उन्नीस सौ सतहत्तर
में जनता पार्टी गठन और उसकी बनी सरकार को आलोचकों ने तब भानुमती का कुनबा कहा था। जनता लहर के साथ आए ज्वार में जैसे ये सब आन जुड़े वैसे ही 1979 आते-आते लौटते भाटे से बिखरने भी शुरू
हो गये। नतीजतन, वोटरों ने जिस कांग्रेस
को 1977 में किनारे किया, उसी को 1977 की जनता पार्टी की 295 सीटों के मुकाबले 353 सीटों के साथ सरकार सौंप दी। इंदिरा गांधी ने अपने पिछले कार्यकाल को सबक के रूप में लिया और सावचेती से सरकार चलाई। लेकिन कई वर्षों से पंजाब में चल रहे आतंकवाद से देश को छुटकारा दिलाने की हड़बड़ी में वे ऑपरेशन ब्ल्यू स्टार के तहत अमृतसर के स्वर्ण मन्दिर में सेना भेजने की ऐतिहासिक भूल कर बैठीं। चन्द्रशेखर के अलावा सभी राजनेता और राजनीतिक पार्टियां उनके साथ थी। भाजपा के लालकृष्ण आडवाणी से तो खुद इन्दिरा गांधी ने सहमति ली। नतीजे में इन्दिरा को अपने प्राणों की कुर्बानी, तदुपरांत हजारों सिखों का कत्लेआम और इससे देश को सिखों के मन में आए अलगाव को भुगतना पड़ा।
खैर,
1980 के चुनावों में बीकानेर से कांग्रेस ने क्षेत्र के पानी इलाके से मनफूलसिंह भादू को उतारा, जाट थे और
कांग्रेस की हवा में जीत भी गये। सामने जनता पार्टी के सत्यनारायण पारीक और जनता पार्टी (सेकुलर) से सीटिंग सांसद चौधरी हरिराम थे। मनफूलसिंह के नाम से क्षेत्र के उत्तरी हिस्से के लोग तो परिचित थे, पर पश्चिमी
क्षेत्र के लोग परिचित नहीं थे। तब इस क्षेत्र की बनावट ऐसी थी कि जो प्रत्याशी गांवों से अन्तर लेकर आता, उस अन्तर को शहरी क्षेत्र के वोटों से पाटना आसान नहीं था। (परिसीमन के बाद स्थितियों में कुछ बदलाव आया है।) मनफूलसिंह बीकानेर के लिए डॉ. करणीसिंह और चौधरी
हरिराम से बेहतर साबित नहीं हुए। राजनीति वे भी स्टेटस सिम्बल के लिए करते थे। जनता पार्टी से जनता की ऊब से उन्हें यह स्टेटस मिल भी गया। जैसे बीकानेर पूर्व की विधायक सिद्धिकुमारी जीतने के बाद जनता से कोई लेना-देना नहीं रखती, वैसा ही मामला सांसद मनफूलसिंह का था।
इन्दिरा हत्याकांड के बाद 1984 में करवाए गए मध्यावधि चुनावों में सहानुभूति लहर के चलते दूसरी बार और 1991 के चुनावों में तीसरी बार मनफूलसिंह चुनाव जीतते गए। मनफूलसिंह का इस क्षेत्र से लगाव होता, कोई दृष्टि होती तो वे
बहुत कुछ न सही काफी कुछ इसलिए करवा सकते थे कि उनके तीनों सांसदी काल में सरकार उनकी पार्टी कांग्रेस की ही थी, पर उन्होंने कुछ
नहीं करवाया। बीकानेर क्षेत्र के साथ आजादी बाद से ही ऐसा होता रहा है।
उन्नीस सौ नवासी
में विश्वनाथप्रतापसिंह कांग्रेस से बगावत करके जनता में हीरो बने। 9वीं लोकसभा के लिए चुनाव हुए तो जनता पार्टी से बने एक घटक जनता दल में गठबन्धनी गड्ड-मड्ड ऐसा हुआ कि पूर्व सांसद चौधरी हरिराम मक्कासर के पुत्र और मार्क्सवादी
कम्यूनिस्ट पार्टी से राजस्थान में कई बार विधायक रहे कॉमरेड श्योपतसिंह बीकानेर से उम्मीदवारी ले आए और सीपीआई (एम) की उम्मीदवारी और जनता दल के समर्थन से चुनाव जीत भी गये। भानुमती के कुनबे की मानिंद वीपी सिंह के नेतृत्व में सरकार भी बन गई।
जनता पार्टी के विरासतियों ने 1977-79 से कोई सबक नहीं लिया― वामपंथी इस बार भी सरकार में शामिल नहीं हुए। चौधरी देवीलाल अपनी चौधर अलग से, तो
चन्द्रशेखर अपना अहम अलग चलाते रहे। पार्टी में फिर टूट हुई और वीपी सिंह सरकार गिर गई। चन्द्रशेखर कांग्रेस के समर्थन
से प्रधानमंत्री बने। कांग्रेस ने अवसर देखकर कुछ ही महीनों में समर्थन खींच लिया, चंद्रशेखर की सरकार भी गिर गई,
इस रोळ-गदोळ में अपने सांसद श्योपतसिंह सरकार को बाहर
से समर्थन देने के बावजूद इस क्षेत्र के लिए कोई कुव्वत नहीं दिखा पाए। 1977 के इस कुनबे के बार-बार के बिखराव से जनता हताश थी, चुनाव अभियान के दौरान
राजीव गांधी की हत्या से उपजी सहानुभूति जैसे अन्य कारण भी बने और कांग्रेस ने बिना नेहरू-गांधी परिवार के ही 1991-92
के चुनावों में नरसिंहाराव के प्रधानमंत्रित्व में 232 के अधूरे बहुमत और बाहरी समर्थन से पूरे पांच साल सरकार चलाई। 1984 में दो सांसदों से शुरू भारतीय जनता पार्टी ने 1989 में 85 और
1991-92 के चुनावों में 120 सीटें लेकर अपनी सम्मानजनक स्थिति बना ली थी। तीसरी बार प्रतिनिधित्व कर रहे हमारे सांसद मनफूलसिंह भादू 'मिट्टी के माधो' साबित हुए। अप्रेल-मई 1996 में हुए ग्यारहवें लोकसभा चुनावों में क्षेत्र के प्रभावी नेता देवीसिंह भाटी भाजपा से अपने बेटे युवा महेन्द्रसिंह की उम्मीदवारी ले आए। कांग्रेस ने इस बार भी लगभग नाकारा साबित हुए मनफूलसिंह को ही मैदान में उतारा।
महेंद्रसिंह भाटी ने चुनाव जीत कर राजनीतिक विश्लेषकों को तो चौंकाया ही, देवीसिंह भाटी ने भी अपने चुनावी कौशल का लोहा मनवा लिया। पूरे चुनाव अभियान के दौरान देवीसिंह चौ. मनफूल सिंह के प्रभाव वाले तब के बीकानेर लोकसभा क्षेत्र के सूरतगढ़ में डेरा जमाए रहे और वहीं कांग्रेस उम्मीदवार को मात देने की चौसर बिछा दी। महेंद्रसिंह लगभग पौने दो वर्ष ही सांसद रहे, इस दौरान अलग-अलग गठबंधनों के दो प्रधानमंत्री रहे, अटलबिहारी वाजपेयी और एचडी देवगौड़ा। भाजपा गठबंधन के अटलबिहारी वाजपेयी मात्र सोलह दिन प्रधानमंत्री रहे और शेष समय एचडी देवगौड़ा। ऐसे में महेंद्रसिंह भाटी क्या कर पाते।
फरवरी,1998 में हुए 12वीं लोकसभा के चुनाव में भाजपा के महेंद्रसिंह भाटी के सामने कांग्रेस ने भारीभरकम बलराम जाखड़ को उतार दिया, जाखड़ की जीत तय ही थी, महेंद्रसिंह चुनाव हार गये। इस तरह प्रतिभाशाली राजनेता महेंद्रसिंह भाटी को अपना सांसदी का हूनर दिखाने का अवसर नही मिला। 12 दिसंबर, 2003 को सड़क दुर्घटना में महेंद्र सिंह भाटी का निधन हो गया, बीकानेर ने संजीदा और अपना हिमायती नेता खो दिया।
बलराम जाखड़ जीत तो गये लेकिन केंद्र में इन्द्रकुमार गुजराल के नेतृत्व में फिर गैरकांग्रेसी सरकार बन गयी, बीकानेर की जाखड़ से उम्मीदों पानी पर फिर गया। यद्यपि यह सरकार भी ज्यादा नहीं रही, सितंबर-अक्टूबर, 1999 में 13वीं लोकसभा के चुनाव हुए, बीकानेर ने कांग्रेस के रामेश्वर डूडी को चुन कर भेजा लेकिन केंद्र में भाजपा के अटलबिहारी वाजपेयी के नेतृत्व में गठबंधन सरकार बन गयी। क्रमश:
―दीपचन्द साँखला
15 अप्रेल,
2014
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