Monday, April 14, 2014

बीकानेर के अब तक के सांसद : काम के न काज के-दो

उन्नीस सौ सतहत्तर की इन्दिरा विरोधी लहर के जो हिस्सा थे उन्होंने उसे जनता लहर का नाम दिया था। तब टीवी था मोबाइल, लैंडलाइन टेलीफोनों में भी एसटीडी की सुविधा नहीं हुई थी। तब पड़ोस के गांव- कस्बे में फोन पर बात करने के लिए ट्रंक बुक करवाना और घण्टों इन्तजार करना होता था। इन्टरनेट और सोशल साइट्स कल्पना से बाहर थे। आम-आवाम को एक दूसरे से जोड़ने के लिए आपातकाल की कड़ी सेंसरशिप के बाद सहम कर हाव खोलते अखबार और प्रतिदिन शाम को रेडियो पर आने वाला बीबीसी लन्दन का हिन्दी समाचार बुलेटिन ही जरीया थे। तब नियमित बीबीसी सुनने वालों को उस दौर का स्मरण करते ही कानों में यह गूंजने लगता है 'बीबीसी लन्दन से, मैं रत्नाकर भारतीय'
बीकानेर के सांसदों की बात करते हुए उन्नीस सौ सतहत्तर के माहौल का स्मरण हो आना लाजमी है। पूर्वोत्तर भारत और दक्षिण के प्रदेशों को छोड़ कर पूरे देश में इन्दिरा गांधी और आपातकाल के प्रति भारी गुस्सा था। इसी गुस्से के दबाव में तमाम विरोधी राजनीतिक दलों को एक होना पड़ा। इस दबाव को अभिव्यक्ति लोकनायक जयप्रकाश नारायण ने दी। वामपंथियों को छोड़कर लगभग तमाम विरोधी दलों ने 1977 के चुनावों में जनतापार्टी के नये नाम और तकनीकी कारणों से भारतीय लोकदल के चुनाव चिह्न हलधर से चुनाव में उतरने की सहमति दी। जहां वामपंथियों का प्रभाव था, वहां-वहां उनके साथ जनतापार्टी का चुनावी समझौता हो गया।
कांग्रेसनीत संप्रग (दो) की बट्टा खाते साख के चलते सरकार से मोहभंग व्यापक जरूर है पर 1977 जैसा गुस्सा 2014 में शायद इसलिए देखा नहीं गया कि लोगों के पास बफारा निकालने के लिए टीवी चैनल, सोशल मीडिया और संचार के कई सारे दूसरे साधन गये हैं। इन साधनों का उपयोग करके इन चुनावों में 'मोदी लहर' नाम से लाभ उठाने में भाजपा सफल हुई हालांकि ऐसा बंंगाल सहित पूर्वोत्तर और कनार्टक को छोड़कर दक्षिण में नहीं हुआ दरअसल कांग्रेस से रुष्टता और भाजपा से भी ज्यादा उम्मीद होने के चलते जहां भी तीसरा विकल्प प्रभावी है जनता उन्हें चुन सकती है। पश्चिम बंगाल, ओडीशा दिल्ली के परिणाम कांग्रेस और भाजपा दोनों से मोहभंग की भी बानगी दे सकते हैं तो उत्तरप्रदेश और बिहार की रोळ-गदोळ में अभी कुछ भी नहीं जा सकता।
लौटकर बीकानेर जाते हैं। सतहत्तर के चुनावों में जनतापार्टी को ऐसा उम्मीदवार चाहिए था जो क्षेत्रफल के हिसाब से तब के देश के सबसे बड़े लोकसभा क्षेत्रों में से एक बीकानेर के लिए संसाधनों सहित सक्षम और समर्थ हो। हालांकि बाद में जनतापार्टी के उम्मीदवार के साथ जनता तन मन धन से इतना खुलकर लगी कि पार्टी की सभी आशंकाएं निर्मूल साबित हुईं। डॉ. करणीसिंह को बकारा गया, पता नहीं किस भय में वे तैयार नहीं हुए, और विनम्रतापूर्वक मना कर दिया। जनतापार्टी के लिए यहां के उम्मीदवार का चयन असम्भव सा होता जा रहा था, तभी क्षेत्र के अन्तिम छोर हनुमानगढ़ मक्कासर के चौधरी हरिराम मैदान में उतर आए। सर्व साधन सम्पन्न हरिराम केवल पंचायत स्तरीय शौकिया राजनीति करते थे बल्कि उनके बेटे कॉमरेड श्योपतसिंह की प्रदेश की वामपंथी राजनीति में अच्छु पहचान थी। जिन्हें 1989 में बीकानेर की जनता ने मार्क्सवादी कम्यूनिस्ट पार्टी के सांसद के रूप में चुना भी था।
कांग्रेस का हाल तब उत्तर पश्चिमी भारत में-2014 से भी खराब हो गया था। उम्मीदवारों का काल उनके सामने ही था, सो पानी क्षेत्र के चौधरी रामचन्द्र को मैदान में इस उम्मीद से उतारा कि कदास जाट कार्ड काम कर जाए। पर वह चुनाव जनतापार्टी या चौधरी हरिराम नहीं जनता खुद लड़ रही थी। हरिराम को जीतना ही था और सरकार भी उनकी पार्टी की बनी। सरकार बनते ही आपसी खदबदाहट शुरू हो गई जिसे उफनते ढाई साल से ज्यादा नहीं लगा। चौधरी हरिराम से क्षेत्र के लोगों को सरकार बदलवाने से ज्यादा उम्मीद भी नहीं की, जो बदल ही गई थी। सरकार में सीधे भागीदारी (मंत्री पद) का व्यक्तित्व हरिराम का था भी नहीं और इस क्षेत्र के विकास और योजनाओं की दृष्टि उनमें नदारद थी ही। बीकानेर लोकसभा क्षेत्र की जनता इतने में ही खुश थी कि इन्दिरा गांधी को पद से हटा दिया। ―दीपचन्द साँखला

14 अप्रेल, 2014

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