Saturday, October 6, 2012

चुनावी मुकाम पर अरविन्द केजरीवाल


आजादी के समय महात्मा गांधी के कहे एक कथन का स्मरण कांग्रेस विरोधी पार्टियां अकसर करवाती हैं तब गांधीजी ने कहा था कि कांग्रेस का काम पूरा हो गया है, अतः इसे भंग कर देना चाहिए| इस कथन के पीछे उनका मकसद और मानना यह था कि राजनीतिक आजादी तो हासिल हो गई है लेकिन असल आजादी तभी मानी जायेगी जब देश का प्रत्येक नागरिक अपनी रोजमर्रा की जरूरतें सम्मानजनक ढंग से पूरी करने लगेगा| कांग्रेसियों को अब उसी काम में लगना चाहिए|
गांधीजी के उक्त कथन को भाजपा अकसर याद दिलाती रहती है| यदि कांग्रेस तब भंग भी हो जाती तो भी कांग्रेस के तमाम सत्ताकांक्षी लोग किसी अन्य नाम से संगठन खड़ा कर लेते और अपने भूतकाल को भुना-भुना कर सत्ता सुख यूं ही भोगते, जैसे आज भोग रहे हैं| क्योंकि आजादी के समय देशव्यापी राजनीतिक विकल्प दूसरा कोई था ही नहीं|
विनोबा, जयप्रकाश नारायण जैसे हजारों जो सत्ताकांक्षी नहीं थे, वे सभी अलग-अलग समूहों और अलग-अलग क्षेत्रों में अपनी-अपनी क्षमता के अनुसार काम करते रहे हैं| लेकिन गांधी ने जिसे असल आजादी कहा उसको क्रियान्वित करने की क्षमता केवल गांधी में ही थी और विडम्बना यह कि गांधी उसके लिए रहे नहीं| इसके मानी विनोबा, जयप्रकाश आदि-आदि के कामों को कमतर आंकना कतई नहीं है| उन्होंने जो भी किया अच्छा किया| लेकिन उनके कामों से लाभान्वित होने वालों का कार्य, प्रकार और भौगोलिक क्षेत्र सीमित थे| पिछली सदी के सातवें दशक तक आते-आते शायद जेपी को लगा होगा कि देश जिन भी स्थितियों में पहुंच गया है उसका एक कारण उनके जैसे लोगों की अक्षमता भी हो सकती है-क्योंकि गांधी जिस असली आजादी की बात कर गये हैं उसका नामो-निशान दूर-दूर तक दिखाई नहीं दे रहा था| कोई सम्भावनाएं भी नहीं दीख रही थी-तब जेपी ने भी शार्टकट अपनाने की सोची और व्यवस्था परिवर्तन का नारा दिया| देश ने उम्मीदें बांध ली और उनके कहे-कहे १९७७ के आते-आते राज भी बदल गया| लेकिन व्यवस्था नहीं बदली|
बात वर्तमान की करते हैं-कल टीम अरविन्द ने अपनी राजनीतिक पार्टी काविजन डॉक्यूमेन्टजारी कर दिया है और इसी 26 तारीख को पार्टी के नाम की घोषणा भी कर देंगे| अन्ना और उनके कुछ साथी इस मुद्दे पर अरविन्द केजरीवाल से सहमत नहीं हैं| विनायक पिछले वर्ष अगस्त से ही अपने विभिन्न सम्पादकीयों में टीम अन्ना की मंशा को सही बताता रहा है| लेकिन उनकी इस मंशा से वे जो साध्य हासिल करना चाहते हैंविनायकउन पर सवालिया निशान और आशंका प्रकट करता रहा है|
सभी अच्छे-भले लोग शार्ट-कट अपनाने की आतुरता पता नहीं क्यों दिखाते रहे हैं? इस मानसिकता में कहीं छिपे तौर पर असली आजादी का श्रेय लेने की आकांक्षा तो काम नहीं कर रही है-अरविन्द की पार्टी किसी चमत्कार के चलते आगामी चुनावों में दिल्ली विधानसभा में और देश की लोकसभा में बहुमत ले भी आये तो क्या वर्तमान शासन व्यवस्था से अपने तरीके से काम ले पायेंगे, जो लगभग असंभव सा है| अरविन्द ने जो दूसरी बात यह कही कि हमारी सरकार बनते ही दस दिन में जनलोकपाल लागू कर देंगे-अध्यादेश के माध्यम से लागू कर भी दिया और लोकसभा में बिल पास भी करवा लिया तो राज्यसभा में इसे कैसे पास करवायेगे? वहां जो निर्वाचन प्रणाली है उसमें बहुमत लाने में अरविन्द की पार्टी को कितने साल लग जायेंगे? छह माह बाद अध्यादेश गिर जायेगा| अन्ना और अरविन्द सचमुच कुछ करना चाहते हैं तो देश के आम-आवाम को पहचानें, उनमें से प्रत्येक को लोकतांत्रिक देश के नागरिक के रूप में शिक्षित करें-उन्हें अपने वोट की ताकत से अवगत करवाएं-हो सकता है यह काम इस पीढ़ी के जीते जी सम्पूर्ण हो लेकिन यदि पूरे मनोयोग से शुरू करेंगे तो एक--एक दिन यह सम्पूर्ण होगा और असल आजादी आम आवाम को हासिल हो जायेगी| अन्यथा 1977 के बाद जयप्रकाश नारायण ने जिस घोर निराशा का सामना किया था-वही निराशा टीम अन्ना और टीम अरविन्द का दरवाजा खटखटाने को तैयार खड़ी है|
जिसे ये आम जनता मान बैठे हैं या जो वर्ग इनके साथ जुड़ा है वह अति विशिष्ट सही विशिष्ट वर्ग ही है-क्योंकि इस वर्ग को जीवन की न्यूनतम जरूरतें हासिल हैं-असल आम जनता देश की आधी से ज्यादा आबादी का वह हिस्सा है-जिसे रोटी-कपड़ा-मकान के लिए रोजाना जद्दो-जहद करनी पड़ती है-ऐसे लोग अन्ना के साथ देखे गये अरविन्द के साथ और ही संन्यासी से व्यापारी और व्यापारी से राजनीतिज्ञ बनने को आतुर रामदेव के साथ देखे जाते हैं|
3 अक्टूबर 2012