Thursday, February 27, 2020

यूं बने हैं हम 'भारत के लोग'

रक्त शुद्धता और मूल निवासी होने के दावों के बीच आज का आलेख भारतीय लेखक और पत्रकार टोनी जोसेफ के 'द हिन्दू' में प्रकाशित साक्षात्कार पर आधारित है। यह साक्षात्कार भारतीय सभ्यता को समझने के लिए किये शोध के आधार पर लिखी जोसेफ की अंग्रेजी पुस्तक 'अरली इण्डियन्स' के सन्दर्भ से लिया गया है। इस साक्षात्कार की जानकारी मित्र अविनाश व्यास ने दी और अग्रज वीरेन्द्र शर्मा ने उसके अनुवाद में सहयोग किया। कुल जमा यही कि प्रस्तुति के अलावा इसमें मेरा खास कुछ नहीं। ―सं.

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नस्लीय विचार करते यह माना जाता रहा कि जो जहां बसा है उनके पूर्वज मूल रूप से वहीं रहते आए हैं। मानव कंकालों की अस्थियों से हासिल यूनिक आनुवंशिक कोड जिसे डीएनए भी कहा जाता है, इसकी वैज्ञानिक खोज से जीव-जगत पर आनुवंशिकता आधारित अनुसंधान और विश्लेषण से न केवल कई धारणाएं मिथक साबित हुईं बल्कि उसने मानव सभ्यता के इतिहास को भी हिला दिया है। विभिन्न कालों में विश्व के अनेक भागों में भिन्न-भिन्न जन समूहों के लगातार पलायन और विस्थापन होते रहे हैं। डीएनए की खोज बताती है कि ऐसे पलायन और विस्थापनों के दौरान अलग-अलग समूहों के मेल मिलाप से नस्लें मिश्रित होती गईं। इसके चलते नस्ली और आनुवंशिक श्रेष्ठता और शुद्धता की बात अर्थहीन साबित हुई है। ये पलायन और विस्थापन मध्य एशिया में ही नहींयूरोप, अमेरिका और अफ्रीका आदि सभी महाद्वीपों-व उप महाद्वीपों में होते रहे हैं।
इस तरह की स्थापनाएं टोनी जोसेफ की हाल ही में आई पुस्तक 'अरली इण्डियन्स' में मिलती हैं। इस पुस्तक में जोसेफ ने बताया कि आबादी के ऐसे पलायनों के फलस्वरूप, अनेक प्राचीन सभ्यताओं के समय में इस भारतीय भू-भाग में विस्थापन हुए और समय के साथ उनमें संबंध भी बने। ऐसे में अपनी नस्ल को ही श्रेष्ठ मानना और आनुवंशिक तौर पर रक्त शुद्धता के दावे भ्रम ही हैं।
भारत के संदर्भ में जोसेफ इस प्रक्रिया को समझते हुए बताते हैं कि वर्तमान भारतीय सभ्यता मुख्यत: चार ऐतिहासिक पलायनों से आए लोगों से बनी है।
वैज्ञानिक शोधों के आधार पर मनुष्य का विकास दक्षिण अफ्रीका में हुआ और पूरी दुनिया वहीं के विस्थापितों से बनी है। हमारे इस उप-महाद्वीप के दक्षिण में मनुष्य का पहला पदार्पण पैंसठ हजार वर्ष पूर्व अफ्रीका से सीधे हुआ वहीं दूसरा विस्थापन बारह हजार पूर्व ईरान से होना सिद्ध हुआ है। पहले-पहल कृषक समूह वहीं से यहां आए और पश्मिोत्तर भू-भाग में बस गये। भारत में खेती-किसानी की शुरुआत तभी से शुरू मानी गई। धीरे-धीरे ये लोग अपने से तिरपन हजार वर्ष पूर्व आये और दक्षिण में बसे आदि-भारतीय से घुल-मिल गये। परिणाम स्वरूप इस उप-महाद्वीप पर कृषि क्रान्ति का सूत्रपात हुआ। इस मिलन से 'हड़प्पा सभ्यता' का उदय और विस्तार हुआ।
तीसरे बड़े विस्थापन के तौर पर चार हजार वर्ष पहले पूर्वी-एशिया से भी लोग-बाग इस उप-महाद्वीप पर आए। पूर्व-दक्षिण के इस विस्थापन में 'खासी' और 'मण्डारिन' भाषी पनपे।
इस तीसरे विस्थापन के कुछ समय बाद ही पैंतीस सौ से चार हजार वर्ष पूर्व मध्य-एशिया के कजाकिस्तान से जो लोग आए वे अपने को आर्य कहने लगे, इस अन्तिम बड़े विस्थापन के साथ ही इण्डो-यूरोपियन भाषाओं का विकास और विस्तार हुआ।
इस प्रकार हम जो आज भारतीय हैं, वे उक्त चार विस्थापनों के विभिन्न अनुपातों का मिश्रण हैं। शोध से यह निष्कर्ष भी निकलता है कि हड़प्पा सभ्यता ही हमारी मूल और मुख्य सभ्यता है। उत्तर और दक्षिण की आबादी उसी सभ्यता की वाहक है। उसी हड़प्पा सभ्यता ने हमें एक सूत्र में पिरो कर रखा। भौगोलिक दूरियों की वजह से दक्षिण में द्रविड़ संस्कृति का विकास हुआ और उत्तर में इण्डो-यूरोपियन संस्कृति।
उक्त चारों विस्थापनों से वर्तमान भारत का एक ही हिस्सा-अण्डमान द्वीप समूह ही पूरी तरह अछूता रहा। वे जैसे भी थे, अपनी नस्ल और आनुवंशिकता के हिसाब से शुद्ध थे। अपने ही समूहों के भीतर जोड़े बनाकर रहने जैसी मर्यादा का पालन दो हजार वर्ष पूर्व से मिलता है, जो यह दर्शाता है कि प्रकारान्तर से विकसित हुई यह जातिप्रथा आर्यों के आगमन की वजह से नहीं बल्कि उससे भी पहले के राजनीतिक विकास, स्थानीय जरूरतों और अन्य कारणों से पनपी।
अब तक का अन्तिम निष्कर्ष यही है कि भारत की वर्तमान समग्र आबादी में 50% से 65% हिस्सा उस भारतीय वंश परम्परा से है जो 65 हजार वर्ष पूर्व अफ्रीका से विस्थापित होकर आये थे।
किसका क्या धर्म और भाषा है और उसके पूर्वज कौन थे, किस क्षेत्रविशेष के हैं। इस तरह के भाव उक्त स्थापनाओं से निरर्थक साबित होते हैं।
दीपचन्द सांखला
27 फरवरी, 2020

Thursday, February 20, 2020

बीकानेर में नहर लाने का श्रेय और आईना दिखाता इतिहास

राजस्थान नहर परियोजना, इंदिरा गांधी की हत्या के बाद जिसे इंदिरा गांधी नहर नाम दे दिया गया। इस नहर परियोजना पर दैनिक भास्कर (18 फरवरी, 2020) के राजस्थान संस्करण में एक फीचर प्रकाशित हुआ है। शीर्षक था 'महाराजा गंगासिंह ने 1938 में ही बनवाया था जैसलमेर तक का नक्शा... नहर बनी तो उनका नहीं इंदिरा गांधी का नाम दे दिया।'
मात्र नक्शा बनवा लेने भर पर इस तरह का शीर्षक देने को पत्रकारिता की सामन्ती मुग्धता के अलावा क्या कह सकते हैं। उक्त उल्लेखित खबर में ये उल्लेख करना भी जरूरी नहीं लगा कि जिसे गंगासिंहजी ने बनवाया उस बीकानेर नहर का नाम गंगनहर किया ही गया है। आजादी बाद की सरकारों की बनवाई परियोजना और संस्थानों के नाम रियासतकालीन शासकों के नाम पर रखने की धारणाओं को सामन्ती ही कहा जायेगा। हम एक संविधान सम्मत लोकतांत्रिक देश में रहते हैं, लेकिन पत्रकारिता-जनित असंवैधानिक हश्र जैसा इस दौर में हुआ, वह इतिहास के काले अध्याय के तौर पर देखा जायेगा।
शासन करने के लिए लोक होना जरूरी है और उसे बचाए रखना भी, इसीलिए ही सही, अंग्रेज शासक लोककल्याण की योजनाओं को तरजीह देते थे और अपने अधीन रहे राजे-रजवाड़ों को तत्संबंधी योजनाओं को अमली जामा पहनाने का निर्देश देते रहते थे इस तरह के खुलासे खुद रजवाड़ों की ओर से लिखवाये गये इतिहास में भी मिल जाते हैं। 
देश की आजादी के आंदोलन के दौरान बीकानेर में सक्रिय रहे सत्याग्रहियों और क्रान्तिकारियों को उन्हीं गंगासिंहजी के शासन में अमानवीय यातनाएं देने का रिकार्ड राजस्थान राज्य अभिलेखागार में उपलब्ध है। इसलिए यह कहने में कोई संकोच नहीं कि अपने सुपर शासकों के निर्देशों पर स्थानीय शासक गंगासिंहजी द्वारा बीकानेर रियासत में विकास के कार्य जितने करवाए, उसकी पुण्याई उन्होंने स्वतंत्रता सेनानियों को निर्मम यातनाएं देकर कभी की खो दी है।
गंगासिंहजी के खाते में दर्ज गंगनहर परियोजना पर दैनिक भास्कर के उदयपुर संस्करण के प्रभारी श्री त्रिभुवन ने काफी शोध किया है। सन्दर्भों सहित शीघ्र प्रकाश्य अपनी पुस्तक की पाण्डुलिपि के आधार पर उनके द्वारा 28 अक्टूबर, 2015 को लिखी एक फेसबुक पोस्ट उस सच को जानने के लिए पर्याप्त है। उसी पोस्ट को किंचित् सम्पादन के साथ पाठकों के लिए यहां साझा कर रहे हैं।
दीपचन्द सांखला
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गंगासिंह के गंगनहर लाने का मिथक
महाराजा गंगासिंह गंगनहर निकालकर लाए और भगीरथ की तरह साबित हुए। यह मिथक जाने कब से चल रहा है। जिनकी सत्ता होती है, इतिहासकार भी उनके दास होते हैं। आप बस एक बार एक मिथक को सत्य का बाना पहना दें, फिर बाकी काम हम पत्रकार मुफ्त में करते रहेंगे। ये मिथक फिर चाहे पं. जवाहरलाल नेहरू से लेकर नरेंद्र मोदी तक कितने ही नेताओं के बारे में क्यों न हो। ऐसा नहीं है कि ये मिथक सदा पॉजीटिव ही होते हैं, निगेटिव भी हो सकते हैं। 
गंगनहर और गंगानगर के इतिहास को लेकर मैं बीकानेर स्थित राजस्थान राज्य अभिलेखागार से लेकर दिल्ली में तीनमूर्ति भवन के नेहरू मेमोरियल संग्रहालय तक की बहुत खाक छान चुका हूं। तथ्य ये हैंं कि 1876 से 1878 के बीच भयावह अकाल पूरे हिंदुस्तान में पड़ा था। यह ग्रेट फैमिन के नाम से कुख्यात है। 'इंपीरियल गजट ऑफ इंडिया' के थर्ड वॉल्यूम (1907 में प्रकाशित) के अनुसार इस अकाल ने देश के 6 लाख 70 हजार वर्ग किलोमीटर क्षेत्र को अपने बाहुपाश में ले लिया था। इसमें 5 करोड़ 85 लाख लोग सीधे प्रभावित हुए थे, जिनमें से 55 लाख लोग भूख से मर गए थे। पंजाब और नॉर्थ प्रोविंस में 8 लाख और राजपूताना में कोई 20 लाख  लोग काल कवलित हुए। किसी को अनाज का दाना नहीं मिला तो किसी को पानी की बूंद। मारे भूख के लोग मरे हुए जानवरों तक को खा गए या कीकर-जांटी के पेड़ों की छाल और अन्य अखाद्य-अभक्ष्य चबा-चबाकर मर गए।
उस अकाल ने दक्षिण भारत के राज्यों को भी बुरी तरह प्रभावित किया। उस अकाल ने ब्रिटिश सरकार के संवेदनहीन शासकों को भी बुरी तरह हिला दिया था। उन दिनों लॉर्ड नार्थ ब्रुक भारत के वायसरॉय थे, लेकिन वे 1876 में चले गए। इस अकाल का सामना किया लार्ड लिटन ने, जो 1876 से 1880 तक वायसरॉय रहे। लॉर्ड नार्थ ब्रुक और लॉर्ड लिटन की डायरियों में दर्ज टिप्पणियां रोंगटे खड़े कर देती हैं। वे यह भी बताती हैं कि भारतीय राजे-महाराजे, जिन्हें हमने आज लोकतांत्रिक कालखंड में भी सिर पर बिठा रखा है, कितना गैरजिम्मेदाराना व्यवहार कर रहे थे। इन देसी शासकों और उनके सलाहकारों ने इस तांडव को भाग्य से जोड़कर अपने फर्ज से किस तरह मुँह मोड़ लिया था। आप भरोसा नहीं करेंगे, अगर उस समय जातिभेद से ऊपर उठकर काम करने वाला अंगरेज अमला नहीं होता तो दलितों और कथित अछूतों की जो हालत होती, वह अकल्पनीय थी और बहुत हद तक रही भी।
खैर, उन्हीं दिनों लॉर्डं लिटन के बाद जब मार्केस ऑफ रिपन वायसरॉय बनकर आए तो उन्होंने अकाल से निबटने की बड़ी योजना बनाई। हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि वे विदेशी, भारत विरोधी और क्रूर शासक थे। लेकिन इन क्रूर शासकों, वायसरायों और स्थानीय अंगरेज प्रशासकों पर ब्रिटिश संसद का बड़ा कड़ा पहरा था। 
मैंने 1857 से लेकर 1947 तक की ब्रिटेन की संसद हाउस ऑफ कॉमन्स और हाउस ऑव लॉर्ड्स की डिबेट्स बहुत ध्यान से पढ़ी हैं। उनमें अंगरेज सांसदों ने जिस तरह भारतीय प्रशासकों की खबर ली है, वैसी बात हमारे सांसदों में आज कहीं दिखाई नहीं देती। वे जिस तरह से हाउस ऑव कॉमन्स और हाउस ऑव लॉर्ड्स में अपने प्रशासकों की खबर लेते थे, वह अन्यत्र दुर्लभ है। लेकिन यह भी सच है कि अंगरेज अंगरेज थे, वे चालाक और धूर्त थे। वे सब-कुछ वैसे ही मैनेज करके चलते थे, जिस तरह हमारे आज के प्रशासक और शासक कर लेते हैं। कहने का मतलब इतना-सा है कि भारत में राज करने वाले अंगरेज अगर कोई बेहतर काम करते थे तो इसके पीछे वहां की संसद और वहां के लोगों का दबाव ही होता था।
उन दिनों उत्तर भारत के राजपूताना और बहावलपुर रियासतों में भुखमरी बहुत बढ़ गई थी। यहां के लोगों ने पंजाब और नॉर्थ-वेस्ट प्रोविंस में चोरियां, डकेतियां और बलात्कार बढ़ गये थे। आखिर 'बूभुक्षितों किं न करोति पापम्' वाली स्थिति हो गई, यानी कि भूख से लड़ता आदमी कौन सा अपराध नहीं करेगा! ऐसे हालात में जब पंजाब और अन्य प्रोविंस त्राहिमाम कर बैठे तो लार्ड रिपन ने एक बड़ा सर्वे ये जानने के लिए करवाया कि आखिर इस लॉ-लेसनेस का कारण क्या है? वे किसी विदेशी सरकार या अन्य लोगों को जिम्मेदार ठहराकर हाथ पर हाथ धरकर नहीं बैठ गये। इस सर्वे को बहुत बुद्धिमत्ता से सोशियो-इकोनॉमिक सोच वाले लोगों ने बड़े शानदार तरीके से किया और निष्कर्ष निकला कि अगर बहावलनगर और बीकानेर रियासतों में लोगों की बहबूदी की कोई परियोजना बने तो ये लोग वहां बस जाएंगे और अपराध घटेंगे।
राजनीतिक विज्ञानियों, समाजशास्त्रियों और अर्थशास्त्रियों ने मुकम्मल योजना बनाकर कहा कि अगर सतलुज का पानी इन दोनों इलाकों में पहुंचा दिया जाए तो लोग खेती करने लगेंगे। अर्ल ऑफ डफरिन ने कोशिश की, लेकिन बीकानेर के तब के शासक डूंगरसिंह नहीं माने। मार्क्वेस ऑफ लैंड्स डाउने ने भी कोशिश की, लेकिन उनके समय में एक बड़ी उम्मीद थी। उन दिनों बीकानेर कोई स्वतंत्र रियासत उस तरह नहीं थी, जिस तरह उदयपुर, जोधपुर या जयपुर हुआ करते थे। बीकानेर में भले ही शासक डूंगरसिंह या गंगासिंह रहे, लेकिन यहां ब्रिटिश डोमिनेटिड रीजेंसी काउंसिल काम करती थी। असली शासक यह काउंसिल ही थी। नाम मात्र को डूंगरसिंहजी और गंगासिंहजी शासक थे। इस काउंसिल को भारत सरकार तय करती थी। यानी बीकानेर रियासत सीधे तौर पर ब्रिटिश डोमिनेटिड रीजेंसी काउंसिल से गवर्न होती थी। बहरहाल, इसी काउंसिल ने डूंगरसिंहजी के समय ही गंगासिंहजी को मेयो कॉलेज में पढ़ाने, ऑक्सफोर्ड भेजने और उन्हें सैनिक प्रशिक्षण देना तय किया था। ये फैसले भी स्थानीय राजपरिवार के नहीं, ब्रिटिश काउंसिल के थे। इसके बाद अंगरेजों द्वारा गंगासिंहजी जब शासक बनाए गए तो वे अंगरेजों के फैसले हूबहू लागू करने लगे। आर्यसमाज के सुधारकों को बीकानेर से देशनिकाला देने और आजादी की मांग करने वालों को बाहर निकालने और स्कूल तक नहीं खुलने देने जैसे फैसले अंग्रेज शासकों से निर्देशित थे।
चूंकि अंगरेजों को अपने प्रोविंस में अपराध कम करने थे, इसलिए उन्होंने बजरिए गंगासिंहजी बीकानेर नहर का प्रोजेक्ट बनवाया और उसे पूरा करवाया। यह प्रोजेक्ट लॉर्ड चेम्सफोर्ड के समय, यानी 1916 से 1921 के बीच बना। आपको यह भी याद दिलाता चलूं कि एक भयावह अकाल 1918-1919 के बीच भी पड़ा था। उस दौरान लॉर्ड चेम्सफोर्ड वायसरॉय थे। इस अकाल ने भी उत्तर भारत से लेकर दक्षिण भारत तक जो विकराल कहर बरपाया, वह अवर्णनीय है, जिसके नतीजे भी घोर मानवहंता रहे। इस तरह बार-बार अकाल पडऩा और बार-बार अंगरेजों के सीधे शासन वाले उत्तर भारतीय पंजाब और साथ लगते बीकानेर जैसे प्रोविंसेज में जब अपराध बेकाबू होने लगे तो अंगरेज प्रशासन की यह धारणा सुदृढ़ हुई कि अगर इन अपराधों को नियंत्रित करना है तो उन इलाकों में नए रोजगार पैदा करने होंगे, ताकि आपराधिक मानसिकता पैदा ही ना हो। उन लोगों को रोजगार से जोडऩा होगा, जिनकी मानसिकता अपराधों की ओर चुंबकीय ढंग से आकर्षित हो रही है। इस सोच से सतलुज का पानी बीकानेर रियासत में भेजने का फैसला हुआ। ऐसा सिर्फ बीकानेर ही नहीं, बहावलपुर और फिरोजपुर के लिए भी हुआ। इन तीनों रियासतों के लिए नहरें निकाली गईं।
आपको हैरानी होगी, 1923 में शुरू बीकानेर नहर, जिसे हम आजकल गंग कैनाल कहते हैं, वह 1925 में बनकर तैयार हो गई, दो साल में। यह काम अंगरेजों ने किया। भारतीय मजदूरों का पसीना इस नहर में आज भी बहता है। गंगनहर के पानी में उन लाखों मजदूरों के उस पसीने की महक आज भी आती है। 
इस काम में बीकानेर रियासत की प्रशासनिक और इंजीनियरिंग क्षमता जवाब दे गई तो अंगरेज सरकार ने पंजाब से जीडी रुडकिन और एक कमिश्नर, जिनका नाम फिलहाल मुझे याद नहीं आ रहा है, इन दो लोगों को भेजा। दोनों ने गंगनहर निर्माण के साथ-साथ कालोनाइजेशन का काम शुरू किया और 1, 2, 1 बीबी, 4 बीबी, 1 केके, 2 केके, 25 एमएल, 24 एमएल, 8 टीके, 5 केके, 36 एलएनपी आदि-आदि जैसे चकों के नाम आउटलेट्स के आधार पर रखे गये जिन्हें हम मोघा कहते हैं। मेरा अपना गांव चक 25 एमएल है। 
इस तरह इस रियासत के लिये महाराजा गंगासिंह से ज्यादा तो अर्ल ऑफ रीडिंग और लार्ड इरविन ने किया। इन दोनों वायसरॉय ने 1921 से 1926 और 1926 से 1931 के बीच गंगनहर के लिए जो किया, वह रिकॉर्ड पर है। लार्ड इरविन तो 26 अक्टूबर, 1927 के दिन फीरोजपुर हैड पर बीकानेर नहर में पानी प्रवाहित करने के उद्घाटन के मौके पर मौजूद थे। इस अवसर पर पं. मदनमोहन मालवीय को भी विशेष तौर पर बुलवाया गया था। 
तथ्य यह भी है कि बीकानेर में जिस तरह शिक्षा हासिल करने की छूट दो-चार उच्चवर्गीय जातियों का ही अधिकार था, उसी तरह जमीन भी इतनी ही जातियां खरीद सकती थीं या ऐसा व्यावहारिक रूप से हो रहा था। बीकानेर नहर निर्माण का खर्च जमीनें बेचकर एकत्र किया जाना था। गंगासिंहजी ने जिस वर्ग विशेष को जमीने खरीदने का प्रस्ताव दिया, वे जमीनें देखने तो गए लेकिन गगनचुंबी टीले देखकर उलटे पांव लौट गए। लोक प्रचलित बातों के अनुसार लौटते हुए उन्होंने तर्क दिया कि हमें क्या अपनी भावी पीढिय़ों को यहां रेत के धोरों में रुलाना है! ऐसा होने पर स्थानीय शासन को दिन में तारे इस चिंता में नजर आने लगे कि आखिर पैसा आएगा कहां से? अंतत: अंगरेज प्रशासन ने पंजाब के लोगों के बीच आमंत्रण भिजवाया, पंजाब के सिक्ख और जाट किसान अपनी शौर्यशाली, आत्मबल के साथ बीकानेर कैनाल क्षेत्र में उतरे और उन्होंने ऊंचे टीलों वाली जमीनें खरीदींं। उनके पैसे से ही गंगनहर के खर्च की पूर्ति हुई।
लेकिन कुछ ही समय बाद गंगासिंहजी ने किसानों पर भारी आबियाना लगा दिया जिसके विरोध में गंगानगर की धरती पर आंदोलनों का सूत्रपात हुआ। ये लोग बड़ी जांबाजी से लड़े। पंजाब के सिक्ख किसान अपने साथ नई सीख लेकर आए, खेती के उन्होंने नये तौर-तरीके अपनाकर मेहनत के नतीजे दिखाए। इस तरह बीकानेर रियासत में ही नहीं, समस्त राजस्थान में उन किसानों ने अपने परिश्रम, अपने पसीने और अपनी पावन तपस्या से गंगानगर को सिर तानकर खड़ा कर दिया। 
बीकानेर नहर के पानी के साथ कृषि ही नहीं, परिश्रम की एक नई संस्कृति भी आई। जातिविहीनता भी पैदा हुई। भेदभाव से ऊपर उठकर चलने की संस्कृति जन्मी। पंजाब के किसान आए तो अनूठी इठलाती पंजाबियत भी आई। शासन के खिलाफ लडऩे की ललक वाली संस्कृति पैदा हुई। 
इन नहरों को निकालने का अंगरेज सरकार का मकसद वाकई में न केवल पूरा हुआ, बल्कि ये हमारे आधुनिक प्रशासकों-आईएएस अधिकारियों के लिए अध्ययन और अनुशीलन का अनुकरणीय विषय होना चाहिए कि वे किसी इलाके में बढ़ती समाज-विरोधी गतिविधियों से किस तरह जूझें।
अंगरेजों से हमें यह सीख तो लेनी ही चाहिए कि उनकी तरह अगर हम काम करें तो समस्याओं को दूर कर सकते हैं, अपराधों से लड़ सकते हैं। हमें यह सोचना चाहिए कि हम अपने राजे-महाराजों की झूठी प्रशस्तियां कब तक पढ़ते रहेंगे और विदेशी आक्रांता के रूप में आए अंगरेज प्रशासकों की खूबियों और अच्छाइयों को निष्पक्ष होकर ग्रहण करने का काम कब करेंगे? हमें अपनी क्रूरताएं सदा करुणा का निर्झर लगती है, अपनी मूर्खताएं बुद्धिमत्ता की प्रज्ज्वलित ज्योतियां प्रतीत होती हैं, अपने खलनायक दिव्य आत्माएं लगती हैं। लेकिन सच यही है कि आज हम एक आजाद और सबल देश हैं। हमें हर चीज को क्रिटिकली ही देखना चाहिए। गंगनहर लाना तो दूर, गंगनहर का कंसेप्ट तक गंगासिंहजी के दिमाग में नहीं आ सकता था। यह अंगरेजों का काम था और उन्होंने किया। अंगरेजों ने गंगनहर ला दी, लेकिन गंगासिंहजी से लेकर आज के शासक तक पानी का सही बंटवारा नहीं करवा सके। हमारे इंजीनियरों ने अपनी इंजीनियरिंग की समस्त मेधा को कलंकित कर दिया है। हमारे प्रशासनिक अधिकारी किसानों को कभी सही पानी नहीं दिला पाए। किसान मुड्ढ़ और टेल के पाटों में कारुणिक ढंग से पिस रहा है।
-त्रिभुवन (28 अक्टूबर, 2015)
(दैनिक भास्कर के उदयपुर संस्करण के प्रभारी संपादक हैं)
20 फरवरी, 2020

Thursday, February 13, 2020

दिल्ली विधानसभा चुनाव परिणाम के बहाने देश के हालात पर चर्चा

आधे-अधूरे राज्य या कहें वृहत्तर निगम दिल्ली विधानसभा चुनाव के परिणाम आ गये हैं। उन्हें दोहराने के कोई मानी इसलिए नहीं है कि जिन्हें भी देश की लोकतांत्रिक प्रक्रिया में कैसी भी रुचि है, वह इससे वाकिफ हैं। इन परिणामों से कुछ बहुत खुश हैं, कुछ बहुत भौचक, ऐसे वही लोग हैं जिनके बारे में देश की चिन्ता में साझीदार लेखक मित्र अशोक कुमार पांडेय ने अपनी फेसबुक पोस्ट में लिखा है कि 'जनता पार्टी-कार्यकर्ता में और पार्टी-कार्यकर्ता भक्त में तबदील होते जा रहे हैं।' कुछ ऐसे भी हैं जो लोकतांत्रिक मूल्यों में भरोसा रखते हैं और जो मोदी-शाह के राज करने के तौर-तरीकों से सहमत नहीं हैं, ऐसे अधिकांश भले दिल्ली के चुनाव परिणामों से आशान्वित हो रहे हैं। उनकी यह आशा निराशा में बदलते देर नहीं लगेगी, यदि तुरन्त लोकसभा के चुनाव करवा लिये जाएं, सांप्रदायिक भीड़ में तबदील हुई बहुसंख्यक वर्ग की जनता शाह-मोदी को वर्तमान से भी ज्यादा बड़ी जीत दे देगी।
बीते एक-सवा साल में हुए चुनावों पर नजर डालें तो इसे अच्छे से समझ सकते हैं। इस दौरान राज्यों के विधानसभा के चुनाव जहां भी हुए, जनता ने वहां भाजपा को या तो खारिज कर दिया या फिर उत्साहवद्र्धक समर्थन नहीं दिया। इसे और ज्यादा अच्छे से समझने के लिए हमें इस तरह समझना होगा कि मोदी और शाह भाजपा का चुनाव चिह्न और झण्डा-बैनर चाहे उपयोग कर रहे हों लेकिन बहुसंख्यक समुदाय के सांप्रदायिक और भीरुओं के बड़े समूह ने उन्हें पार्टी से अलग मान लिया है। वे उनमें वह नायक देखने लगे हैं जो मुसलमान और पाकिस्तान जैसे प्रेत से मुक्ति दिला सकता है। इसके लिए आरएसएस-संघ ने वही भूमिका निभाई जो बालपन-किशोरवय में भूत-प्रेत की कथाएं सुनाने वाले अनायास निभा जाते हैं, इस भय को व्यापक तौर पर बिठाने में संघ को कई दशक लगे हैं। निजी जीवन में तो उम्र के साथ उन कथाओं से व्याप्त भय धीरे-धीरे हटता रहता है। लेकिन सार्वजनिक जीवन में उस भय को यथावत् रखने में अपने वाक्चातुर्य और अभिनय से मोदी और शाह सफल हैं। जनता भी अपने अधिकार और जरूरतों की पूर्ति के लिए जहां मतदान करते हुए राज्यों में अपने मत और मन को बदल लेती है वहीं, केन्द्र के चुनावों में मन पर हावी पाकिस्तानी-मुसलमानी प्रेत से भयभीत हो निर्णय करेगी। शाह और मोदी अपने आईटी सैल के द्वारा सोशल मीडिया खासकर वाट्सएप के माध्यम से इस प्रेत को बनाए रखने में सफल है। शाह-मोदी समर्थक जनता यह भी मान चुकी है कि पाकिस्तान और मुसलमानी भय से बचाये रखने की जिम्मेदारी शाह-मोदी की है, वे ही हमें बचाये रख सकते हैं और यह भी कि राज्य की सरकारों के यह बस की बात नहीं है। इसलिए राज्यों में वह स्थानीय वजहों, एंटी इंकम्बेसी और व्यक्तिगत पसंद-नापंसदगी से प्रभावित होकर मतदान करती है और केन्द्र में केवल 'प्रेत-भय' से निर्भय रहने के लिए। इस भय के सामने डूबती अर्थव्यवस्था, खत्म होते रोजगार और लगातार बिगड़ती कानून व्यवस्था गौण है। लोकसभा चुनावों में जिन्होंने मोदी-शाह को वोट किया है, उनसे बात करते ही पता चल जायेगा। वे इन मुद्दों को या तो जरूरी ही नहीं मानते या फिर इनके पक्ष में कोई वाट्सएपी तर्क पेश कर देंते हैं।  थोड़ा और अन्दर घुसेंगे तो मन में व्याप्त प्रेत-भय को उगलते भी देर नहीं लगायेंगे। राजनीतिक शब्दावली में इसे संघ की हिन्दुत्वी अवधारणा के बरअक्स नव-हिन्दुत्वी अवधारणा कह सकते हैं।
हम एक संविधान सम्मत लोकतांत्रिक व्यवस्था के नागरिक हैं, इसका भान हो तो पर मुश्किलों से निकलने के लिए विमर्श कर सकते हैं या फिर 1975-77 के आपातकाल में जिस तरह चुप होकर देखते रहे या तब की तरह ही शासकों में सद्बुद्धि आने का इंतजार करें। तब की शासक और अब के शासकों में संस्कारों का बड़ा अन्तर है। तब इंदिरा गांधी थीं, जो गांधी-नेहरू जैसे लोकतांत्रिक मूल्यों को जीने वाले लोगों के सान्निध्य में पली-बढ़ी थीं। लेकिन अभी के शाह और मोदी जिस संघ से शिक्षित-दीक्षित हैं, वहां मूल्यों की बात तो दूर, लोकतंत्र की अवधारणा में ही उनका भरोसा नहीं है। ऐसे में संविधान को ताक पर रखे होने पर भी आश्चर्य नहीं करना चाहिए।
रही विपक्षी दलों की और विपक्षी नेताओं की बात, आपातकाल के दौरान दलों को स्थगित और नेताओं को अन्दर कर दिया गया था, लेकिन इंदिरा गांधी ने जब चुनावों की घोषणा की तो उन्होंने सभी को छोड़ दिया। वर्तमान में परिस्थितियां एकदम भिन्न हैं। विपक्षीयों में समाजवादी अधिकांश भाजपा में पहुंच कर अपनी सोच को कुंद कर चुके हैं, रहे-सहे भ्रष्टाचार की भेंट चुके हैं। वामपंथियों पर संघ ने विदेशी-विधर्मी होने की छाप लगा दी है, कैडर बेस कहलाने वाली इस पार्टी के कैडर की पोल तो तब चौड़े आई, जब पता लगा कि ट्रेड यूनियनों के माध्यम से जुड़े कर्मचारी विचार से नहीं, केवल हित साधने को जुड़े थे। कुछ तो दो-तीन दशकों की सरकारों की श्रम विरोधी नीतियों ने और कुछ अन्य विचारों की या केवल इन्हें काउन्टर करने के मकसद से बनी ट्रेड यूनियनों ने भारत में वामपंथ को बेअसर कर दिया। 
सबसे बड़े रहे दल कांग्रेस ने केन्द्र में भी और अधिकांश राज्यों में भी अधिकांश समय तक शासन किया है। इसलिए वर्तमान परिस्थितियों और लोकतंत्र के सामने आयी चुनौतियों की बड़ी जिम्मेदारी से उसे बरी नहीं किया जा सकता। सबसे बड़ी जिम्मेदारी तो कांग्रेस की यह थी कि वह ऐसी व्यवस्था करती कि देश की जनता एक संवैधानिक लोकतंत्र के नागरिक के तौर व्यवहार करती और प्रतिक्रिया देती। दूसरी उसके शासन में भ्रष्टाचार जिस तरह से विकराल होता गया और खुद कांग्रेस के नेताओं की उसमें लिप्तता बढ़ती गई, कांग्रेस ने उसे नजरअन्दाज किया। परिवार आश्रित रही इस पार्टी में विवेकवान कम और जी-हुजूरिये नेताओं की भरमार हो गयी। सोनिया गांधी और वर्तमान शीर्षस्थ नेताओं को राजीव गांधी की असमय मृत्यु की वजह से जबरदस्ती नेतृत्व स्वीकारना पड़ा। अगली पीढ़ी के राहुल-प्रियंका को भी विरासत संभालने की मजबूरी राजनीति में चाहे ले आयी, लेकिन जब वे बड़े हो रहे थे तो विरासत में उन्हें देश और राजनीति की समझ देने वाला कोई नहीं था। अपने बूते समझने-बूझने की प्रक्रिया शुरू की तो अंग्रेजी में अभ्यस्त इन दोनों को अपनी बात भारत के बड़े हिन्दी-भाषी क्षेत्र में संप्रेषित करना मुश्किल हो गया। खैर इन सब से कांग्रेस कैसे पार पायेगी। इसकी वह जाने। 
यूं तो किसी भी शासन प्रणाली को लोकतांत्रिक मूल्यों के परिप्रेक्ष्य में आदर्शतम छोड़ आदर्श भी नहीं कहा जा सकता लेकिन हमारे देश ने जो बहुदलीय संसदीय शासन प्रणाली अपनायी, वही हमारे जैसे भौगोलिक, सांस्कृतिक व विभिन्न धार्मिक और भाषाओं की विभिन्नता वाले देश के लिए सर्वाधिक अनुकूल है। इस में अनेक दलों की भूमिका उसे और अधिक व्यापक बनाती है।
वर्तमान शासकों ने न्यायपालिका, कार्यपालिका और विधायिका जैसे लोकतंत्र के तीन संवैधानिक स्तंभों का जो हश्र किया है वह ज्यादा चिन्ताजनक है। विधायिका पर काबिज हो कार्यपालिका को मोदी और शाह ने ब्यूरोक्रेटस के माध्यम से अपने तक ही सीमित कर लिया है। मंत्रिमंडल की स्थिति सिर्फ हाथ उठाकर या हस्ताक्षर कर सहमति देने भर की ही रह गयी है। शासन और कानून व्यवस्था को सुचारु रखने के लिए बनी सीबीआई, ईडी, आइटी जैसी एजेंन्सियों का दुरुपयोग कर जब न्यायपालिका तक को दबाव में ले आया गया हो, ऐसे में अन्य सरकारी एजेंसियों और विपक्षी दलों के भ्रष्ट नेताओं की बिसात ही क्या। न्यायपालिका जिस तरह से प्रकरणों को निपटाने में देरी कर रही है या जिस तरह से फैसले दे रही हैं, उससे इसे और अच्छे से समझा जा सकता है। अपने कर्तव्यों के आलोक में लोकतंत्र का चौथा पाया कहलाने वाले मीडिया की स्थिति तो और बुरी है। वह या तो बिक चुका है या स्वार्थ के वशीभूत हो कर्तव्यच्युत हो चुका है या फिर किये हुए खोटों से अपने को बचाने में लगा है।
क्षेत्रीय दल और क्षत्रप अपने-अपने प्रदेशों में यदि सत्ता में है तो अपनी सत्ता को केन्द्र के कोप से बचाने में लगे हैं। जो भ्रष्ट रहे हैं, वे सीबीआई, ईडी, आईटी के भय से चुप हैं। ऐसी निराशाजनक स्थितियों से निकलने के लिये विवेकवान लोग या तो मोदी-शाह से सद्बुद्धि की असंभव सी उम्म्मीद कर सकते हैं या फिर किसी बड़ी चामत्कारिक घटना के घटित होने की। लेकिन निराश होकर बैठना तो गैर जिम्मेदार नागरिक होना है, जिसकी किसी भी विवेकशील मनुष्य से उम्मीद नहीं की जा सकती।
अन्त में यह कि जो आम आदमी पार्टी की सफलता और उसमें उम्मीद देख रहे हैं, वह इतना ही समझ लें कि अरविन्द केजरीवाल दिल्ली की 'सुपर मेयर' जैसी ही जिम्मेदारी ठीक ठाक निभा सकते हैं, वह प्रधानमंत्री तो क्या पूर्ण राज्य के मुख्यमंत्री की योग्यता भी नहीं रखते, वे ना अपनी कार्यप्रणाली से और ना ही मन से लोकतांत्रिक हैं। इतनी विविधताओं वाले देश की जरूरतों की समझ तो उन में हरगिज नहीं है।
बहुदलीय संसदीय प्रणाली में ही गठबंधन सरकारों की गुंजाइश होती है, ऐसी सरकारों में जन विरोधी या अलोकतांत्रिक निर्णयों की गुंजाइश न्यूनतम होती हैं, ऐसा हमने अपने यहां की गठबंधन सरकारों से अनुभव किया है। भारी बहुमत से आने वाली सरकारों में विचलन की आशंका ज्यादा होती है। 1971 में इन्दिरा गांधी को और 2019 में मोदी-शाह को मिले पूर्ण बहुमत के उदाहरण हमारे सामने हैं। इसीलिए केजरीवाल को 2015 और हाल ही में 2020 में मिले भारी बहुमत को लोकतंत्र के लिए शुभ नहीं मानना चाहिएमध्यमार्गी, दक्षिणपंथी, वामपंथी और उदार विचारधारा वाले मतदाताओं में वैचारिक भिन्नता का होना और सदनों में मंथन के लिए उनका प्रतिध्वनित होना भी जरूरी है।
—दीपचन्द सांखला
13 फरवरी, 2020

Thursday, February 6, 2020

बीकानेर कोटगेट क्षेत्र की यातायात समस्या : पाती डॉ. बीडी कल्ला के नाम

माननीय कल्लाजी,
सूबे की सरकार में आपकी हैसियत दूसरे नम्बर की है, यद्यपि हम बीकानेरी तो इसी से खुश हो लेते हैं। फिर भी आप अपनी इस हैसियत से शहर का कुछ विशेष भला कर पायें तो वह लम्बे समय तक उल्लेखनीय रहेगा।
आप मानेंगे या नहीं, इस शहर की सबसे बड़ी समस्या हाल-फिलहाल कोटगेट क्षेत्र के यातायात की है। इस तरह की समस्याओं के समाधान ना केन्द्र की सूची में है और ना ही समवर्ती सूची में, लेकिन इसे केन्द्र सूची का मसला मान आप निरवाले हमेशा होते रहे हैं। इसकी पुष्टि हाल ही के केन्द्र सरकार के बजट पर आयी आपकी प्रतिक्रिया से भी होती है। आपने अपनी बजट प्रतिक्रिया में बीकानेर रेल बायपास का प्रावधान ना होने की आलोचना करके ऐसा ही सन्देश दिया है।
सूबे के शासन में नम्बर दो की हैसियत पाये आपको सवा वर्ष होने को है, इस समस्या के समाधान के लिए आप और आपका प्रशासन जिस तरह की कवायद कर रहा है, उससे लग रहा है कि इसी कवायद में पांच वर्ष निकल जाने हैं। कोई भी काम सिरे तभी चढ़ता है जब उसे अच्छे से समझें और फिर लक्ष्य तय करें। समस्या न रेलवे लाइन है और ना ही रेल फाटक, ऐसी समस्याएं देश में लगातार विकसित होते सभी शहरों में मिल जायेगी। मनन करेंगे तो पायेंगे कि देश की ही नहीं, प्रदेशों की अधिकांश राजधानियों तक में शासन-प्रशासन ने इसे यातायात की समस्या माना और तद्नुसार अण्डरब्रिज, ओवरब्रिज और एलिवेटेड रोड बनाकर समाधान कर लिया। किसी शहर में यह नहीं देखा गया कि रेल लाइन को ही हटाने के लिए आन्दोलन किया गया हो या तीस वर्षों तक उसे भुगता हो। हम बीकानेरी कौन से ऐसे अति विशिष्ट हैं कि हमारे शहर की यातायात समस्या के समाधान के लिए रेलवे अपनी मिल्कीयत की जमीन छोड़, शहर से गुजरने वाली रेलगाडिय़ों के रनिंग-टाइम में आधे से डेढ़ घंटे तक का समय अतिरिक्त वहन करेगी। अंडरब्रिज, ओवरब्रिज और एलिवेटेड रोड जैसे संभावित तीनों समाधानों के आलोक में पहले भी कई बार विचार किया है, इन्हें एक बार फिर से साझा कर देता हूं।
इस समस्या को सबसे पहले उठाने और 1991 में लम्बा आन्दोलन चलाने वाली 'जनसंघर्ष समिति' तत्कालीन कांग्रेसनीत केन्द्र सरकार के रेलमंत्री सीके जाफर शरीफ और भाजपानीत सरकार में प्रदेश के मुख्यमंत्री भैरोंसिंह शेखावत द्वारा 23 जनवरी 1992 को दिए जुमले पर आज भी कुण्डली मारे बैठी हुई है। बिना यह समझे कि तब उन शासकों का मंतव्य लालगढ़-बीकानेर के रेल लाइन टुकड़े का शान्ति से गेज परिवर्तन करवाना भर था। इसलिए बायपास के तौर पर शहरियों को चूसते रहने के लिए खुद शहरियों का ही अंगूठा वे मुंह में दे गये। कुछ मौजिज और नादान शहरी इस समस्या के लगातार विकराल होने से लहूलुहान होते अपने अंगूठे को आज भी चूसने से बाज नहीं आ रहे हैं। 
जोधपुर शहर, जिससे विकास के मामले में बीकानेर सर्वाधिक ईष्र्या रखता है, के बीच से रेल लाइन निकलती है और उन्होंने अब तक सभी रेलवे क्रॉसिंगों पर अण्डरब्रिज-ओवरब्रिज बनवा लिए और हम हैं कि जैसलमेर के रियासती शासकों की तर्ज पर 'खड़ा सिक्का' लेने की जिद पर अड़े हुए हैं? जोधपुर शहर तो सूबे का ऐसा पहला शहर होने जा रहा है जो अपने बढ़ते यातायात की सुविधा के लिए चार किमी की एलिवेटेड बनाकर अपनी व्यस्ततम सड़क की क्षमता दोगुनी कर लेगा।
सन्दर्भ  : 1976 में तैयार मास्टर प्लान
मास्टर प्लान में इस समस्या के समाधान के लिए रेल बायपास का सुझाव तो जरूर दिया है, लेकिन उक्त प्लान में यह साफ सुझाया गया है कि बीकानेर जं. के वर्तमान स्टेशन को पूरी तरह हटाना होगा और इसके एवज में घड़सीसर और मुक्ताप्रसाद नगर में नये रेलवे स्टेशन बनाने होंगे। रेल बायपास हेतु मास्टर प्लान के सुझाव में वर्तमान बीकानेर जं. को हटाने और दो नये स्टेशन बनाने के इन सुझावों को बायपास की पैरवी में मास्टर प्लान का सहारा लेने वाले छिपाते रहे हैं। शहर के बाशिन्दे क्या इन स्टेशनों को बाहर भेजने के लिए तैयार हैं
राज्य सरकार द्वारा रेलवे को भेजे गये एमओयू का प्रारूप
[ सन्दर्भ : मुख्य प्रशासनिक अधिकारी (निर्माण) उत्तर-पश्चिम रेलवे, जयपुर जोनल कार्यालय द्वारा रेलवे बोर्ड के कार्यकारी निदेशक (वक्र्स) को लिखा पत्र क्रमांक NWR/S&C/W.623/BKN/BYPASS दिनांक 19.01.2005 ]
वर्तमान बीकानेर जं. यहां से हटा दिया जाय तथा लालगढ़ को ही बीकानेर का मुख्य स्टेशन बना दिया जाए। लालगढ़ से कोलायत की ओर जाने वाली रेल लाइन को 11 किमी के रेल बायपास के द्वारा जोधपुर की ओर जाने वाली रेल लाइन से उदयरामसर के  पास मिला दिया जाए। सच्चाई यह है कि उतर-पश्चिम रेलवे के जयपुर जोनल कार्यालय ने अपनी टिप्पणी में बीकानेर रेलवे स्टेशन को हटाने से इनकार कर दिया था।
रेल विभाग का इसमें यह भी कहना था कि राज्य सरकार के उक्त प्रस्ताव में बीकानेर से श्रीडूंगरगढ़ की ओर जाने वाली रेललाइन को इस बायपास से जोडऩे का कोई उल्लेख नहीं है। राज्य सरकार ने अपने एमओयू में यह चाहा था कि श्रीडूंगरगढ़ की ओर से बीकानेर आने वाली लाइन का जो आमान परिवर्तन होना है उसे बीकानेर तक न लाकर उदयरामसर में ही मिला दिया जाए। इस 16 किमी लम्बी रेललाइन का यह जोड़ वन विभाग की भूमि में से गुजरना था। ऐसे में यह बायपास कुल 27 किमी में पूरा होना था जब कि राज्य सरकार का प्रस्ताव मात्र 11 किमी. का ही था। रेलवे ने इससे भी इनकार कर दिया। 
    उक्त एमओयू में राज्य सरकार ने यह भी चाहा था कि लालगढ़ के वर्तमान रेलवे वर्कशॉप को बीकानेर स्थानांतरित कर दिया जाए ताकि बीकानेर-लालगढ़ के मध्य की वर्तमान रेललाइन को हटाये जाने पर मीटर गेज डब्बों के मरम्मत कार्य में बाधा ना आए। जाहिर है राज्य सरकार की मंशा यही रही होगी कि वर्तमान बीकानेर जं. स्टेशन हटाकर रेलवे अपने खर्च पर वर्कशॉप वहां स्थानान्तरित कर ले। क्योंकि रेलवे के पास बीकानेर में इसके अलावा कोई स्थान भी नहीं हैं। रेलवे ने इससे भी इनकार कर दिया।
इन दो बड़े कारणों के अलावा अन्य कई छिटपुट सहमति-असहमति की टिप्पणियों के साथ रेलवे के जयपुर जोनल कार्यालय ने उपरोक्त सन्दर्भित पत्र के द्वारा बायपास निर्माण पर जो रिपोर्ट रेलवे बोर्ड को भिजवाई उसके इस वाक्य पर शहरवासी कृपया गौर करें : हमें इस निर्माण कार्य को अपनी पिंकबुक से हटा लेना चाहिए क्योंकि यह कार्य व्यावहारिक प्रतीत नहीं होता। रेलवे अधिकारी यह भी बताते हैं कि रेलवे ने राज्य सरकार की वह रकम कभी की लौटा दी है। रेलवे द्वारा तब बन्द इस बीकानेर रेल बायपास प्रकरण पर कभी फिर पुनर्विचार किया हो, जानकारी में नहीं।
मास्टर प्लान 1976 के बायपास प्रावधानों तथा राज्य सरकार के एमओयू प्रारूप के उपरोक्त दिये गये तथ्यों पर गौर कर विचारें कि उक्त दोनों प्रस्तावों के प्रावधानों पर बीकानेर की आम जनता सहमत हो सकती है, दोनों में ही वर्तमान बीकानेर स्टेशन को हटाए जाने की बात है। जो यह भ्रम फैलाया जा रहा है कि रेलवे रेल बायपास के लिए तैयार है, वह भी रेलवे के उक्त पत्र की भाषा से नहीं लगता। इस तरह हमें मान लेना चाहिए कि राज्य सरकार द्वारा जमीन और धन उपलब्ध करवाने के बावजूद रेलवे शहर के बीच से गुजरने वाली लाइन को नहीं हटायेगा, सवारी गाडिय़ा यथावत शहर से चलेंगी। ऐसे में शहर की यातायात समस्या का समाधान कैसे मिलेगा।
रेल अण्डरब्रिज
दूसरा विकल्प अण्डरपास या रेल अण्डरब्रिज बनाने का है जिसे नगर विकास न्यास ने सात वर्ष पहले दिया था। यह आरयूबी सांखला फाटक पर इसलिए नहीं बन सकता कि एक तरफ सट्टा बाजार चौराहा है तो दूसरी ओर कोयला गली, ऊपर से स्टेशन की ओर जाने वाले मार्ग पर चढ़ाई भी ज्यादा है। अत: गुंजाइश कोटगेट रेल फाटक पर निकाली गई। हालांकि सांखला फाटक जितनी समस्या तो यहां नहीं है, लेकिन कम भी नहीं है। जहां एक ओर मिर्च गली है तो दूसरी ओर कैंची गली, वहीं कोटगेट की ओर कुछ चढ़ाई भी है। बीच बाजार में होने के चलते लगभग पचास दुकानें जहां सीधे प्रभावित होंगी वहीं अंदरूनी गलियों वाले इतने ही व्यापारी प्रभावित हुए बिना नहीं रहेंगे। यदि यह आदर्श समाधान हो तो इन प्रभावितों का त्याग हथियाया जा सकता है लेकिन जो असल समस्या बारिश के दिनों में आधे अन्दरूनी शहर का पानी कोटगेट से होते हुए इसी रेल फाटक से गुजरने की है। इस बेशुमार पानी के निकास की व्यवस्था हालांकि असंभव नहीं है, चार-पांच फीट चौड़े पाइप से रानी बाजार पुलिया तक इसे ले जाया जा सकता है लेकिन इस व्यवस्था का रखरखाव नगर निगम या नगर विकास न्यास, दोनों में से जिसे भी करना हो, रख-रखाव की मुस्तैदी इन दोनों महकमों की किसी से छुपी नहीं है। ऊपर से हम शहर वाले सीवर लाइन को जिस तरह कचरा पात्र के रूप में बापरने के आदी हैं वह भी कोढ़ में खाज ही है। निम्न उदाहरणों से अण्डरब्रिज की भयावहता का अन्दाजा लगा सकते हैं--यहां यह भी जानकारी रखना जरूरी है कि आरयूबी यदि दस फीट भी गहरा किया जाता है तो 2 फीट रेल लाइन के गर्डर जोड़कर यह गहराई बारह फीट हो जायेगी। ट्रांसपोर्ट प्लानरों के हिसाब से इसके लिए ढलान-सड़क की एक तरफ की आदर्श लंबाई कम से कम 240 फीट होनी चाहिए। क्योंकि कम सड़कीय ढलान का अनुपात हलके वाहनों के लिए बीस फीट पर एक फीट का होना माना गया है। ऐसे में दोनों तरफ 250 फीट लम्बी सड़क कहां से आयेगी और क्या-क्या प्रभावित होगा देखने वाली बात है।
दूसरा उदाहरण दस बारह वर्ष पहले महात्मा गांधी रोड का है जहां आकाश बिलकुल साफ था लेकिन अचानक बारिश के मौसम की तरह कोटगेट होते हुए भीतरी शहर से पानी का रेला आ गया। बाद में पता चला कि कोई छितराई बदली अन्दरूनी शहर पर अच्छे से बरसी थी। इसीलिए कहा गया है कि प्रकृति आपको संभलने का अवसर नहीं देती। पानी अचानक ऐसे आ जाए और आरयूबी का पाइप कहीं पर डटा हो तो अण्डरब्रिज को भरने में इतनी देर भी नहीं लगेगी कि सघन यातायात को रोककर अन्दर वालों को बाहर भी किया जा सके। चलो किया भी जा सके तो ऐसा करेगा कौन? राजधानियों की व्यवस्थाओं से तुलना करना ज्यादती होगी। वहां शासक खुद बैठते हैं। यहां तो जिनके जिम्मे है वे जरूरत पर दफ्तर में ही नहीं मिलते।
इसे यहीं के उदाहरण से समझ लें। सूरसागर की समस्या के हल में शहर से आने वाले पानी को इसमें जाने से रोकना भी है। कोटगेट होते हुए आने वाले पानी का गंतव्य सूरसागर ही है। सूरसागर की सफाई के साथ इसके दो तरफ पर्याप्त चौड़े पाइप डाल कर पानी निकासी के लिए जगह-जगह जालियां लगाई गई हैं। जालियां इन बारह वर्षों में कभी सही नहीं रही--वहां से गुजरने वाले अतिरिक्त सावधानी नहीं बरतें तो दुर्घटनाएं होती ही हैं। अलावा इसके जिस जरूरत के लिए यह जो डायवर्जन पाइप लाइन डाली गयी, वह इन बारह वर्षों में जरूरत पर कितनी बार दुरुस्त मिली कि बारिश का पानी सर्राटे से उसमें से होकर गुजर गया हो। जब तक पाइप के जाम को निकाला जाता है तब तक बरसाती पानी या तो सूरसागर में गिरता है या फिर रास्ता बनाकर जूनागढ़ की खाई में डालना पड़ता है। समाधान कुछ वैसा ही तो होना चाहिए जैसा हमारा स्वभाव है या जिस तरह की आदतें यहां के सरकारी कारकुनों के काम करने की हो लीं है। 
अभी हाल में यह भी सामने आया कि कोयला गली से मटका गली के बीच अण्डरब्रिज की संभावना तलाशें। अवश्य तलाश लें, संभव हो तो योजना को सिरे चढ़ाना चाहिए। लेकिन रेलवे लाइनों की अधिकता के चलते क्षेत्र की यहां चौड़ाई बहुत ज्यादा है, वहीं गंदे पानी का एक नाला भी है।
एलिवेटेड रोड समाधान : शंकाएं
आरयूआईडीपी द्वारा 2005-06 में बनी एलिवेटेड रोड योजना को भारत सरकार के परिवहन मंत्रालय के सेवानिवृत्त अभियन्ता अजीतसिंह की देखरेख और बीकानेर के अभियन्ता अशोक खन्ना और हेमन्त नारंग के सहयोग से बनाया गया जिसमें रेलवे के अभियन्ता एनके शर्मा की सलाह-सहयोग भी महत्त्वपूर्ण रहा है। 
आपकी सुविधा के लिए एक बार पुन: उस प्रोजेक्ट की जानकारी साझा कर रहा हूं। लगभग 26 फीट चौड़ाई की यह डबललेन एलिवेटेड रोड महात्मा गांधी रोड स्थित रिखब मेडिकल स्टोर वाले बड़े चौक से चढ़कर फड़बाजार चौराहे से सांखला फाटक की ओर घूमनी है। वहां से नागरी भण्डार तक पहुंचकर दो शाखाओं में विभक्त होकर एक शाखा रेलवे स्टेशन जाने वाले यातायात के लिए मोहता रसायनशाला के आगे उतरेगी तो दूसरी शाखा अन्दरूनी शहर की ओर जाने वालों के लिए फोर्ट स्कूल के पास राजीव मार्ग पर।
एलिवेटेड रोड की इस आरयूआईडीपी योजना में थोड़ा विस्तार देकर इसके स्टेशन की ओर वाले सिरे को रेलवे स्टेशन के मुख्यद्वार पर तथा रानी बाजार की ओर जाने वाले यातायात को पीडब्ल्यूडी डाक बंगले के पीछे की ओर उतारा जा सकता है, उसी के एक सिरे को रानी बाजार से आने वाले यातायात के लिए आयकर कार्यालय के आगे से चढ़ाया जा सकता है। मूल योजना की चौड़ाई में इतना परिवर्तन जरूर किया जा सकता है कि महात्मा गांधी रोड और स्टेशन रोड से गुजरने वाली एलिवेटेड रोड को बिना किसी भवन के हिस्से का अधिग्रहण किए सड़क की चौड़ाई यदि बढ़ाई जा सकती है तो बढ़ानी चाहिए। चाहे वह 2-3 फीट ही क्यों ना बढ़े।
अलावा इसके इस योजना के लिए कई नकारात्मक बातें फैलाई जा रही हैं। पहली यह कि इसके निर्माण के बाद सांखला फाटक को दीवार बनाकर हमेशा के लिए रेलवे बंद कर देगा। लेकिन यह नहीं बताया जा रहा है कि रेलवे ऐसा किस स्थिति में करेगा और किस स्थिति में नहीं। रेलवे का यह कायदा है कि एलिवेटेड रोड या रेलवे ओवरब्रिज, अण्डरब्रिज के निर्माणकार्य में रेललाइन के ऊपर या नीचे के हिस्से का निर्माणकार्य सुरक्षा सावचेती के चलते रेलवे खुद करवाता है। इसमें रेलवे के मानदंड हैं कि स्थानीय प्राधिकरण या राज्य सरकार रेलवे क्षेत्र के उक्त निर्माणकार्य का भुगतान करना स्वीकार कर लेते हैं तो रेलवे उस रेलवे क्रॉसिंग को यथावत रखता है अन्यथा उसे हमेशा के लिए बन्द कर देता है। रेलवे का व्यावहारिक तर्क है कि जब एलिवेटेड रोड या रेलवे ओवरब्रिज के ऊपरी हिस्सों के निर्माण का पैसा विभाग ने लगा दिया तब वह क्यों द्वारपालों की तनख्वाह भुगते और क्यों उस फाटक का मेंटीनेंस भुगते। 2006-07 में बनी योजना अनुसार स्थानीय एलिवटेड रोड लगभग एक किलोमीटर का बनना है जिसका पूरा खर्च राज्य सरकार को ही वहन करना चाहिए-यह कोई बड़ी रकम भी नहीं है, एनएचएआई के अधीन देने से ही यह योजना न्यायिक पेचीदगियों में उलझी है। 
एलिवेटेड रोड योजना से क्षेत्र के व्यापारियों की व्यापार घटने की जो शंका है वह भी निर्मूल इसलिए है कि अभी जो 70 प्रतिशत यातायात महात्मा गांधी रोड और स्टेशन रोड को केवल आवागमन के तौर पर उपयोग कर भीड़ बढ़ाता है वह एलिवेटेड रोड से सीधे गुजर जाएगा। ऐसे में इन बाजारों के जो असल खरीददार हैं उन्हें खरीददारी के लिए न केवल पर्याप्त सहूलियत मिलेगी बल्कि उन्हें वाहन पार्किंग का पर्याप्त स्थान भी मिल जायेगा। इसलिए क्षेत्र के व्यापारियों को इस एलिवेटेड रोड योजना पर सकारात्मक रुख अपना लेना चाहिए।
बायपास और एलिवेटेड रोड समाधानों पर अपने-अपने तर्क
बायपास निर्माण में मोटा-मोट 30-32 किमी की नई रेललाइन डलनी है जिस पर नाल और लालगढ़ स्टेशन के बीच एक नया रेलवे स्टेशन भी रेलवे द्वारा प्रस्तावित है। इसमें यह भी कि रेलवे लालगढ़ और बीकानेर के स्टेशनों को यथावत रखना चाहता है और दोनों के बीच की वर्तमान रेललाइन को भी। रेलवे का मानना है कि वह सवारी गाडिय़ों को पुराने मार्ग से ही गुजारेगा, यात्री गाडिय़ों के संचालन समय को कम करने का दबाव रेलवे पर हमेशा रहता है। ऐसे में यात्री रेल गाडिय़ों को बायपास से गुजारने के लिए लगभग एक-डेढ़ घंटे का अतिरिक्त समय रेलवे कैसे वहन करेगा। 
बायपास के बहाने एलिवेटेड रोड का विरोध करने वालों की तरफ से यह भी कहा जा रहा है कि एलिवेटेड रोड बनने से बीकानेर जं. रेललाइन के दोहरीकरण और विद्युतीकरण से वंचित हो जाएगा। एलिवेटेड रोड बनने से विद्युतीकरण के काम पर तो कोई आंच नहीं आनी है, तमाम ओवरब्रिजों और एलिवेटेड रोड के नीचे से रेलवे की विद्युत लाइनें निकलती ही हैं। रही रेल लाइन के दोहरीकरण की बात, तो बीकानेर-लालगढ़ स्टेशन के बीच की रेललाइन लगभग पौने चार किमी की ही है, यदि यह लाइन सिंगल रहकर शेष का दोहरीकरण होता है तो इस छोटे टुकड़े का सिंगल ट्रेक रहने से गाडिय़ों के संचालन में कोई खास बाधा नहीं आनी है।
कल्ला साहब!
अन्त में आपसे यही आग्रह है कि आपके इस कार्यकाल में शहर की इस समस्या का कोई व्यावहारिक हल निकलवा देंगे तो यह शहर आपको हमेशा याद करेगा। जरूरत सिर्फ मन बनाने की है।
—दीपचन्द सांखला
6 फरवरी, 2020