और चौराहे होंगे। इन सभी क्रॉसिंग पर न केवल एकाधिक पुलिस और आरएसी के जवान लगाये गए बल्कि बल्लियां लगा कर रास्ते भी बन्द किये गये। गजनेर रोड वाणिज्य नाके से करणी भवन होटल तक का यह क्षेत्र घनी बसावट में आता है और कल शादियां भी बहुत थीं, इसीलिए आमजन का आवागमन भी रोजाना से बहुत ज्यादा था। राष्ट्रपति के कल रात के इस आवागमन से सभी को भारी दिक्कतों का सामना करना पड़ा। यहां फिर स्पष्ट कर दें कि यह सब लिखने का मंतव्य यह नहीं है कि राष्ट्रपति की सुरक्षा के लिए यह सब नहीं करना चाहिए था।
प्रशासन और राष्ट्रपति की सुरक्षा एजेन्सी थोड़ा विचार करती तो उन्हें होटल लालगढ़ पैलेस में ठहरने का आग्रह करता या गजनेर से गांधी कॉलोनी तक हैलिकॉप्टर से लाया-ले जाया जा सकता था। करणी भवन होटल से एक किलोमीटर से भी कम की दूरी पर शार्दूल क्लब में हैलिपैड है भी। 32 किलोमीटर लम्बे रास्ते की व्यवस्था के पूरे खर्चे को जोड़ें तो राष्ट्रपति का हैलिकॉप्टर से आना-जाना संभवतः सस्ता ही पड़ता और ना भी पड़ता तो भी जनता तो भारी परेशानियों से बचती, क्या प्रशासन भविष्य में ऐसे कार्यक्रमों में इस तरह के विकल्पों पर भी विचार करेगा?
राष्ट्रपति यदि सरकिट हाउस में ही ठहर जातीं तो फिर कहना ही क्या। पूर्व के राष्ट्रपति अपनी बीकानेर यात्राओं में वहां ठहरते रहे हैं।
--दीपचंद सांखला
19 नवंबर, 2011