Thursday, August 26, 2021

देश की तासीर में जबरिया बदलाव

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) अपनी स्थापना के बाद के 95 वर्षों से अपने एजेंडे पर बड़ी चतुराई से जुटा है बल्कि यह कहना अतिशयोक्ति में नहीं आयेगा कि इसका अनुगमन करने वाले बड़ी धूर्तता से लगे हैं। यह सर्वविदित है कि संघानुगामियों का आजादी के आंदोलन में किसी तरह का योगदान तो दूर की बात, ये अंग्रेज शासकों और अलगाववादियों के लिए अनुकूलता बनाने में ही लगे रहे।

कहने को आरएसएस एक सामाजिक संगठन है, अपनी अपंजीकृत इकाइयों—शाखाओं—में यह दिखावे के तौर पर तयशुदा रूढ़ और विवादहीन गतिविधियां करते हैं, वहीं तय आयोजनों के अलावा अपने शाखा-साथियों की अनौपचारिक बैठकों-मुलाकातों में घृणा के बीज बोते नहीं थकते जाति और धर्म श्रेष्ठता की बातें कर चार वर्णों में बंटी जातियों में तथाकथित सवर्णों में भी एक विशेष ब्राह्मण-समूह को श्रेष्ठ और उन्हीं के कहे को अनुकरणीय स्थापित करने में अपरोक्ष तौर पर जुटे रहते हैं। बात यहीं खत्म नहीं होती, इस पर कायम रहने की जरूरत वे इसलिए बताते हैं कि यदि सदियों पुरानी इस व्यवस्था को पुख्ता नहीं रखेंगे तो दूसरे धर्म के—खासकर इस्लाम और ईसाई हमारे धर्म को समाप्त कर देंगे। इसके लिए गढ़ी गई झूठी ऐतिहासिक घटनाओं को प्रचारित करते हैं या ऐतिहासिक घटनाओं की अपने ऐजेंडे के अनुकूल 'संघ-घडंत' व्याख्या बताते रहे हैं।

इस तरह की झूठी बातें भय पैदा करती हैं और भय कायरता। कायरता की पीठ पर हाथ लगते ही वह हिंसक होते देर नहीं लगाती। मोदी-शाह की शासनशैली ऐसे ही कायरों की पीठ पर हाथ रखने में कारगर साबित हो रही है। नतीजतन जिनके विरुद्ध फिलहाल सर्वाधिक विषवमन किया जा रहा है उस मुस्लिम समुदाय के कमजोर लोगों के साथ ये कायर हिंसक होकर घृणा का वमन करने लगे हैं। गो-पालन में लगे मुसलमानों को गो-वंश के परिवहन में बड़ी दिक्कत आने लगी है। पहले उनके साथ सीधे हिंसा होती थी लेकिन जब से रंगदारी तय हो गयी तब से ये तथाकथित गो-भक्त रंगदारी वसूलने और गो-वंश का निर्बाध परिवहन होने दे रहे हैं। इस तरह गो-भक्तों का तथाकथित शौर्य ठण्ड पी गया। 
जो रंगदारी वसूलने में लग गये, वे तो काम लग गये, लेकिन अन्य कायर दूसरे-दूसरे तरीकों से अपनी घृणा के वमन में लग गये हैं, रोटी-रोजी में लगे मुस्लिम समुदाय के लोगों पर जब-तब 'चढ़ी' करने लगे। इन्दौर में हाल ही की एक घटना में चूड़ी बेचने वाले मुस्लिम युवक का सामान बिखेरते हुए इन्हीं कायरों ने इस हीनता में पीट दिया कि वह चूड़ी पहनाने के बहाने हिन्दू स्त्रियों के हाथों को छूता है।

इन्दौर के चूड़ी विक्रेता पर जो एक आरोप चस्पा किया गया, वह यह कि हिन्दू नाम रखकर ऐसा कर रहा है। हिंसक कृत्र्य का ऐसा बचाव करने वाले ऐसा क्यों नहीं सोचते कि रोटी-रोजी के लिए उसे नाम बदलने की नौबत क्यों आयी। इन कायर-हिंसकों ने देश में ऐसा माहौल बना दिया है कि अल्पसंख्यक अपनी असल पहचान के साथ मजदूरी भी नहीं कर सकता। यहां वर्षों पहले का उदाहरण दोहराना चाहता हूं—मेरे एक पड़ौसी मुस्लिम युवक थे मुमताज, जो हनुमान भक्त थे। सादुलगंज स्थित ग्रेजुएट हनुमान मन्दिर के परम भक्त। एक दिन मन्दिर में मुझसे टकरा गये, देखकर सकपकाए—किनारे ले गये और बोले कि मेरी पहचान मत बताना, मेरी पहचान यहां मूलचन्द नाम से है। ऐसा उन्हें इसलिए करना पड़ा, क्योंकि उस मन्दिर के तब के पुजारी जनार्दन व्यास मन्दिर में श्रद्धालु का नाम और जाति पूछकर ही प्रवेश देते थे, पहचान इसलिए भी छुपानी पड़ती है। संघानुगामियों की बेशर्मी की हद तो तब देखने में आयी जब मध्यप्रदेश के गृहमंत्री उस चूड़ी विक्रेता युवक पर हमला करने वालों का ढिठाई से बचाव करने प्रेस से मुखातिब हुए। 

हमारे बीकानेर का ही उदाहरण लें, यहां चूड़ी व्यवसाय में सदियों से जो मुस्लिम समुदाय लगा है, उसे चूड़ीगर कहा जाता है, उनकी कभी कोई एळ-गेळ शिकायत सामने नहीं आयी।

इस देश की तासीर बदलने में वर्तमान शासक जो लगे हैं, उसकी कीमत हमें अपना सुख-चैन खोकर चुकानी होगी। अर्थव्यवस्था का भट्टा इन्होंने पूरी तरह बिठा ही दिया है, सामाजिक-समरसता से भी इनकी दुश्मनी कम नहीं है। हम अब भी नहीं जागे तो क्या कुछ खो देंगे, उसकी कल्पना मात्र से ही सिहर उठते हैं।
―दीपचन्द सांखला
24 अगस्त, 2021

Thursday, August 5, 2021

बीकानेर शहर की समस्याएं : हम कब तक अंगूठा चूसते रहेंगे

स्वायत्त शासन मंत्री शान्ति धारीवाल प्रशासन शहरों के संग कार्यशाला के बहाने बीते शनिवार को बीकानेर में थे। अकेले मंत्रीजी ही नहीं, उनका पूरा सचिवालय शुक्रवार शाम बीकानेर पहुंच गया था। मंत्रीजी होटल लक्ष्मी निवास पैलेस में ठहरे, जबकि उनके मुख्यमंत्री सर्किट हाउस में ही ठहरते हैं। लाखों रुपयों की इस खर्चीली यात्रा से शहर को क्या हासिल होगा, फिलहाल दावा छोड़ अनुमान भी नहीं लगा सकते। इस तरह के औपचारिक आयोजनों को मीडिया अच्छी-खासी सुर्खियां चाहे दे, इनके शून्य परिणामों का मीडिया कभी जिक्र नहीं करता।

खैर! ऐसी रातों के झांझरके ऐसे ही होते हैं। शहर की दो बड़ी समस्याएं—कोटगेट क्षेत्र की यातायात समस्या और दूसरी सफेद हाथी सूरसागर की—दोनों का मौका मुआयना मंत्रीजी ने किया है। सूरसागर को सफेद हाथी इसलिए लिखा कि जबसे इसे साफ किया गया है, तब से इसे एक बार भी एक चौथाई नहीं भरा जा सका है। अनेक ट्यूबवेलों और नहरी पानी की आमद के बावजूद यही स्थिति है। सफाई के बाद बीते 13 वर्षों में इसकी मरम्मत और रखरखाव पर ही करोड़ों खर्च किये जा चुके हैं।

बरसाती और गन्दे पानी की आवक पर इसके लिए अलग से सीवरेज लाइन डालने और फिल्टर प्लांट लगाने का तख्मीना बनाने का आदेश तो धारीवालजी दे गये हैं, लेकिन इसे भरा कैसे रखा जायेगा, इस पर बात नहीं की गई। रियासत काल में सूरसागर जिस आगोर से भर जाता था, वह अब अधिकतर तो छावनी क्षेत्र में आ गई तो कुछ बसावट की भेंट चढ़ गई है। जब कृत्रिम साधनों के पानी से पार नहीं पडऩी तो इसे वर्तमान रूप में बनाये रखना सफेद हाथी पालने जैसा ही है।
यह बात पूर्व मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे के समझ आ गयी थी। जून, 2014 में 'सरकार आपके द्वार' के तहत वे जब बीकानेर आयीं तो उन्होंने कुछ पत्रकारों को गजनेर पैलेस में बातचीत के लिए बुलाया था। तब मैंने सूरसागर से संबंधित उपरोक्त बात की थी तो राजे ने पूछा विकल्प क्या हो सकता है? मैंने सुझाया इसे इसी गहराई में डेजर्ट पार्क के तौर पर विकसित किया जा सकता है। जिसमें थार मरुस्थल के पेड़-पौधे लगाये और ऐसे जीव-जन्तुओं को रखा जा सकता है जिन पर वन विभाग को एतराज न हो। सूरसागर के सामने जूनागढ़ किला है जहां रोजाना हजारों की संख्या में देशी-विदेशी पर्यटक आते हैं। उनके लिए डेजर्ट पार्क के तौर पर आकर्षण का एक और केन्द्र हो जायेगा। राजे ने इस पर सहमति जतायी और जाते हुए इसकी घोषणा भी की—लेकिन जयपुर पहुंच कर इसका फोलोअप वे भूल गयीं।

उसी मुलाकात में राजे से जो अन्य बात हुई उसमें कोटगेट क्षेत्र की यातायात समस्या के एकमात्र व्यावहारिक समाधान एलिवेटेड रोड पर भी मेरी बात हुई थी, राजे यह घोषणा करके गयीं कि आरयूआईडीपी द्वारा बनाई गयी योजनानुसार मार्च, 2015 तक इसका शिलान्यास करने वे खुद आएंगी। लेकिन हुआ यह कि बीकानेर पश्चिम के विधायक और अब दिवंगत गोपाल जोशी को उस पर इसलिए एतराज था कि एलिवेटेड रोड उनके व्यावसायिक प्रतिष्ठान के ठीक सामने उतर रही थी। इस कारण यह योजना भी ठण्डे बस्ते में चली गयी।
सूरसागर का तो जो होगा वह होगा, उससे अब किसी को सीधे परेशानी नहीं है। लेकिन कोटगेट क्षेत्र की यातायात समस्या से शहर के लाखों बाशिन्दे परेशान हैं और शहर नुमाइंदे इस पर गंभीर नहीं हैं। बीकानेर पूर्व की विधायक सिद्धिकुमारी को चुनाव जीतने के अलावा कोई लेना-देना शहर की समस्याओं का कभी रहा ही नहीं तो उनसे उम्मीद क्या करें। लेकिन बीकानेर पश्चिम विधायक डॉ. बी डी कल्ला जब-तब शहर हित के दावे करते रहते हैं तो उम्मीद उन्हीं से रख सकते हैं। कल्ला अब तक इस समस्या के समाधान के तौर पर बायपास की जिद्द पकड़े बैठे हैं, और शायद समझना चाहते भी नहीं हैं। एलिवेटेड रोड जैसे व्यावहारिक समाधान को नजरअंदाज कर दूसरे-दूसरे समाधानों पर समय जाया कर रहे हैं। बीते एक वर्ष से उन्होंने नगर विकास न्यास को आरयूबी (रेल अण्डरब्रिज) योजना पर लगा रखा है। योजना जैसी-तैसी बनी भी, लेकिन अपनी हाल ही की इस यात्रा में धारीवाल उसे अव्यावहारिक बता खारिज कर गये हैं। धारीवाल को इससे ज्यादा मतलब भी नहीं है। कल्ला के पास अब दो वर्ष भी नहीं बचे हैं। वे चाहें तो 6 फरवरी, 2020 को इस समस्या पर उन्हें लिखे मेरे उस पत्र को पढ़ सकते हैं जिसमें इसके समाधान से संबंधित सभी विकल्पों का विस्तार से उल्लेख है। वे चाहेंगे तो उस पत्र की प्रति मैं पुन: उपलब्ध करवा सकता हूं। शहर की जनता इस समस्या से बीते चार दशकों से भी ज्यादा समय से त्रस्त है।

यातायात संबंधी ऐसी ही समस्याओं के समाधान के लिए जोधपुर और अजमेर में एलिवेटेड रोड बीच बाजार में बन रहे हैं और हम हैं कि उस एक मात्र व्यावहारिक समाधान से बिदकते रहते हैं। हमारे नुमाइंदों की सकारात्मक सोच होती तो 2006-07 में जब यह योजना बनी तभी काम शुरू हो जाता तो 2009-10 तक शहरवासी सुकून से आवागमन करते। लगता तो नहीं है कल्ला इस पर तत्पर होंगे लेकिन मेरा धर्म अवगत करवाते रहना है, सो बार-बार करवाता रहा हूं ओर आगे भी करवाता रहूंगा।
―दीपचन्द सांखला
5 अगस्त, 2021

Wednesday, July 21, 2021

पाती देवीसिंह भाटी के नाम

मान्य देवीसिंहजी!

आपातकाल के दौरान 1977 के लोकसभा चुनावों में आपको जब पहले-पहल देखा, तब मैं 18 वर्ष का भी नहीं हुआ था। बीकानेर लोकसभा क्षेत्र से हरिराम मक्कासर जनता पार्टी से उम्मीदवार थे। इन चुनावों में जनता में जैसा उत्साह था वैसा माहौल उससे पहले (1967 से चुनावी राजनीति में सक्रिय हूं) और आज तक किसी चुनाव में नहीं देखा। 

तब का वह दृश्य याद है जब दिनभर घूम-घुमाकर शाम को डागा बिल्डिंग पहुंचते और पांच नम्बर से लेकर नीचे सड़क तक खड़े समूहों से फीडबैक सुनते और खुश होते। उन्हीं चर्चाओं में सर्वाधिक जिस नाम की चर्चा होती वह देवीसिंह भाटी था। बिना हुड की जीप में शाम और देर शाम जब भी आप डागा बिल्डिंग पहुंचते-हमारे जैसे कई नवयुवा घेर लेते और पूछते—क्या रिपोर्ट है। आप इतना ही कहते...बढिय़ा और मुख्य चुनाव कार्यालय की ओर चल देते। नायक सी वह छवि स्मृतियों में आज भी कहीं अंकित है।

अभी पत्र लिखने का हेतु इसलिए बना कि इन दिनों आपने बीकानेर शहर से लगती ओरण (गोचर) को बचाने का बीड़ा उठाया है। इस लंबी-चौड़ी ओरण को बचाने के लिए बनवाई जा रही चारदीवारी इस काल में छोटे-मोटे भागीरथी प्रयास से कम नहीं है। इसे आप पूर्ण करवा देंगे तो महानगरीय शब्दावली में यह ग्रीन जोन कहलायेगा।

यह काम शुरू हो गया और आपकी देख-रेख में हो रहा है तो पूरा होगा ही। मेरे इस पत्र के प्रयोजन इतना ही महत्त्वपूर्ण माने या इससे ज्यादा, यह तय आपको करना है। वह प्रयोजन है—कोलायत के कपिल सरोवर के पौराणिक वैभव को लौटाने का। इसके एक सोपान के तौर पर जलकुम्भी हटाने का काम आपने कुछ वर्ष पूर्व करवाया था। यह बात अलग है कि सरोवर में जलकुम्भी फिर लौट आयी, किन कारणों से लौटी, विशेषज्ञों की राय से उसे तो हमेशा के लिए हटाना ही है। अन्य जो काम हैं सरोवर की आगोर को बचाना और उसके 52 घाटों का जीर्णोद्धार करवाना। घाटों का जीर्णोद्धार तो आपके लिए बड़ा काम नहीं है लेकिन आगोर को सुरक्षित रखना और हमेशा के लिए सुरक्षित रखना-रखवाना बड़ा काम है।

इसके लिए आपको न केवल अपनी सामाजिक हैसियत का उपयोग करना होगा बल्कि अपनी राजनीतिक हैसियत का उपयोग भी करना होगा। इस आर्थिक युग में धन के भूखों का राम होठों तक ही है—हिये तक नहीं। अन्यथा धन के ये भूखे कम से कम कोलायत सरोवर के आगोर क्षेत्र को तो अवैध खनन से मुक्त रखते। सरकारी मुलाजिमों से आगोर क्षेत्र में खनन पट्टे जारी भी हो गये हैं तो उन्हें रद्द करवाना और यह जाप्ता करना भी जरूरी है कि भविष्य में यह भूल दोहराई न जाए। आप मुनादी करवा देंगे तो पूरा भरोसा है कि आगोर के उस क्षेत्र में अवैध-खनन का काम रुक जायेगा। एक और प्रयास क्षेत्र के प्राकृतिक सौंदर्य को लौटाने का है। खनन के ओवर बर्डन से निकली मिट्टी से बने डूंगर न केवल आगोर के बहाव क्षेत्र में बाधा हैं बल्कि क्षेत्र पर बदनुमा दाग भी हैं। यह काम होगा कैसे—मुझे अनुमान नहीं है, लेकिन होना जरूरी है। आगोर क्षेत्र में खनन से जो गहरे गड्ढे बन गये उन्हें इस ओवर बर्डन से बुरवाया जा सकता है। यह काम कम अर्थ-साध्य नहीं है, मोटे बजट की जरूरत होगी। आप मन बना लेंगे तो यह सब व्यवस्था भी आप संभव करवा लेंगे। ऐसा मानना मेरा ही नहीं है, उनका भी है जो आपको अच्छे से जानते-समझते हैं।

इस बड़े काम को करने का मन बनाना आसान नहीं। कितने संसाधन जुटाने होंगे मुझे पता है। लेकिन देवीसिंह भाटी के सामथ्र्य का भी पता है कि वे मन बना लेंगे तो इस वय में कर गुजरेंगे और सार्वजनिक इतिहास में उनको इन कार्यों के लिए भी याद किया जायेगा। उम्मीद करता हूं कि इस अनुष्ठान को पूर्ण करवाने के लिए व्यवस्थित कार्य योजना की घोषणा शीघ्र ही करेंगे। अग्रिम आभार।

―दीपचन्द सांखला

22 जुलाई, 2021

Thursday, July 15, 2021

मोदी-शाह के विकल्प की बात

भारतीय लोकतंत्र के लिए यह शुभ संकेत है कि मोदी-शाह के विकल्प की चर्चा पिछले डेढ़-दो वर्षों से होने लगी है। यद्यपि ऐसी चर्चा फिलहाल राजनीतिक विश्लेषकों, पत्रकारों और जागरूक नागरिकों तक ही सीमित हैं। जबकि डेढ़-दो वर्ष पूर्व तक ये भी स्तब्ध थे। बेहतर होता विपक्षी दलों के बीच भी इस तरह की कवायद होती, राजनीतिक विश्लेषक प्रशान्त किशोर बीच में इस हेतु जरूर सक्रिय दिखे। इस पर उनकी फिलहाल की निष्क्रियता रणनीतिक है या निराशा-जनित, पता लगना है।
बेहतर और भी तब होता जब विकल्प की बात भारतीय जनता पार्टी के भीतर से भी उठती—इस उम्मीद की वजह इतनी ही है कि भाजपा संवैधानिक लोकतंत्र में पंजीकृत दल है। अन्यथा उसके पितृ संगठन और खुद उसकी अघोषित विचारधारा के मद्देनजर ऐसी उम्मीद पालना निराश होना है। क्योंकि संघ और उसके अनुगामी संगठनों का विश्वास जब लोकतंत्र में ही नहीं है तो इनसे संविधान में आस्था की उम्मीद कैसी? इसीलिए संघानुमार्गी जिसमें भी निष्ठा व्यक्त करते हैं, मान लें यह उनका उपयोग मात्र कर रहे होते हैं।
जागरूक नागरिकों में से अनेक विकल्प की उम्मीदों के साथ कांग्रेस को कोसने लगे हैं। कोस इसलिए रहे हैं कि उन्हें कांग्रेस के अलावा राष्ट्रीय स्तर पर कोई विकल्प सूझ नहीं रहा, और इसलिए भी कि कांग्रेस उस तरह से विरोध पर उतारू नहीं दिख रही कि जनता उसे मोदी-शाह के विकल्प के तौर पर स्वीकार करने लगे। सरसरी तौर पर देखें तो माजरा यही है। लेकिन क्या सच में ऐसा है? नहीं। दरअसल आजादी के बाद पहली बार ऐसा है कि अंधभक्ति में ग्रस्त जनता के बड़े हिस्से के मन को (इसे हिप्नोसिस या सम्मोहन की अवस्था भी कह सकते हैं) झूठ, भ्रम और ढोंग से बांध दिया गया है, ये सम्मोहित समूह सच्चाई जानना ही नहीं चाहता बल्कि आगाह करने वाले पर उलट प्रतिक्रिया देने लगता है। ऐसी स्थितियों में कोई भी दल आगे कर दें या कैसा भी व्यक्तित्व खड़ा कर दें, उसे ये स्वीकारेंगे ही नहीं।
फिलहाल यह मानना कि कांग्रेस या उसके किसी नेता को विकल्प के तौर पर स्वीकारा जाएगा, जमता नहीं है।
ऐसे में हो क्या सकता है? या तो मोदी-शाह से ऊपर का कोई मजमेबाज और धूर्त आए, जो इनके सिर बांधने जैसा हो। विकल्प की ऐसी ही उम्मीद करनी है तो फिर इन्हीं को बरदाश्त क्यों नहीं करें, इनके विकल्प के तौर पर इनसे बदतर क्यों। और यदि विकल्प के तौर पर कोई भला या कम-से-कम इनसे तो भला हो—आये तो इसके लिए जनता को ही अपने विवेक को जगाकर मन बदलना होगा। बेहतर विकल्प की जरूरत महसूस करनी होगी। इसके लिए पहले तो बहुसंख्यकों को इस भ्रम से निकलना होगा कि उनके धर्म पर कोई खतरा है। और इससे भी कि धर्म को बचाने के लिए हम कुछ भी कुर्बान करने को तैयार हैं। ऐसा होगा तभी जब हम अपनी असली जरूरतों को समग्रता से समझेंगे। ऐसा होगा तभी सत्ता में वैकल्पिक दल की उम्मीदें पाल सकेंगे, जब तक ऐसा नहीं होगा—तब तक हमें यूं ही भुगतना होगा। एक भारतीय नागरिक के तौर पर कितना कुछ हमने खो दिया और क्या कुछ खो देंगे, इसकी कल्पना मात्र सिहराने लगती है, ऐसी अनुभूति के लिए हमें जागरूक नागरिक होना होगा। सभी इस तरह का मन बनाएं, जरूरी नहीं। कम-से-कम एक बड़े जनसमूह को हिप्नोसिस से-सम्मोहन से बाहर आने की जरूरत है।
(कुछ राज्यों में आ रहे बदलावों से उम्मीदें न पालें, उनके बदलावों की वजह स्थानीय हैं।)
—दीपचन्द सांखला
15 जुलाई, 2021

Thursday, July 1, 2021

नाथी का बाड़ा, घर जाने का निर्देश और कल्ला कांग्रेस बनाम शहर कांग्रेस

राजस्थान की राजनीति के दोनों मुख्य दलों में सब कुछ ठीक नहीं है। भाजपा में हाइकमान की हेकड़ी की वजह से तो कांग्रेस में हाइकमान के अनिर्णय की मानसिकता से। राजस्थान में तीसरे मोर्चे की चर्चा जरूर होती है, लेकिन उनके पास ऐसा कोई नेता नहीं है जिसकी स्वीकार्यता समग्र राजस्थान में हो। 

इस तरह राजस्थान की राजनीति फिलहाल मोटामोट दो ही दल हैं, कांग्रेस और भाजपा। वर्तमान सिनेरियो में भाजपा के पास वसुंधरा राजे का कोई विकल्प बनता दिख नहीं रहा है तो कांग्रेस में सचिन पायलट अपनी हड़बड़ी के चलते अशोक गहलोत का विकल्प बनते-बनते भटक गये। इस भटक से उनमें उपजी कुण्ठाओं ने जहां पार्टी में उनकी स्वीकार्यता को और भी कम कर दिया वहीं इस घटनाक्रम से पार्टी और सरकार का कामकाज भी प्रभावित हो रहा है। 

आज बात कांग्रेस की करेंगे। प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष, शिक्षामंत्री और बीकानेर जिलाप्रभारी मंत्री गोविन्दसिंह डोटासरा पिछले दिनों बीकानेर में थे। डोटासरा उन कांग्रेसी नेताओं में से हैं, जो मीडिया के साथ सोशल मीडिया को सुर्खियां देते रहते हैं। कुछ माह पूर्व नाथी के बाड़े का उल्लेख कर चर्चा में आये डोटासरा ने मंत्रिमण्डलीय बैठक के बाद चर्चा तब भी बटोरी जब मुख्यमंत्री की उपस्थिति में मंत्रिमंडल में असल दो नम्बर शान्ति धारीवाल से जब उलझे तो धारीवाल ने झिड़क दिया। धारीवाल की हेकड़ी इसलिए भी चुलती है कि वे पार्टी के लिए दूझती गाय है। नम्बर दो में असल का उल्लेख इसलिए करना पड़ा क्योंकि हमारे इधर बीडी कल्ला को नम्बर दो कहा जाता है। 

डोटासरा अभी जब बीकानेर आये तो वे मोर-पांख का झाड़ू बीकानेर के सभी नामी नेताओं के सिर पर रखने में चूके नहीं। बीडी कल्ला, रामेश्वर डूडी, वीरेन्द्र बेनीवाल, मंगलाराम गोदारा आदि सभी की मिजाजपुर्सी की बल्कि भंवरसिंह भाटी को तो विनायकजी की तरह साथ ही रखा। अपनी इस बीकानेर यात्रा में भी सुर्खियां जाने-अनजाने वे दे ही गये। कल्ला-कांग्रेस की और से कल्ला परिवार के राजनीतिक वारिस होने का मन बनाये अनिल कल्ला के पक्ष में जब 100 से अधिक कल्ला-कांग्रेसियों ने अनिल कल्ला को शहर अध्यक्ष बनाए जाने की लिखित पैरवी की तो डोटासरा यह बोले बिना नहीं रह सके कि मैं इसके मानी अच्छे से समझता हूं।
लेकिन ज्यादा सुर्खियां बटोरी निगम पार्षद अंजना खत्री ने। अंजना खत्री कांग्रेस की ओर से महापौर की उम्मीदवार थीं और गोटियां सही बैठ गयी होतीं तो सुशीला कंवर की जगह महापौर वह ही होतीं। महापौर नहीं बनी तो नहीं बनी, नेता प्रतिपक्ष भी वह अभी तक नहीं बन पा रही हैं। क्योंकि सूबे की सरकार और संगठन बीते डेढ़ वर्ष से दो बड़े मोर्चे को संभालने में ही लगे हैं। पहला भाजपा की शह से मोर्चें पर डटे सचिन पायलट के विद्रोह के चलते तो दूसरा महामारी कोरोना से। डोटासरा बीकानेर आये तो अंजना ने मिलकर निगम में नेता प्रतिपक्ष की नियुक्ति की मांग रखी। खीज में या स्वभाव के चलते डोटासरा ने झिड़कते हुए अंजना को यह कह दिया तुम अपने घर जाओ। उम्रदराज अंजना को संभवत: दो वजह से बुरा लगा हो—एक तो वे उम्र में डोटासरा से काफी बड़ी हैं दूसरा वह सक्रिय महिला हैं। अंजना को यह भी लगा होगा कि वह स्त्री है इसलिए उसे घर में बैठने की हिदायत दी जा रही है। अंजना ने भी पलट कर तैश में आकर जवाब दे दिया—मैं तो अपने घर (बीकानेर) में ही हूं, घर जायें आप। सामान्यत: शीर्ष के नेता कार्यकर्ताओं की ओर से इस तरह के जवाब सुनने के आदि नहीं होते हैं। फिर सोचा होगा जैसा दिया वैसा कभी-कभी झेलना भी पड़ सकता है। हालांकि बाद में अंजना खत्री ने सफाई देकर 'डेमेज कंट्रोल' की कोशिश जरूर की।

बीकानेर शहर कांग्रेस की राजनीति में दूसरी उल्लेखनीय घटना यह हुई कि पुराने कांग्रेसी नेता गुलाम मुस्तफा बाबूभाई की अगुआई में कांग्रेसियों ने डोटासरा के सामने मांग रखी कि बीकानेर शहर कांग्रेस की विधानसभा क्षेत्रवार पूर्व और पश्चिम की दो अलग-अलग शहर ईकाइयां होनी चाहिए। होगी कि नहीं, बाद की बात है लेकिन इतना पक्का है कि शहर कांग्रेस को कल्ला-कांग्रेस से मुक्त करवाने की लड़ाई स्थानीय कांग्रेसी हार चुके हैं। दो ईकाइयां होती भी हैं तो इसके लिए कल्ला-कांग्रेसियों की मौन स्वीकृति इसलिए भी मिल सकती है कि यदि ऐसा होता है तो वे अपनी दुकान निर्बाध चला सकेंगे। अन्यथा स्थानीय कांग्रेसी कुचरणी ज्यादा चाहे न कर पाएं, सिचले तो नहीं बैठने वाले। खैर, आसान न बीकानेर शहर अध्यक्ष की नियुक्ति है और न दो अलग-अलग ईकाइयां बनना, देखते जाओ आगे-आगे होता है क्या।

डोटासरा को लम्बी पारी खेलनी है तो बजाय मुखर होने के, घुन्ना होना और सावचेती से चलना बेहतर होगा अन्यथा नारायणसिंह, रामेश्वर डूडी, चन्द्रभान, बीडी कल्ला, जैसे पार्टी में लगभग शीर्ष हैसियत तक पहुंच कर फिसले हैं।
—दीपचन्द सांखला
30 जून, 2021

Saturday, June 12, 2021

रास्ता और रेल रोको आंदोलन

राजेन्द्र राठौड़ की गिरफ्तारी के बाद उनके हितचिन्तकों और जिनके हितसाधक राठौड़ रहे हैं, उन लोगों ने विरोध स्वरूप कल सड़कों पर आवागमन रोका और चूरू में रेलगाड़ी भी। राठौड़ चूरू जिले से नुमाइंदगी करते हैं, जाहिर है उनके हितचिन्तक और उनसे लाभान्वित वहीं ज्यादा होंगे। इसीलिए चूरू जिले में उद्वेलन कुछ ज्यादा रहा। प्रदेश में और भी कई जगह इस तरह के छुटपुट प्रदर्शन हुए हैं।

कल बीकानेर शहर में भी नयी गजनेर रोड पर कुछ देर तक रास्ता रोका गया–सूचना है कि उस समय तीन ऐंबुलेंस भी इस रास्ता रोको की शिकार हुईं―उन ऐंबुलेंस में ऐसे रोगी थे जिन्हें तत्काल विशेषज्ञ-डाक्टरों की सेवाओं की जरूरत थीं। आन्दोलनकर्ताओं को इसकी सूचना भी दी गई, लेकिन उन्होंने इसे गम्भीरता से नहीं लिया। कल ही जब चूरू में यही सब हो रहा था तब विरोध पर उतरे लोगों ने सरायरोहिल्ला-बीकानेर रेलगाड़ी को रोकने की कोशिश की―नहीं रोक पाने पर उन्होंने रेलगाड़ी पर पत्थरबाजी की। यह सब विरोध के नाम पर अब आम होने लगा है। कुछ माह पहले भी जब महिपाल मदेरणा और मलखानसिंह की गिरफ्तारी हुई तो इसी तरह से विरोध प्रदर्शन हुए।

राजेन्द्र राठौड़ सचमुच आरोपी हैं तो थोड़े दिनों बाद उनके समर्थक शांत होने लगेंगे और नहीं हैं तो सीबीआई ज्यादा दिन उन्हें अन्दर नहीं रख पायेगी। हमारे कानून की चाल कछुवा जरूर है-अचल नहीं।

रेलगाडिय़ां और सड़कें रोकना अब विरोध की अभिव्यक्ति मान ली गई है―बिना यह जाने कि इस तरह से हम कितनों की जान से खेल रहे हैं और अगर कोई युवा अपने कॅरिअर बनाने के अवसर को हासिल करने निकला है तो उसके पेशेवर जीवन को ताक पर रखने की गलती भी कर रहे होते हैं, अब ऐसे अवसर वैसे ही बहुत सीमित हो गये हैं। कल के गजनेर रोड के रास्ता रोको में दो प्रसुताएं कराह रही थीं। उनके या उनके नवजात के साथ कुछ भी हो सकता था। इस तरह के विवेकहीन विरोधों में लगे सभी से निवेदन है कि वह इतना तो विचारें कि इन रेलों को और सड़कों को रोकने से आपका भी कोई प्रिय और परिजन किसी बड़ी तकलीफ में आ सकता है।

लोकतंत्र में प्रत्येक को अपनी बात कहने का हक हासिल है―किसी को यह लगता है कि उनके साथ या उनके किसी स्नेहीजन के साथ अन्याय हो रहा है तो उन्हें विरोध के और ध्यानाकर्षण के ऐसे उपाय काम लेने चाहिए जिससे किसी अन्य के हकों और महती जरूरतों में व्यवधान ना आये। किसी का हक मार कर, असुविधाओं में धकेल कर या किसी की जान जोखिम में डाल कर अपने हक हासिल करना चाहेंगे तो इस तरीके के शिकार कभी आप भी हो सकते हैं।

इस तरह की समझाइश पर यह जवाब आम होता है कि इसके बिना सुनवाई नहीं होती है। अगर ऐसा है, और देखा भी गया है कि है भी तो इसके लिए भी आप और हम ही दोषी हैं। इस व्यवस्था को हम पर किसी ने थोपा नहीं है, और प्रति पांच वर्ष बाद इस तरह की व्यवस्था को अगले और पांच और वर्ष के लिए हम ही स्वीकार करते हैं। राज किसी भी पार्टी का रहा हो, व्यवस्थाएं यूं ही चल रही है। यह न केवल बद से बदतर हो रही है बल्कि जिन्दगी की मुश्किलें भी लगातार बढ़ती जा रही हैं।

कल फिर शहर में बन्द का आह्वान है। आह्वानकर्ताओं से यह उम्मीद है कि अपने इस बन्द से आवश्यक सेवाओं को छूट दें,  सड़कें और रेलें आवश्यक सेवाओं में ही आती हैं।

इस तरह के आंदोलनों के पीड़ितों से भी उम्मीद की जाती है कि वह अपनी पीड़ा टीवी और अखबारों के माध्यम से जाहिर करें ताकि समाज में संवेदनशील समझ विकसित हो सके।

―दीपचंद सांखला
7 अप्रेल, 2012

Friday, June 11, 2021

प्रकोप में पुलिस

परसों बुधवार की घटना है, म्यूजियम तिराहे पर होमगार्ड का एक सिपाही ड्यूटी पर था। जीप चलाते हुए मोबाइल पर बात करते एक चालक को जब उसने टोका तो चालक को इतना नागवार लगा कि उसने होमगार्ड के जवान की न केवल पिटाई कर दी बल्कि उसका कान चबा कर लहूलुहान भी कर दिया। जीप चालक की हेकड़ी इतने भर से संतुष्ट नहीं हुई, वह सरिया लेकर और सबक सिखाने तक को आतुर हो गया, ताकि वह होमगार्ड का वह जवान भविष्य में किसी अन्य के साथ इस तरह ड्यूटी ना निभाए।

9 फरवरी को सादुलसिंह सर्किल का एक दृश्य। इसी दिन यातायात पुलिस ने महात्मा गांधी रोड पर सादुलसिंह सर्किल तक इकतरफे यातायात की नई व्यवस्था लागू की थी। यातायात निरीक्षक (टीआई) स्वयं सर्किल पर तैनात थे। बावजूद इसके एक ऑटोचालक ने व्यवस्था के उल्लंघन की जुर्रत की। जब टीआई ने उस पर कार्यवाही के आदेश दिये तो ऑटोचालक का दुस्साहस देखिए, उसने अपने किसी निर्भयकर्ता 'आका' को मोबाइल लगा टीआई से कहने लगा, 'लो, बात करो।'

एक और घटना का जिक्र करना जरूरी है। लगभग एक वर्ष पहले की बात है, तौलियासर भैरूं मन्दिर चौराहे पर तब ऑटोरिक्शा अनधिकृत और बेतरतीब खड़े रहा करते थे, किसी की भी नहीं सुनते। ट्रैफिक पुलिस ने एक महिला सिपाही की वहां ड्यूटी लगा दी, यह जानते हुए भी कि वहां के ये ऑटोरिक्शा वाले पुरुष कांस्टेबल के भी ताबे नहीं आते। वह महिला सिपाही दो-तीन दिन में ही इन ऑटोरिक्शा वालों से इतनी कुंठित हुई कि एक ऑटोरिक्शा के कांच (विंड स्क्रीन) पर डंडा दे मारा। कांच टूट गया। हालांकि महिला सिपाही की यह कार्यवाही गलत थी लेकिन ऑटोरिक्शा वाला भी क्या सही था? ऑटोरिक्शा वालों को यह कैसे बर्दाश्त होता, वे तो पुरुष सिपाहियों को भी दिन में कई-कई बार आईना दिखाते रहते हैं, एक महिला सिपाही को इस तरह कैसे बर्दाश्त करते—हड़ताल कर दी—तब के पुलिस अधीक्षक ने भी खुद को बिना रीढ़ के होने का प्रमाण दिया—उस महिला सिपाही से उस ऑटोरिक्शा वाले से रू-बरू माफी मंगवाई। पुलिस अधीक्षक ने वस्तुस्थिति जानते हुए भी ऐसा करवाया जो उस महिला सिपाही के लिए ही नहीं पूरे पुलिस महकमे के लिए हतोत्साही करने वाला था। ऐसी परिस्थितियों में इन पुलिस वालों से हम कैसी उम्मीद कर सकते हैं!

इन तीन घटनाओं का उल्लेख यहां यह बताने के लिए किया गया कि पूरे पुलिस महकमे को विभिन्न सत्तारूपों ने किस तरह से पंगु बना दिया है—यह सत्तारूप नेताओं के रूप में, यूनियन के रूप में और अब तो एक और सत्तारूप शालीनता से आवृत पत्रकारों की हमारी जमात का भी है। हमारे पत्रकार भी सिपाहियों से मोबाइल पर किसी को छोड़ने का आग्रह करते देखे जा सकते हैं—हालांकि पत्रकारों का स्वर शालीन होता है। नेताओं के स्वर में अकसर जो हेकड़ी देखी जाती है—वह पत्रकारों में अभी नहीं आई है। यानी जिस किसी के पास भी किसी पावर का दावं है, वह उसे लगाने से नहीं चूकता।

उस जीप चालक को किसी अपने 'आका' का जोम था, तभी उसने उस होमगार्ड को सबक सिखाने की ठानी। अब उस होमगार्ड के सिपाही को पुलिस से और अपने होमगार्ड के साथियों से यह नसीहत दी जा रही होगी कि ड्यूटी पर चुपचाप खड़े क्यों नहीं रहते—किसी से उलझना जरूरी है क्या?
9 फरवरी की घटना में भी जरूर उस ऑटोचालक को उसके आका ने नसीहत नहीं दे रखी होगी कि सिपाहियों को तो मेरे फोन का डर दिखा दिया कर—अफसरों को नहीं।

अपराधी या अनियमितता करने वालों में से जिस किसी के पास भी दावं बड़ा होता है, वह अपनी पावली चलाता ही है—लेकिन मदेरणा, मलखान, राठौड़, एडीजे एके जैन, आईजी पोन्नूचामी, एएसपी अरशद को सीखचों के पीछे देखकर इतना तो समझ लेना चाहिए कि न्याय के घर देर भले ही हो, अंधेर नहीं है। जरूरत दृढ़ इच्छा-शक्ति के साथ न्याय के घर का लगातार दरवाजा खटखटाते रहने की है।

—दीपचंद सांखला
6 अप्रेल, 2012