Tuesday, May 10, 2022

बीकानेर : स्थापना से आजादी तक-1

बीकानेर की स्थापना को लेकर लोक प्रचलित है कि जोधपुर दरबार में चाचा कांधल भतीजे बीका से कुछ फुसफुसा रहे थे, राव जोधा को बेअदबी लगी। जोधा ने व्यंग्य में पूछ लिया कि चाचा-भतीजा कोई नया राज बसाने की तज्वीज में लगे हैं क्या ? कहते हैं यही बात चाचा-भतीजे को चुभ गई और निकल पड़े। बीकानेर की स्थापना को लेकर लोक प्रचलित इस कथा पर कवि-विचारक नन्दकिशोर आचार्य यह कहने से नहीं चूकते कि कांधल और बीके को बीकानेर बसाने के लिए क्या थार का यह रेगिस्तान ही मिला। गर्मी से असहज और पहाड़प्रिय आचार्य यह कहने से नहीं चूकते कि पास ही अरावली की पहाड़ियां  भी थीं—वहीं शहर बसा लेते।

लेकिन इतिहासकार उक्त अक्खाणे से सहमत नहीं लगते। बीकानेर बसने-बसाने को लेकर उनकी स्थापनाएं भिन्न हैं। 'बीकानेर इतिहास एवं संस्कृति' स्मारिका में प्रो. शिवरतन भूतड़ा 'बीकानेर राज्य का उद्भव' शीर्षक से छपे अपने आलेख में बीकानेर स्थापना का उल्लेख इस तरह करते हैं :

"बीकानेर बसने से पूर्व राव जोधा इसी जांगल प्रदेश में जोधपुर बसाने की कई कोशिश कर चुके थे। जोधपुर बसाने से पूर्व राव जोधा को मेवाड़ी सेना ने मण्डोर से जब बेदखल कर दिया तो सुरक्षा हेतु उन्होंने जांगलू के काहुनी गांव में शरण ली। इसी दौरान जांगलू के शासक नापाजी सांखला ने अपनी बहिन नोरंग दे का विवाह राव जोधा से कर दिया। कहते हैं राव बीका नोरंग दे के ही पुत्र थे। राठौड़ों और सांखलों के इस रिश्ते ने जांगल देश में राठौड़ राज्य स्थापना की भावभूमि तैयार कर दी थी। जांगलू में रहते राव जोधा ने अपनी शक्ति को संगठित किया और 1453 ई. में मण्डोर पर पुन: आधिपत्य कर लिया।" जोधपुर शहर बसाने की अनुकूलता इस तरह बनी। 

इतिहासकार प्रो. भूतड़ा इसके बाद की घटना को लिखते हुए बताते हैं कि मुस्लिम बिलोचों से पराजित होकर नापा सांखला राव जोधा के पास गये। राव जोधा ने पुत्र बीका और भाई कांधल को जांगल देश में राज्य स्थापित करने के उद्देश्य से भेज दिया। 1465 ई. में बीका ने बिलोचों को पराजित कर जांगलू अपने मामा को दे दिया। नापा ने इसके बाद बीका की अधीनता स्वीकार कर इस जांगल देश में राठौड़ राज्य स्थापित करने में महत्त्वपूर्ण सहयोग दिया। 

इस समय तक जैसलमेर के रावल केहर के पुत्र केल्हण पूगल क्षेत्र को जीत कर भाटी राज्य की स्थापना कर चुके थे। बीका जब जांगल-प्रदेश में अपना राज स्थापित करने की जुगत में थे, तब पूगल के शासक राव शेखा थे। जैसलमेर-पूगल जैसे अनउपजाऊ क्षेत्र में राज करना आसान नहीं था तो शासक अपना काम लूट और धाड़ेती से चलाते थे। लूट के मकसद से मुल्तान गये राव शेखा को मुस्लिम सूबेदार ने पकड़ कर कैद कर लिया। राज कायम करने की तजवीज में भटक रहे बीका से राव शेखा की पत्नी ने अपने पति को छुड़ा लाने का अनुरोध किया। मुल्तान पर आक्रमण कर राव बीका ने राव शेखा को मुक्त करवा दिया। क्षेत्र की लोकदेवी करणीजी राव शेखा की धर्मबहिन थी। इस रिश्ते का लाभ राव बीका को मिला। बीका ने जांगल देश में अपने राज्य की स्थापना हेतु आशीर्वाद प्राप्त कर लिया। करणीजी के कहने पर राव शेखा ने न केवल अपनी पुत्री रंगकुंवरी का विवाह राव बीका से कर दिया बल्कि बीका की अधीनता भी स्वीकार कर ली। 

नये शहर और गांव पानी के स्रोत के पास ही बसाये जाते थे। बीका ने कोडमदेसर तालाब के पास गढ़ बना कर शहर बसाने की योजना बनायी। क्षेत्र के भाटियों को इसकी भनक लग गयी। जैसलमेर के भाटी रावल कलिकर्ण की सहायता से बीका पर आक्रमण कर दिया। युद्ध में कलिकर्ण मारे गये और बीका ने जीत हासिल की। लेकिन बीका ने भांप लिया कि भाटियों के दामाद होते हुए भी उनके नजदीक राजधानी बसाना सुरक्षित नहीं है। उन्हें ज्ञात था कि पिता राव जोधा ने अपने राज्य के विस्तार के लिए पड़ौस के मोहिलवाटी पर कब्जा करने की नीयत से वहां के शासक अजीतसिंह—जो जोधा के दामाद भी थे—को बुलाकर मार डालने की कोशिश की थी। पता लगने पर अजीतसिंह भाग लिए। लेकिन राठौड़ों ने पीछा कर उसे मार ही दिया। बीका चतुर थे सो भाटियों से दूर रहना ही तय किया। लेकिन ज्यादा दूर जाने की गुंजाइश नहीं थी। आवागमन के द्रुत गति के साधन तब नहीं थे। 15-20 मील की दूरी भी सुरक्षित मानी जाती थी। वर्तमान बीकानेर जिस टीबे पर बसा है वहां पहले से कुछ बसावट थी। भाण्डाशाह जैन मन्दिर की स्थापना बीकानेर की स्थापना से पूर्व की माना जाना इसका प्रमाण है। मामा नापाजी सांखला की सलाह पर संवत् 1545 की वैशाख शुक्ल पक्ष की दूज को राव बीका ने वहीं बीकानेर नगर की विधिवत् स्थापना की।

शहर का नाम रखने पर अलग-अलग मान्यताएं है, जिसमें यह भी कि इस टीबे की भूमि नेर नाम जाट ने इस शर्त पर दी कि शहर के नाम में उसका नाम भी हो। कुछ इसे बीका के पुत्र और उत्तराधिकारी नारोजी से जोड़ते हैं लेकिन कुछ इतिहासकार मानते हैं कि नेर का अर्थ नगर भी है, जैसे भटनेर-जोबनेर आदि—जो बीकानेर बसने से पहले के हैं— इसलिए बीकानेर का मतलब बीकानगर से ही है। इस तरह यह बीकानेर शहर अस्तित्व में आया। जब बीका से पूर्व उनके पिता जोधा को भी इस थार रेगिस्तान में राज्य स्थापना के लिए इतने पापड़ बेलने पड़े तो नन्दकिशोर आचार्य की ठठेबाजी के हिसाब से पूर्व में अच्छे से काबिज हो चुकी अरावली पर्वत शृंखलाओं में नगर बसाने की राव बीका सोच भी कैसे सकते थे। क्रमश:

—दीपचंद सांखला

05 मई, 2022

Wednesday, April 27, 2022

प्रशान्त किशोर उर्फ पीके और कांग्रेस

देश के मीडिया, सोशल मीडिया और राजनीतिक हलकों में इन दिनों चुनावी रणनीतिकार प्रशान्त किशोर (पीके) की विशेष चर्चा है। कांग्रेस से आये ताजा बयान—जिसमें कहा गया कि प्रशान्त किशोर ने पार्टी में शामिल होने से इनकार कर दिया है। पीके की ओर से आये ट्वीट से इसकी पुष्टि भी हो गयी। कांग्रेस और पीके के बीच आया यह गतिरोध पहला नहीं है, बल्कि पिछले वर्ष भी ऐसा ही हुआ था। कांग्रेस और पीके—वर्तमान परिस्थितियों में दोनों को एक-दूसरे की जरूरत है और दोनों के पास ही एक-दूसरे का विकल्प नहीं है। न कांग्रेस के पास केन्द्र में कुशल संगठनकर्ता है और न ही 2014 में अपने किये के पश्चात्ताप के लिए पीके के पास कांग्रेस जैसी दूसरी पार्टी। इसलिए उम्मीद है यह संवाद हमेशा के लिए खत्म नहीं हुआ होगा। दोनों फिर मिल बैठेंगे और साथ-साथ काम करके देश को बुरे दौर से निकालेंगे। बात आगे करें उससे पूर्व पीके के नेपथ्य को थोड़ा जान लें।

वैसे तो प्रशान्त किशोर 2012 के गुजरात विधानसभा चुनाव में भाजपा के रणनीतिकार के तौर पर सक्रिय हुए, लेकिन सुर्खियों में वे 2014 में तब आये जब लोकसभा चुनावों में भाजपा या कहें नरेन्द्र मोदी के चुनाव की कमान संभाली। इस चुनाव का माहौल 2011 में तब से बनने लगा, जब अन्ना हजारे ने जन लोकपाल की मांग की आड़ में तब की संप्रग सरकार के समक्ष लगभग देशव्यापी विरोध खड़ा कर दिया। इस विरोध को भुनाने में चुनावी रणनीतिकार के तौर पर प्रशान्त किशोर ने मुख्य भूमिका निभाई। नारे, पोस्टर, बैनर, भाषण के कन्टेंट, चुनावी दौरे आदि सभी कुछ प्रशान्त किशोर की टीम ही तय करती थी।

याद कीजिये भाजपा के उस चुनाव अभियान में कुछ ऐसा नहीं था जिससे देश में घृणा या द्वेष फैले, लोग अराजक हों। हां, सपने बहुत दिखाये गये, फिर भी वह अभियान साफ-सुथरा था। इस चुनाव में नरेन्द्र मोदी को भारी सफलता दिलवाने के साथ ही पीके चुनावी सफलता के ब्रांड बन गये।

उसके बाद पीके ने 2015 के बिहार विधानसभा चुनाव में नीतीश कुमार की जदयू के लिए, 2017 में पंजाब विधानसभा चुनाव में अमरिंदरसिंह (कांग्रेस) के लिए, 2017 में ही उत्तरप्रदेश विधानसभा चुनाव में कांग्रेस के लिए, 2019 में आंध्रप्रदेश विधानसभा चुनाव में वाईएसआर रेड्डी की वाईएसआर कांग्रेस के लिए, 2020 में दिल्ली विधानसभा चुनाव में अरविन्द केजरीवाल की आम आदमी पार्टी के लिए, 2021 के तमिलनाडु विधानसभा चुनाव में एमके स्टालिन की द्रविड़ मुन्नेत्र कडग़म के लिए और 2021 के ही पं. बंगाल विधानसभा चुनाव में ममता बनर्जी की तूणमूल कांगे्रस के लिए अपनी सेवाएं दीं। एक उत्तरप्रदेश विधानसभा चुनाव में कांग्रेस को छोड़ सभी पक्षकारों को उन्होंने सफलता दिलवाई।

यह सब करते हुए 2018 में अपनी राजनीतिक महत्त्वाकांक्षाओं की पूर्ति के लिए  कहें या अपने कूटनीतिक बौद्धिक मित्र पवन के वर्मा—जो तब नीतीश कुमार की जनतादल यूनाइटेड में ही थे—के आग्रह पर जदयू की सदस्यता ग्रहण कर ली। इस बीच नीतीश कुमार सोनिया गांधी के नेतृत्व वाले संप्रग से नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व वाले राजग में आ लिए। थोड़े समय बाद नरेन्द्र मोदी, अमित शाह ने एनआरसी व सीएए का राग छेड़ दिया। राजग के घटक होने के नाते नीतीश इस मुद्दे पर चुप रहे लेकिन अपनी वैचारिक प्रतिबद्धता के चलते पवन के वर्मा और प्रशान्त किशोर ने सीएए व एनआरसी का खुलकर विरोध किया। इसे लेकर नीतीश कुमार पर इतना दबाव पड़ा  कि अन्तत: अपने राष्ट्रीय उपाध्यक्ष प्रशान्त किशोर और राष्ट्रीय प्रवक्ता पवन के वर्मा—दोनों को पार्टी से निष्कासित कर दिया गया। जिनके साथ भी काम किया, नरेन्द्र मोदी को छोड़कर सभी के साथ पीके के निजी रिश्ते कायम हैं, यहां तक कि जदयू के नीतीश कुमार के साथ भी। 

इसी बीच सुलझे विचारों के पवन के वर्मा के साथ उनकी संगत बनी रही। वहीं दूसरी ओर 2019 की जीत के बाद केन्द्र में नरेन्द्र मोदी के समान्तर सत्ता के केन्द्र बने अमित शाह की अगुवाई में लगातार सीएए, एनआरसी और इसके साथ ही धारा 370 की खुर्दबुर्दगी जैसे निर्णय लिए गये, आरोपियों के साथ भेदभावपूर्ण व्यवहार किया जाने लगा। माहौल खराब करने में लिप्त लोगों के साथ सम्प्रदाय और विचार के आधार पर रियायत बरतना, इसी आधार पर झूठे मामले बना लोगों को लंबे समय तक जेलों में प्रताडि़त किया जाने लगा। इससे देश में न केवल माहौल खराब होने लगा बल्कि संविधान में भरोसा करने वालों में निराशा और आक्रोश भी व्यापने लगा।

लगता है इन्हीं सब के चलते पीके की अन्तरआत्मा उन्हें कोसने लगी। इसीलिए लगभग दो वर्ष से वे मोदी-शाह का सशक्त विकल्प खड़ा करने की कोशिश में लगे हैं। कांग्रेस हाइकमान के साथ पिछले वर्ष भी कई बैठकें कीं, संभवत: राहुल गांधी उनकी पूरी रूपरेखा पर सहमत नहीं हो पाये। राहुल ऐजेन्डा एकदम साफ-सुथरा चाहते होंगे। अपनी उस पहली कोशिश में कांग्रेस से निराश पीके ने ममता बनर्जी में केन्द्रीय नेतृत्व की क्षमता तलाशनी चाही। ममता के लिए विपक्ष के दिग्गजों और विभिन्न क्षत्रपों से मुलाकातें कीं। एक नहीं, अनेक कारणों से ममता बनर्जी के नेतृत्व पर सहमति नहीं बन पायी। सभी से यही सलाह मिली कि 2019 में लगभग 20 प्रतिशत वोट हासिल करने वाली कांग्रेस के बिना मजबूत विकल्प की बात बेमानी है।

देश की वर्तमान दुर्दशा से आहत प्रशान्त किशोर इसके लिए कहीं खुद को भी दोषी मानते हैं, क्योंकि 2014 के जिस चुनाव से नरेन्द्र मोदी को भारी जीत मिली, उसमें पीके की बड़ी भूमिका थी। शायद इसीलिए वे देश को इस बुरे दौर से निकालने की जद्दोजेहद में हैं। घूम फिर कर इन दिनों वे फिर कांग्रेस के मुखातिब हुए। नई रूपरेखा के साथ कांग्रेस हाइकमान संग अनेक बैठकें कीं।

लेकिन इस बार भी बात सिरे नहीं चढ़ी। इसी को लेकर मीडिया-सोशल मीडिया में न केवल पीके पर आक्षेप लगाये जा रहे हैं, बल्कि कांग्रेस और नेहरू-गांधी परिवार अपनी कुठाएं निकाल रहे हैं। पीके पर आक्षेप लगाने वालों को यह समझना होगा कि प्रोफेशनल लॉयल्टी और वैचारिक निष्ठा—दोनों अलग-अलग हो सकते हैं। अन्य नेताओं तथा पार्टियों के साथ जो काम पीके ने किया वह उसकी प्रोफेशनल जरूरत थी। साथ ही वे समय-समय पर अपनी वैचारिक निष्ठा भी जाहिर करते रहे हैं। कांग्रेस में उनकी रुचि वैचारिक निष्ठा के चलते है न कि प्रोफेशनल लॉयल्टी के चलते। इसी तरह कांग्रेस को लेकर भी यह समझना होगा कि पीके ने जिनके लिए भी काम किया वे सब पार्टी सुप्रीमो थे जबकि कांग्रेस में हाइकमान तो है लेकिन सुप्रीमो जैसा कुछ नहीं। खासकर सोनिया-राहुल गांधी के बाद, कांग्रेस के निर्णयों में अनेक वरिष्ठ नेता शामिल होते हैं। पीके से हुए संवाद की जो खबरें आ रही हैं, उससे इसकी पुष्टि भी होती है। इसलिए पीके को भी इस गतिरोध को उसी लोकतांत्रिक परिप्रेक्ष्य में देखना चाहिए। ऐसा भी हो सकता है और है ही कि पीके की एंट्री से कांग्रेस के कुछ वरिष्ठ नेताओं को अपनी हैसियत कम होती या खत्म होती लगने लगी हो।

प्रशान्त किशोर भी चाहते होंगे कि उन्हें कांग्रेस में ऐसी हैसियत मिले कि वे पूरी क्षमता के साथ अपनी रणनीति को जमीनी जामा पहना सकें। हालांकि कांग्रेस के साथ काम करना पीके के लिए पिछले टास्क्स जितना आसान नहीं होगा। एक वजह यह भी हो सकती है कि राहुल गांधी अपनी दादी और पिता से उलट मूल्यों की राजनीति करने के प्रबल आग्रही हैं। वहीं दूसरी ओर वर्तमान समय में जब मीडिया और सोशल मीडिया के माध्यम से झूठ और सांप्रदायिक राष्ट्रवाद से आज की दो पीढिय़ों को संक्रमित कर जहरीला बना दिया गया है कि वे सच सुनने को ही तैयार नहीं है, ये जहर-बुझे लोग सत्ता की शह से बेधड़क भी हैं। 

वर्तमान समय में जब राजनीति अराजक हो गयी है तो मूल्यगत मर्यादाओं के साथ काम कर परिणाम हासिल करना मुश्किल है। ऐसे में उम्मीद ही कर सकते हैं कि जो भी हो देश और आमजन के लिए अच्छा हो।

अन्त में सवाल यह कि प्रशान्त किशोर कांग्रेस में शामिल होकर चुनावी जिम्मेदारी संभालते तो इन दो बड़ी चुनौतियों से कैसे निपटते, इसका रास्ता भी उन्होंने अवश्य सोचा होगा। पहली, 2014 के लोकसभा चुनाव में उन्होंने उस भाजपा के लिए काम किया जिसके पास आरएसएस जैसा ऐसा देशव्यापी संगठन है जिसके बुद्धिबंद स्वयंसेवक ऊपर से मिले निर्देशों का पालन अक्षरश: करते हैं। कांग्रेस के पास ऐसा संगठन होना तो दूर की बात, समर्पित कार्यकर्ता तक नहीं हैं। दूसरी चुनौती होती—पीके की कम्पनी जो विभिन्न दलों के साथ अनुबंध करके काम करती है। जैसा कि सुन रहे हैं कि हाल ही में उनकी कंपनी ने तेलंगाना की टीआरएस के साथ अनुबंध किया है। तेलंगाना में 2023 में विधानसभा चुनाव होने हैं। कांग्रेस वहां दूसरी बड़ी पार्टी है। ऐसे में दोनों को एक साथ पीके कैसे साधते। अनुबंध अनुसार कंपनी के माध्यम से टीआरएस के लिए काम करेंगे तो वहां की कांग्रेस के लिए पीके की क्या भूमिका होती—कांग्रेस के कुछ वरिष्ठों ने यह सवाल भी उठाया है। ऐसी आशंका में 1979 की उस उथल-पुथल का स्मरण हो आया जिसमें दोहरी सदस्यता के मुद्दे पर जनता पार्टी की सरकार चली गयी थी।

—दीपचंद सांखला

27 अप्रेल, 2022

Thursday, April 21, 2022

बीकानेर लोकसभा क्षेत्र की राजनीति

राजस्थान विधानसभा चुनाव 2023 के अन्त में होने हैं और लोकसभा चुनाव 2024 के मध्य में। चूंकि हमारे प्रधानमंत्री बारह महीने सुपर-प्रचारक मोड में ज्यादा रहते हैं, इसलिए कई पार्टियां और नेता समयपूर्व तैयारी में लग गये हैं। बीकानेर जिले में सात विधानसभा क्षेत्र हैं, सातों में दोनों मुख्य पार्टियों—कांग्रेस और भाजपा के उम्मीदवारों में कोई खास बदलाव नहीं लगता। बीकानेर शहर की दोनों सीटों पर बदलाव की गुंजाइश जरूर लगती है, लेकिन इस पर कोई अनुमान फिलहाल संभव नहीं है। हो सकता है शहर की दोनों सीटों पर दोनों पार्टियां नये उम्मीदवार दें या जो वर्तमान में विधायक हैं, उन्हें रिपीट करें। बात आम आदमी पार्टी की राजस्थान में दस्तक देने की चल रही है। यह गुजरात, हिमाचल प्रदेश के नतीजें पर निर्भर करेगा और ऐसा नहीं भी हो लेकिन राजस्थान में पंजाब वाली स्थिति नहीं है। यहां भाजपा पहले से ही अच्छी स्थिति में है, ऐसे में हो सकता है आम आदमी पार्टी बजाय कांग्रेस के भाजपा को नुकसान पहुंचाए।

बीकानेर लोकसभा क्षेत्र से भाजपा की ओर से वर्तमान सांसद और केन्द्रीय राज्य मंत्री अर्जुनराम मेघवाल सदन में मेज थप-थपा कर और हंस-हंस कर अपनी उम्मीदवारी पक्की करने में लगातार लगे हुए हैं। यदि भाजपा के केन्द्रीय नेतृत्व में परिवर्तन नहीं होगा तो बीकानेर से उम्मीदवारी में भी परिवर्तन नहीं होगा। अर्जुनराम मेघवाल ने जिला मुख्यालय पर अंबेडकर जयंती की पूर्व संध्या (13 अप्रेल) को शक्ति प्रदर्शन का कार्यक्रम रखा। इसी के काउण्टर में कांग्रेस के खाजूवाला विधायक और सूबे में केबीनेट मंत्री गोविन्दराम मेघवाल ने 14 अप्रेल को कार्यक्रम रख उतर-पातर कर लिया।

ऐसी रैलियों की कूत अब तक लोगों के शामिल होने की संख्या से की जाती थी, लेकिन भीड़ जब से मैनेज की जाने लगी, तब से विशेषज्ञ-कूत का पैमाना बदल गया है। अब देखा जाता है कि आपकी पार्टी से क्षेत्र के कितने नेता आपके साथ हैं।

बीकानेर क्षेत्र से लोकसभा सीट पर अर्जुनराम मेघवाल के संभावित प्रतिद्वंद्वी गोविन्दराम माने जाते हैं। ऐसे में इन रैलियों का ऑब्जरवेशन ज्यादा महत्त्वपूर्ण है। अर्जुनराम मेघवाल के साथ जिले के वरिष्ठ भाजपा नेता सामान्यत: नहीं होते हैं, इसलिए अपने आयोजनों में वे केन्द्र के किसी छुटभैये मंत्री को लाकर भरपाई करते रहे हैं, चूंकि इस बार इन्हीं दिनों दिल्ली में बड़े आयोजन थे इसलिए दिल्ली से कोई आये नहीं। 13 अप्रेल की उनकी रैली में राज्यस्तरीय छोड़ जिले से भी कोई वरिष्ठ नेता नहीं थे। मतलब यही कि अर्जुनराम मेघवाल अपनी ब्यूरोक्रेटिक हेकड़ी के चलते चुनावी जीत के लिए केवल मोदी नाम पर निर्भर हैं।

वहीं इसके उलट गोविन्दराम मेघवाल की रैली में जिले के अधिकतर वरिष्ठ कांग्रेसी नेता शामिल हुए जिनमें सूबे के अल्पसंख्यक आयोग के अध्यक्ष को भी ले आये। मतलब यही कि अर्जुनराम मेघवाल जहां पूरी तरह मोदी नाम पर निर्भर हैं वहीं गोविन्दराम मेघवाल क्षेत्र की राजनीति अपने बूते कर रहे हैं।

 दूसरी बात यह कि अर्जुनराम मेघवाल जहां अपने बेटे को राजनीति में लॉन्च करने में अभी तक असफल रहे हैं वहीं गोविंदराम अपने बेटी-बेटे दोनों को राजनीति में अच्छे से स्थापित कर चुके हैं। 

गोविन्दराम को तो बस रामेश्वर डूडी को साधना बाकी है, जिसकी गुंजाइश डूडी की हेकड़ी और बचकानी राजनीति के चलते कम लगती है।

यद्यपि पिछली बार 2019 में भी अपनी पुत्री सरिता चौहान या अपने लिए गोविन्दराम ने कांग्रेस से उम्मीदवारी की कोशिश की थी। लेकिन रामेश्वर डूडी के चलते सफल नहीं हो पाए। रामेश्वर डूडी ने जिन्हें चाहा उनके लिए उम्मीदवारी ले आए, लेकिन जिता नहीं पाये। रामेश्वर डूडी ने उम्मीदवारी दिलाई अर्जुनराम मेघवाल के रिश्ते में भाई पूर्व आईपीएस अधिकारी मदनगोपाल को। पूर्व आईएएस अर्जुनराम की ही तरह मदनगोपाल मेघवाल ने भी राजनीति में आने के लिए समयपूर्व वीआरएस लिया। अन्यथा वे एडीजी के तौर पर सेवानिवृत्त हो सकते थे।

कोशिश 2024 में भी मदनगोपाल कांग्रेस से उम्मीदवारी की करेंगे और गोविन्दराम मेघवाल से खुनस के चलते रामेश्वर डूडी भी सहयोग करेंगे। हो सकता है इस बार भी मदनगोपाल मेघवाल को उम्मीदवारी मिल भी जाए। लेकिन डूडी के बारे में जो आकलन है, और जिसे लिखता भी रहा हूं कि डूडी खुद चुनाव जीत सकते हैं, और किसी अन्य को चुनाव हरा भी सकते हैं, लेकिन किसी को जितवा भी सकते हैं—ऐसी कूवत डूडी में नहीं है, और ये भी कि गोविन्दराम मेघवाल के मुकाबले मदनगोपाल मेघवाल का प्रभाव बीकानेर लोकसभा क्षेत्र में न के बराबर है। गोविन्दराम जहां एक से अधिक विधानसभा क्षेत्रों की नुमाइंदगी कर चुके वहीं अन्य विधानसभा क्षेत्रों के विधायकों और पूर्व विधायकों से उनके अच्छे संबंध है। वहीं डूडी जिले के अन्य नेताओं से कभी अच्छे सम्पर्क बनाकर नहीं रख पाए। गोविन्दराम मेघवाल के लिए एक सकारात्मक पक्ष उनकी बेटी का स्त्री उम्मीदवार होना भी हो सकता है। वे अपनी बेटी सरिता चौहान को ही सांसद बनाना चाहते हैं जो एक अरसे से राजनीति में सक्रिय भी है। प्रियंका गांधी के फॉर्मूले को लागू किया गया तो बीकानेर लोकसभा क्षेत्र से सरिता चौहान से बेहतर उम्मीदवार कांग्रेस के पास फिलहाल नहीं दिख रहा है वहीं गोविन्दराम चुनाव लडऩे-लड़वाने में पारंगत हैं ही।

—दीपचंद सांखला

21 अप्रेल, 2022

Wednesday, March 30, 2022

चिन्ता विकल्पहीनता की है, विपक्षहीनता की नहीं

 हाल ही में पांच राज्यों (उत्तराखंड, पंजाब, उत्तरप्रदेश, मणिपुर और गोवा) में हुए विधानसभा चुनावों के परिणामों में विपक्षहीनता की चिन्ता प्रत्यक्ष है। वहीं मोदी समर्थक बड़ा और मुखर समूह परिणामों पर लहालोट है। देश में सबसे बड़ी विपक्षी पार्टी कांग्रेस का आधार लगातार खिसकता जा रहा है। इसकी वजह भी है, देश में पहली बार किसी पार्टी या उससे जुड़े नेहरू-गांधी परिवार के खिलाफ लम्बे अरसे से झूठ आधारित नकारात्मक अभियान के तहत ऐसा हो रहा है।

इस परिप्रेक्ष्य में आगे बातें करें उससे पूर्व हमें एक नजर अपने लोकतांत्रिक देश के इतिहास पर डाल लेनी चाहिए। 1947 में आजादी के बाद जो अंतरिम सरकार बनी उसमें सभी विचारधाराओं का प्रतिनिधित्व था और उसी की देखरेख में हमारे देश के संविधान का निर्माण भी हुआ। हमने बहुदलीय लोकतांत्रिक प्रणाली को स्वीकार किया जिसके तहत 1951-52 में लोकसभा और प्रान्तों की विधानसभाएं चुनी गयीं।

अपने-अपने प्रभाव और सामथ्र्य के अनुसार सभी दलों ने उसमें हिस्सा लिया, लोकसभा और विधानसभाओं में सभी दलों के प्रतिनिधि चुनकर भी पहुंचे। चूंकि आजादी का आन्दोलन कांग्रेस के नेतृत्व में चला इसलिए उसका प्रभावक्षेत्र पूरे देश में था-अत: ना केवल केन्द्र में बल्कि सभी प्रांतों में कांग्रेस की सरकारें बनीं। देश के पहले चुने हुए प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू बने। देश के हर क्षेत्र में शून्य से शुरू करने की चुनौतियों में नेहरू के सामने यह चुनौती भी छोटी नहीं थी कि एक बहुदलीय राजनीतिक व्यवस्था विकसित हो। नेहरू विपक्षी विचारधाराओं से देश को मुक्त करने का आह्वान तो दूर, उन्हें बनाये रखने के लिए अपने सहयोगियों तक से जूझे। गांधी हत्या में शामिल राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ पर गृहमंत्री के नाते सरदार पटेल ने जब प्रतिबंध लगाया तो वे नेहरू ही थे जिन्होंने पटले को इस तरह के निर्णयों से बचने को कहा और प्रतिबंध हटाने के लिए तैयार किया। नेहरू विपक्षी पार्टियों और उनके नेताओं को हमेशा प्रोत्साहित करते, जिसका प्रमाण है 1967 के चुनाव परिणाम। लगभग शून्य से शुरू हुआ विपक्ष 1967 के चुनावों तक कांग्रेस के लिए एक चुनौती बनकर उभरा जिसमें समाजवादी पार्टियां प्रमुख थीं। यही वजह है कि 1967 के चुनाव के बाद तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी को आर्थिक क्षेत्र में समाजवादी कदम उठाने पड़े। 1971 के चुनाव परिणामों में इन्दिरा गांधी की शानदार जीत में 1971 के युद्ध में पाकिस्तान पर शानदार विजय के अलावा इन्दिरा सरकार के समाजवादी कदम भी मुख्य कारण बने। उठाव ले रही समाजवादी पार्टियों के लिए यह किसी झटके से कम नहीं था। इन्दिरा गांधी की आपातकाल लगाने जैसी बड़ी भूल ने केवल विपक्षी के लिए संजीवनी का काम किया बल्कि उत्तर भारत में कांग्रेस की साख को बड़ा झटका भी दिया। चूंकि इंदिरा गांधी लोकतांत्रिक संस्कारों में पली-बढ़ी थी, इसलिए आपातकाल लम्बा खींचते हुए मात्र 19 महीने बाद ही चुनाव करवाने को तैयार हो गयीं।

1977 के बाद के भारतीय लोकतंत्र पर नजर डालें तो कांग्रेस का एक छत्र राज कभी नहीं रहा, केन्द्र में और ही राज्यों में। यह सब बताने का मकसद इतना ही है कि वर्तमान दौर से पूर्व किसी सत्ता की विपक्ष को खत्म करने की मंशा कभी नहीं रही। बल्कि सदन में पुरजोर विरोध के बावजूद आपसी सौम्यता-सौजन्यता हमेशा बनी रही जिसके अनेक उदाहरण मिलते हैं।

वर्तमान परिप्रेक्ष्य पर बात करने से पूर्व ये समझना होगा कि विपक्ष और विकल्प, दो अलग-अलग हैं। विपक्ष को समझें तो दक्षिणपंथी पार्टियों का एक पक्ष है जिसमें भारतीय जनता पार्टी, आम आदमी पार्टी, एआईएमआईएम जैसी पार्टियां हैं तो वामपंथी में तमाम वामपंथी पार्टियों को ले सकते हैं, जो फिलहाल अपने जैसे-तैसे अस्तित्व को बनाये रखने के लिए जूझ रही हैं। समाजवादी पार्टियां परिवार या समूह विशेष में या क्षेत्रिय पार्टियों में सिमट कर रह गयी हैं। बची मध्यमार्गी कांग्रेस तो वह भी अब अपने बचे-खुचे अस्तित्व को ही बनाये रखने की चुनौतियां झेल रही है। 2019 चुनाव परिणामों में विभिन्न पार्टियों के वोट शेयर को देखें तो विपक्ष खत्म नहीं हुआ है। लगभग 60 प्रतिशत वोट शेयर के साथ वह आज भी खड़ा है, वह चाहे तो सत्ता पक्ष के लिए बड़ी चुनौती बन सकता है।

बड़ी उम्मीद वाली बहुजन समाजवादी पार्टी खुद से उम्मीदें पूरी तरह खत्म कर चुकी है। अनुसूचित जातियों की कोई नई पार्टी बने और कांशीराम जैसी सोच और इच्छाशक्ति वाला नेता आगे आये तो इनकी प्रभावी पार्टी खड़ी हो सकती है। ओबीसी ने अपनी सोच को कथित सवर्णों से नत्थी कर दिया है। नरेन्द्र मोदी जैसा कोई खड़ा भी होगा तो मोदी की तरह उसी सोच के लिए काम करेगा, अपने और अपने से कमजोर के लिए नहीं। 

वामपंथी पार्टियों की लाइन यूरोपियन है। इनमें कोई नयी धारा ऐसी खड़ी हो, जिसकी सोच, शब्दावली और तौर-तरीके भारतीयता के अनुकूल हो तो वामपंथ की गुंजाइश अभी यहां खत्म नहीं हुई हैबल्कि गांधी के विचारों की तरह ही वामपंथ की गुंजाइश यहां कभी खत्म नहीं होगी बल्कि गांधी, अम्बेडकर और भगतसिंह की वैचारिक त्रिवेणी ज्यादा अच्छे से ना केवल हमारे लोकतंत्र को सींचती रह सकती है बल्कि आमजन के लिए बेहतर आर्थिक-सामाजिक स्थितियां बनाने में कारगर भी साबित हो सकती है।

विकल्प का दायरा सीमित है। पार्टियों के भीतर नेतृत्व के विकल्प का अकाल साफ नजर आता है। जैसे भाजपा में नरेन्द्र मोदी का विकल्प अभी तक नजर नहीं रहा था। लेकिन अब अमित शाह और योगी आदित्यनाथ के नाम लिए जाने लगे हैं। भाजपा के लिए यह सब मुश्किल नहीं, क्योंकि उनकी पितृ संस्था राष्ट्रीय स्व्यंसेवक संघ जरूरत पडऩे पर इसे अच्छे से हैंडल कर सकती है। लेकिन यह भी कि लोकतंत्र बना रहा तो जरूरी नहीं कि भाजपा हमेशा आज वाली स्थिति में ही हो। 

दूसरी बात कांग्रेस की है जहां जबरदस्त विकल्पहीनता है। जमीनी नेता कोई नहीं है। घरानों से आए हुए और प्रोफेशनल्स का जमावड़ा है। गिनती के नेता हैं जो जमीन से जुड़े हैं। यही वजह है कि कांग्रेस को हमेशा नेहरू-गांधी परिवार पर निर्भर रहना पड़ता है। 2019 के चुनावों में अपनी सबसे बुरी स्थिति के बावजूद कांग्रेस का वोट शेयर 19 प्रतिशत ज्यादा है जो भाजपा के वोट शेयर से आधा है। वोट शेयर के मामले में शेष सभी विपक्षी पार्टियां 5 प्रतिशत के पार जाती हांफने लगती हैं। 

अपनी यूरोपियन सोच और ऐजेन्डे के चलते वामपंथी पार्टियों का वोट शेयर लगातार घट रहा है। इसकी एक बड़ी वजह उनकी धर्मविरोधी छाप भी रही है जिसे आरएसएस ने अच्छे से भुनाते हुए आमजन में उन्हें लगभग अछूत के तौर पर स्थापित कर दिया है। समाजवादी पार्टियां पारिवारिक पार्टियां बनकर नाम या छाप की समाजवादी रह गयी हैं, इनका अस्तित्व अन्य क्षेत्रीय पार्टियों से भिन्न नहीं है।

वर्तमान में दक्षिणपंथी आम आदमी पार्टी की तरह ही बहुजन विचार के साथ कांशीराम द्वारा स्थापित बहुजन समाज पार्टी अपने गैर संगठनीय कार्य-कलापों के चलते खत्म होने के कगार पर है, जबकि भविष्य की राजनीति में इस पार्टी से सर्वाधिक उम्मीदें थीं।

वर्तमान की चिन्ता यह है कि मोदी-शाह के तौर-तरीकों के चलते जब न्यायपालिका, व्यवस्थापिका, कार्यपालिका सहित मीडिया भी जब अपने असल अस्तित्व के लिए जूझ रहा है, तब इन परिस्तिथियों से निकला कैसे जाए ? ऐसे में उम्मीदें विपक्ष पर टिकती हैं। फिर वह चाहे जैसा-तैसा भी हो। 1977 की तरह घोषित आपातकाल भी नहीं है, जिसने विपक्ष को एक होने को मजबूर कर दिया था। वर्तमान में सत्ता पक्ष की ओर से हर वह निकृष्टता अपनायी जा रही है जिससे विपक्ष और विपक्ष के नेता पंगु हो जाएं। इन्दिरा गांधी के लगाये आपातकाल में इस तरह की स्थितियां नहीं थी।

लेकिन उम्मीदें खत्म इसलिए नहीं मान सकते कि 2019 के लोकसभा चुनाव के आंकड़ों को देखें तो कुल मतदान का 60 प्रतिशत वोट विपक्ष के साथ तथा लगभग 40 प्रतिशत भाजपा के साथ था। मतदान प्रतिशत को बाद करके देखें तो देश के कुल मतदाताओं में से मात्र 24 प्रतिशत मतदाता ही संघ-मोदी या भाजपा के साथ थे। ये आंकड़े अभी भी लोकतंत्र के प्रति भरोसा बनाये रखने के लिए पर्याप्त हैं।

वर्तमान परिस्थितियों से निकलने के लिए विपक्ष 1977 की तरह फिर एक क्यों नहीं हो सकता ? मानते हैं वह प्रयोग विफल रहा। लेकिन लोकतंत्र का कोई प्रयोग सर्वथा विफल नहीं होता। लोकतंत्र में विफलताएं सबक बनती हैं।

अन्त में, विपक्ष किस तरह एक होकर वर्तमान में संतुलन बना सकता हैइस पर बात कर लेते हैं। विपक्षी एकता के नेतृत्व के लिए कांग्रेस के राहुल गांधी के अलावा जिन चेहरों पर बात होती रही है उनमें नीतिश कुमार तो कभी के फिस्स हो लिए। उनके बाद शरद पवार का नाम भी लिया जाता रहा है। पवार 80 वर्ष के पार हैं, अस्वस्थ हैं, अलावा इसके उनके इतने झमेले हैं कि कोई कोई पुरानी फाइल खुल सकती है। शायद इसलिए वे विपक्षी एकता को नेतृत्व देने के लिए तैयार नहीं लगते। ममता बनर्जी का नाम भी चला, लेकिन शॉर्ट टेम्पर्ड ममता का मिजाज देशव्यापी नेतृत्व का नहीं है-एक सूबे की पार्टी वे अपने तरीके से चला सकती हैं। अलग-अलग ऐजेन्डे और सोच वाली देश की विभिन्न पार्टियों को जोड़कर रखने जैसी कूवत सोनिया गांधी में थी, वैसा नेता चाहिए। दक्षिण के किसी नेता की रुचि राष्ट्रीय राजनीति में नहीं है। उनके खुद के इतने झमेले हैं कि वे उन्हें ही संभाल लें तो बहुत है।

एक नेता जिस पर अभी तक इस तरह से विचार नहीं हुआ, वे उद्धव ठाकरे हो सकते हैं। शिव सेना को संभालने के बाद उन्होंने अपनी नेतृत्व क्षमता अलग तरह से साबित की है। यहां यह स्पष्ट कर देना जरूरी है कि शिव सेना जो एक दक्षिणपंथी पार्टी मानी जाती है, वह भाजपा, आम आदमी पार्टी या एआईएमआईएम जैसी दक्षिणपंथी पार्टी नहीं है। शिव सेना की सांप्रदायिकता और क्षेत्रीयतावाद रणनीतिक है कि वैचारिक। यह स्पष्ट उद्धव ठाकरे के नेतृत्व के बाद ही हो पाया। खुली सोच और सामंजस्यवादी मिजाज के चलते विपक्षी नेता का जिम्मा उद्धव ठाकरे को दिया जा सकता है, मुख्यमंत्री रहते हुए भी वे इसे बखूबी अंजाम दे सकते हैं।

इस तरह से अपनी बात रखने का मकसद इतना ही है कि विपक्ष होगा तो संविधान बचेगा, लोकतंत्र बचेगाये सब बचेंगे तभी देश बचेगा अन्यथा 1947 से ज्यादा बिखराव के कगार पर देश पहुंच जायेगा। तब गांधी थे, नेहरू थे, वैसा अब कोई नहीं है। अत: देश के लिए विपक्ष का मजबूत होना जरूरी है।

दीपचंद सांखला

31 मार्च, 2022