Thursday, August 26, 2021

देश की तासीर में जबरिया बदलाव

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) अपनी स्थापना के बाद के 95 वर्षों से अपने एजेंडे पर बड़ी चतुराई से जुटा है बल्कि यह कहना अतिशयोक्ति में नहीं आयेगा कि इसका अनुगमन करने वाले बड़ी धूर्तता से लगे हैं। यह सर्वविदित है कि संघानुगामियों का आजादी के आंदोलन में किसी तरह का योगदान तो दूर की बात, ये अंग्रेज शासकों और अलगाववादियों के लिए अनुकूलता बनाने में ही लगे रहे।

कहने को आरएसएस एक सामाजिक संगठन है, अपनी अपंजीकृत इकाइयों—शाखाओं—में यह दिखावे के तौर पर तयशुदा रूढ़ और विवादहीन गतिविधियां करते हैं, वहीं तय आयोजनों के अलावा अपने शाखा-साथियों की अनौपचारिक बैठकों-मुलाकातों में घृणा के बीज बोते नहीं थकते जाति और धर्म श्रेष्ठता की बातें कर चार वर्णों में बंटी जातियों में तथाकथित सवर्णों में भी एक विशेष ब्राह्मण-समूह को श्रेष्ठ और उन्हीं के कहे को अनुकरणीय स्थापित करने में अपरोक्ष तौर पर जुटे रहते हैं। बात यहीं खत्म नहीं होती, इस पर कायम रहने की जरूरत वे इसलिए बताते हैं कि यदि सदियों पुरानी इस व्यवस्था को पुख्ता नहीं रखेंगे तो दूसरे धर्म के—खासकर इस्लाम और ईसाई हमारे धर्म को समाप्त कर देंगे। इसके लिए गढ़ी गई झूठी ऐतिहासिक घटनाओं को प्रचारित करते हैं या ऐतिहासिक घटनाओं की अपने ऐजेंडे के अनुकूल 'संघ-घडंत' व्याख्या बताते रहे हैं।

इस तरह की झूठी बातें भय पैदा करती हैं और भय कायरता। कायरता की पीठ पर हाथ लगते ही वह हिंसक होते देर नहीं लगाती। मोदी-शाह की शासनशैली ऐसे ही कायरों की पीठ पर हाथ रखने में कारगर साबित हो रही है। नतीजतन जिनके विरुद्ध फिलहाल सर्वाधिक विषवमन किया जा रहा है उस मुस्लिम समुदाय के कमजोर लोगों के साथ ये कायर हिंसक होकर घृणा का वमन करने लगे हैं। गो-पालन में लगे मुसलमानों को गो-वंश के परिवहन में बड़ी दिक्कत आने लगी है। पहले उनके साथ सीधे हिंसा होती थी लेकिन जब से रंगदारी तय हो गयी तब से ये तथाकथित गो-भक्त रंगदारी वसूलने और गो-वंश का निर्बाध परिवहन होने दे रहे हैं। इस तरह गो-भक्तों का तथाकथित शौर्य ठण्ड पी गया। 
जो रंगदारी वसूलने में लग गये, वे तो काम लग गये, लेकिन अन्य कायर दूसरे-दूसरे तरीकों से अपनी घृणा के वमन में लग गये हैं, रोटी-रोजी में लगे मुस्लिम समुदाय के लोगों पर जब-तब 'चढ़ी' करने लगे। इन्दौर में हाल ही की एक घटना में चूड़ी बेचने वाले मुस्लिम युवक का सामान बिखेरते हुए इन्हीं कायरों ने इस हीनता में पीट दिया कि वह चूड़ी पहनाने के बहाने हिन्दू स्त्रियों के हाथों को छूता है।

इन्दौर के चूड़ी विक्रेता पर जो एक आरोप चस्पा किया गया, वह यह कि हिन्दू नाम रखकर ऐसा कर रहा है। हिंसक कृत्र्य का ऐसा बचाव करने वाले ऐसा क्यों नहीं सोचते कि रोटी-रोजी के लिए उसे नाम बदलने की नौबत क्यों आयी। इन कायर-हिंसकों ने देश में ऐसा माहौल बना दिया है कि अल्पसंख्यक अपनी असल पहचान के साथ मजदूरी भी नहीं कर सकता। यहां वर्षों पहले का उदाहरण दोहराना चाहता हूं—मेरे एक पड़ौसी मुस्लिम युवक थे मुमताज, जो हनुमान भक्त थे। सादुलगंज स्थित ग्रेजुएट हनुमान मन्दिर के परम भक्त। एक दिन मन्दिर में मुझसे टकरा गये, देखकर सकपकाए—किनारे ले गये और बोले कि मेरी पहचान मत बताना, मेरी पहचान यहां मूलचन्द नाम से है। ऐसा उन्हें इसलिए करना पड़ा, क्योंकि उस मन्दिर के तब के पुजारी जनार्दन व्यास मन्दिर में श्रद्धालु का नाम और जाति पूछकर ही प्रवेश देते थे, पहचान इसलिए भी छुपानी पड़ती है। संघानुगामियों की बेशर्मी की हद तो तब देखने में आयी जब मध्यप्रदेश के गृहमंत्री उस चूड़ी विक्रेता युवक पर हमला करने वालों का ढिठाई से बचाव करने प्रेस से मुखातिब हुए। 

हमारे बीकानेर का ही उदाहरण लें, यहां चूड़ी व्यवसाय में सदियों से जो मुस्लिम समुदाय लगा है, उसे चूड़ीगर कहा जाता है, उनकी कभी कोई एळ-गेळ शिकायत सामने नहीं आयी।

इस देश की तासीर बदलने में वर्तमान शासक जो लगे हैं, उसकी कीमत हमें अपना सुख-चैन खोकर चुकानी होगी। अर्थव्यवस्था का भट्टा इन्होंने पूरी तरह बिठा ही दिया है, सामाजिक-समरसता से भी इनकी दुश्मनी कम नहीं है। हम अब भी नहीं जागे तो क्या कुछ खो देंगे, उसकी कल्पना मात्र से ही सिहर उठते हैं।
―दीपचन्द सांखला
24 अगस्त, 2021

Thursday, August 5, 2021

बीकानेर शहर की समस्याएं : हम कब तक अंगूठा चूसते रहेंगे

स्वायत्त शासन मंत्री शान्ति धारीवाल प्रशासन शहरों के संग कार्यशाला के बहाने बीते शनिवार को बीकानेर में थे। अकेले मंत्रीजी ही नहीं, उनका पूरा सचिवालय शुक्रवार शाम बीकानेर पहुंच गया था। मंत्रीजी होटल लक्ष्मी निवास पैलेस में ठहरे, जबकि उनके मुख्यमंत्री सर्किट हाउस में ही ठहरते हैं। लाखों रुपयों की इस खर्चीली यात्रा से शहर को क्या हासिल होगा, फिलहाल दावा छोड़ अनुमान भी नहीं लगा सकते। इस तरह के औपचारिक आयोजनों को मीडिया अच्छी-खासी सुर्खियां चाहे दे, इनके शून्य परिणामों का मीडिया कभी जिक्र नहीं करता।

खैर! ऐसी रातों के झांझरके ऐसे ही होते हैं। शहर की दो बड़ी समस्याएं—कोटगेट क्षेत्र की यातायात समस्या और दूसरी सफेद हाथी सूरसागर की—दोनों का मौका मुआयना मंत्रीजी ने किया है। सूरसागर को सफेद हाथी इसलिए लिखा कि जबसे इसे साफ किया गया है, तब से इसे एक बार भी एक चौथाई नहीं भरा जा सका है। अनेक ट्यूबवेलों और नहरी पानी की आमद के बावजूद यही स्थिति है। सफाई के बाद बीते 13 वर्षों में इसकी मरम्मत और रखरखाव पर ही करोड़ों खर्च किये जा चुके हैं।

बरसाती और गन्दे पानी की आवक पर इसके लिए अलग से सीवरेज लाइन डालने और फिल्टर प्लांट लगाने का तख्मीना बनाने का आदेश तो धारीवालजी दे गये हैं, लेकिन इसे भरा कैसे रखा जायेगा, इस पर बात नहीं की गई। रियासत काल में सूरसागर जिस आगोर से भर जाता था, वह अब अधिकतर तो छावनी क्षेत्र में आ गई तो कुछ बसावट की भेंट चढ़ गई है। जब कृत्रिम साधनों के पानी से पार नहीं पडऩी तो इसे वर्तमान रूप में बनाये रखना सफेद हाथी पालने जैसा ही है।
यह बात पूर्व मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे के समझ आ गयी थी। जून, 2014 में 'सरकार आपके द्वार' के तहत वे जब बीकानेर आयीं तो उन्होंने कुछ पत्रकारों को गजनेर पैलेस में बातचीत के लिए बुलाया था। तब मैंने सूरसागर से संबंधित उपरोक्त बात की थी तो राजे ने पूछा विकल्प क्या हो सकता है? मैंने सुझाया इसे इसी गहराई में डेजर्ट पार्क के तौर पर विकसित किया जा सकता है। जिसमें थार मरुस्थल के पेड़-पौधे लगाये और ऐसे जीव-जन्तुओं को रखा जा सकता है जिन पर वन विभाग को एतराज न हो। सूरसागर के सामने जूनागढ़ किला है जहां रोजाना हजारों की संख्या में देशी-विदेशी पर्यटक आते हैं। उनके लिए डेजर्ट पार्क के तौर पर आकर्षण का एक और केन्द्र हो जायेगा। राजे ने इस पर सहमति जतायी और जाते हुए इसकी घोषणा भी की—लेकिन जयपुर पहुंच कर इसका फोलोअप वे भूल गयीं।

उसी मुलाकात में राजे से जो अन्य बात हुई उसमें कोटगेट क्षेत्र की यातायात समस्या के एकमात्र व्यावहारिक समाधान एलिवेटेड रोड पर भी मेरी बात हुई थी, राजे यह घोषणा करके गयीं कि आरयूआईडीपी द्वारा बनाई गयी योजनानुसार मार्च, 2015 तक इसका शिलान्यास करने वे खुद आएंगी। लेकिन हुआ यह कि बीकानेर पश्चिम के विधायक और अब दिवंगत गोपाल जोशी को उस पर इसलिए एतराज था कि एलिवेटेड रोड उनके व्यावसायिक प्रतिष्ठान के ठीक सामने उतर रही थी। इस कारण यह योजना भी ठण्डे बस्ते में चली गयी।
सूरसागर का तो जो होगा वह होगा, उससे अब किसी को सीधे परेशानी नहीं है। लेकिन कोटगेट क्षेत्र की यातायात समस्या से शहर के लाखों बाशिन्दे परेशान हैं और शहर नुमाइंदे इस पर गंभीर नहीं हैं। बीकानेर पूर्व की विधायक सिद्धिकुमारी को चुनाव जीतने के अलावा कोई लेना-देना शहर की समस्याओं का कभी रहा ही नहीं तो उनसे उम्मीद क्या करें। लेकिन बीकानेर पश्चिम विधायक डॉ. बी डी कल्ला जब-तब शहर हित के दावे करते रहते हैं तो उम्मीद उन्हीं से रख सकते हैं। कल्ला अब तक इस समस्या के समाधान के तौर पर बायपास की जिद्द पकड़े बैठे हैं, और शायद समझना चाहते भी नहीं हैं। एलिवेटेड रोड जैसे व्यावहारिक समाधान को नजरअंदाज कर दूसरे-दूसरे समाधानों पर समय जाया कर रहे हैं। बीते एक वर्ष से उन्होंने नगर विकास न्यास को आरयूबी (रेल अण्डरब्रिज) योजना पर लगा रखा है। योजना जैसी-तैसी बनी भी, लेकिन अपनी हाल ही की इस यात्रा में धारीवाल उसे अव्यावहारिक बता खारिज कर गये हैं। धारीवाल को इससे ज्यादा मतलब भी नहीं है। कल्ला के पास अब दो वर्ष भी नहीं बचे हैं। वे चाहें तो 6 फरवरी, 2020 को इस समस्या पर उन्हें लिखे मेरे उस पत्र को पढ़ सकते हैं जिसमें इसके समाधान से संबंधित सभी विकल्पों का विस्तार से उल्लेख है। वे चाहेंगे तो उस पत्र की प्रति मैं पुन: उपलब्ध करवा सकता हूं। शहर की जनता इस समस्या से बीते चार दशकों से भी ज्यादा समय से त्रस्त है।

यातायात संबंधी ऐसी ही समस्याओं के समाधान के लिए जोधपुर और अजमेर में एलिवेटेड रोड बीच बाजार में बन रहे हैं और हम हैं कि उस एक मात्र व्यावहारिक समाधान से बिदकते रहते हैं। हमारे नुमाइंदों की सकारात्मक सोच होती तो 2006-07 में जब यह योजना बनी तभी काम शुरू हो जाता तो 2009-10 तक शहरवासी सुकून से आवागमन करते। लगता तो नहीं है कल्ला इस पर तत्पर होंगे लेकिन मेरा धर्म अवगत करवाते रहना है, सो बार-बार करवाता रहा हूं ओर आगे भी करवाता रहूंगा।
―दीपचन्द सांखला
5 अगस्त, 2021

Wednesday, July 21, 2021

पाती देवीसिंह भाटी के नाम

मान्य देवीसिंहजी!

आपातकाल के दौरान 1977 के लोकसभा चुनावों में आपको जब पहले-पहल देखा, तब मैं 18 वर्ष का भी नहीं हुआ था। बीकानेर लोकसभा क्षेत्र से हरिराम मक्कासर जनता पार्टी से उम्मीदवार थे। इन चुनावों में जनता में जैसा उत्साह था वैसा माहौल उससे पहले (1967 से चुनावी राजनीति में सक्रिय हूं) और आज तक किसी चुनाव में नहीं देखा। 

तब का वह दृश्य याद है जब दिनभर घूम-घुमाकर शाम को डागा बिल्डिंग पहुंचते और पांच नम्बर से लेकर नीचे सड़क तक खड़े समूहों से फीडबैक सुनते और खुश होते। उन्हीं चर्चाओं में सर्वाधिक जिस नाम की चर्चा होती वह देवीसिंह भाटी था। बिना हुड की जीप में शाम और देर शाम जब भी आप डागा बिल्डिंग पहुंचते-हमारे जैसे कई नवयुवा घेर लेते और पूछते—क्या रिपोर्ट है। आप इतना ही कहते...बढिय़ा और मुख्य चुनाव कार्यालय की ओर चल देते। नायक सी वह छवि स्मृतियों में आज भी कहीं अंकित है।

अभी पत्र लिखने का हेतु इसलिए बना कि इन दिनों आपने बीकानेर शहर से लगती ओरण (गोचर) को बचाने का बीड़ा उठाया है। इस लंबी-चौड़ी ओरण को बचाने के लिए बनवाई जा रही चारदीवारी इस काल में छोटे-मोटे भागीरथी प्रयास से कम नहीं है। इसे आप पूर्ण करवा देंगे तो महानगरीय शब्दावली में यह ग्रीन जोन कहलायेगा।

यह काम शुरू हो गया और आपकी देख-रेख में हो रहा है तो पूरा होगा ही। मेरे इस पत्र के प्रयोजन इतना ही महत्त्वपूर्ण माने या इससे ज्यादा, यह तय आपको करना है। वह प्रयोजन है—कोलायत के कपिल सरोवर के पौराणिक वैभव को लौटाने का। इसके एक सोपान के तौर पर जलकुम्भी हटाने का काम आपने कुछ वर्ष पूर्व करवाया था। यह बात अलग है कि सरोवर में जलकुम्भी फिर लौट आयी, किन कारणों से लौटी, विशेषज्ञों की राय से उसे तो हमेशा के लिए हटाना ही है। अन्य जो काम हैं सरोवर की आगोर को बचाना और उसके 52 घाटों का जीर्णोद्धार करवाना। घाटों का जीर्णोद्धार तो आपके लिए बड़ा काम नहीं है लेकिन आगोर को सुरक्षित रखना और हमेशा के लिए सुरक्षित रखना-रखवाना बड़ा काम है।

इसके लिए आपको न केवल अपनी सामाजिक हैसियत का उपयोग करना होगा बल्कि अपनी राजनीतिक हैसियत का उपयोग भी करना होगा। इस आर्थिक युग में धन के भूखों का राम होठों तक ही है—हिये तक नहीं। अन्यथा धन के ये भूखे कम से कम कोलायत सरोवर के आगोर क्षेत्र को तो अवैध खनन से मुक्त रखते। सरकारी मुलाजिमों से आगोर क्षेत्र में खनन पट्टे जारी भी हो गये हैं तो उन्हें रद्द करवाना और यह जाप्ता करना भी जरूरी है कि भविष्य में यह भूल दोहराई न जाए। आप मुनादी करवा देंगे तो पूरा भरोसा है कि आगोर के उस क्षेत्र में अवैध-खनन का काम रुक जायेगा। एक और प्रयास क्षेत्र के प्राकृतिक सौंदर्य को लौटाने का है। खनन के ओवर बर्डन से निकली मिट्टी से बने डूंगर न केवल आगोर के बहाव क्षेत्र में बाधा हैं बल्कि क्षेत्र पर बदनुमा दाग भी हैं। यह काम होगा कैसे—मुझे अनुमान नहीं है, लेकिन होना जरूरी है। आगोर क्षेत्र में खनन से जो गहरे गड्ढे बन गये उन्हें इस ओवर बर्डन से बुरवाया जा सकता है। यह काम कम अर्थ-साध्य नहीं है, मोटे बजट की जरूरत होगी। आप मन बना लेंगे तो यह सब व्यवस्था भी आप संभव करवा लेंगे। ऐसा मानना मेरा ही नहीं है, उनका भी है जो आपको अच्छे से जानते-समझते हैं।

इस बड़े काम को करने का मन बनाना आसान नहीं। कितने संसाधन जुटाने होंगे मुझे पता है। लेकिन देवीसिंह भाटी के सामथ्र्य का भी पता है कि वे मन बना लेंगे तो इस वय में कर गुजरेंगे और सार्वजनिक इतिहास में उनको इन कार्यों के लिए भी याद किया जायेगा। उम्मीद करता हूं कि इस अनुष्ठान को पूर्ण करवाने के लिए व्यवस्थित कार्य योजना की घोषणा शीघ्र ही करेंगे। अग्रिम आभार।

―दीपचन्द सांखला

22 जुलाई, 2021

Thursday, July 15, 2021

मोदी-शाह के विकल्प की बात

भारतीय लोकतंत्र के लिए यह शुभ संकेत है कि मोदी-शाह के विकल्प की चर्चा पिछले डेढ़-दो वर्षों से होने लगी है। यद्यपि ऐसी चर्चा फिलहाल राजनीतिक विश्लेषकों, पत्रकारों और जागरूक नागरिकों तक ही सीमित हैं। जबकि डेढ़-दो वर्ष पूर्व तक ये भी स्तब्ध थे। बेहतर होता विपक्षी दलों के बीच भी इस तरह की कवायद होती, राजनीतिक विश्लेषक प्रशान्त किशोर बीच में इस हेतु जरूर सक्रिय दिखे। इस पर उनकी फिलहाल की निष्क्रियता रणनीतिक है या निराशा-जनित, पता लगना है।
बेहतर और भी तब होता जब विकल्प की बात भारतीय जनता पार्टी के भीतर से भी उठती—इस उम्मीद की वजह इतनी ही है कि भाजपा संवैधानिक लोकतंत्र में पंजीकृत दल है। अन्यथा उसके पितृ संगठन और खुद उसकी अघोषित विचारधारा के मद्देनजर ऐसी उम्मीद पालना निराश होना है। क्योंकि संघ और उसके अनुगामी संगठनों का विश्वास जब लोकतंत्र में ही नहीं है तो इनसे संविधान में आस्था की उम्मीद कैसी? इसीलिए संघानुमार्गी जिसमें भी निष्ठा व्यक्त करते हैं, मान लें यह उनका उपयोग मात्र कर रहे होते हैं।
जागरूक नागरिकों में से अनेक विकल्प की उम्मीदों के साथ कांग्रेस को कोसने लगे हैं। कोस इसलिए रहे हैं कि उन्हें कांग्रेस के अलावा राष्ट्रीय स्तर पर कोई विकल्प सूझ नहीं रहा, और इसलिए भी कि कांग्रेस उस तरह से विरोध पर उतारू नहीं दिख रही कि जनता उसे मोदी-शाह के विकल्प के तौर पर स्वीकार करने लगे। सरसरी तौर पर देखें तो माजरा यही है। लेकिन क्या सच में ऐसा है? नहीं। दरअसल आजादी के बाद पहली बार ऐसा है कि अंधभक्ति में ग्रस्त जनता के बड़े हिस्से के मन को (इसे हिप्नोसिस या सम्मोहन की अवस्था भी कह सकते हैं) झूठ, भ्रम और ढोंग से बांध दिया गया है, ये सम्मोहित समूह सच्चाई जानना ही नहीं चाहता बल्कि आगाह करने वाले पर उलट प्रतिक्रिया देने लगता है। ऐसी स्थितियों में कोई भी दल आगे कर दें या कैसा भी व्यक्तित्व खड़ा कर दें, उसे ये स्वीकारेंगे ही नहीं।
फिलहाल यह मानना कि कांग्रेस या उसके किसी नेता को विकल्प के तौर पर स्वीकारा जाएगा, जमता नहीं है।
ऐसे में हो क्या सकता है? या तो मोदी-शाह से ऊपर का कोई मजमेबाज और धूर्त आए, जो इनके सिर बांधने जैसा हो। विकल्प की ऐसी ही उम्मीद करनी है तो फिर इन्हीं को बरदाश्त क्यों नहीं करें, इनके विकल्प के तौर पर इनसे बदतर क्यों। और यदि विकल्प के तौर पर कोई भला या कम-से-कम इनसे तो भला हो—आये तो इसके लिए जनता को ही अपने विवेक को जगाकर मन बदलना होगा। बेहतर विकल्प की जरूरत महसूस करनी होगी। इसके लिए पहले तो बहुसंख्यकों को इस भ्रम से निकलना होगा कि उनके धर्म पर कोई खतरा है। और इससे भी कि धर्म को बचाने के लिए हम कुछ भी कुर्बान करने को तैयार हैं। ऐसा होगा तभी जब हम अपनी असली जरूरतों को समग्रता से समझेंगे। ऐसा होगा तभी सत्ता में वैकल्पिक दल की उम्मीदें पाल सकेंगे, जब तक ऐसा नहीं होगा—तब तक हमें यूं ही भुगतना होगा। एक भारतीय नागरिक के तौर पर कितना कुछ हमने खो दिया और क्या कुछ खो देंगे, इसकी कल्पना मात्र सिहराने लगती है, ऐसी अनुभूति के लिए हमें जागरूक नागरिक होना होगा। सभी इस तरह का मन बनाएं, जरूरी नहीं। कम-से-कम एक बड़े जनसमूह को हिप्नोसिस से-सम्मोहन से बाहर आने की जरूरत है।
(कुछ राज्यों में आ रहे बदलावों से उम्मीदें न पालें, उनके बदलावों की वजह स्थानीय हैं।)
—दीपचन्द सांखला
15 जुलाई, 2021

Thursday, July 1, 2021

नाथी का बाड़ा, घर जाने का निर्देश और कल्ला कांग्रेस बनाम शहर कांग्रेस

राजस्थान की राजनीति के दोनों मुख्य दलों में सब कुछ ठीक नहीं है। भाजपा में हाइकमान की हेकड़ी की वजह से तो कांग्रेस में हाइकमान के अनिर्णय की मानसिकता से। राजस्थान में तीसरे मोर्चे की चर्चा जरूर होती है, लेकिन उनके पास ऐसा कोई नेता नहीं है जिसकी स्वीकार्यता समग्र राजस्थान में हो। 

इस तरह राजस्थान की राजनीति फिलहाल मोटामोट दो ही दल हैं, कांग्रेस और भाजपा। वर्तमान सिनेरियो में भाजपा के पास वसुंधरा राजे का कोई विकल्प बनता दिख नहीं रहा है तो कांग्रेस में सचिन पायलट अपनी हड़बड़ी के चलते अशोक गहलोत का विकल्प बनते-बनते भटक गये। इस भटक से उनमें उपजी कुण्ठाओं ने जहां पार्टी में उनकी स्वीकार्यता को और भी कम कर दिया वहीं इस घटनाक्रम से पार्टी और सरकार का कामकाज भी प्रभावित हो रहा है। 

आज बात कांग्रेस की करेंगे। प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष, शिक्षामंत्री और बीकानेर जिलाप्रभारी मंत्री गोविन्दसिंह डोटासरा पिछले दिनों बीकानेर में थे। डोटासरा उन कांग्रेसी नेताओं में से हैं, जो मीडिया के साथ सोशल मीडिया को सुर्खियां देते रहते हैं। कुछ माह पूर्व नाथी के बाड़े का उल्लेख कर चर्चा में आये डोटासरा ने मंत्रिमण्डलीय बैठक के बाद चर्चा तब भी बटोरी जब मुख्यमंत्री की उपस्थिति में मंत्रिमंडल में असल दो नम्बर शान्ति धारीवाल से जब उलझे तो धारीवाल ने झिड़क दिया। धारीवाल की हेकड़ी इसलिए भी चुलती है कि वे पार्टी के लिए दूझती गाय है। नम्बर दो में असल का उल्लेख इसलिए करना पड़ा क्योंकि हमारे इधर बीडी कल्ला को नम्बर दो कहा जाता है। 

डोटासरा अभी जब बीकानेर आये तो वे मोर-पांख का झाड़ू बीकानेर के सभी नामी नेताओं के सिर पर रखने में चूके नहीं। बीडी कल्ला, रामेश्वर डूडी, वीरेन्द्र बेनीवाल, मंगलाराम गोदारा आदि सभी की मिजाजपुर्सी की बल्कि भंवरसिंह भाटी को तो विनायकजी की तरह साथ ही रखा। अपनी इस बीकानेर यात्रा में भी सुर्खियां जाने-अनजाने वे दे ही गये। कल्ला-कांग्रेस की और से कल्ला परिवार के राजनीतिक वारिस होने का मन बनाये अनिल कल्ला के पक्ष में जब 100 से अधिक कल्ला-कांग्रेसियों ने अनिल कल्ला को शहर अध्यक्ष बनाए जाने की लिखित पैरवी की तो डोटासरा यह बोले बिना नहीं रह सके कि मैं इसके मानी अच्छे से समझता हूं।
लेकिन ज्यादा सुर्खियां बटोरी निगम पार्षद अंजना खत्री ने। अंजना खत्री कांग्रेस की ओर से महापौर की उम्मीदवार थीं और गोटियां सही बैठ गयी होतीं तो सुशीला कंवर की जगह महापौर वह ही होतीं। महापौर नहीं बनी तो नहीं बनी, नेता प्रतिपक्ष भी वह अभी तक नहीं बन पा रही हैं। क्योंकि सूबे की सरकार और संगठन बीते डेढ़ वर्ष से दो बड़े मोर्चे को संभालने में ही लगे हैं। पहला भाजपा की शह से मोर्चें पर डटे सचिन पायलट के विद्रोह के चलते तो दूसरा महामारी कोरोना से। डोटासरा बीकानेर आये तो अंजना ने मिलकर निगम में नेता प्रतिपक्ष की नियुक्ति की मांग रखी। खीज में या स्वभाव के चलते डोटासरा ने झिड़कते हुए अंजना को यह कह दिया तुम अपने घर जाओ। उम्रदराज अंजना को संभवत: दो वजह से बुरा लगा हो—एक तो वे उम्र में डोटासरा से काफी बड़ी हैं दूसरा वह सक्रिय महिला हैं। अंजना को यह भी लगा होगा कि वह स्त्री है इसलिए उसे घर में बैठने की हिदायत दी जा रही है। अंजना ने भी पलट कर तैश में आकर जवाब दे दिया—मैं तो अपने घर (बीकानेर) में ही हूं, घर जायें आप। सामान्यत: शीर्ष के नेता कार्यकर्ताओं की ओर से इस तरह के जवाब सुनने के आदि नहीं होते हैं। फिर सोचा होगा जैसा दिया वैसा कभी-कभी झेलना भी पड़ सकता है। हालांकि बाद में अंजना खत्री ने सफाई देकर 'डेमेज कंट्रोल' की कोशिश जरूर की।

बीकानेर शहर कांग्रेस की राजनीति में दूसरी उल्लेखनीय घटना यह हुई कि पुराने कांग्रेसी नेता गुलाम मुस्तफा बाबूभाई की अगुआई में कांग्रेसियों ने डोटासरा के सामने मांग रखी कि बीकानेर शहर कांग्रेस की विधानसभा क्षेत्रवार पूर्व और पश्चिम की दो अलग-अलग शहर ईकाइयां होनी चाहिए। होगी कि नहीं, बाद की बात है लेकिन इतना पक्का है कि शहर कांग्रेस को कल्ला-कांग्रेस से मुक्त करवाने की लड़ाई स्थानीय कांग्रेसी हार चुके हैं। दो ईकाइयां होती भी हैं तो इसके लिए कल्ला-कांग्रेसियों की मौन स्वीकृति इसलिए भी मिल सकती है कि यदि ऐसा होता है तो वे अपनी दुकान निर्बाध चला सकेंगे। अन्यथा स्थानीय कांग्रेसी कुचरणी ज्यादा चाहे न कर पाएं, सिचले तो नहीं बैठने वाले। खैर, आसान न बीकानेर शहर अध्यक्ष की नियुक्ति है और न दो अलग-अलग ईकाइयां बनना, देखते जाओ आगे-आगे होता है क्या।

डोटासरा को लम्बी पारी खेलनी है तो बजाय मुखर होने के, घुन्ना होना और सावचेती से चलना बेहतर होगा अन्यथा नारायणसिंह, रामेश्वर डूडी, चन्द्रभान, बीडी कल्ला, जैसे पार्टी में लगभग शीर्ष हैसियत तक पहुंच कर फिसले हैं।
—दीपचन्द सांखला
30 जून, 2021

Saturday, June 12, 2021

रास्ता और रेल रोको आंदोलन

राजेन्द्र राठौड़ की गिरफ्तारी के बाद उनके हितचिन्तकों और जिनके हितसाधक राठौड़ रहे हैं, उन लोगों ने विरोध स्वरूप कल सड़कों पर आवागमन रोका और चूरू में रेलगाड़ी भी। राठौड़ चूरू जिले से नुमाइंदगी करते हैं, जाहिर है उनके हितचिन्तक और उनसे लाभान्वित वहीं ज्यादा होंगे। इसीलिए चूरू जिले में उद्वेलन कुछ ज्यादा रहा। प्रदेश में और भी कई जगह इस तरह के छुटपुट प्रदर्शन हुए हैं।

कल बीकानेर शहर में भी नयी गजनेर रोड पर कुछ देर तक रास्ता रोका गया–सूचना है कि उस समय तीन ऐंबुलेंस भी इस रास्ता रोको की शिकार हुईं―उन ऐंबुलेंस में ऐसे रोगी थे जिन्हें तत्काल विशेषज्ञ-डाक्टरों की सेवाओं की जरूरत थीं। आन्दोलनकर्ताओं को इसकी सूचना भी दी गई, लेकिन उन्होंने इसे गम्भीरता से नहीं लिया। कल ही जब चूरू में यही सब हो रहा था तब विरोध पर उतरे लोगों ने सरायरोहिल्ला-बीकानेर रेलगाड़ी को रोकने की कोशिश की―नहीं रोक पाने पर उन्होंने रेलगाड़ी पर पत्थरबाजी की। यह सब विरोध के नाम पर अब आम होने लगा है। कुछ माह पहले भी जब महिपाल मदेरणा और मलखानसिंह की गिरफ्तारी हुई तो इसी तरह से विरोध प्रदर्शन हुए।

राजेन्द्र राठौड़ सचमुच आरोपी हैं तो थोड़े दिनों बाद उनके समर्थक शांत होने लगेंगे और नहीं हैं तो सीबीआई ज्यादा दिन उन्हें अन्दर नहीं रख पायेगी। हमारे कानून की चाल कछुवा जरूर है-अचल नहीं।

रेलगाडिय़ां और सड़कें रोकना अब विरोध की अभिव्यक्ति मान ली गई है―बिना यह जाने कि इस तरह से हम कितनों की जान से खेल रहे हैं और अगर कोई युवा अपने कॅरिअर बनाने के अवसर को हासिल करने निकला है तो उसके पेशेवर जीवन को ताक पर रखने की गलती भी कर रहे होते हैं, अब ऐसे अवसर वैसे ही बहुत सीमित हो गये हैं। कल के गजनेर रोड के रास्ता रोको में दो प्रसुताएं कराह रही थीं। उनके या उनके नवजात के साथ कुछ भी हो सकता था। इस तरह के विवेकहीन विरोधों में लगे सभी से निवेदन है कि वह इतना तो विचारें कि इन रेलों को और सड़कों को रोकने से आपका भी कोई प्रिय और परिजन किसी बड़ी तकलीफ में आ सकता है।

लोकतंत्र में प्रत्येक को अपनी बात कहने का हक हासिल है―किसी को यह लगता है कि उनके साथ या उनके किसी स्नेहीजन के साथ अन्याय हो रहा है तो उन्हें विरोध के और ध्यानाकर्षण के ऐसे उपाय काम लेने चाहिए जिससे किसी अन्य के हकों और महती जरूरतों में व्यवधान ना आये। किसी का हक मार कर, असुविधाओं में धकेल कर या किसी की जान जोखिम में डाल कर अपने हक हासिल करना चाहेंगे तो इस तरीके के शिकार कभी आप भी हो सकते हैं।

इस तरह की समझाइश पर यह जवाब आम होता है कि इसके बिना सुनवाई नहीं होती है। अगर ऐसा है, और देखा भी गया है कि है भी तो इसके लिए भी आप और हम ही दोषी हैं। इस व्यवस्था को हम पर किसी ने थोपा नहीं है, और प्रति पांच वर्ष बाद इस तरह की व्यवस्था को अगले और पांच और वर्ष के लिए हम ही स्वीकार करते हैं। राज किसी भी पार्टी का रहा हो, व्यवस्थाएं यूं ही चल रही है। यह न केवल बद से बदतर हो रही है बल्कि जिन्दगी की मुश्किलें भी लगातार बढ़ती जा रही हैं।

कल फिर शहर में बन्द का आह्वान है। आह्वानकर्ताओं से यह उम्मीद है कि अपने इस बन्द से आवश्यक सेवाओं को छूट दें,  सड़कें और रेलें आवश्यक सेवाओं में ही आती हैं।

इस तरह के आंदोलनों के पीड़ितों से भी उम्मीद की जाती है कि वह अपनी पीड़ा टीवी और अखबारों के माध्यम से जाहिर करें ताकि समाज में संवेदनशील समझ विकसित हो सके।

―दीपचंद सांखला
7 अप्रेल, 2012

Friday, June 11, 2021

प्रकोप में पुलिस

परसों बुधवार की घटना है, म्यूजियम तिराहे पर होमगार्ड का एक सिपाही ड्यूटी पर था। जीप चलाते हुए मोबाइल पर बात करते एक चालक को जब उसने टोका तो चालक को इतना नागवार लगा कि उसने होमगार्ड के जवान की न केवल पिटाई कर दी बल्कि उसका कान चबा कर लहूलुहान भी कर दिया। जीप चालक की हेकड़ी इतने भर से संतुष्ट नहीं हुई, वह सरिया लेकर और सबक सिखाने तक को आतुर हो गया, ताकि वह होमगार्ड का वह जवान भविष्य में किसी अन्य के साथ इस तरह ड्यूटी ना निभाए।

9 फरवरी को सादुलसिंह सर्किल का एक दृश्य। इसी दिन यातायात पुलिस ने महात्मा गांधी रोड पर सादुलसिंह सर्किल तक इकतरफे यातायात की नई व्यवस्था लागू की थी। यातायात निरीक्षक (टीआई) स्वयं सर्किल पर तैनात थे। बावजूद इसके एक ऑटोचालक ने व्यवस्था के उल्लंघन की जुर्रत की। जब टीआई ने उस पर कार्यवाही के आदेश दिये तो ऑटोचालक का दुस्साहस देखिए, उसने अपने किसी निर्भयकर्ता 'आका' को मोबाइल लगा टीआई से कहने लगा, 'लो, बात करो।'

एक और घटना का जिक्र करना जरूरी है। लगभग एक वर्ष पहले की बात है, तौलियासर भैरूं मन्दिर चौराहे पर तब ऑटोरिक्शा अनधिकृत और बेतरतीब खड़े रहा करते थे, किसी की भी नहीं सुनते। ट्रैफिक पुलिस ने एक महिला सिपाही की वहां ड्यूटी लगा दी, यह जानते हुए भी कि वहां के ये ऑटोरिक्शा वाले पुरुष कांस्टेबल के भी ताबे नहीं आते। वह महिला सिपाही दो-तीन दिन में ही इन ऑटोरिक्शा वालों से इतनी कुंठित हुई कि एक ऑटोरिक्शा के कांच (विंड स्क्रीन) पर डंडा दे मारा। कांच टूट गया। हालांकि महिला सिपाही की यह कार्यवाही गलत थी लेकिन ऑटोरिक्शा वाला भी क्या सही था? ऑटोरिक्शा वालों को यह कैसे बर्दाश्त होता, वे तो पुरुष सिपाहियों को भी दिन में कई-कई बार आईना दिखाते रहते हैं, एक महिला सिपाही को इस तरह कैसे बर्दाश्त करते—हड़ताल कर दी—तब के पुलिस अधीक्षक ने भी खुद को बिना रीढ़ के होने का प्रमाण दिया—उस महिला सिपाही से उस ऑटोरिक्शा वाले से रू-बरू माफी मंगवाई। पुलिस अधीक्षक ने वस्तुस्थिति जानते हुए भी ऐसा करवाया जो उस महिला सिपाही के लिए ही नहीं पूरे पुलिस महकमे के लिए हतोत्साही करने वाला था। ऐसी परिस्थितियों में इन पुलिस वालों से हम कैसी उम्मीद कर सकते हैं!

इन तीन घटनाओं का उल्लेख यहां यह बताने के लिए किया गया कि पूरे पुलिस महकमे को विभिन्न सत्तारूपों ने किस तरह से पंगु बना दिया है—यह सत्तारूप नेताओं के रूप में, यूनियन के रूप में और अब तो एक और सत्तारूप शालीनता से आवृत पत्रकारों की हमारी जमात का भी है। हमारे पत्रकार भी सिपाहियों से मोबाइल पर किसी को छोड़ने का आग्रह करते देखे जा सकते हैं—हालांकि पत्रकारों का स्वर शालीन होता है। नेताओं के स्वर में अकसर जो हेकड़ी देखी जाती है—वह पत्रकारों में अभी नहीं आई है। यानी जिस किसी के पास भी किसी पावर का दावं है, वह उसे लगाने से नहीं चूकता।

उस जीप चालक को किसी अपने 'आका' का जोम था, तभी उसने उस होमगार्ड को सबक सिखाने की ठानी। अब उस होमगार्ड के सिपाही को पुलिस से और अपने होमगार्ड के साथियों से यह नसीहत दी जा रही होगी कि ड्यूटी पर चुपचाप खड़े क्यों नहीं रहते—किसी से उलझना जरूरी है क्या?
9 फरवरी की घटना में भी जरूर उस ऑटोचालक को उसके आका ने नसीहत नहीं दे रखी होगी कि सिपाहियों को तो मेरे फोन का डर दिखा दिया कर—अफसरों को नहीं।

अपराधी या अनियमितता करने वालों में से जिस किसी के पास भी दावं बड़ा होता है, वह अपनी पावली चलाता ही है—लेकिन मदेरणा, मलखान, राठौड़, एडीजे एके जैन, आईजी पोन्नूचामी, एएसपी अरशद को सीखचों के पीछे देखकर इतना तो समझ लेना चाहिए कि न्याय के घर देर भले ही हो, अंधेर नहीं है। जरूरत दृढ़ इच्छा-शक्ति के साथ न्याय के घर का लगातार दरवाजा खटखटाते रहने की है।

—दीपचंद सांखला
6 अप्रेल, 2012

'खलनायक' अशोक गहलोत

भारतीय मन में रचे-बसे दो महाकाव्य रामायण और महाभारत, दोनों अतुलनीय। लोक में इन दोनों के ही सैकड़ों रूप मिलते हैं। जीवन के अनगिनत आयामों को बारीकी से समझाने में सक्षम इन दोनों ही महाकाव्यों के मुख्यपात्रों को आधुनिक सिनेमाई अन्दाज से देखें तो नायक की उपस्थिति इन दोनों में मिलती है। रामायण में नायक के रूप में राम और खलनायक के रूप में रावण हैं तो महाभारत में यह बड़ा गड्ड-मड्ड है―वहां नायक केवल कृष्ण हैं और सभी पात्रों को कहीं न कहीं खलनायकी के कठघरे में खड़ा पाते हैं, कहीं-कहीं कृष्ण को भी।

वर्तमान राजनीति को देखें तो महाभारत की तर्ज पर कोई भी पात्र यहां भी खलनायकी से अछूता नहीं है। चूंकि आज के इस ‘महाभारत’ को रचने वाले ॠषि वेदव्यास नहीं है तो कृष्ण के रूप में कोई नायक भी नहीं है। इसलिए कोई राजनेता अपने को नायक साबित करता तो नहीं दिखता पर अपने बरअक्स अन्य को खलनायक साबित करने की जुगत में जरूर लगा मिलेगा, गोया बरअक्स शख्सियत को खलनायक साबित करना ही अपने को नायक साबित करना है।

हमारे बीकानेर में भी यह प्रपंच बदस्तूर जारी है। यहां यह प्रयास लगातार जारी रहता है कि बीकानेर के विकास में सबसे बड़ी बाधा अशोक गहलोत हैं―इसमें विपक्षियों से ज्यादा कांग्रेसियों की सक्रियता अधिक दिखाई देती है। अशोक गहलोत को खलनायक के तौर पर स्थापित कर देने भर से यहां के राजनेताओं और जनप्रतिनिधियों की बहुत-सी मुश्किलें आसान हो जाती हैं और उनकी अक्षमताओं को आड़ भी मिल जाती है।

राज्य के इस वर्ष के बजट को ही लें, मुख्यमंत्री ने छः विश्‍वविद्यालयों की घोषणा की है, बीकानेर का नाम उनमें नहीं था। लेकिन जब बीकानेर के लिए वेटेनरी विश्‍वविद्यालय की घोषणा की गई तब किसी अन्य संभाग के लिए ऐसी कोई घोषणा नहीं थी, यह ना तो कांग्रेस के नेता बताते हैं और ना ही मीडिया इसका उल्लेख करता है। हां, मीडिया नागौर के लिए की गई घोषणाओं को जोधपुर के खाते में जरूर डाल देगा, यह बिना जाने कि नागौर, अजमेर संभाग में है। 

केन्द्रीय विश्‍वविद्यालय का उलाहना मुख्यमंत्री को हमेशा रहेगा―विजयशंकर व्यास कमेटी की सिफारिश के बावजूद उसे अजमेर को दे दिया जाना बीकानेर के साथ अन्याय है। केन्द्रीय विश्‍वविद्यालय की इस घोषणा में क्या दाबा―चींथी नहीं हुई–इसको इस तरह भी कह सकते हैं कि सचिन पायलट के सामने हमारे दिग्गज बालक हो लिए।

हमारे नेताओं ने कभी इस पर चिन्तन किया कि यहां के इंजीनियरिंग कॉलेज की जिस तरह की प्रतिष्ठा लगभग पांच वर्ष पहले थी, वैसी अब क्यों नहीं है? या यह कि उसका स्तर लगातार क्यों गिरता जा रहा है―इस तरह के कॉलेजों की प्रतिष्ठा प्लेसमेंट के लिए वहां पर आने वाली कम्पनियों और उनके द्वारा दिए जाने वाले मोटे पैकेज से तय होती है। बीकानेर का इंजीनियरिंग कॉलेज किस तरह की राजनीति का शिकार हो रहा है?

गंगासिंह विश्‍वविद्यालय आज भी किस हैसियत में है―यहां के नेताओं ने उसके लिए क्या प्रयास किये। अगर सचमुच किये हैं तो उनका रंग दिखाई क्यों नहीं दे रहा।

सरदार पटेल मेडिकल कॉलेज में डॉक्टरों के कितने पद खाली हैं, तकनीकी स्टाफ के कितने और अन्य कर्मचारियों के कितने पद भरे नहीं जा रहे हैं। इसकी जवाबदेही अशोक गहलोत से ज्यादा यहां के नेताओं की बनती है, उन्होंने इसके लिए अब तक क्या प्रयास किये हैं।

यहां के सरकारी स्कूलों और सरकारी कॉलेजों में कक्षाएं नियमित नहीं लगती हैं। आज से नहीं पिछले बीसेक वर्षों से स्थितियां बद से बदतर होती जा रही हैं। क्या यह स्थानीय नेताओं की जिम्मेदारी में नहीं आता है कि इन स्थितियों को दुरस्त करवाएं। ना पुलिस महकमे में सिपाही पूरे हैं और ना ही ट्रैफिक पुलिस के पास। इन पदों को भरवाना तो दूर, उलटे पुलिस वालों का मनोबल गिराने को ये नेता नाजायज कामों के लिए दिन में कितने फोन करते हैं―इसकी सूचना तो किसी भी अधिकार के तहत हासिल नहीं की जा सकती।

रेल बायपास एक ऐसा मुद्दा है जिससे इस बीकानेर शहर का कोई भला नहीं होने वाला―इसके बावजूद यहां के नेता इस लॉलीपॉप को न छोड़ने की जिद पर अड़े हैं। 
यह भी कि देश में कहीं रेल बायपास इस बिना पर बनने का कोई उदाहरण है कि रेल लाइन शहर के बीच आ गयी है। रेल फाटकों की समस्या का समाधान रेल ओवरब्रिज-रेल अन्डरब्रिज और एलिवेटेड रोड ही हैं–यहां कि नुमाइंदगी करने वालों से विनम्र अनुरोध है कि अपने तुच्छ स्वार्थों को साधने के वास्ते जनता को गुमराह ना करें।

अशोकजी! बीकानेर में लम्बे समय से पुलिस अधीक्षक नहीं है, माध्यमिक शिक्षा आयुक्त नहीं है, पीबीएम अस्पताल में अधीक्षक नहीं है। मेडिकल कॉलेज, इंजीनियरिंग कॉलेज और डूंगर कॉलेज में प्रिंसिपल नहीं है। यह जानते हुए भी कि आपको सात संभागों के तैंतीस जिलों को देखना होता है―लेकिन फिर भी किसी संभाग या जिले पर ध्यान देने का नम्बर कभी तो आना चाहिए! कहा भी गया है कि शासक न्यायप्रिय हो इतना ही काफी नहीं है, न्याय होता दिखना भी चाहिए।
―दीपचंद सांखला
3 अप्रेल, 2012

कर्मचारी ईमानदार भी और रिश्वतखोर भी

बीकानेर के केन्द्रीय कारागार में सेवारत प्रहरी निहालचन्द कल जब रिश्‍वत लेते धरे गये तो उन्होंने बताया कि इस जेल में पैसे देने पर सब कुछ हासिल हो सकता है। कुंठित स्वरों में निहालचन्द ने जो कुछ बताया उन सूचनाओं की वाकफियत शहर के कई लोगों को है। इन कई में वे भी शामिल हैं जिनकी जिम्मेदारी ही है कि जेल में कैदियों को सबकुछ हासिल ना होने दें। अपने सजग होने का दम भरने वाले अधिकतर पत्रकारों को, जिला प्रशासन को, पुलिस महकमे को, कोर्ट-कचहरी में होने वाली हथाइयों में शामिल होने वालों को भी यह जानकारियां रहती हैं। जिनके मित्र-परिजन जेल में कभी रहे हैं या इन दिनों हैं―उन्हें तो इन सबका ज्ञान सांगो-पांग हो जाता है। यह भी नहीं कि जेल-कर्मचारियों में निहालचन्द पहली बार धरे गये हैं, अपने राजस्थान में तो जेल अधीक्षक तक रिश्‍वत लेते धरे गये हैं। कल निहालचन्द धरे गये―क्या कोई भी यह गारंटी ले सकता है कि बीकानेर जेल में कोई अवैध लेन-देन कम से कम आज तो नहीं हुआ होगा? शायद नहीं। अन्य कोई सरकारी कार्यालय इससे अछूता नहीं है। सरकारी ही क्यों, बड़ी निजी कंपनियों के कार्यालयों में भी रिश्‍वत के लेन-देन के बारे में सुना जाने लगा है। जबकि ईमानदार कर्मचारियों से तो यह भी सुना गया है कि छठे वेतन के बाद तो सरकार इतना देने लगी है कि खाये-ओढ़े खूटता ही नहीं है।

इस विषय को उठाने का मतलब यह मान लेना कतई ना समझें कि सभी कर्मचारी रिश्‍वतखोर हैं। निष्पक्ष सर्वे करवाया जाय तो आधे से अधिक कर्मचारी ईमानदार, कर्तव्यनिष्ठ और काम से मतलब रखने वाले मिल जायेंगे। हमारे टीवी, अखबार ऐसे लोगों को कभी सुर्खियां नहीं देते हैं। उनका तर्क होता है कि हम गारंटी कैसे दे सकते हैं। कम से कम सेवानिवृत्ति पर तो ईमानदार-कर्मठों को सुर्खियां मिलनी ही चाहिए। हां, इसे स्वीकार करने में कोई आपत्ति नहीं कि कुछ कार्यालय ऐसे भी होंगे जहां नब्बे प्रतिशत रिश्‍वतखोर या हरामखोर होंगे तो कुछ दफ्तर ऐसे भी मिल जायेंगे जहां नब्बे प्रतिशत कर्मचारी भले होंगे, तर्क देने वाले कह सकते हैं कि ऐसे दफ्तरों में बेईमान होने की गुंजाइश ही नहीं होती―यह पूरा झूठ नहीं तो आधा सच तो हो ही सकता है―कोई बेईमान नहीं भी होना चाहे तो लोग करने को तत्पर रहते हैं। जनरल वी के सिंह कहते हैं कि उन्हें चौदह करोड़ की रिश्‍वत की जब पेशकश की गई तो इस कुतर्क से समझाने की कोशिश की गई कि ‘सभी लेते हैं, आप भी ले लो।’ यह कुतर्क चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी से लेकर सत्ता के शिखर पर बैठे तक अकसर कारगर साबित होता देखा गया है। लेकिन कुछ लोग हैं जो पता नहीं किस मिट्टी के बने है। राजस्थान की जनता पार्टी सरकार की एक घटना है, महबूब अली जलदाय विभाग में मंत्री थे, एक अभियंता का ‘मलाईदार’ पद से ट्रांसफर हो गया―ब्रीफकेस लेकर वह अभियंता पहुंच गये मंत्रीजी के बंगले। मंत्रीजी ने लगभग झाड़ते हुए कह दिया कि ‘पानी के विभाग से हो–आपको यह पता नहीं कि मेरे शहर बीकानेर का पानी कितना गहरा है। जाओ, जहां के आर्डर हुए हैं, जाकर ज्वाइन कर लो।’ कहने वाले कह सकते हैं कि महबूब अली को उस अभियंता को गिरफ्तार करवाना चाहिए था, लेकिन अधिकांश ईमानदार ऐसे लफड़ों से बचते देखे गये हैं। एक घटना और बताते हैं―उसी जलदाय विभाग के एक सहायक अभियन्ता थे हमारे बीकानेर में, बेहद ईमानदार-निष्ठावान और कर्मठ अधिकारी की छवि भी थी उनकी। वे अपने घर के दरवाजे पर खड़े थे, तभी एक पत्रकार उनके पड़ौसी से मिलने आये। उन पत्रकार महोदय ने उन अभियन्ता के लिए पड़ोसी के सामने भद्दी और अपमानजनक टिप्पणी की, जिसे ज्यों का त्यों नहीं लिखा सकता, लेकिन उन पत्रकार का कहना यही था कि यह मूर्ख है।

जेल प्रहरी निहालचन्द शायद माहौल का मारा हो सकता है, कुंठित इसलिए हुआ हो कि जब सभी रिश्‍वत लेकर खोटे कर रहे हैं तो शिकार वो अकेला ही क्यों हो रहा है?
कुछ भ्रष्टों के हृदय परिवर्तन होते भी देखे गये हैं। सौ-सौ चूहे खाकर हज जाने की तर्ज पर―पिछले वर्ष आठ अप्रैल को भ्रष्टाचार के खिलाफ अन्ना के अनशन के समर्थन में बीकानेर के कुछ लोग एक दिन के सांकेतिक अनशन पर गांधी पार्क में बैठे थे, वहां बैठने वालों में दो-एक ऐसे भी थे जिन्होंने सेवानिवृत्ति के दिन तक रिश्‍वत दोनों हाथों बटोरी थी। हो सकता है सेवानिवृत्ति के बाद उन्हें अपने किये पर ग्लानि होने लगी हो, तभी भ्रष्टाचार के खिलाफ वहां आकर बैठे होंगे।
―दीपचंद सांखला
2 अप्रेल, 2012

Thursday, May 27, 2021

ऐसे थे स्वामी संवित् सोमगिरिजी

बीकानेर के शिवबाड़ी में उजाड़ पड़े लालेश्वर महादेव मन्दिर परिसर स्थित शिवमठ की लगभग साढ़े छह वर्षों से खाली पड़ी महन्त गद्दी सम्भालने की हां स्वामी संवित सोमगिरिजी ने भरी तो इस परिसर के साथ लगाव रखने वालों की आस्था उल्लासित हुई। 20 नवम्बर 1994 में उन्होंने यह जिम्मेदारी संभाली। बीकानेर में ही पले-बढ़े जीवनराम (संन्यास पूर्व नाम) मैकेनिकल इंजीनियरिंग की कक्षाएं लेते-लेते विरक्त हुए और स्वामी ईश्वरानन्दजी गिरि से दीक्षा लेकर विज्ञान से अध्यात्म की ओर प्रवृत्त हो लिए। 

छात्र जीवन में कविताएं लिखने वाले जीवनराम से यहां के साहित्यिक क्षेत्र के अनेक लोग परिचित थे। शिवमठ के महंत बनने पर उन्हीं में से एक कवि-नाटककार नन्दकिशोर आचार्य ने जिज्ञासा रखी कि संन्यासी होने के बाद महंत होना प्रबन्धकीय पचड़ों में फंसना नहीं है? सोमगिरिजी ने उत्तर दिया कि उनके जीवन की पहली आध्यात्मिक अनुभूति मुझे इसी मन्दिर में हुई थी, जब इसी परिसर स्थित मठ की जिम्मेदारी का प्रस्ताव मिला तो मैंने प्रसाद समझकर ग्रहण कर लिया। 

सोमगिरिजी की शोभा सुन चुका था इसलिए उनके बीकानेर लौटने पर उन्हें सुनने की उत्सुकता जगी रही। जल्द ही अवसर भी आ गया। 1995 की अक्षय तृतीया को परशुराम जयंती थी। बीकानेर के सर्व विप्र समाज ने रानी बाजार स्थित गौड़ सभा भवन में सोमगिरिजी का उद्बोधन रखा। वर्ग विशेष का आयोजन होने के बावजूद डॉ. श्रीलाल मोहता से चर्चा की और दोनों ने जाना तय कर लिया। गौड़ सभा भवन के खचाखच भरे प्रांगण में बैठने का स्थान नहीं बचा सो हम किनारे खड़े हो गये। उस एक में मैं बाहरी कुछ लोगों की नजर में आया भी, लेकिन ना वे मुखर हुए और ना मैंने संज्ञान लिया। सोमगिरिजी ने प्रवचन शुरू किया-उपस्थितों की आकांक्षाओं के उलट उन्होंने बजाय विप्र-गौरव या विप्र हित की बात करने के, उन्होंने सामाजिक समरसता की जरूरत बताते हुए समाज में दबे-कुचले वर्गों को बराबरी का सम्मान देने की बात की, सर्व समाज के कल्याण की बात की। स्वामीजी का पूरा प्रवचन इसी लय में था। मैं और डॉ. श्रीलाल मोहता इशारों में एक दूसरे को आश्वस्त करते रहे कि हमारा आना सार्थक हुआ। जैसी उम्मीद थी, स्वामीजी वैसा ही बोले।

हमारे बचपन और किशोरवय में शिवबाड़ी का मन्दिर परिसर हरा-भरा और सुव्यवस्थित था। वह वर्षों से बिना महन्त के उजाड़ और जर्जर होने के कगार पर था। स्वामी सोमगिरिजी के आते ही परिसर स्पन्दित होने लगा। 'राजकीय प्रत्यक्ष प्रभार श्रेणी' में होने के बावजूद स्वामीजी ने इस परिसर को 'सुपुर्दगी श्रेणी' का मानकर वर्षों तक लगातार ना केवल मरम्मत का काम चलाया बल्कि पौधारोपण के साथ-साथ दूब के मैदान भी विकसित किये। श्रद्धालुओं की रौनक बढ़ते-बढ़ते मन्दिर परिसर अपने पुराने वैभव को लौटा लाया। हालांकि आगौर क्षेत्र में कॉलोनियों की बसावट से शिवबाड़ी तालाब इन वर्षों में लबालब कभी नहीं हुआ।

गांव से शहरी बस्ती बना दलित-बहुल शिवबाड़ी के दलित बाशिन्दों ने अपने क्षेत्र के मन्दिरों में प्रवेश का कभी सोचा नहीं होगा। लेकिन सोमगिरिजी के आने के बाद उन्हें ना केवल मन्दिर में प्रवेश के लिए प्रोत्साहित किया गया बल्कि मठ की गद्दी वाले भवन में बैठकर प्रवचन सुनने की छूट दलितों को दी गयी। शाम के नियमित आयोजनों में शिवबाड़ी के दलित शिरकत करने लगे। बस्ती में लालेश्वर-डूंगरेश्वर महादेव मन्दिर के अलावा दो भव्य मन्दिर और भी हैं—एक जैन मन्दिर और दूसरा लक्ष्मीनाथ मन्दिर, लेकिन दलितों को ससम्मान प्रवेश सोमगिरिजी के बाद शिवबाड़ी मन्दिर में ही मिला।

और यह भी कि मठ परिसर में प्रवास के नियमों में सोमगिरिजी ने लिखवा दिया कि कोई प्रवासी साधु-संन्यासी, पंडित मन्दिर परिसर में रहते तंत्र-मंत्र-ज्योतिष की बात नहीं कर सकेगा। स्वामीजी संकीर्णता और कट्टरपन को पसंद नहीं करते थे, संघी पठन सामग्री (तब सोशल मीडिया नहीं आया था) पढऩे वाले की जानकारी उन्होंने मुझे बड़ी हिकारत से दी।

ऐसी ही तकलीफ स्वामीजी ने एक बार और जाहिर की। लालेश्वर और डूंगरेश्वर महादेव मन्दिर को राजकीय प्रत्यक्ष प्रभार श्रेणी से सुपुर्दगी श्रेणी में लाने के लिए स्वामीजी ने हर तरह से प्रयास किये। वर्ष 2007-08 की बात है। स्वामीजी के एक प्रकल्प 'मानव प्रबोधन प्रन्यास' के ट्रस्टी सूबे से संबंधित मंत्री से इस बाबत मिले। मंत्रीजी के आदमी ने एक बड़ी रकम की मांग की। ट्रस्टियों ने इस बिना पर स्वामीजी को तैयार कर लिया कि इस रकम को हम जुटायेंगे, आप तो बस हां कर दो। स्वामीजी ने मन मसोज कर एक बार तो हां कर दी। ट्रस्टी रकम लेकर जयपुर के लिए एक सुबह रवाना भी हो गये, लेकिन स्वामीजी की आत्मा इसे स्वीकार नहीं कर पा रही थी, उक्त ट्रस्टी को फोन करके बीच रास्ते सीकर से वापस बुलवा लिया। स्वामीजी ने इस वाकिये का जिक्र करते हुए कहा कि देखो—हिन्दू हित की बात करने वाली पार्टी के मंत्रियों की यह स्थिति है कि मन्दिर को भी नहीं छोड़ते।

एक दिन मैं दर्शन लाभ के लिए शिवबाड़ी गया तो स्वामीजी मठ परिसर में नहीं थे। पता लगा कि पीछे कुएं की तरफ गये हैं। वे वहां टैंकर भरने की पर्चियां काट रहे थे। मैं पहुंचा तो स्वामीजी ने अपनी समस्या बतायी कि क्या करूं आज पर्ची काटने वाला नहीं आया। मन्दिर परिसर में पिस्टल शूटिंग रेंज के माध्यम से युवकों को निशानेबाजी का प्रशिक्षण दिया जाने लगा। यहां से प्रशिक्षित युवकों ने नेशनल तक नाम कमाया। लेकिन देवस्थान विभाग ने इस तरह की गतिविधियों पर एतराज जता दिया। आखिर संवित् शूटिंग संस्थान के लिए दूसरी जमीन लेकर रेंज वहां विकसित करनी पड़ी।

सरकारी होने के बावजूद मन्दिर-मठ की लम्बी चौड़ी सम्पत्तियों की सार-संभाल की प्रबन्धकीय और अदालती पेचीदगियों के चलते स्वामीजी अपने अलग तरह के आचार-व्यवहार को लम्बे समय तक साध नहीं पाए। जिसकी एक बड़ी वजह यह कि जिन समान विचार के लोगों से वे यह उम्मीद करते थे कि समय देकर मन्दिर-मठ व्यवस्था और आयोजनों में सहयोग करेंगे, उनमें से कोई भी उनकी उम्मीदों पर खरा नहीं उतरा। हुआ यह कि जिस तरह के लोग मन्दिर-मठ से जुड़े उनकी अपनी सोच के दबाव भी कम नहीं थे वहीं रोजमर्रा के राजकीय झंझटों से मुक्ति के लिए मन्दिर को 'सुपुर्दगी श्रेणी' में लाने के प्रयासों  के चलते स्वामीजी अपने व्यवहार को सहयोगियों की अनुकूलता अनुसार ढालने लग गये। इसी वजह से स्वामीजी की सोच में भी बदलाव आने लगा।

बावजूद इन सबके मन्दिर भूमि पर लगातार नवनिर्माण, जीर्णोद्धार और चारदिवारी-तारबन्दी करके पड़े-पौधों से पूरे परिसर को हरा-भरा और भव्य बनाने में स्वामीजी लगे रहे। सहयोगियों की संगत और सोशल मीडिया पर फैलाये जा रहे साम्प्रदायिक झूठ से स्वामीजी प्रभावित होने लगे। पांच-सात वर्ष पूर्व की बात है, मैं स्वामीजी के एक प्रवचन में गया हुआ था। वह पूरा प्रवचन बजाय आध्यात्म के तथाकथित हिन्दुत्वी था। स्वामीजी को लगने लगा हिन्दू धर्म पर जबरदस्त खतरा मंडरा रहा है। उन्होंने कहा कि असम में 3 करोड़ बांग्लादेशी घुसपैठिये आ गये हैं और वे वहां की धर्म-संस्कृति को नष्ट-भ्रष्ट कर रहे हैं। इन प्रवचनों बाद एक दिन मैं सेवा में गया तो पूछ बैठा, महाराज यह तीन करोड़ घुसपैठिये वाला तथ्य सही नहीं, कहां से आया। इधर-उधर देखते हुए स्वामीजी बोले कि सभी कह रहे हैं। जबकि तब असम की कुल जनसंख्या ही ढाई से पौने तीन करोड़ थी। उसके बाद केन्द्र और असम दोनों जगह आई भाजपा की सरकार के चलते वहां एनआरसी (नेशनल रजिस्टर ऑफ सिटीजन) करवाई गयी। एनआरसी के आंकड़ों के अनुसार वहां घुसपैठिए 19 लाख के लगभग ही निकले जिनमें मुस्लिम घुसपैठिये 5 से 6 लाख के बीच ही हैं, शेष में से 12 लाख हिन्दू और कुछ अन्य।

झूठ का जहर जिस तरह चढ़ता है उसका एक और उदाहरण साझा करना चाहूंगा। 7-8 वर्ष पूर्व की बात होगी, स्वामीजी के गुरु श्री ईश्वरानंदजी का शिवबाड़ी मन्दिर परिसर में प्रवचन था। उनकी शोभा के आकर्षण में सुनने जाना ही था। ईश्वरानंदजी का आध्यात्मिक प्रवचन सुनकर अभिभूत हुआ। 

कुछेक वर्ष पूर्व ईश्वरानंदजी का बीकानेर फिर पधारना हुआ। स्थानीय पार्क पैराडाइज में प्रवचन रखा गया। अपने उसी जिज्ञासु भाव से मैं प्रवचन सुनने गया, जो भाव उनके पिछले प्रवचन से पल्लवित हुआ था। लेकिन वहां क्या सुनता हूं कि ईश्वरानन्दजी भी बजाय अध्यात्म के धर्म-संस्कृति पर खतरे की तर्ज पर ही बोले—नोर्थ ईस्ट के हवाले से उनका पूरा भाषण सोशल मीडिया के झूठ से संक्रमित था। उस दिन मैं बहुत निराश हुआ।

इस तरह बनायी और घड़ी गयी परिस्थितियां विचार में, व्यवहार में जिस तरह बदलाव लाती हैं, वह संन्यास के साधना मार्ग में विचलन पैदा करती ही है। यहां तक 2017-18 में स्वामी सोमगिरिजी मध्यप्रदेश सरकार के बुलावे पर दल विशेष द्वारा प्रायोजित धार्मिक आयोजनों के संयोजन में लग गये। स्वामीजी के विचार-व्यवहार में आए परिवर्तन से समझ में आ गया कि महन्त जैसे प्रबन्धकीय पद को ग्रहण करने पर श्री नन्दकिशोर आचार्य ने शंका क्यों प्रकट की थी।

मन्दिर परिसर को सुपुर्दगी श्रेणी में करवाने की स्वामी सोमगिरिजी की उत्कट इच्छा में आस्था के चलते स्वामीजी के बिना कहे देवस्थान विभाग में पदारूढ़ अपने परिचित आयुक्त से जयपुर सचिवालय में मिला और जानना चाहा कि प्रत्यक्ष प्रभार से सुपुर्दगी श्रेणी में करने पर सरकार को एतराज क्यों है, जबकि स्वामीजी ना केवल भले हैं बल्कि पूरे परिसर की देखभाल बहुत संजीदगी से कर रहे हैं। उन्हें यह भी बताया कि स्वामीजी के मठ संभालने से पूर्व मन्दिर परिसर की इतनी लम्बी-चौड़ी जमीन पर कब्जे होने लगे थे। आयुक्त महोदय ने कहा 'सांखलाजी अभी तो सोमगिरिजी हैं, भले हैं। बाद में कौन किस तरह के लोग आते हैं, क्या पता। देवस्थान विभाग की सम्पत्तियों के साथ क्या-क्या नहीं हो रहा, आपको पता ही है।'

अब जब स्वामीजी नहीं रहे तो उनके उत्तराधिकारियों से यह उम्मीद की जाती है कि वे ना केवल स्वामी सोमगिरिजी की मूल (प्रारंभिक) भावना को चेतन रखेंगे बल्कि उक्त आयुक्त महोदय की आशंकाओं को भी निर्मूल साबित करेंगे। इतना ही नहीं, जिस परिसर को स्वामीजी ने अपनी साधना की कीमत पर रात-दिन चमन बनाये रखा, उसे भी क्षीण नहीं होने देंगे। एक बात और स्वामीजी ने इस गद्दी पर आसीन होने के बाद कितने तरह के लोगों को जोड़ा और परोटा उसी भावना के साथ ना केवल उन सभी को जोड़े रखना, नये-भले और सच्चे लोगों को और जोडऩा कम चुनौतीपूर्ण नहीं है।

स्वामीजी से मिले सान्निध्य की अनुभूतियां तथा अनुभव और भी अनेक हैं लेकिन इस बार इतना ही...

—दीपचन्द सांखला

27 मई, 2021

Wednesday, May 19, 2021

मुक्तप्राण की जयध्वनि : डॉ. श्रीलाल मोहता

हृदय हिला हुआ है, इसकी प्रतीती लिखते समय काँपती अंगुलियों से हो रही है। डॉ. श्रीलाल मोहता मानो बीकानेर की संस्कृति के ईश्वर-नियुक्त राजदूत थे। उनकी उपस्थिति में एक अद्भुत ऋजुता परिलक्षित होती थी। वे अपनी चुप्पी तक में सदाशयता की एक मुखर मूर्ति थे। गत तीन दशक से वे 'परम्परा' संस्था के निमित्त से लोक और लोकेतर के अर्थ के अनुसंधान में, बीकानेर के समग्र सांस्कृतिक जन को अपने साथ जोड़कर अग्रसर थे। इस उपक्रम के अनेक अंगोपांग थे। आज (16 मई, 2021) सुबह उनके न रहने के समाचार की पीड़ा की सांत्वना मैंने उन्हीं की संस्था के एक प्रकाशन—गुजराती चिन्तक मकरंद दवे की कृति 'तपोवन के पथ पर'—के पारायण में खोजी। इसके प्रकाशकीय में डॉ. श्रीलाल मोहता मकरंद दवे का नहीं, मानो अपना ही परिचय दे रहे हैं। लिखते हैं, 'श्री मकरंद दवे प्राचीनता के पक्षधर तो हैं, लेकिन साथ ही वे आधुनिकता को नकारते भी नहीं हैं, वे पुराने प्रेतों को जीवित नहीं करना चाहते हैं, आज के आधुनिक विचारक, जिन्हें वे ऋषितुल्य चिन्तक कहते हैं, जैसे एरिक फ्रॉम, मार्टिन बूबर, विक्टर फ्रेकल, रूथ बेनेडिक्ट या फिर अब्राहम मास्लो आदि ने जो कुछ कहा है, उन्हीं बातों को वे हमारी संस्कृति के मूलाक्षर में कहना चाहते हैं।' डॉ. मोहता ने समाहार में विलक्षण पद-प्रयोग किया है—हमारी संस्कृति के मूलाक्षर। कदाचित् इन्हीं पर उनकी अपनी आंख भी टिकी हुई थी।

यद्यपि कुछ वर्षों से उन्हें 'लोक कला मर्मज्ञÓ के विरुद से अभिहित किया जाता रहा था। मेरे विचार में यह उनके अनेकायामी बौद्धिक और सांस्कृतिक व्यक्तित्व का एकायामी न्यूनीकरण ही था। वे क्या नहीं थे? संगीत, छन्द, आयुर्वेद, इतिहास, पुराण, नई और पुरानी कविता, दर्शनशास्त्र समेत ज्ञान के कितने पक्ष थे जिन पर उनके साथ गपशप की शैली में गंभीर विमर्श किया जा सकता था। उन्होंने हिन्दी के सर्वाधिक सघनरूपेण सत्यान्वेषी कवि नरेश मेहता पर शोध-लेखन कर वाचस्पति (Ph.D) की उपाधि प्राप्त की थी। उनकी असाधारण विनोद-वृत्ति ने उन्हें ज्ञान के अभिमान से सदा दूर रखा। एक अर्थ में वे हनुमानजी की तरह थे। उन्हें उनका गंभीर ज्ञान-पराक्रम अक्सर याद दिलाना पड़ता था। जैसे किष्किंधा कांड के अन्त में जामवन्त हनुमानजी को याद दिलाते हैं—पवन तनय बल पवन समाना। बुद्धि विवेक विज्ञान निधाना।। वे भी तो डॉ. छगन मोहता जैसे समकालीन ऋषि-मनीषी के तनय थे। हनुमानजी और उनमें एक ही अन्तर था; हनुमान दुष्टों को दंड देते थे, किन्तु डॉ. श्रीलाल मोहता ने जीवन में किसी को दंडित या प्रताडि़त किया ही नहीं। वे अच्छे अथवा बुरे, अनुकूल अथवा प्रतिकूल प्रत्येक व्यवहार का एक ही उत्तर देते थे-सरलप्राण मुस्कान मात्र। उनके जैसा संपूर्णरूपेण सकारात्मक मनुष्य शहर तो क्या संसार में मिलना भी दुर्लभ है। उन्हें किसी के अवगुणों से मानो कुछ लेना-देना ही नहीं था; और गुण ग्राहकी ऐसी कि मेरे जैसे अनेक छोटों के मान देने पर भी वे संकोच की सांसत में घिरे दिखाई पड़ते। उनकी यह अनसूया-वृत्ति इतनी सिद्ध थी कि भरी सभा में अपमान होने पर भी वे अविचलित भाव से अपनी भूमिका निभाते रहते थे।

मुझे मिला 'साहित्य अकादमी' पुरस्कार भी एक तरह से उन्हीं का कर्तृत्व कहा जा सकता है। नब्बे के दशक में उन्होंने युवा रचनाशीलता को मंच देने के लिए 'प्रज्ञा परिवृत' के बैनर तले एक मासिक एकल काव्य-पाठ शृंखला शुरू की थी। मैं कहानियां लिखकर यत्किंचित् पहचान अर्जित कर चुका था, किन्तु कविताएं लिखना मेरा एक गोपन व्यापार था। उन्हीं के लाड़ भरे आग्रह पर मैंने अपनी राजस्थानी कविताओं को एकल-पाठ के लिए इकजाई किया था। इन्हीं कविताओं के संकलन 'उतर्यो है आभो' पर मुझे वर्ष 1997 का साहित्य अकादमी पुरस्कार मिला। उनके कहने पर मैंने कितने ही मौलिक सर्जनात्मक प्रयोग किए। उन्होंने 'परम्परा' की 'आस्वाद' शृंखला में मुझसे वात्स्यायनजी (अज्ञेय) की कविताओं का पाठ करवाया, जो एक अद्भुत काव्य-संध्या थी। संस्था की छत पर हुए इस पाठ में बादलों के सुन्दर वितान के बीच इन्द्रधनुष दिखाई पड़ रहा था। मानो वात्स्यानजी ही नभ के झरोखे से अपनी कविताएं सुन रहे थे। उनके साथ कई पुस्तकें संपादित कीं। 'गणगौर गाथा' की सारी दृष्टि, समूचा विचार उनका था, पर जब भी मिलते सारे श्रेय का भागीदार मुझे बना देते थे। पीयूष दईया के साथ उन्होंने 'लोक का आलोक' संपादित की, जो हिन्दी में लोक-विमर्श की एक सर्वाधिक विलक्षण कृति है।

मैं उन्हें याद करता रहूंगा और उनके न रहने पर जो-जो दिल पर गुजरेगी, उसे रकम करता (लिखता) रहूंगा। फैज़ अहमद 'फैज़ इस 'घनीभूत पीड़ा' की घड़ी में मुझसे कह रहे हैं :

हम परवरिश-ए-लौह-ओ-कलम करते रहेंगे

जो दिल पे गुजरती है रक़म करते रहेंगे।

(शीर्षक : मकरंद दवे की सन्दर्भित कृति की 'भूमिका' से साभार।)

—मालचन्द तिवाड़ी

Thursday, April 15, 2021

ज्योतिराव फुले और भीमराव अंबेडकर

ज्योतिराव फुले का जन्म 11 अप्रेल, 1827 को और डॉ. भीमराव अंबेडकर का जन्म 14 अप्रेल 1891 को। 19वीं ईस्वी शताब्दी के अप्रेल में जन्मीं दोनों विभूतियों ने भारतीय समाज के दबे-कुचले वर्गों में आत्मविश्वास का उल्लेखनीय भाव पैदा किया। कह सकते हैं ज्योतिराव फुले ने जिस क्षेत्र में दबे-कुचले वर्गों में आत्मविश्वास जगाने के लिए जो जमीन तैयार की—डॉ. अम्बेडकर उसी में फले-फूले। मध्यप्रदेश के मालवा से महाराष्ट्र के कोंकण और विदर्भ के बीच का भू-भाग ज्योतिराव फुले की सक्रीयता से जाग्रत हुआ। इन दोनों विभूतियों पर फेसबुक मित्र संजय श्रमण ने एक अच्छी टिप्पणी की है जिसे 'विनायक' के पाठकों से साझा करना जरूरी लगा।

यह अनायास नहीं है कि इसके ठीक उलट 'क्रिया की प्रतिक्रिया' होने का कुतर्क देने वाली विचारधारा के उच्चवर्गीय संगठन राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और उसके संस्थापक केशव बलिराम हेडगेवर प्रतिक्रिया के तौर पर उसी क्षेत्र में पनपे, और यह भी कि इसी संगठन के दूसरे और तीसरे सर संघचालक भी इसी क्षेत्र से आए जहां ज्योतिराव फुले ने दलित और पिछड़ों को जागरूक किया। —दीपचन्द सांखला

ज्योतिबा फुले और बाबा साहेब अंबेडकर का जीवन और कर्तृत्व बहुत ही बारीकी से समझे जाने योग्य है। आज जिस तरह की परिस्थितियां हैं उनमें ये आवश्यकता और अधिक मुखर और जरूरी बन पड़ी है।

दलित आन्दोलन या दलित अस्मिता को स्थापित करने के विचार में भी एक 'क्रोनोलॉजिकल' प्रवृत्ति है, समय के क्रम में उसमें एक से दूसरे पायदान तक विकसित होने का एक पैटर्न है और एक सोपान से दूसरे सोपान में प्रवेश करने के अपने कारण हैं। ये कारण सावधानी से समझे और समझाये जा सकते हैं।

अधिक विस्तार में न जाकर ज्योतिबा फुले और अंबेडकर के उठाये कदमों को एक साथ रखकर देखें। दोनों में एक जैसी त्वरा और स्पष्टता है। समय और परिस्थिति के अनुकूल दलित समाज के मनोविज्ञान को पढऩे, गढऩे और एक सामूहिक शुभ की दिशा में उसे प्रवृत्त करने की दोनों में मजबूत तैयारी दिखती है। और चूंकि कालक्रम में उनकी स्थितियां और उनसे अपेक्षाएं भिन्न हैं, इसलिए एक ही ध्येय की प्राप्ति के लिए उठाये गए उनके कदमों में समानता होते हुए भी कुछ विशिष्ट अंतर भी नजर आते हैं। 

ज्योतिबा के समय में जब कि शिक्षा दलितों के लिए दुर्लभ थी, और शोषण के हथियार के रूप में निरक्षरता और अंधविश्वास जैसे 'भोले-भाले' कारणों को ही मुख्य कारण माना जा सकता था—ऐसे वातावरण में शिक्षा और कुरीति निवारण—इन दो उपायों पर पूरी ऊर्जा लगा देना आसान था, न केवल आसान था बल्कि यही संभव भी था।  और यही ज्योतिबा ने अपने जीवन में किया भी। क्रान्ति-दृष्टाओं की नैदानिक दूरदृष्टि और चिकित्सा कौशल की सफलता का निर्धारण भी समय और परिस्थितियां ही करती हैं।  

इस विवशता से इतिहास का कोई क्रांतिकारी या महापुरुष कभी नहीं बच सका है।  ज्योतिबा और उनके स्वाभाविक उत्तराधिकारी अंबेडकर के कर्तृत्व में जो भेद हैं उन्हें भी इस विवशता के आलोक में देखना उपयोगी है। इसलिए नहीं कि एक बार बन चुके इतिहास में अतीत से भविष्य की ओर चुने गये मार्ग को हम इस भांति पहचान सकेंगे, बल्कि इसलिए भी कि अभी के जागृत वर्तमान से भविष्य की ओर जाने वाले मार्ग के लिए पाथेय भी हमें इसी से मिलेगा।

ज्योतिबा के समय की 'चुनौती' और अंबेडकर के समय के 'अवसर' को तत्कालीन दलित समाज की उभर रही चेतना और समसामयिक जगत में उभर रहे अवसरों और चुनौतियों की युति से जोड़कर देखना होगा। जहां ज्योतिबा एक पगडंडी बनाते हैं उसी को अंबेडकर एक राजमार्ग में बदलकर न केवल यात्रा की दशा बदलते हैं बल्कि गंतव्य की दिशा भी बदल देते हैं।

नए लक्ष्य के परिभाषण के लिए अंबेडकर न केवल मार्ग और लक्ष्य की पुनर्रचना करते हैं बल्कि अतीत में खो गए अन्य मार्गों और लक्ष्यों का भी पुनरुद्धार करते चलते हैं। फुले में जो शुरुआती लहर है वो अंबेडकर में प्रौढ़ सुनामी बनकर सामने आती है और एक नैतिक आग्रह और सुधार से आरम्भ हुआ सिलसिला, किसी खो गए सुनहरे अतीत को भविष्य में प्रक्षेपित करने लगता है।

आगे यही प्रक्षेपण अतीत में छीन लिए गए 'अधिकार' को फिर से पाने की सामूहिक प्यास में बदल जाता है।

इस यात्रा में पहला हिस्सा जो शिक्षा, साक्षरता और वैज्ञानिक दृष्टिकोण पैदा करने जैसे नितांत निजी गुणों के परिष्कार में ले जाता था, वहीं दूसरा हिस्सा अधिकार, समानता और आत्मसम्मान जैसे कहीं अधिक व्यापक, इतिहास सिद्ध और वैश्विक विचारों के समर्थन में कहीं अधिक निर्णायक जन-संगठन में ले जाता है। इतना ही नहीं, बल्कि इसके साधन और परिणाम स्वरूप राजनीतिक उपायों की खोज, निर्माण और पालन भी आरम्भ हो जाता है।

यह नया विकास स्वतंत्रता पश्चात की राष्ट्रीय और स्थानीय राजनीति में बहुतेरी नयी प्रवृत्तियों को जन्म देता है। जो समाज हजारों साल से निचली जातियों को अछूत समझता आया था उसकी राजनीतिक रणनीति में जाति का समीकरण सर्वाधिक पवित्र साध्य बन गया।

ये ज्योतिबा और अंबेडकर का किया हुआ चमत्कार है, जिसकी भारत जैसे रुढि़वादी समाज ने कभी कल्पना भी न की थी। यहां न केवल एक रेखीय क्रम में अधिकारों की मांग बढ़ती जाती है बल्कि उन्हें अपने दम पर हासिल करने की क्षमता भी बढ़ती जाती है। 

इसके साथ-साथ इतिहास और धार्मिक ग्रंथों के अंधेरे और सड़ांध-भरे तलघरों में घुसकर शोषण और दमन की यांत्रिकी को बेनकाब करने का विज्ञान भी विकसित होता जाता है। ये बहुआयामी प्रवृत्तियां जहां एक साथ एक ही समय में इतनी दिशाओं से आक्रमण करती हैं कि शोषक और रुढि़वादी वर्ग इससे हताश होकर 'आत्मरक्षण' की आक्रामक मुद्रा में आ जाता है।

एक विस्मृत और शोषित अतीत की राख से उभरकर भविष्य के लिए सम्मान और समानता का दावा करती हुई ये दलित चेतना, इस पृष्ठभूमि में लगातार आगे बढ़ती जाती है। —संजय श्रमण

15 अप्रेल, 2021

Thursday, April 8, 2021

पाती अशोक गहलोत के नाम/संदर्भ : दांडी मार्च समापन दिवस संगोष्ठी

 मान्य अशोकजी,

नहीं जानता इस पत्र को भी पढऩे का समय आप निकाल पाएंगे। हो सकता है पिछले पत्र के हश्र को यह पत्र भी हासिल हो लेगा। खैर! मैं अपनी जिम्मेदारी पूरी करता हूं। इस पत्र की प्रेरणा 6 अप्रेल, 2021 को ऑनलाइन आयोजित दांडी मार्च समापन दिवस कार्यक्रम से मिली, जिसमें बीकानेर से एक प्रतिभागी में भी था। दांडी मार्च की प्रासंगिकता पर आहूत उक्त गोष्ठी में जो सुझाव देना चाहता थावह इस पत्र के माध्यम से साझा कर रहा हूं।

सनातन शब्दावली में बात करें तो गांधी और नेहरू आजाद भारत के पितृ-पुरुष हैं। इन दोनों पितृ-पुरुषों के बारे में जो झूठ और अनर्गलता आजादी बाद से संगठित और व्यवस्थित रूप से फैलाई जा रही है, सोशल मीडिया आने के बाद तो उस झूठ और अनर्गलता को पंख लग गये हैं। इसी पितृ-दोष के चलते ना केवल लोकतांत्रिक मूल्यों का ह्रास हुआ बल्कि अब तो संवैधानिक संघीय ढांचा भी ताक पर है।

सोशल मीडिया की चपेट में आये युवकों के बीच गांधी और नेहरू को जिस तरह खारिज किया जा रहा है उसके चलते सक्रिय और मुखर आमजनों काविशेष कर नयी पीढ़ी का गांधी और नेहरू द्वारा स्थापित मूल्यों और संस्थानों पर भरोसा खत्म हो गया है। 

झूठ और अनर्गलताओं का प्रतिरोध जिस स्तर पर और जितना व्यवस्थित होना चाहिए वह हो नहीं रहा। इन सबसे चिन्तित कुछ लोग छिटपुट प्रतिरोध और खंडन-मंडन जरूर कर रहे हैं। लेकिन झूठ की गति और ताकत के सामने वह ऊंट के मुंह में जीरा भी साबित नहीं हो पा रहा। उन्हें झूठा साबित करने के लिए उनके फैलाये झूठ के खिलाफ उनसे भी तेज गति से सत्य को प्रचारित और स्थापित करना जरूरी है जो सोशल मीडिया की व्यवस्थित टीम के बिना संभव नहीं लगता।

मुख्यमंत्री के अलावा आप में एक गांधीनिष्ठ की छवि भी देखी जाती है। इसीलिए उम्मीद भी की जाती है कि शासन-प्रशासन से अलग एक व्यवस्थित अभियान की जरूरत आप समझेंगे और ऐसे अभियान के लिए गैर सरकारी स्तर पर गुंजाइश बनायेंगे।

दांडी मार्च समापन कार्यक्रम के अपने उद्बोधन में आपने 'शान्ति और अहिंसा प्रकोष्ठ' के अब तक किये कार्यक्रमों की अच्छी-खासी प्रशंसा की। लेकिन ऐसे कार्यक्रम औपचारिकता भर हैं, उनकी कैसी भी पैठ जमीनी स्तर पर दिखाई नहीं देती ऐसे खानापूर्ति आयोजनों से ना कुछ हासिल हुआ, ना ही होने वाला है। ऐसे आयोजनों की व्यवस्थित फीडबैक ऊपर तक पहुंचाई जाती है, जिससे आभास मात्र होता है कि बहुत कुछ सार्थक हो रहा है।

इस पत्र को लम्बा ना करते हुए 6 अप्रेल के दांडी मार्च समापन दिवस आयोजन के डिजायन की भी बात करना जरूरी लगता है। हनुमानगढ़ मूर्ति अनावरण कार्यक्रम को दांडी मार्च प्रासंगिकता वाली संगोष्ठी के साथ घालमेल नहीं किया जाना चाहिए था। दोनों कार्यक्रमों की प्रकृति भिन्न हैं। जहां मूर्ति अनावरण पब्लिक प्रोग्राम होता है, वहीं संगोष्ठी विशेष, जिसमें किसी विशेष विषय पर विमर्श कर भविष्य की दिशा तय की जाती है। उक्त संयुक्त आयोजन में हुआ यह कि शान्ति धारीवाल को अपनी उपलब्धियां गिनवानी पड़ी वहीं मंत्रीद्वय कल्ला और यादव तथा आरपीएससी के पूर्व चेयरमैन बीएम शर्मा ने भी दांडी मार्च तथा गांधी के इतिहास को बताने में बहुत समय ले लिया। इसकी जानकारी संगोष्ठी के संभागीयों को पहले से थी।

दो कार्यक्रमों के उलझन में हुआ यह कि जिला स्तर पर जुड़े संभागीयों को अपनी बात कहने का अवसर ही नहीं मिला। मिलता तो हो सकता है कुछ सार्थक बात और सुझाव निकल कर आते। इस संगोष्ठी के लिए जयपुर कलेक्ट्रेट से नन्दकिशोर आचार्य जैसे काम की बात करने वाले जुड़े थे, अन्य संभागों से ऐसे ही सुझाव देने वाले विद्वजन जुड़े होंगे।

ऐसे में अब जब आपके इस कार्यकाल का आधा ही समय बचा है, उम्मीद है गांधी और नेहरू के खिलाफ फैलाये जा रहे झूठ और अर्नगलता के बरक्स आप ऐसा कुछ करवा पायेंगे जो सोशल मीडिया पर स्थायी प्रभाव छोड़ सके।

दीपचन्द सांखला

8 अप्रेल, 2021